बृहस्पतिवार, 25 नवम्बर 2010

विचार-७५ :: आज महिला हिंसा विरोधी दिवस है

आज महिला हिंसा विरोधी दिवस है

  • यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः| यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥

    २५ नवम्बर १९६० को डोमिनिकन गणराज्य के तानाशाह की विरोधी तीन मीराबेल बहनों की उनकी राजनीतिक गतिविधियों को लेकर क्रूरतापूर्वक हत्या कर दी गई थी।

  • उनकी ही याद में २५ नवम्बर को महिला हिंसा विरोधी दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने १९९९ के दिसम्बर महीने में एक प्रस्ताव के माध्यम से २५ नवम्बर को महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा उन्मूलन का अंतरराष्ट्रीय दिवस घोषित किया था।

हिंसा उन्मूलन दिवस पर देखें यथार्थ क्या है?

  • राष्‍ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्‍यूरो के अनुसार देश में

    • हर 29 मिनट पर एक महिला के साथ दुष्‍कर्म होता है।

    • प्रतिदिन दहेज हिंसा के नाम पर 50 मामले दर्ज होते हैं।

    • हर तीन मिनट पर दर्ज होता है महिला के ख़िलाफ़ हिंसा का एक मामला।

    • हर साल 7600 महिलाएं होती है दहेज हत्‍या का शिकार।

  • विश्व स्तर पर –

    • हर १० महिला में से एक महिला अपने जीवन में कभी न कभी शारीरिक या यौन हिंसा का शिकार होती हैं।

  • १९९४ के विश्व बैंक के एक अध्ययन के अनुसार लड़कियों और महिलाओं के लिए जिन दस जोखिम कारकों का चयन किया गया था उनमें बलात्कार और घरेलू हिंसा को सबसे खतरनाक माना गया है।

  • समाज के गिद्ध अपने फड़फड़ाते डैनों से और नुकीली चोंच और लपलपाती जिह्वा से बना रहें हैं महिलाओं को अपना शिकार।

  • ……. और हम नारे लगा रहे हैं नारी मुक्ति का, नारी स्वातंत्र्य का, ... क्या अभिशाप है, ... पश्चाताप है, घोर पश्चाताप है!

  • पाश्चात्य संस्कृति के कुछ नारों पर भी ग़ौर करें

    • स्त्री मुक्ति के नारे

    • यौन मुक्ति के नारे

    • विवाह मुक्ति के नारे

    • लिव-इन-रिलेशनशीप के नाम पर पुरुष मुक्ति के नारे, समलिंगी सहवास … होगा क्या इससे विकास!

ज़रा एक पल रुक कर सोचिए

  • विवाह और परिवार बंधन है या सुरक्षा का आधार ... मत बनाओ बहस का विषय विवाह रूपी संस्था को! ये संस्था हमसे ही बनती है, मिटती भी हमसे ही है

  • यह निर्विवाद सत्य है कि सामरसता की धरा पर ही प्रेम पल सकता है …. भय, हिंसा और एकाधिकार से यह संभव नहीं

  • सच है यह भी

    • कि क़ानून ढेर सारे हैं, पर महिलाओं के ख़िलाफ़ न सिर्फ़ हिंसा ज़ारी हैं बल्कि दिन-प्रतिदिन बढती ही जा रही हैं। जन्म लेते ही उनके ख़िलाफ़ हिंसा का चक्र शुरु हो जाता है।

