रविवार, 31 अक्तूबर 2010

लिखावट

विचार-२७ :: गांधी-गांधीवाद-२
लिखावट
गांधी जी कहा करते थे,
“लिखावट के अक्षर बुरे होना अपूर्ण शिक्षा की निशानी है।”
गांधी जी की लिखावट का अक्षर बहुत ख़राब थी। बचपन में गांधी जी अपना अक्षर सुधार नहीं पाए। बड़े होकर प्रयास करके भी वह अच्छा नहीं हो सका।
गांधी जी का मानना था,
“सुलेख शिक्षा का ज़रूरी अंग है।”
मत्स्यपुराण में कहा गया है,
शीर्षोपेतान्‌ सुसम्पूर्णान्‌‍ समश्रेणिगतान्‌‍ समान्‌‍।
आन्तरान्‌‍ वै लिखेद्यस्तु लेखक: स वर: स्मृत:॥
अर्थात्‌ ऊपर की शिरो रेखा से युक्त, सभी प्रकार से पूर्ण, समानान्तर तथा सीधी रेखा में लिखे गए और आकृति में बराबर अक्षरों को जो लिखता है वही श्रेष्ठ लेखक कहा जाता है।
अच्छालेखन तो ज्ञान का प्रतीक होता है। सुंदर हस्तलेखन सम्पूर्ण शिक्षा का द्योतक है। आजकल क़लम से क़ाग़ज़ पर लिखने प्रवृति घटती जा रही है। अच्छे लेखन की अवहेलना कर हम क्या अपना नुकसान नहीं कर रहे?

आपका क्या विचार है?

विचार-२६ :: मानवता

सुप्रभात!

मानवता

परमात्‍मा ने हमें खुशबूदार फूल बनाया है, क्‍या हम यह खुशबू सब तक फैला रहे हैं।

शनिवार, 30 अक्तूबर 2010

बचपन

सांध्य विचार

गांधी – गांधीवाद

गांधी भारतवर्ष के अनेक युगों के संचित पुण्य का मधुर फल था।

--आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कल्पलता में
इस ब्लॉग पर हम गांधी जी के जीवन, दर्शन और विचारों की बात भी करेंगे। उनके जीवन प्रसंगों से कुछ सीखने का प्रयत्न करेंगे।
वर्तमान युग में नैतिक दार्शनिकों में महात्मा गांधी का नाम सर्वोपरि है। तभी तो आदर से हम उन्हें महात्मा कहते हैं। मूलतः वे एक समाज-सुधारक संत थे। उनका मुख्य कार्य जनता को प्रबुद्ध बनाना था। उन्होंने समाज को नया मार्ग बताया, एक नई दिशा दी। उन्होंने किसी दर्शन और धर्म को जन्म नहीं दिया, किसी सम्प्रदाय की स्थापना नहीं की। फिर भी एक विचारक के रूप में हमारे सामने आए। उनके मत को हम गांधीवाद कहते हैं।
मोहनदास करमचन्द गांधी का जन्म २ अक्तूबर १८६९ (संवत्‌ १९२५ की भादो वदी बारस के दिन) काठियावाड़ के पोरबंदर नामक स्थान (गुजरात) में एक धार्मिक परिवार में हुआ था।
पिता श्री करमचन्द गांधी (काबा गांधी) राजकोट, पोरबंदर के दीवान थे। माता पुतली बाई अत्यंत धार्मिक और श्रद्धालु महिला थीं। चालीसवें साल के बाद करमचन्द गांधी ने पुतली बाई से शादी की थी। ये उनकी चौथी पत्नी थी। इनसे एक कन्या और तीन पुत्र हुए। तीसरे पुत्र मोहनदास थे। गांधी जी के दादा का नाम उत्तम चंद गांधी था। बचपन में गांधी जी के माता-पिता एवं मित्र उन्हें मोनिया कह कर पुकारते थे।
गांधी जी की प्रारंभिक शिक्षा राजकोट में प्रताप कुंवरबा प्राथमिक विद्यालय में 1876 से 1879 तक हुई। सात साल की उम्र में गांधी जी को पोरबंदर छोड़ना पड़ा क्योंकि उनके पिताजी राजकोट के दीवान बना दिये गए। पोरबंदर से उनके पिताजी राजस्थानिक कोर्ट के सदस्य बनकर राजकोट आए। राजकोट में गांधीजी ने अल्फ्रेड स्कूल में शिक्षा प्राप्त की।
बचपन मे देखे गये दो नाटक श्रवण-पितृभक्ति एवं सत्य हरिश्‍चंद्र का गांधीजी के व्यक्तित्व पर काफी प्रभाव पड़ा। खासकर हरिश्चन्द्र का जिसने सत्य के लिए हर चीज़ का बलिदान कर दिया तथा प्राण त्यागने के पूर्व जिसे दारुण दुखों का निरंतर सामना करना पड़ा था। जैन सुधारक राजाचन्द्र का भी उनके व्यक्तित्व पर स्पष्ट प्रभाव मिलता है।

