“लिखावट के अक्षर बुरे होना अपूर्ण शिक्षा की निशानी है।”
“सुलेख शिक्षा का ज़रूरी अंग है।”मत्स्यपुराण में कहा गया है,
“लिखावट के अक्षर बुरे होना अपूर्ण शिक्षा की निशानी है।”
“सुलेख शिक्षा का ज़रूरी अंग है।”मत्स्यपुराण में कहा गया है,
मानवता
परमात्मा ने हमें खुशबूदार फूल बनाया है, क्या हम यह खुशबू सब तक फैला रहे हैं।
गांधी – गांधीवादगांधी भारतवर्ष के अनेक युगों के संचित पुण्य का मधुर फल था।
एक बार उनके मन में कोई बात बैठ जाती तो उसको निकाला नहीं जा सकता था।
अपने जीवन में वे जब-जब अत्यंत विनीत लगे तब-तब वे अत्यंत शक्तिशाली थे साथ ही अत्यंत व्यावहारिक भी।
साहस
पहाड जैसी विपत्ति को दूर करने के लिए सिर्फ थोडा सा साहस ही पर्याप्त है।
सांध्य विचार

एमर्सन ने कहा था आत्मविश्वास सफलता का प्रमुख रहस्य है। आज हम जो भी काम करें पूरे मन से करें। पूरे आत्मविश्वास के साथ करें और अपनी तरफ़ से कोई कसर बाकी न छोड़ें। न सिर्फ पुरूषार्थ करना चाहिए बल्कि करते रहना चाहिए। ऋषियों ने कहा है – “चरैवेति चरैवेति” अर्थात चलते रहो चलते रहो! कभी न कभी मंजिल मिल ही जाएगी। भरपूर प्रयत्न करने पर भी सफलता न मिले तो निराश और उदास न होकर धैयपूर्वक प्रयत्न जारी रखना चाहिए।
लगातार प्रयत्न करते रहने के आगे कुछ नहीं टिकता। प्रतिभा भी नहीं। बहुत सारे प्रतिभाशाली असफल लोग देखने को मिलते हैं।
आत्मविश्वास में कभी भी कमी नहीं आनी चाहिए।
आत्मविश्वास ही सफलता की चरम सीमा पर पहुँचने वाला एकलौता मार्ग है।
पंचतंत्र के अनुसार आत्मविश्वासी व्यक्ति ही समुद्र के बीचों बीच जहाज के नष्ट हो जाने पर भी तैर कर उसे पार कर लेता है।
निर्धन लोगों की सबसे बड़ी पूंजी और मित्र उनका आत्मविश्वास ही होता है।
अपने सबसे बेहतर स्तर को प्राप्त करने की यात्रा आसान नहीं है। यह रुकावटों से भरी पड़ी है। जीतने वाले में इन बाधाओं को जीतने और पहले से भी ज्यादा संकल्प के साथ लौटने की क्षमता आत्मविश्वास से आती है।
हमें सदा याद रखना चाहिए कि “वक्त से पहले और मुकद्दर से ज्यादा किसी को नहीं मिलता।”
बुझ जाए शमा तो जल सकती है
तूफान से भी किश्ती निकल सकती है
मायूस न हो इरादे न बदल
तकदीर किसी भी वक्त बदल सकती है।
इसलिए “हारिए न हिम्मत, बिसारिए न राम”! क्योंकि “हिम्मते मरदा, मदद-ए-ख़ुदा”!!

ज़्यादातर असफलता योग्यता की कमी के कारण नहीं कोशिश बंद कर देने के कारण मिलती है।
सीमित सोच से बड़े लक्ष्य नहीं हासिल होते।
आसान रास्ता ढूंढने से बेहतर है कि मुश्किल पर आजमाए रास्ते पर चलें।
जिनमें ख़ुद पर यकीन नहीं होता वे ही बीच का या आसान रास्ता तलाशते रहते हैं। हम सभी गिरते हैं, चोट खाते हैं। शायद खुद पर अविश्वास भी आता हो, पर उठकर खड़े होते हैं, आगे बढते हैं। पर हमें अपने उसूलों पर चलते रहना चाहिए। क़ामयाबी उसूलों पर चलने का नाम है।
किसी चीज को समझने के लिए ज्ञान की अवश्यकता होती है किन्तु उसे महसूस करने के लिए अनुभव की आवश्यकता होती है।