  • यह सच है कि उनकी वेदना और त्रासदी को पुरुष लिख सकता नहीं

    • क्योंकि यह कड़वा सच तो हमारे पुरुष समाज की ही देन हैं

      • सती प्रथा

      • पर्दा प्रथा

      • बाल-विवाह

      • कन्या वध

      • बहु विवाह

      • विधवा प्रताड़ना

      • दहेज हत्या

      • बालिका भ्रूण हत्या

      • ऑनर किलिंग

      • पति और परिवार के सदस्यों का बुरा वार्ताव

      • छेड़-छाड़

      • तेज़ाब से हमला

      • साइबर अपराध

      • एम एम एस

      • दफ़्तरों में छेड़-छाड़

हां मानता हूं

  • हमारे इस पुरुष प्रधान समाज में यह भी मान लिया गया है कि नारी –

    • वस्तु है

    • संपत्ति है

    • संभोग और संतान की इच्छा पूरी करने का साधन मात्र

    • उपभोक्तावादी संस्कृति में उपभोग्य वस्तु

  • यह प्रश्न भी उचित है कि क्या नारी होना ही बोझ है

  • इस पुरुष प्रधान समाज में नारियों के साथ जुड़ा है

    • भावनात्मक हिंसा का शिकार

    • कहीं व्याभिचार

    • कहीं बलात्कार

    • पति की गालियां

    • पीहर के लिए अपशब्द

    • दुश्चरित्र की संज्ञा

    • अवहेलना

    • परस्त्रीगमन

    • अवमानना

    • प्रताड़ना

    • यौनाचार की घटना

    • अमानवीय व्यवहार

    • दोहरी भूमिका का तनाव

    • सामाजिक कुसंस्कार के पिंजड़े में बंद

    • पराया धन का तमगा

    • अनर्गल और बर्बर परंपराएं

 

  • इन सब से नारियां खुद को असुरक्षित, अपमानित, पीड़ादायी स्थितियों में ही नहीं पातीं बल्कि नारकीय जीवन जीने को अभिशप्त हैं।

  • पुरुष प्रधान समाज की दोमुंही नीति़ और दोहरा मापदंड, हां दोहरा मानदंड का शिकार भी होना पड़ता है उन्हें

    • एक ओर नारी श्रद्धा का पात्र है

    • दूसरी ओर विकास में अवरोधक है

    • एक ओर बालिका पूजा

    • दूसरी ओर कन्या भ्रूण हत्या

    • एक ओर घर की लक्ष्मी कहते

    • दूसरी ओर सम्पत्ति में अधिकार ही नहीं है

और फिर भी चाहिए

  • समर्पणशील, पतिव्रता पत्नी।

 

  • इस सामंजस्य के अभाव से उत्पन्न हो रही हैं कई समस्यायें

    • घर में अशान्ति

    • अव्यवस्था

    • कलह-क्लेश

    • परिवार टूटना

    • तलाक़ मे वृद्धि

 

कौन है इसका जिम्मेदार

    • सरकारी मशीनरी?

    • शिक्षा??

  • हमारी सामाजिक मानसिकता???

  • या नारी स्वयं???? --- महादेवी वर्मा ने अतीत के चलचित्र में कहा था – “एक पुरुष के प्रति अन्याय की कल्पना से ही सारा पुरुष समाज उस स्त्री से प्रतिशोध लेने को उतारू हो जाता है और एक स्त्री के साथ क्रूरतम अन्याय का प्रमाण पाकर भी सब स्त्रियां उसके अकारण दण्ड को अधिक भारी बनाए बिना नहीं रहतीं।”

 

  • हिंसा तो घर से शुरु हो जाता है उनके ख़िलाफ़।

  • बेटे के लालच में बेटियों को मारना कहां तक जायज है?

  • लगता है आज की उपभोक्तावादी संस्कृति का कुप्रभाव है महिलाओं पर हिंसा।

  • पुरुष प्रधान समाज की सामंती सोच का नतीजा भी, जैसे ऑनर किलिंग।

  • लड़के-लड़कियों में भेद-भाव

  • उद्देश्य मानों सिर्फ़ शादी करना\करा देना रह गया हो

  • महज वंश-वृद्धि का माध्यम माना जाता है

 

समाधान क्या है?