क बार उनके मन में कोई बात बैठ जाती तो उसको निकाला नहीं जा सकता था।

 
उन्होंने सारे विश्‍व को एक नयी दिशा दी। उन्होंने जो कुछ कहा और किया वह इतिहास बन गया। सत्कर्मों ने उन्हें जीते जी संत बना दिया क्योंकि वे दुनिया की मोहमाया से अपने आपको अलग रख पाए और सच के रास्ते पर चलते रहे। उन्होंने पूरे देश का आचरण ही बदल डाला। उनका व्यक्तित्व हमेशा प्रेरणा देता रहता है।
अपने जीवन में वे जब-जब अत्यंत विनीत लगे तब-तब वे अत्यंत शक्तिशाली थे साथ ही अत्यंत व्यावहारिक भी।
पं. सोहन लाल द्विवेदी की ये पंक्तियां उस महापुरुष को समर्पित हैं
चल पड़े जिधर दो पग डगमग, चल पड़े कोटि पग उसी ओर,
पड़ गयी जिधर भी एक दृष्टि, गड़ गये कोटि दृग उसी ओर।
… … ज़ारी है

विचार-२४ :: साहस

सुप्रभात!

साहस

पहाड जैसी विपत्ति को दूर करने के लिए सिर्फ थोडा सा साहस ही पर्याप्‍त है।

शुक्रवार, 29 अक्तूबर 2010

विचार-२३ :: आत्‍मविश्वास

सांध्य विचार

आत्‍मविश्वास

आत्‍मविश्वास में वह बल है, जो हज़ारों आपदाओं का सामना कर उन पर विजय प्राप्‍त कर सकता है।

-स्‍वेट मार्डन

एमर्सन ने कहा था आत्मविश्वास सफलता का प्रमुख रहस्य है। आज हम जो भी काम करें पूरे मन से करें। पूरे आत्‍मविश्‍वास के साथ करें और अपनी तरफ़ से कोई कसर बाकी न छोड़ें। न सिर्फ पुरूषार्थ करना चाहिए बल्कि‍ करते रहना चाहिए। ऋषियों ने कहा है – “चरैवेति चरैवेति” अर्थात चलते रहो चलते रहो! कभी न कभी मंजिल मिल ही जाएगी। भरपूर प्रयत्‍न करने पर भी सफलता न मिले तो निराश और उदास न होकर धैयपूर्वक प्रयत्‍न जारी रखना चाहिए।

लगातार प्रयत्‍न करते रहने के आगे कुछ नहीं टिकता। प्रतिभा भी नहीं। बहुत सारे प्रतिभाशाली असफल लोग देखने को मिलते हैं।

आत्‍मविश्वास में कभी भी कमी नहीं आनी चाहिए।

आत्‍मविश्‍वास ही सफलता की चरम सीमा पर पहुँचने वाला एकलौता मार्ग है।

पंचतंत्र के अनुसार आत्‍मविश्वासी व्‍यक्ति ही समुद्र के बीचों बीच जहाज के नष्‍ट हो जाने पर भी तैर कर उसे पार कर लेता है।

निर्धन लोगों की सबसे बड़ी पूंजी और मित्र उनका आत्‍मविश्‍वास ही होता है।

images (2) अपने सबसे बेहतर स्तर को प्राप्‍त करने की यात्रा आसान नहीं है। यह रुकावटों से भरी पड़ी है। जीतने वाले में इन बाधाओं को जीतने और पहले से भी ज्‍यादा संकल्‍प के साथ लौटने की क्षमता आत्‍मविश्वास से आती है।

हमें सदा याद रखना चाहिए कि “वक्‍त से पहले और मुकद्दर से ज्‍यादा किसी को नहीं मिलता।”

बुझ     जाए       शमा    तो   जल  सकती   है

तूफान से    भी    किश्‍ती निकल सकती है

मायूस   न       हो       इरादे      न       बदल

तकदीर किसी भी वक्‍त बदल सकती है।

इसलिए “हारिए न हिम्मत, बिसारिए न राम”! क्योंकि “हिम्मते मरदा, मदद-ए-ख़ुदा”!!

