विचार-99
24 जनवरी बालिका दिवस
- आज 24 जनवरी को बालिका दिवस हम मना रहे हैं ।
- इस दिवस का उद्देश्य है लड़कियों के बारे में व्याप्त भ्रांतियां दूर करना, जागरूकता फैलाना और लोगों को कन्या भ्रूण हत्या के प्रतिकूल प्रभावों के बारे में बताना।
- भास ने अविमारक में कहा था “कन्या पितृत्व बहुवन्दनीयम्” अर्थात कन्या का पिता होना बहुत वन्दनीय है।
- क्या आज भी ऐसी स्थिति है? आज के कुछ कवियों की बातें देखिए –
मुन्ने की अम्मा कहती है, कविवर सुनो कहानी,
कविता क्या दहेज में दोगे, बिटिया हुई सयानी।
छविनाथ मिश्र
बादलों से उलझी हुई चांदनी
आके सिरहाने गुमसुम खड़ी हो गई।
बाप के शीश पे उम्र के बोझ सी
एक नन्हीं सी बेटी बड़ी हो गई।
--- महेन्द्र शंकर
सारी शोखी, हंसी, शरारत, छोड़ कहां पर आई है,
मुझे छोड़ सब समझ गए, बिटिया ससुराल से आई है।
- आज देश के उच्चस्थ से लेकर उच्चतम पदों पर महिलाएं विराजमान हैं। वे हर क्षेत्रों में देश का गौरव बढ़ा रही हैं।
- पर क्या स्थिति संतोषजनक है?
- क्या वो पूरी आजादी से पंख फैलाकर खुले आसमान में उड़ सकती है- या अब भी कैद है पिंजडे में?
- वर्तमान परिदृश्य में क्या वो खुश हैं?
- राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो (NCRB) द्वारा ज़ारी एक रिपोर्ट के ... आंकड़े कहते हैं ...
- देश में हर 29 मिनट पर एक महिला के साथ दुष्कर्म होता है।
- कई हादसों में अपनों ने ही उनकी खुशी छीन ली है ...
- पिछले वर्ष 30.7% की बढ़ोत्तरी हुई है युवतियों से उनके ही रिश्तेदारों द्वारा दुष्कर्म किए जाने की घटनाओं में।
- अपने ही सगे संबंधियों द्वारा दुष्कर्म किए जाने की घटना के जहां 309 मामले 2008 में दर्ज हुए थे, वही 2009 में बढ़कर 404 हो गए।
- इनमें से 182 अपराधों में पीडि़ता की उम्र 18 ये 30 वर्ष की थी, 14-18 वर्ष की 95 बालिकाएं, 10-14 वर्ष की 56 बालिकाएं और 10 साल से कम उम्र की 24 बालिकाएं थीं।
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- कुल 21,397 दुष्कर्म के मामले 2009 में सामने आए इनमें से 20,311 दुष्कर्म के मामले में 95% पीडि़ता उक्त व्यक्ति से परिचित थी।
- और भी हैं तथ्य ...
- हर वर्ष महिलाओं के ख़िलाफ़ आपराध के मामलों में वृद्धि हो रही है।
- हर तीन मिनट पर दर्ज होता है महिला हिंसा का मामला।
- हर साल 7600 महिलाएं होती है दहेज हत्या का शिकार
- ….. और प्रतिदिन दहेज हिंसा के नाम पर 50 मामले दर्ज होते हैं।
- 7 लाख लड़कियों को मार दिया जाता है- गर्भ में ।
- 15 लाख, एक वर्ष की आयु के बच्चे हर साल मरते हैं – भारत में लिंग संबंधी रूढि़वादिता के कारण। इसका नतीज़ा है कि लिंगानुपात गड़बड़ाता जा रहा है। देश में प्रति 100 महिला शिशु पर लिंगानुपात 110 पुरुष शिशु का है। गुजरात, हरियाणा, पंजाब और दिल्ली जैसे राज्यों में प्रति 100 लड़कियों पर १२६ लड़के पैदा होते हैं।
- संयुक्त राष्ट्र की 134 देशों की लैंगिक असमानता सूची में पाक 112 वें, बांग्लादेश 116 वें, नेपाल 110 वें और भारत 122 वें स्थान पर है। लगभग सबसे पीछे।
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- 25% बच्चे जन्म में ही कुपोषण का शिकार रहते हैं। महिला और बाल विकास मंत्रालय के अनुसार भारत में किशोरियों की कुल संख्या तकरीबन 8.3 करोड़ है, जिनमें 2.74 करोड़, यानि लगभग 33% लड़कियां कुपोषण का शिकार है।
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- चाहे बछेन्द्री पाल एवरेस्ट चढ जाए, चाहे कल्पना चावला अंतरिक्ष में उड़ जाए, आंकड़े बताते हैं कि प्रगति और समानता के लाख दावों तथा सरकार के भरपूर प्रयासों के बावज़ूद लड़कियों के बारे में सामाजिक सोच में बदलाव नहीं आया है।
- आज भी लड़कियों की तुलना में लड़कों को अधिक महत्त्व और प्राथमिकता दी जाती है।
- शहरी क्षेत्रों में, लोग कहते हैं, कि हालत में सुधार आया है। पर गावों में ... ? लड़कियां अभी भी बोझ समझी जाती हैं।
- अब भी लोगों की सोच वहीं अटकी है कि वंश केवल लड़कों से ही चलता है। ... और बेटे के द्वारा मुखाग्नि देने से ही मोक्ष मिलती है।
- आज भी पुत्र-वधुओं को “दूधो नहाओ, पूतों फलो” का आशीर्वाद दिया जाता है। किसी नई दुल्हन को यह कह कर तो देखिए भगवान करे तुम्हें पुत्री पैदा हो! … फिर देखिए यह समाज आपका क्या करता है?