  • सोच में बदलाव की ज़रूरत

  • उचित शिक्षा

  • सही परवरिश

  • स्वावलम्बन

 

बात समाप्त करने से पहले मनुस्मृति की पंक्तियां याद करता/दिलाता चलूं

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः

यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥

जहां स्त्रियां पूजित होती हैं, वहां देवताओं का वास होता है। जहां इनकी पूजा नहीं होती वहां सब क्रियाएं निष्फल होती हैं।

और यदि अरस्तू की मानें तो –

नारी की उन्नति या अवनति पर ही राष्ट्र की उन्नति या अवनति निर्धारित है।

आपका क्या विचार है?

71 टिप्‍पणियां:

  1. आज का यह विचार और विश्लेषण अति उत्तम है ....यह पोस्ट संग्रहणीय है ...और गहन विचार करने वाली .....ऐसी सार्थक पोस्ट के लिए आभार व्यक्त करना भी कम ही होगा ....

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  2. कहा जाता है नारी परिवार[ समाज और राष्ट्र की धुरी है परन्तु उसकी स्थिति बेहद शोचनीय है . समाज में फैले व्यभिचार और कुविचार का एक सशक्त कारण यह भी है की आज महिलाओं की सम्माननीय गरिमा में हर स्तर पर गिरावट आई है . इसी बीमार मानसिकता के चलते नारियों का मान हरण हुआ है और कुरीतियाँ नए रूप में सामने आकर समाज और देश को दूषित कर रही है . आपने जो समाधान दिया है

    सोच में बदलाव की ज़रूरत
    उचित शिक्षा
    सही परवरिश
    स्वावलम्बन


    वही इसका स्थायी समाधान है . समाज के आप जैसे हर बुद्धिजीवी से प्रत्येक महिला की यह अपील है की वे अपने आसपास और परिवेश में अपने सुविचारों का प्रसारण करें ताकि हम भी गरिमा और गर्व से सुरक्षित समाज में अपनी स्थिति कायम रख सकें. हार्दिक शुभकामना .

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ही गंभीर बात है कि महिलाओं के ऊपर होने वाले शोषण के ऊपर सभी खामोश हैं, क्या राजनेता, क्या सामाजिक कार्यकर्त्ता, यहाँ तक मीडिया भी... क्या ख़ामोशी को सहमति समझा जाए?

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  4. आप लोगों की अभिव्यक्ति से भावुक हुआ।
    विचार नहीं, अभिव्यक्ति कहा है।
    शाह नवाज़ जी .... सच ही कह रहे हैं आप कि बहुत ही गंभीर बात है कि महिलाओं के ऊपर होने वाले शोषण के ऊपर सभी खामोश हैं!

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  5. आज का सबसे उत्तम विचार मगर सिर्फ़ विचार तक ही सीमित रह गया है जब तक समग्रता से प्रयास न किये जायें और ऐसा होना संभव नही क्योंकि उससे पुरुष वर्चस्व खत्म होने के आसार बन जायेंगे और ऐसा कौन चाहेगा इसलिए सिर्फ़ कहने भर के लिये रह गया है ये सब वरना तो देखा जाये कितनी ही महिलाओ पर मानसिक शोषण होता है जिसे किसी भी गिनती मे नही लिया जाता कोई ध्यान भी नही देता……………ये तभी संभव है जब एक लम्बी प्रक्रिया सतत और समग्र रूप से चले।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  6. संग्रहनीय एवं विचारणीय पोस्ट!
    सादर!

