विचार-110
आत्महत्या
- तीन-चार दिनों से शहर से बाहर था। संगठन के पूर्वक्षेत्रीय राजभाषा सम्मेलन के सिलसिले में नालंदा जाना हुआ। लौटा तो कई दिनों का अखबार पड़ा था। उन्हें पढने के दौरान एक खबर पढकर मन काफ़ी व्यथित हो उठा।
- दक्षिण कोलकाता के कसबा थाना के अंतर्गत बोसपुकुर लेन में रहने वाला पांचवीं कक्षा का एक बच्चा संदीप मंडल, जिसकी उम्र 10 साल की थी, एक रियलिटी डांस शो में भाग लेना चाहता था। पर ऑडिशन में असफल रहा। बहुत दिनों से संजोये सपने के साथ-साथ उसका दिल टूट गया। संदीप के परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। इस कारण से उसके माता-पिता डांसर बनने का उसका शौक पूरा करने के लिए उसे किसी डांसिंग स्कूल में भेजने में असमर्थ थे। पर डांस का दीवाना संदीप घर पर ही टीवी देख कर डांस सीखा करता था। पिछले कुछेक महीनों में उसने कुछेक डांस रियलिटी शो के लिए 5-6 ऑडिशन्स भी दिए थे। पर कहीं भी उसका चयन नहीं हुआ था। वह बहुत ही तनाव और अवसाद से ग्रस्त हो गया था। अगले ऑडिशन्स के लिए उसने अपने अभिभावक से पैसे मांगे, पर आर्थिक तंगी के कारण उन्होंने पैसे देने से इंकार कर दिया। इसको लेकर उसकी अपनी मां और पिता से काफ़ी बहस हुई। संदीप की मां बाहर गई थी, जब रात को नौ बजे घर लौटी तो बेटे को घर की छत से झूलता पाया। संदीप ने फांसी लगा ली थी।
- असफलता के बाद खुदकुशी को इम्पल्सिव बिहैवियर कहा जाता है। टीवी और सिनेमा आदि का बुरा असर बाल मन पर पड़ता है।
- NCRB (National Crime Record Bureau) राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो का आकंड़ा बताता है कि वर्ष भर में कुल 2,951 बच्चों ने जान दी।
- 6 लोग प्रतिदिन असफलता के कारण आत्महत्या करते हैं।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में कहा गया है कि विश्व में मौत का 13वां प्रमुख कारण आत्म हत्या है।
- 3000 लोग विश्व में प्रतिदिन आत्महत्या करते हैं।
- भारत में आत्महत्या करने वाले तीन लोगों में से एक युवा होता है।
- देश में हर चार मिनट में कोई एक अपनी जान दे देता है।
- यानी देश में हर 12 मिनट में 30 वर्ष से कम आयु का एक युवा अपनी जान ले लेता है।
- खुदकुशी के कारणों पर गौर करें तो पाते हैं कि
- परिवारिक परेशानी के कारण 23% लोग खुदकुशी करते हैं।
- बीमारी के कारण 21% लोग खुदकुशी करते हैं।
- प्यार मोहब्बत के कारण 2.9% लोग खुदकुशी करते हैं।
- दहेज, झगड़े, ड्रग्स, गरीबी के कारण 2.3% लोग खुदकुशी करते हैं।
- पुरूष – अधिकांश सामाजिक और आर्थिक परेशानी के कारण खुदकुशी करते हैं।
- जबकि महिला- व्यक्तिगत और भावनात्मक कारण से।
- प्रतिदिन 348 आत्महत्या करने वाले इस देश में 2009 में 1,27,151 लोगों ने की आत्महत्या की। इनमें से 68.7% 15-44 वर्ष की उम्र के लोग थे।
- इसी दौरान कुल 2,951 बच्चों ने जान दी।
- 2008 की तुलना में आत्महत्या में 1.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई कुल
