शुक्रवार, 5 नवम्बर 2010

विचार-३६ :: स्वार्थी

स्वार्थी
आंख के अंधे को दुनिया नहीं दिखती, काम के अंधे को विवेक नहीं दिखता, मद के अंधे को अपने से श्रेष्ठ नहीं दिखता और स्वार्थी को कहीं भी दोष नहीं दिखता।
-चाणक्य

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