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  7. वन्दना जी आपसे पूरी तरह सहमत। यह तब तक संभव नहीं है जब तक समग्रता से प्रयास न किया जाए।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  8. अनुपमा जी प्रोत्साहन के लिए आभार।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  9. अपके आँकडे और तथ्य आँखें खोलने के लिये काफी हैं मगर हम तो आँखों पर पट्टी बान्ध कर बैठे हैं कैसे दिखेगा ये सच और आज की सब से बडी और घिनौनी बात जो सामने आयी है वो स्कूलों मे यौन शोषण और सेक्स सकेन्दल्ज़ के रूप मे है। न तो सरकार न कोइ और इसे सही कर सकता है केवल नैतिक शिक्षा पर अधिक जोर दिया जाना चाहिये उसके बाद ही सभी प्रयास सफल होंगे सरकारी तन्त्र भ्रष्टाचार से स्वतन्त्र हो ति ऐसे जाल तोडे जायेंगे जब कि ये सब कुछ व्यवस्था की नाक के नीचे होता है। बहुत विचारणीय पोस्ट है। धन्यवाद}।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  10. निर्मला दीदी, आपके विचार सदा प्रेरक होते हैं। बहुत सही सुझाया आपने की नैतिक शिक्षा पर बल दिया जाना चाहिए।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  11. जिस चीज़ की क़ीमत लगाई जा सके,उनका कोई मूल्य नहीं होता। और,जो चीज़ मूल्यवान होती है,उसकी क़ीमत नहीं लगाई जा सकती। इन्हीं अर्थों में,ध्यान,प्रेम,स्वतंत्रता आदि की ही तरह स्त्री भी 'मूल्यवान' है।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  12. राधारमण जी बहुत उत्तम विचार रखे हैं आपने। और इस अमूल्य निधि की बेकद्री पर सिर शर्म से झुक जाता है।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  13. मनोज जी,
    अनायास ही आपका नया ब्लॉग विचार से हमारा परिचय हुआ । आपके विचार ने हमें यह विचार करने पर मजबूर कर दिया कि वाकई आपके विचार सटीक और मार्गदर्शी है।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  14. एक बेहतरीन पेशकश महिलाओं के विषय पे. औरत के अधिकार बहुत हैं और इसका हल स्वम महिलाओं को निकालना पड़ेगा. औलाद की परवरिश एक मान ही किया करती है और तरबियत भी मान ही देती है. बचपन से औरत की इज्ज़त के बारे मैं औलाद को सिखाओ.
    महिला आकस्मिक रूप से लालची लोगों के हाथ लग गई. अब ये इन महिलाओं का दाइत्व है कि अपनी खोई हुई मर्यादा को दोबारा प्राप्त करने का प्रयास करें और समाज को अनेक बुराइयों से बचा लें.

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  15. जुगल किशोर जी आपके इस विचार से हमें प्रोत्साहन ही नहीं बल भी मिला। आभार आपका।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  16. एस एम मासूम जी आपकी बात भी कहीं न कहीं सच है। खास कर दहेज के मामले में। एक मां को जब बेटे का सौदा करते देखता हूं तो बहुत तकलीफ़ होती है। और दहेज हत्या में कई महिलाएं (सास/ननद) भी दोषी पाई गई हैं।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  17. बेहद सार्थक पोस्ट ,न के बराबर मिलते हैं ऐसे आलेख .निश्चित रूप से संग्रहणीय और विचारणीय.
    बहुत आभार ऐसे उत्तम पोस्ट का.

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  18. शिखा जी आभार आपके इन प्रोत्साहक बातों का।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  19. मनोज जी, पहली बार आपके इस ब्लॉग पर आई हूँ । सर्वप्रथम तो आपको नए ब्लॉग की बधाई । आपने अपने विचार पर जो विषय चुना है उसके बारे में मैं क्या कहूँ.. चूंकि मैं खुद एक महिला हूँ तो जाहिर सी बात है कि आपके विचार से सहमत होऊंगी पर अगर मैं पुरुष होती तो भी आपके विचार से पूर्ण रूप से सहमत होती ।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  20. रीता जी, आपके विचार और प्रोत्साहन के लिए आभार।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  21. बहुत उपयोगी विचार दिए हैं. इन पर चिंतन आवश्यक है.