 

विचार-२२ :: अवसर

सुप्रभात!

अवसर

यदि आपने एक अवसर गँवा दिया तो ऑंसुओं के बादलों से अपनी दृष्टि धुंधली मत कीजिए। अपनी दृष्टि स्‍वच्‍छ रखिए।

बृहस्पतिवार, 28 अक्तूबर 2010

विचार-२१ :: नाकामयाबी

सांध्य विचार

नाकामयाबी

इतिहास बताता है कि बड़े-बड़े विजेताओं को भी जीत के पहले हताश कर देने वाली बाधाओं का सामना करना पड़ा। उन्हें जीत इसलिए मिली कि वे अपनी नाकामयाबी से मायूस नहीं हुए।

-- बी.सी. फ़ोर्ब्स

कई बार हम कोई परियोजना के परिणाम अपने मनोनुकूल नहीं पा कर बेहद निराश हो जाते हैं। लगातार सोचते रहते हैं कि मैं इसे पूरा करने के लायक हूं ही नहीं। अपने आप पर से भरोसा टूटने लगता है।
नाकामयाबी स्थाई नहीं होती। यह एक अड़चन है। इसे दूर करना होता है। इसके कुछ कारण हो सकते हैं। उन वजहों को सोचना चाहिए,  ख़ुद पर भरोसा रखते हुए। हां, यह सही है कि असफलता से ख़ुद पर से भरोसा उठने लगता है। ऐसा लगता है कि मुझमें कुछ गड़बड़ है।  हमें अपनी सोच और अपना रवैया बदलना होगा। ज़िन्दगी एक ढर्रे पर नहीं चलती। इसका कोई एक पैटर्न नहीं होता। कोई बना बनाया फॉर्मूला नहीं होता। एक कारण तो यह भी है कि हम एक ढर्रे पर चल रही अपनी ज़िन्दगी के ढर्रे को बदलने को तैयार ही नहीं होते। अड़े रहते हैं।
हमें खुद से बातचीत करने की आदत डालनी चाहिए। खुद का आकलन करना चाहिए। अपने रवैये को देखना चाहिए। आवश्यकतानुसार उसमें बदलाव लाना चाहिए।
ऐसे अनेकों कारण हो सकते हैं जिनसे नाकामयाबी हासिल हुई हो। इन वजहों को दूर कर हम कामयाबी हासिल कर सकते हैं। हम खतरे उठाने से बचते हैं। जिसके फलस्वरूप अनिश्चय की स्थिति में होते हैं और निर्णय नहीं लेते। ज्यों ही मुश्किलें आई, बस हमारी कोशिशों में कमी आ जाती है।
ज़्यादातर  असफलता  योग्यता की कमी के कारण नहीं कोशिश बंद कर देने के कारण मिलती है।
हम में दूर दर्शिता का भी अभाव होता है।
सीमित सोच से बड़े लक्ष्य नहीं हासिल होते।
लक्ष्य हासिल करने के लिए हमें अपनी प्राथमिकताएं तय कर लेनी चाहिए, अन्यथा हम वक़्त बरबाद करते रहेंगे। हमें यह मानकर चलना चाहिए कि आखिर में जीत कछुए की ही होती है। यानी शॉर्ट कट नहीं चलता।
आसान रास्ता ढूंढने से बेहतर है कि मुश्किल पर आजमाए रास्ते पर चलें।
जिनमें ख़ुद पर यकीन नहीं होता वे ही बीच का या आसान रास्ता तलाशते रहते हैं। हम सभी गिरते हैं, चोट खाते हैं। शायद खुद पर अविश्वास भी आता हो, पर उठकर खड़े होते हैं, आगे बढते हैं। पर हमें अपने उसूलों पर चलते रहना चाहिए।
क़ामयाबी उसूलों पर चलने का नाम है।
यह क़िस्मत पर भरोसा करने वालों को नहीं, उसूलों पर चलने वालों को मिलती है। तो एक साकरात्मक सोच के साथ योजना बना कर उस पर चल देना चाहिए।

विचार-२० :: अनुभव

सुप्रभात!