- प्रतिदिन 223 पुरूष आत्महत्या करते हैं वहीं 125 महिलाएं प्रति दिन खुदकुशी करती हैं जिनमें से 69 हाउस वाईफ/गृहणी होती हैं।
- 73 लोग प्रतिदिन बीमारी के कारण आत्महत्या करते हैं।
- 10 प्रतिदिन प्यार के कारण, 9 प्रतिदिन बैंकरपट्सी के कारण, 6 प्रतिदिन असफलता और 153 अन्य कारण से आत्मह्त्या करते हैं।
- 8 प्रतिदिन गरीबी के कारण, और देश में प्रतिदिन 7 बरोजगार खुदकुशी करता है। बेरोजगारी के कारण आत्महत्या में 18.8% की एवं नौकरी के कारण 15.1% की वृद्धि
- 82 पारिवारिक समस्या के कारण प्रतिदिन खुदकुशी करते हैं।
- कृषक में आत्महत्या करने का मामला बढ़ा है। 2008 से 7% की वृद्धि
- 30% लोग कीटनाशक खाने का रास्ता अपनाते हैं, वहीं अन्य उपायों में से जहर 8%, रेल 7.8%, डूबना 7.7% और आग 7 % है।
- गांधी जी ने कहा था,
- “आत्महत्या का विचार करना सरल है, आत्महत्या करना सरल नहीं ।”
- आत्महत्या भगवान की अवज्ञा है। जिस प्रकार सुख-दुख उसके दान हैं, उन्हें मनुष्य झेलती है, उसी प्रकार प्राण भी उसकी धरोहर है ।
- 10 सितम्बर को विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस मनाया जाता है।
सपने देखने की उम्र में सपने की तरह बच्चों का खुद टूट जाना, अफसोस होता है.
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत सही लिखा है आपने बच्चों को यह नहीं समझाया जाता कि असफलता ही सफलता तक पहुँचने की पहली सीढी है
प्रत्युत्तर देंहटाएंविद्यार्थियों के लिए: आपकी खुशकिस्मत, सोच और आत्महत्या
बहुत चिंताजनक बात है.ये सब बदलती जीवनशैली और बढ़ते भौतिकवाद के कारण है. लोगों को विचार करना होगा इसपर.
प्रत्युत्तर देंहटाएंयदि माँ बाप अपने बच्चों के साथ और भी ज्यादा दोस्ताना हो जाएँ और उन्हें भावनात्मक दृढ़ता दें तो इस आत्महत्या कों रोका जा सकता है ।
प्रत्युत्तर देंहटाएंhmmm aapke words ko read kar ke kafi sahi lagaa agar aap sabse aache se baat kare to ye sab band ho sakta hai ...
प्रत्युत्तर देंहटाएंKeep Visit my Blog Plz... :D
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दिव्या जी की बात से सहमत ..
प्रत्युत्तर देंहटाएंआंकड़ों के साथ अपनी बात कहने का अंदाज़ अच्छा है ..सही जानकारी मिलती है ...
यह खबर मेरी नज़रों से भी गुजरी थी...और मन में यही चल रहा था..इतनी छोटी सी उम्र में इस बच्चे ने ऐसा कदम उठा लिया.
प्रत्युत्तर देंहटाएंमनोचिकित्सकों ने आत्महत्या की एक और वजह बतायी हैं copycat syndrome .
कई बार लोग देखते-पढ़ते-सुनते हैं...कि ऐसी स्थिति में किसी ने आत्महत्या की...और फिर खुद को उसी सिचुएशन में पाकर यही कदम उठा लेते हैं.
बहुत ही दुखद है यह सब
भावात्मक सहारे से आत्महत्या को काफी हद तक रोका जा सकता है .
प्रत्युत्तर देंहटाएंबेहतरीन जानकारी सही तरह से मिली.
अफसोसजनक स्थिति...
प्रत्युत्तर देंहटाएंविचलित करने वाले आँकड़े और व्यथित करने वाली घटना.. मेरी कुण्डली में भी आत्महत्या का योग है और स्वीकार करता हूम कि कई बार ऐसे मनोभाव भी उठे! ख़ैर ज़िंदा हूँ अभी तक.