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  22. आपकी इस पोस्ट का लिंक कल शुक्रवार को (२६--११-- २०१० ) चर्चा मंच पर भी है ...

    http://charchamanch.blogspot.com/

    --

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  23. मनोज जी ;
    सही प्रश्न उठा कर सही जवाब भी तो आपने स्वंय ही मनु -स्मृति के हवाले से दे दिया है. यह सच है की महाभारत काल के बाद वैदिक ज्ञान को भुलाते जाने से हे सारी की सारी समस्याएं उठी हैं और उनका विलोप केवल और केवल वैदिक मान्यताओं की पुनर्स्थापना से ही हो सकता है .बाकी सारी बातें केवल ढोल बजाना ही हैं.

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  24. भूषण जी, सहमत हूं आपसे कि इस विषय पर चिंतन आवश्यक है।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  25. संगीता जी चर्चा मंच पर स्थान देने के लिए आभार।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  26. सच कहा माथुर साहब। हमारी कई जटिल समस्याओं का समाधान हमारे पौराणिक ग्रन्थों से मिल सकते हैं। हमने तो पश्चिमी सभ्यता का अंधानुकरण कर कई समस्याओं को बढावा ही दिया है।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  27. आज तक की जीवन यात्रा में एक या दो पुरुष को छोड़कर ऐसा किसी को नहीं देखा जो स्त्री का निस्वार्थ भाव से सम्मान करता हो। मुझे नहीं लगता हमारे समाज में स्त्री को कभी सम्मान की नागाह से देखा जा सकेगा.

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  28. इस ज्वलंत और संवेदनशील मुद्दे पर गहन विश्लेषणात्मक आलेख, जिसमें इस समस्या में मौजूद सभी पक्षों का
    सूक्ष्मतम और करूणामयी दृष्टि से जानने समझने और जागृति एवं साथ मिलकर समाधान तलाशने की दिशा में लिया गया कदम निस्संदेह प्रंशनीय है. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  29. ज़ील जी, एक या दो पुरुष से मिल तो लिए, जिनकी नज़र में नारी के लिए निःस्वार्थ सम्मान है।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  30. डोरोथी जी आपकी टिप्पणी से हमारा उत्साहवर्धन हुआ। धन्यवाद।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  31. इस समसामयिक आलेख और आंकड़ों के द्वारा इसका प्रस्तुति करण से आज के दौर में स्त्रियों की दुर्दशा पर आपका विचार-चिंतन गहरा प्रभाव छोड़ता है। आभार इस प्रस्तुति के लिए।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  32. aapne jo aankde diye aapke gahan chintan ko darshaata hai...lekin jab sawal aata hai sudhar ka jo to har koi ek dusre ki taraf dekhta hai aur pahle aap ...pahle aap wali sthiti aa jati hai aur result ye ki kuchh nahi badalta.

    bahut acchhi post. aabhaar.

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  33. अनामिका जी, स्थिति विकट तो ज़रूर है, पर मुझे नारी शक्ति में विश्वास है, और इसका ताज़ा उदाहरण बिहार का चुनाव है।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  34. हास्यफ़ुहार जी, प्रोत्साहन का आभार।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  35. मनोज जी

    कहने के लिए आप ने कुछ छोड़ा ही नहीं है नारी के साथ होने वाले सभी शारीरिक मानसिक अत्याचारों का आप ने कह दिया है और उसके कारण भी बता दिये है | लेकिन समस्या ये है की लोग इसको मानने को तैयार ही नहीं है | जब लोगों को ये लगेगा ही नहीं कि वो अत्याचार कर रहे है तो सुधार की बात ही नहीं उठती है | ये सब बाते तो वो दूसरो पर लागु करंगे पर अपने घर कि महिलाओ के लिए तो ये मामूली सी बात है कह कर ख़ारिज कर देते है | बहुत ही अच्छा सम्पूर्ण आलेख|

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  36. अंशुमाला जी, ये ऐसा विषय है कि जितना लिखो कम पड़ जाता है\ चारो तरफ़ यह अत्याचार देखता हूं तो बहुत दुख होता है और न चाहते हुए भी आपकी बातों से सहमत होने को विवश हूं।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  37. समाज में उत्पन्न नारी की कई ज्वलंत समस्याओं पर बहुत ही प्रभावशाली तरीके से प्रकाश किया है आपने वाकई हमें और खुद इस समाज को सोचना पड़ेगा...सुधार होने की ज़रूरत है..ऐसी हिंसात्मक प्रवृतियों को समाज में बढ़ने से अब रोकना होगा..जैसे भी हो एक सार्थक पहल करने की ज़रूरत है..