अनुभव

किसी चीज को समझने के लिए ज्ञान की अवश्‍यकता होती है किन्‍तु उसे महसूस करने के लिए अनुभव की आवश्‍यकता होती है।

बुधवार, 27 अक्तूबर 2010

विचार-१९ :: कर्म

सांध्य विचार

कर्म

कर्म करने व सभी समस्‍याएं हल करने का समय अब है, अत: इसे बहानेबाजी में मत गँवायें।

विचार-१८ :: अंग्रेज़ी देवी

अपराह्न विचार

अंग्रेज़ी देवी

आज के अखबार में एक समाचार पढा-“मनोकामना पूर्ण करेंगी ‘अंग्रेज़ी देवी’।” ख़बर के मुताबिक अच्छी नौकरी और अच्छी बीवी चाहिए तो भारत-नेपाल सीमा पर बने मंदिर के करें दर्शन!

मंदिर निर्माण परियोजना से जुड़े चन्द्रभान प्रसाद का मानना है कि अंग्रेज़ी जीवन की सच्चाई है। यदि आप अंग्रेज़ी नहीं जानते तो अच्छी नौकरी और अच्छी बीवी नहीं पा सकते। अच्छी नौकरी और अच्छी बीवी दोनों के के लिए अंग्रेज़ी भाषा का ज्ञान होना वर्तमान समय की मांग है।

भारत-नेपाल सीमा स्थित मोहमदाबाद तहसील के बांगा गांव में एक ऐसा मंदिर बनाया गया है, जहां सिर्फ़ ‘अंग्रेज़ी देवी’ की ही पूजा होती है। अंग्रेज़ी देवी की प्रतिमा दिल्ली से मंगाई गई है। मंदिर में देवी के एक हाथ में क़लम और दूसरे में कम्प्यूटर है। एक मंज़िले इस मंदिर की सीढियां ‘की बोर्ड’ की तरह है। सोमवार, २५ अक्तूबर, लॉर्ड मैकाले के जन्मदिन के अवसर पर इसका उद्घाटन होना था पर बारिश ने सब गूड़ गोबर कर दिया। अब शायद अगले महीने इसका विधिवत उद्घाटन किया जाएगा।

मेरी तो जो नौकरी है वही है।... और अच्छी बीवी मुझे नहीं चाहिए। जो है, मेरी बीवी, वह दुनिया की सबसे अच्छी बीवी है। पर इस मानसिकता क्या कहना?!

मैं दो महान विभूतियों के विचार रख रहा हूं – उसके बाद बताइए कि आपका क्या कहना है?

 

बाबा नागार्जुन ने कहा था

“संसार की निगाहों में हमारी यह अंग्रेज़ी भक्ति भारतीय जनता की मानसिक पंगुता का चटकीला विज्ञापन साबित हो रहा है।”

 

मोटूरि सत्यनारायण ने कहा था,

“सभ्य समाज में जूते और टोपी दोनों की प्रतिष्ठा देखी जाती है। जूतों का दाम साधारणतया टोपी से ज़्यादा ही होता है। दैनिक जीवन में जूतों की अनिवार्यता भी सर्वत्र देखी जाती है। पर इससे टोपी की उपयोगिता तथा मान मर्यादा में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है। कोई भूल कर भी सिर पर जूता नही रखता और न पैरों में टोपी पहनता है। जो ऐसा करता है वह पागल माना जाता है। हिंदी हमारी गांधी टोपी के समान है, तो अंग्रेज़ी जूता है।”

विचार-१७ :: सफलता

सुप्रभात!