- इक्कीसवीं सदी में भी नहीं आया है सोच में बदलाव!
- आज भी कहेंगे कि ‘बच्चा होने वाला है’ ... बच्ची तो जैसे शब्द कोश में मानो है ही नहीं।
- सवाल अब भी वही है – समाज द्वारा लड़कियों को कब लड़कों से बराबरी का दर्ज़ा मिलेगा?
- ज़रूरी है सोच में बदलाव लाने की। एक शायर ने कहा भी है कि,
सोच को सुधारिए, सितारे बदल जाएंगे।
नज़रिए को सुधारिए, नज़ारे बदल जाएंगे।
ज़रूरत नहीं है क़श्ती को बदलने की यारों,
क़श्ती के रुख़ को बदलो, क़िनारे बदल जाएंगे।
- हर बुराई की जड़ अशिक्षा है। देश में महिलाओं की साक्षरता 53.87% है। शिक्षा का बढावा करें। शिक्षित समाज ही लड़कियों के महत्त्व को समझ सकता है। सिर्फ़ सरकार और उसकी नीतियां ही पर्याप्त नहीं हैं।
- आज के समय में महिलाएं नारी शक्ति को एक नया अर्थ दे रही है।
- बालिकाओं के अस्तित्व, शिक्षा और बेहतर स्वास्थ पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए।
- आज स्त्रियां हर क्षेत्र में अपना अस्तित्व सार्थक कर रही हैं। चूल्हे-चक्की से लेकर कम्प्यूटर , एवरेस्ट और अंतरिक्ष तक का यह सफर लंबा और उँचा तो है ही, साथ ही बहुत साहसिक और दिलचस्प भी है।
- आशापूर्णा देवी ने प्रथम प्रतिश्रुति में कहा है- “यद्यपि लड़की फूटी कौड़ी के मोल की होती है, फिर भी उसे देखने को जी चाहता है, लेने-छूने को जी चाहता है और स्नेह की वस्तु है इसलिए एक मीठी अनुभूति आती है।”
- रुडयार्ड किपलिंग ने कहा था, “भगवान हर जगह नहीं हो सकता, इसलिए उसने मां को बनाया।”
- मां ... यानी किसी की लड़की, यानी बालिका, यानी FEMALE CHILD. यानी भगवान!!!
जिन्हें शक हो वो करें और ख़ुदाओं की तलाश
हमें तो बालिकाओं में ही दुनिया का ख़ुदा दिखता है।
पुनश्च :: राहुल सिंह जी की बिटिया शीर्षक वाली एक पोस्ट यहां है-, आप देखना चाहेंगे.
जयप्रकाश त्रिपाठी जी की इस कविता की दो पंक्तियां फिलहाल यहीं देना चाहूंगा,
घर की बगिया में जो महके, सुन्दर कोमल फूल है बिटिया।
पाप भगाने तीरथ ना जा, सब तीरथ का मूल है बिटिया॥
हर बुराई की जड़ अशिक्षा है..
प्रत्युत्तर देंहटाएंबिलकुल सही..पर हालात बदलेंगे जरुर.
बिटिया शीर्षक वाली एक मेरी एक पोस्ट यहां है- http://akaltara.blogspot.com/2010/10/blog-post.html, आप देखना चाहेंगे.
प्रत्युत्तर देंहटाएंबालिका दिवस पर संसार की हर बालिका को हार्दिक बधाई और यही उम्मीद करती हूँ कि हर बालिका जब बडी होकर माँ बने तो तो एक सशक्त औरत पहले बने और उनके विकास मे भरपूर सहयोग दे………बेहद उम्दा आलेख्…………आभार्।
प्रत्युत्तर देंहटाएंमेरे लिए तो हर दिन ही मेरा है !!