    एक जागरूकता भारी सार्थक पोस्ट...आलेख के लिए बहुत बहुत बधाई मनोज जी...

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  38. इन्द्रनील जी, उपस्थिति और विचार के लिए धन्यवाद।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  39. विनोद जी बिल्कुल सही कहा, एक सार्थक सोच के साथ पहल की ज़रूरत है।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  40. excellent post i have posted the link on naari blog i wish there were more bloggers like you then woman bloggers like me who are fighting blog to blog for woman rights will become redundent

    thanks you for this valuable post

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  41. रचना जी सच मानिए तो कल से मैं आपकी प्रतीक्षा कर रहा था। ... और भरोसा था कि आप ज़रूर आएंगी, इसीलिए आज कोई पोस्ट अभी तक नहीं लगाया था, अन्यथा हम तो दूसरा पोस्ट लगा देते।
    आप जिस तरह से महिलाओं के अधिकार की लड़ाई लड़ रहीं हैं, आपका आना, और इस विषय पर विचार देना, हमारे इस ब्लॉग की सार्थकता आज सिद्ध हो गई।
    कोटिशः आभार।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  42. mae kal sae kament padh rahee hun aur aap ko aashirwaad dae rahee hun
    aakhri mae kament daena chahte thee is liyae nahin aayee kament box mae

    post kae saath saath kament kaa mazaa bhi lena chahtee thee

    shukriyaa

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  43. रचना जी,
    ओह! यह तो प्रमाण है कि आप ने कमेंट बॉक्स पर अपनी निगाहें जमा रखी हैं।
    अब तो शुक्रिया/आभार भी छोटा पड़ जाएगा।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  44. यह एक सामाजिक समस्या है...समाज सुधार की ज़रूरत है... साथ ही दोषियों के ख़िलाफ़ भी सख्त कार्रवाई करनी होगी...

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  45. फ़िरदौस जी, सच है कि सामाजिक कुप्रथाओं के विरुद्ध क़ानून को भी सख्त होना होगा।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  46. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  47. बेहद सार्थक पोस्ट ,निश्चित रूप से संग्रहणीय और विचारणीय.
    ये सिलसिला तब तक ख़तम नि होगा जब तक औरत ही औरत की दुश्मन बनी रहेगी बहु की सर पर सास का हाथ रहे तो क्या मजाल है की बेटा उससे बदसलूकी कर सके .. आभार ऐसे उत्तम पोस्ट का.

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  48. मंजुला जी,
    बात आपकी सही है। पर एक बात है कि स्त्रियों में जागरूकता की कमी हमारी व्यवस्था के दोषी होने के कारण है। हमें उन्हें जागरूक बनाना होगा और इसमें नेतृत्व का भी भारी योगदान है, बिहार के चुनाव परिणाम इसका ताज़ा उदाहरण है। जहां महिलओं ने सबको धता बताते हुए चुनाव के परिणाम को नारी शक्ति का परिचायक बना दिया।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  49. नारी की उन्नति या अवनति पर ही राष्ट्र की उन्नति या अवनति निर्धारित है।..... बहुत सही कहा गया है |

