नमस्कार मित्रों!
आज एक नवगीत आपसे इस मंच से शेयर करने का मन कर रहा है। जब मैं ख़ुद को घोर निराशा या उलझनों की स्थिति में पाता हूं तो अपने पर विश्वास करना शुरु कर देता हूं और एक गहरी श्वांस लेकर उन मुश्किलों का डटकर सामना करने को उठ खड़ा होता हूं। कुछ ऐसी ही परिस्थितियों का वर्णन है इस कविता में।
एक गहरी श्वांस लेकर
--- --- मनोज कुमार
एक गहरी श्वांस लेकर !
मैं अंधेरे में खड़ा था, रोशनी की आस लेकर।
मिट गया सब तिमिर गहरा
जल गया जब दीप कोई।
दे गया था धवल मोती
पड़ा तट पर सीप कोई।
उतर आए लो! सितारे झील में आकाश लेकर।
मन कहीं उलझा हुआ था,
मकड़ियों सा जाल बुनकर।
झँझड़ियों की राह आती
स्वर्ण किरण एकाध चुनकर।
उठा गहरी नींद से मैं, इक नया विश्वास लेकर।
छोड़ दी बैसाखियाँ जब
चरण ख़ुद चलने लगे।
हृदय में नव सृजन के
भाव फिर पलने लगे।
भावनाओं का उमड़ता, वेगमय उल्लास लेकर।
समय देहरी पर खड़ा है हाथ में मधुमास लेकर।
*** ***
शब्द चयन आकर्षक है। गीत में प्रवाह भी अति सुन्दर है।
प्रत्युत्तर देंहटाएंभावपूर्ण गीत के लिए आभार।
सुंदर नवगीत.उलझन,निराशा,मुश्किलें तो परीक्षा की तरह आती हैं और नए सिरे से हिम्मत बांधती और संघर्ष करने की ताकत देती हुए निकल जाती हैं.
प्रत्युत्तर देंहटाएंमिट गया सब तिमिर गहरा
जल गया जब दीप कोई।
दे गया था धवल मोती
पड़ा तट पर सीप कोई।
उतर आए लो! सितारे झील में आकाश लेकर।
आपके गीत की उक्त पंक्तियाँ आशा के संचार की जीती-जागती प्रस्तुति है
उत्साह प्रेरक गीत!!
प्रत्युत्तर देंहटाएंहर पंक्ति अन्तर में उमंगो का नवसंचार करती हुई।
सुन्दर नवगीत ....प्रेरणादायक .... घोर निराशा में आशा का संचार करता हुआ ..
प्रत्युत्तर देंहटाएंइस प्रेरक नवगीत के लिये धन्यवाद और बधाई।
प्रत्युत्तर देंहटाएंछोड दी बैसाखियां जब,
प्रत्युत्तर देंहटाएंचरण खुद चलने लगे,
ह्रदय में नवसृजन के तब,
भाव फिर पलने लगे.
वाकई अन्धकार में आशा की किरण...
अपने ही बुने जाल में अक्सर फसा रह जाता है मन.
प्रत्युत्तर देंहटाएंनेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जन्मदिन पर उत्साहवर्धक कविता हेतु धन्यवाद.
प्रत्युत्तर देंहटाएंआपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रत्युत्तर देंहटाएंप्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (24/1/2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
http://charchamanch.uchcharan.com
नवउषा की आशा सा ..बेहद भावपूर्ण और आकर्षक गीत.
प्रत्युत्तर देंहटाएंbehad bhavpuran geet
प्रत्युत्तर देंहटाएं...
मनोज जी!
प्रत्युत्तर देंहटाएंइतनी लयबद्ध और छंदबद्ध गीतिका के लिये आपका असीम धन्यवाद! यह गीत वास्तव में एक प्रेरणा प्रदान करता है!!
हृदय में नव सृजन के
प्रत्युत्तर देंहटाएंभाव फिर पलने लगे...
Very motivating poem !
छोड़ दी बैसाखियाँ जब
प्रत्युत्तर देंहटाएंचरण ख़ुद चलने लगे।
हृदय में नव सृजन के
भाव फिर पलने लगे ...
बहुत ही सुन्दर ... आशावादी शब्द ... और कहीं हद तक सच भी ... अक्सर इंसान घबराता है कठिनाइयों से ... डरता है ... पर जब सामना करता है तो पार पा ही जाता है ...
आशा और विश्वास जगाता एक सुंदर गीत! बधाई!
प्रत्युत्तर देंहटाएंछोड़ दी बैसाखियाँ जब
प्रत्युत्तर देंहटाएंचरण ख़ुद चलने लगे।
हृदय में नव सृजन के
भाव फिर पलने लगे।
बहुत सुन्दर..शब्द संयोजन और भाव प्रवाह लाज़वाब..
चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 25-01-2011
प्रत्युत्तर देंहटाएंको ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..
http://charchamanch.uchcharan.com/
सुन्दर रचना
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत प्रेरणा देने वाले रचना | निराशा में नयी ऊर्जा का संचार करने में सक्षम |
प्रत्युत्तर देंहटाएं"उठा गहरी नींद से मैं, इक नया विश्वास लेकर।
प्रत्युत्तर देंहटाएंछोड़ दी बैसाखियाँ जब
चरण ख़ुद चलने लगे।
हृदय में नव सृजन के
भाव फिर पलने लगे।
भावनाओं का उमड़ता, वेगमय उल्लास लेकर।
समय देहरी पर खड़ा है हाथ में मधुमास लेकर।
*** ***" क्या बात है। व्यक्ति को आवश्यकता है अपने आप पर "विश्वास" की, हौसले की। बहुत ही मन को छू लेने वाली रचना।
मनोज जी पूरा का पूरा गीत ही ओजमय है, खास कर ये हिस्सा तो दिल के काफ़ी करीब लगा:
प्रत्युत्तर देंहटाएंछोड़ दी बैसाखियाँ जब
चरण ख़ुद चलने लगे।
हृदय में नव सृजन के
भाव फिर पलने लगे।
भावनाओं का उमड़ता, वेगमय उल्लास लेकर।
बहुत ही उम्दा काव्य कृति| बधाई स्वीकार करें मनोज जी|
आशा और विश्वास से भरे प्रेरक नवगीत के लिये बधाई स्वीकार करें !
प्रत्युत्तर देंहटाएं