प्रत्युत्तर देंहटाएंबालिका दिवस पर सामयिक है और सुन्दर पोस्ट.
प्रत्युत्तर देंहटाएंदो दोहे मेरे भी:-
अक्सर शादी में दिखी, हमें बात ये खास,
जितना लोभी वर नहीं,उतनी लोभी सास.
कन्याओं के जन्म से , बचते हैं इन्सान.
पर लड़के के जन्म को,समझ रहे वरदान.
बहुत अच्छे ढंग से आपने इस दिन की सार्थकता को सामने लाया है। पोस्ट के अंतिम हिस्सों में काव्यात्मक वक्तव्य और कुंवर जी का दोहा भी पसंद आया।
प्रत्युत्तर देंहटाएंओह!! सारे आंकडे शूल बनकर चुभ गये!!
प्रत्युत्तर देंहटाएंइन फूल सी बेटियों के लिये हम कुछ शूल भी कम न कर पाए। अहो!दुखम्!!
बालिका दिवस पर संसार की हर बालिका को हार्दिक बधाई
प्रत्युत्तर देंहटाएंशहरीकरण और आर्थिक स्थिति का स्त्री के अस्तित्व से सीधा संबंध है।
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत सुंदर जी धन्यवाद
प्रत्युत्तर देंहटाएंबालिका दिवस पर समाज में बालिकाओं की स्थिति का सही चित्रण करती पोस्ट.
प्रत्युत्तर देंहटाएंलोगों की सोच में एक क्रांतिकारी बदलाव की जरूरत है....तभी समाज में बेटियों को अपना हक़ मिल पायेगा...और एक उम्र के बाद भी वो अपनी मुस्कराहट, स्वाभिमान, सुख-संतोष बरकरार रख पाएंगी.
अभी अभी एक बिटिया के विवाह समारोह से लौटा हूँ.. एक बिटिया गोद में सिर रखकर सोई है!! उसकी नींद न उचट जाए, इसलिये बस इतना ही लिख रहा हूँ!!
प्रत्युत्तर देंहटाएंघर की बगिया में जो महके, सुन्दर कोमल फूल है बिटिया।
प्रत्युत्तर देंहटाएंपाप भगाने तीरथ ना जा, सब तीरथ का मूल है बिटिया॥
कन्यादान के पुनीत दान के बगैर हम उस कर्ज से कैसे मुक्त हो सकते हैं जो अपने ससुर से अपनी पत्नि के रुप में लेकर हम अपना जीवन सहज रुप से गुजारते हैं ।
लोगो में बढती पुत्र- लालसा और खतरनाक गति से लगातार घटता स्त्री, पुरूष अनुपात आज पूरे देश के समाजशास्त्रियोए, जनसंख्या विशेषज्ञों , योजनाकारो तथा समाजिक चिंतकों के लिए चिंता का विषय बन गया है। जहॉ एक हजार पुरूषों में इतनी ही मातृशक्ति की आवश्यकता पडती है, वही अब कन्या - भ्रूण हत्या एवं जन्म के बाद बालिकाओं की हत्या ने स्थिति को विकट बना दिया है। आज लोगो में पहले से ही लिंग जानने से भ्रूण हत्या में इजाफा हो रहा है। लोग पता लगा कर कन्या भ्रूण को नष्ट कर देते है। गर्भपात करना बहुत बडा कुकर्म और पाप है। शास्त्र में भी कहा गया है कि गर्भपात अनुचित है, संस्कृति में इस संदर्भ में एक श्लोक है ।
प्रत्युत्तर देंहटाएंयत्पापं ब्रह्महत्यायां द्विगुणं गर्भपातनेए प्रायश्चितं न तस्यास्ति तस्यास्त्यागो विधीयते श्श्
ब्रह्म हत्या से जो पाप लगता है, उससे दुगुना पाप गर्भपात से लगता है। इसका कोई प्रायश्चित नहीं है
सोच को सुधारिए, सितारे बदल जाएंगे।
प्रत्युत्तर देंहटाएंनज़रिए को सुधारिए, नज़ारे बदल जाएंगे।
ज़रूरत नहीं है क़श्ती को बदलने की यारों,
क़श्ती के रुख़ को बदलो, क़िनारे बदल जाएंगे।
आज के सन्दर्भ में इस तरह के लेखन की बहुत जरुरत है. हालात को बदलने और सोयी हुये चेतना को जागृत करने का यह प्रयास प्रशंसनीय है. सही कहा गया हैं इन पंक्तियों में नज़रिए को बदलने की जरुरत है. सिर्फ एक दिन बालिका दिवस मनाने का ढोंग करने से कुछ नहीं होने वाला. जरुरत है अपने आसपास का माहौल बदलने की कोशिश करने की. शुरुआत चाहे जितनी ही छोटी क्यूँ ना हो पर होनी चाहिये. एक दिन परिवर्तन की लहर चल निकलेगी. इन हालातों के जिम्मेदार इसी समाज में से, हमारे बीच में से ही निकल कर आते हैं अगर हम सब सिर्फ अपना अपना नज़रिया ही बदलने का एक ईमानदार संकल्प ले लें तो भी हालात बहुत हद तक बेहतर हो जायेंगे.