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  50. भाई मनोज जी आपने एक शब्द का गलत जगह उपयोग कर दिया है | संभोग शब्द किसी के शौषण या जुलम का संकेत नहीं है |ये दाम्पत्य जीवन का अहम पहलू है | जिस क्रिया में नर नारी द्वारा समान रूप से भोगा जाए वो सम्भोग है | उसे सुधार देवे उसकी जगह दुसरे अन्य शब्द खोज कर लगाए तो ठीक रहेगा | मुझे जैसा समझ में आया लिख दिया है बाकी आप हिन्दी भाषा के मुझसे ज्यादा जानकार है |

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  51. राठौर जी, आभार आपका प्रोत्साहन के लिए। उस पंक्ति से मेरा आशय यह था कि नारी ,मात्र संतान पैदा करने के लिए नहीं हैं।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  52. शोधपूर्ण आलेख. विचारणीय और विचारोत्तेजक. धन्यवाद.

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  53. आपने महिला-दिवस के बहाने एक पूरा-का-पूरा शोध-पत्र ही प्रस्तुत कर दिया है...हुज़ूर! मैं समझ सकता हूँ कि आप कितने उद्यमी हैं...!
    यक़ीनन...इतनी सारी सामग्री यूँ ही किसी एक पेड़ पर लटकी तो नहीं मिल गयी होगी...है न, मनोज जी?

    आपको बधाई...नहीं, नहीं, हार्दिक बधाई!

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  54. करण जी, अभार आपकी उपस्थिति और प्रेरक विचार के लिए।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  55. जितेन्द्र जी, आपकी बातों से मनोबल बढता है।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  56. सार्थक और विचारणीय पोस्ट ...मनोज जी
    धन्यवाद आपका....

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  57. मनोज जी! सर्वप्रथम बड़े भाई से यह ब्लॉग छिपाए रखने का कोप दर्ज कर लें. अब आज की पोस्ट पर अपने विचार... जितनी गहराई से आपने यह पोस्ट लिखी है उससे आपकी भावनाओं की ईमानदारी का पता चलता है. समस्त नारी जाति के के सम्मान में यह एक दस्तावेज़ है. पोस्ट की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें तथ्यों के माध्यम से बात रखीगई है न कि अनर्गल अतिशयोक्ति के द्वारा..
    राठौड़ साहब ने जिस शब्द पर आपत्ति उठाई है वह मुझे उचित नहीं प्रतीत होता है.. वह शब्द अपनी सम्पूर्ण गरिमा एवम् संदर्भ के अनुसार शोभित है... शब्द बदला भी जा सकता है,किंतु उसके साथ जिस युग्म का प्रयोग किया गया है, क्या उसका अनर्थ न होगा! (सादर)मनोज जी बधाई एवम आभार, मुझे अपनी माँ, बहन और बीवी से मिलवाने का!!

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  58. बड़े भाई (सलिल जी) ..क्षमा प्रार्थी हूं।
    आपकी भाव भरी बातों के बाद शब्द नहीं हैं।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  59. बहुत ही सार्थक शब्‍दों के साथ बेहतरीन लेखन ....आभार ।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  60. सदा जी आपकी उपस्थिति और प्रोत्साहन के लिए आभार।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  61. हमने तो इसे झटपट खतम कर दिया था शिखा जी। अब लगता है इससे भी छोटी पोस्ट लिखनी होगी। क्या करें यादों की गलियारों में घुसते ही भटक जाते हैं!
    धन्यवाद आपका।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  62. Bahut bahut badhai is post ke liye... bahut bada dil, tez buddhi aur sachche man se hi yeh post likhi jaa sakti thi! dhanyawaad

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  63. कहने के लिए आप ने कुछ छोड़ा ही नहीं है नारी के साथ होने वाले सभी शारीरिक मानसिक अत्याचारों का आप ने कह दिया है और उसके कारण भी बता दिये है |

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  64. der se padha, lekin very good and sarthak prastuti.mahilao ko apani suraksh swayam karani hogi kyoki aaj kal koi bharose ke kabil nahi dikhata. thakyou.

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं

आपके बहुमूल्य विचार से हमें भी लाभान्वित करें