सफलता

सफलता का मतलब सिर्फ़ असफल होना नहीं है, बल्कि सफलता का सही अर्थ है अपने असली मक़सद को पाना। इसका मतलब है पूरा युद्ध जीतना, न कि छोटी-मोटी लड़ाइयां जीतना।

-- एंडविन सी. ब्लिस

मंगलवार, 26 अक्तूबर 2010

विचार-१६ :: आलोचना

सांध्य विचार

आलोचना

किसी दूसरे व्‍यक्ति की आलोचना करने से पहले हमें अपने अन्‍दर झॉंक कर देख लेना चाहिए।

विचार-१५ :: शुभ-अशुभ

अपराह्न विचार

शुभ-अशुभ

जो शुभ करने में देर करता है, वह चूक जाता है। जो अशुभ करने में ज़ल्दी करता है वह भी चूक जाता है। अशुभ को करते समय रुक जाओ और देर करो, और शुभ को करते समय देर मत करना और रुक मत जाना।

ओशो

विचर-१४ :: अच्छाई

सुप्रभात!

अच्छाई

जो भी चीज़ आपको अच्छा महसूस कराती है, वह हमेशा और  ज़्यादा अच्छाई लाएगी।

सोमवार, 25 अक्तूबर 2010

विचार-१३ :: कबीर वाणी

सांध्य विचार

कबीर वाणी

मूँड़ मुड़ाये हरि मिले, सब कोई लेय मुड़ाय।

बार-बार  के  मूड़ते,  भेड़   न   बैकुण्ठ   जाय॥

कबीरदास जी कहते हैं कि सिर के बाल कटवाने से अगर भगवान्‌ प्राप्त हो जाए तो सब कोई सिर के बाल कटवाकर भगवान्‌ को प्राप्त कर ले। जिस तरह से भेड़ का पूरा शरीर कई बार मूड़ा जाता है तब भी वह बैकुण्ठ को नहीं प्राप्त कर सकता है।

विचार-१२ :: व्‍यर्थ संकल्‍प

अपराह्न विचार

व्‍यर्थ संकल्‍प

आपको भाषा का अल्‍प विराम व पूर्ण विराम लगाना आता है परन्‍तु क्‍या व्‍यर्थ संकल्‍पों पर भी पूर्ण विराम लगाना आता है?

विचार-११ :: कमज़ोरी

सुप्रभात!

कमज़ोरी

यदि आप दूसरों की कमज़ोरियॉ अपने मन में रखते हैं तो शीघ्र ही वे आपका अंग बन जायेंगी।

रविवार, 24 अक्तूबर 2010

विचार-१० :: बुराई

सांध्य विचार

बुराई

बुराई का चिन्‍तन करने या बुराई से डरने से बुराई मन में घर कर जाती है।

विचार-९ :: कर्म

अपराह्न विचार

कर्म

हमारे वचन चाहे कितने भी श्रेष्‍ठ क्‍यों न हों परन्‍तु दुनिया हमें हमारे कर्मों के द्वारा पहचानती है।

विचार-८ :: अतीत

सुप्रभात!

अतीत

अगर आप अतीत (बीती) को ही याद करते रहेंगे तो वर्तमान में जीना कठिन लगेगा व भविष्‍य असम्‍भव प्रतीत होगा।

शनिवार, 23 अक्तूबर 2010

विचार-७ :: कबीर वाणी

सांध्य विचार

कबीर वाणी

दुख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोय।

जो सुख   में  सुमिरन करें,  दुख काहे को  होय॥

अर्थात्‌ - कबीर जी कहते हैं कि दुःख में ईश्वर को सब याद करते हैं, सुख में कोई याद नहीं करता। जो इसे सुख में भी याद करे, तो दुःख ही क्यों हो।

कविता

1 विचार-98 :: कविता :: एक गहरी श्वांस लेकर
2 पादप ! यहां न कोई तेरा !
3 स्लम का मिल्यनेयर
4 श्रमकर पत्थर की शय्या पर
5 काम करती माँ !
6 पर्वतांचल की नदियां
7 मुझे चांद चाहिए
8 झींगुर दास
9 ओ कैटरपिलर!
10 ये मेरा जीवन एकाकी
11 बादल अम्बर के विरहाकुल!
12 याद तेरी आई
13 क्या यही है स्वतंत्रता!
14 अमरलता
15 जीने के लिए
16 सबसे ऊंचा रावण
17 मन तरसे इक आंगन को
18 राह चलते
19 तेरी याद सताए
20 आ गया है साल नूतन
21 एक लंबी कविता जो छोटी पड़ गई
22 मैं गया था अपने गांव
23 कैसे करूं आभार प्रकट!
24 मीडिया की डुगडुगी

आलेख

आलेख
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विचार-८ :: अतीत
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