आंकड़े चिंताजनक हैं। समाज को अपनी सोंच में सुधार करना होगा।
प्रत्युत्तर देंहटाएंबालिकाएं ईश्वर के वरदान हैं। जिनके घर बेटियां हैं, समझिए, सारे तीर्थ वहीं विराजमान हैं।
प्रशंसनीय प्रस्तुति।
.जी हाँ सोच को ही बदलने की ज़रुरत है.आज़ादी के ६२ वर्ष बाद भी गुलाम देश की परम्पराओं को धोना छोड़ कर अपनी अर्वाचीन संस्कृति को पुनः अपनाने से आपके विचार सार्थक मूर्त रूप ले सकेंगे.
प्रत्युत्तर देंहटाएंमेल से प्राप्त टिप्पणी
प्रत्युत्तर देंहटाएंमनोज जी,
निम्नलिखित टिप्पणी मैंने आपके ब्लॉग पर पोस्ट की थी, लेकिन शायद किसी तकनीकी कारणवश प्रिंट ठीक से नहीं दिख रहा है. उसे डिलीट कर के इसको पुनः प्रकाशित करने का कष्ट करें.
धन्यवाद,
मंजु
(manukavya.wordpress.com)
सोच को सुधारिए, सितारे बदल जाएंगे।
नज़रिए को सुधारिए, नज़ारे बदल जाएंगे।
ज़रूरत नहीं है क़श्ती को बदलने की यारों,
क़श्ती के रुख़ को बदलो, क़िनारे बदल जाएंगे।
आज के सन्दर्भ में इस तरह के लेखन की बहुत जरुरत है. हालात को बदलने और सोयी हुये चेतना को जागृत करने का यह प्रयास प्रशंसनीय है. सही कहा गया हैं इन पंक्तियों में नज़रिए को बदलने की जरुरत है. सिर्फ एक दिन बालिका दिवस मनाने का ढोंग करने से कुछ नहीं होने वाला. जरुरत है अपने आसपास का माहौल बदलने की कोशिश करने की. शुरुआत चाहे जितनी ही छोटी क्यूँ ना हो पर होनी चाहिये. एक दिन परिवर्तन की लहर चल निकलेगी. इन हालातों के जिम्मेदार इसी समाज में से, हमारे बीच में से ही निकल कर आते हैं अगर हम सब सिर्फ अपना अपना नज़रिया ही बदलने का एक ईमानदार संकल्प ले लें तो भी हालात बहुत हद तक बेहतर हो जायेंगे.
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
प्रत्युत्तर देंहटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
प्रत्युत्तर देंहटाएंबालिका दिवस पर आज की पोस्ट आँख खोलती है ..आंकड़े पढते हैं तो मन दुखता है ..पर सच्चाई से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता ...
प्रत्युत्तर देंहटाएंमेरा निजी अनुभव इन पंक्तियों में है --
पर बेटियाँ
मन में बसती हैं
उनके रहने से
न जाने कितनी
कल्पनाएँ रचती हैं ।
बेटियाँ माँ का
ह्रदय होती हैं , सुकून होती हैं
उसके जीवन के गीतों की
प्यारी सी धुन होती हैं.
पूरी पोस्ट पढनी हो तो यहाँ पढ़ सकते हैं -
बेटी ...प्यारी सी धुन
बेटी प्यारी सी धुन
प्रत्युत्तर देंहटाएंबालिका दिवस पर आपकी सार्थक पोस्ट सराहनीय है, बेटियाँ घर का सम्मान होती हैं उन्हें समुचित देखभाल चाहिए.
प्रत्युत्तर देंहटाएंबालिका दिवस पर इससे अच्छी पोस्ट नहीं हो सकती। हार्दिक बधाई।
प्रत्युत्तर देंहटाएं-------
क्या आपको मालूम है कि हिन्दी के सर्वाधिक चर्चित ब्लॉग कौन से हैं?
बालिका दिवस पर आपका लेख विचारों में मंथन पैदा करता है !
प्रत्युत्तर देंहटाएंआपने ठीक लिखा है ,स्थिति में बहुत अधिक सुधार नहीं हुआ है !
शिक्षा की जागरूकता से ही सुधार की आशा की जा सकती है
बहुत अच्छा लिखा है। कटु सत्य से साक्षात्कार कराता है यह आलेख।
प्रत्युत्तर देंहटाएं