कर्म करने व सभी समस्याएं हल करने का समय अब है, अत: इसे बहानेबाजी में मत गँवायें।
आज के अखबार में एक समाचार पढा-“मनोकामना पूर्ण करेंगी ‘अंग्रेज़ी देवी’।” ख़बर के मुताबिक अच्छी नौकरी और अच्छी बीवी चाहिए तो भारत-नेपाल सीमा पर बने मंदिर के करें दर्शन!
मंदिर निर्माण परियोजना से जुड़े चन्द्रभान प्रसाद का मानना है कि अंग्रेज़ी जीवन की सच्चाई है। यदि आप अंग्रेज़ी नहीं जानते तो अच्छी नौकरी और अच्छी बीवी नहीं पा सकते। अच्छी नौकरी और अच्छी बीवी दोनों के के लिए अंग्रेज़ी भाषा का ज्ञान होना वर्तमान समय की मांग है।
भारत-नेपाल सीमा स्थित मोहमदाबाद तहसील के बांगा गांव में एक ऐसा मंदिर बनाया गया है, जहां सिर्फ़ ‘अंग्रेज़ी देवी’ की ही पूजा होती है। अंग्रेज़ी देवी की प्रतिमा दिल्ली से मंगाई गई है। मंदिर में देवी के एक हाथ में क़लम और दूसरे में कम्प्यूटर है। एक मंज़िले इस मंदिर की सीढियां ‘की बोर्ड’ की तरह है। सोमवार, २५ अक्तूबर, लॉर्ड मैकाले के जन्मदिन के अवसर पर इसका उद्घाटन होना था पर बारिश ने सब गूड़ गोबर कर दिया। अब शायद अगले महीने इसका विधिवत उद्घाटन किया जाएगा।
मेरी तो जो नौकरी है वही है।... और अच्छी बीवी मुझे नहीं चाहिए। जो है, मेरी बीवी, वह दुनिया की सबसे अच्छी बीवी है। पर इस मानसिकता क्या कहना?!
मैं दो महान विभूतियों के विचार रख रहा हूं – उसके बाद बताइए कि आपका क्या कहना है?
“संसार की निगाहों में हमारी यह अंग्रेज़ी भक्ति भारतीय जनता की मानसिक पंगुता का चटकीला विज्ञापन साबित हो रहा है।”
“सभ्य समाज में जूते और टोपी दोनों की प्रतिष्ठा देखी जाती है। जूतों का दाम साधारणतया टोपी से ज़्यादा ही होता है। दैनिक जीवन में जूतों की अनिवार्यता भी सर्वत्र देखी जाती है। पर इससे टोपी की उपयोगिता तथा मान मर्यादा में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है। कोई भूल कर भी सिर पर जूता नही रखता और न पैरों में टोपी पहनता है। जो ऐसा करता है वह पागल माना जाता है। हिंदी हमारी गांधी टोपी के समान है, तो अंग्रेज़ी जूता है।”

शुभ-अशुभ
कबीर वाणीआपको भाषा का अल्प विराम व पूर्ण विराम लगाना आता है परन्तु क्या व्यर्थ संकल्पों पर भी पूर्ण विराम लगाना आता है?
यदि आप दूसरों की कमज़ोरियॉ अपने मन में रखते हैं तो शीघ्र ही वे आपका अंग बन जायेंगी।
बुराईबुराई का चिन्तन करने या बुराई से डरने से बुराई मन में घर कर जाती है।
कर्महमारे वचन चाहे कितने भी श्रेष्ठ क्यों न हों परन्तु दुनिया हमें हमारे कर्मों के द्वारा पहचानती है।
अतीतअगर आप अतीत (बीती) को ही याद करते रहेंगे तो वर्तमान में जीना कठिन लगेगा व भविष्य असम्भव प्रतीत होगा।
कबीर वाणी|
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विचार-८ :: अतीत
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