प्रत्युत्तर देंहटाएंअक्सर,अपनी सामर्थ्य और सीमा के गलत आकलन के कारण ऐसी स्थिति पैदा होती है। दुखद यह है कि आत्महत्या करने वाला सबसे बड़ा वर्ग वह है,जो किसी राष्ट्र का सर्वाधिक उत्पादक वर्ग होता है।
प्रत्युत्तर देंहटाएंजब हम अपने बच्चो को सपने दिखाते हे, जिन्हे वो पुरा नही कर सकते तो ऎसे हालात पेदा होते हे, हम अपने बच्चो के संग दोस्तो की तरह से उन की बात सुणे ओर उन्हे सही रास्ता दिखाये, यही अच्छा हे
प्रत्युत्तर देंहटाएंआत्महत्या मतलब आत्मा की हत्या है.
प्रत्युत्तर देंहटाएंमनोज जी ,बहुत ही सार्थक आलेख लिखा है आपने.
प्रत्युत्तर देंहटाएंशुभ कामनाएं
thanx for the wonderful information....sahi kahaaa
प्रत्युत्तर देंहटाएंएक बहुत बढ़िया एवं महत्वपूर्ण लेख के लिए आभार !
प्रत्युत्तर देंहटाएंबच्चों से भावनात्मक लगाव की कमी आज हर जगह दिख रही है, यह कमी उन्हें अकेलेपन का अहसास दिलाती है !
अवसाद हटाने के लिए घर में स्नेह और आपसी सहयोग का वातावरण जरूरी है
बहुत ही महत्वपूर्ण लेख. गांधीजी के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं . काश समाज में इसकी व्यापकता बढ़ पाती. आभार
प्रत्युत्तर देंहटाएंबड़े दुख की बात है कि ऐसी घटनाओं पर हम केवल दुख व्यक्त कर मौन रह जाते हैं। इसमें अन्तर्निहित मानसिकताओं पर, जैसा कि डॉ.दिव्या ने या रश्मि रविजा जी ने संकेत किया है, विद्यालयों के माध्यम से काम करने की आवश्यकता है। मनोज कुमार जी ने इसे विचार पर विचारार्थ प्रस्तुत कर अपनी सहृदयता का परिचय दिया। आभार।
प्रत्युत्तर देंहटाएंशिक्षा केवल किताबी नहीं होनी चाहिए.. वह शारीरिक और मानसिक भी होनी चाहिए जो आजकल के विद्यालय नहीं दे पा रहे हैं और उसी के अनुरूप यह आत्महत्या..
प्रत्युत्तर देंहटाएंमाँ-बाप दोनों काम-काजी होने के कारण भी बच्चे की सही परवरिश नहीं हो पाती है.. बहुत से घटक आते हैं इसके लिए.. शोचनीय विषय है..
पटना का तो और बुरा हाल है ...पिछले सात दिनों में नौ आत्महत्याएं ..ह्रदय कांप जाता है ..सार्थक आलेख
प्रत्युत्तर देंहटाएंआपने एक ज्वलंत समस्या को छुआ है । परिवार में स्नेह का कभी अभाव न हो पैसे का तो होता है और हो सकता है । अवसाद के समय प्यार और हिम्मत की बातें बच्चों को इस अवसाद से बाहर निकाल सकती हैं ।
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत अच्छा और महत्वपूर्ण आलेख...टीवी ने तो असफलता के मायने ही बदल दिए हैं...जितने रिएलिटी शोज बढ़ रहे है...उतने ही बच्चों के सपने बढ़ने लगे हैं...और उनका जल्द ही पूरा न हो पाना उनमें निराशा और अवसाद भर देता है...बच्चे अपनी पढ़ाई से इतर कुछ बनने के सपने देखने लगते हैं। इसमें माता-पिता की भूमिका निर्णायक होती है और उन्हें सही मार्ग दर्शन करना चाहिए...पढ़ाई-लिखाई पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए...
प्रत्युत्तर देंहटाएंयहां आना अच्छा लगा...सारे तथ्य और आंकड़े भी पढ़े...आगे ये सब अपने आप मिल जाए इसलिए मैंने ब्लॉग भी फॉलो कर लिया...
प्रत्युत्तर देंहटाएंएक ही घटना पर भिन्न दृष्टिकोण का परिणाम। आत्महत्या करने वाले को जो मुद्दा बड़ा महत्वपूर्ण जान पड़ता है,उसी के बारे में दूसरे सोचते हैं कि अच्छा,इतनी सी बात पर ऐसा कदम उठा लिया!
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