बुधवार, 13 अप्रैल 2011

पादप ! यहां न कोई तेरा !

images (19)पादप ! यहां न कोई तेरा !

तरु- तरु लिपट रहीं वल्लरियां,
भंवरों से चुम्बित मधु कलियां,
और अकेला खड़ा विजन में,
नित देखे तू सांझ – सवेरा ।
पादप ! यहां न कोई तेरा !

सरसिज पर क्रीड़ा मराल की,
लहरें चूमें तृषा डाल की।
तुमको मिला न कोई साथी,
करे रात जो यहां बसेरा।
पादप ! यहां न कोई तेरा !

सबके साथी अपने-अपने,
देख रहे सब सौ-सौ सपने
तेरे भी कुछ सपने होंगे
साथी प्रिय हो कोई मेरा।
पादप! यहां न कोई तेरा!

*** ***

17 टिप्‍पणियां:

  1. सबके साथी अपने-अपने,
    देख रहे सब सौ-सौ सपने
    तेरे भी कुछ सपने होंगे
    साथी प्रिय हो कोई मेरा।
    पादप! यहां न कोई तेरा!

    सादगी और सहजता से लबरेज़ बेहतरीन कविता.

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  2. अच्छा लिखा. बधाई
    मेरा ब्लॉग भी देखें
    दुनाली

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  3. अच्छा लिखा है.
    मेरे ब्लॉग पर आयें, स्वागत है
    दुनाली

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  4. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (14-4-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  5. पादप से संवाद , उसका दर्द ,इतने सुन्दर शब्दों में ..उत्कृष्ट रचना .आभार

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  6. वाह! बहुत शानदार अभिव्यक्ति,दिल को छूती हुई.पहली बार आपके ब्लॉग पर आया,विशालजी के ब्लॉग से लिंक पाकर.खूबसूरत अहसास हुआ.मेरे ब्लॉग 'मनसा वाचा कर्मणा'पर आपका स्वागत है.

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  7. आप की भावो की अभिव्यक्ति के क्या कहने.. निरुतर हूँ...हम तो इन्सान की भावना उकेरते थे आप ने तो पौधों की भाषा भी सिख ली..
    बहुत बहुत बधाई...

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  8. बहुत शानदार अभिव्यक्ति,दिल को छूती हुई| धन्यवाद|

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  9. बहुत खूबसूरत एवं अनूठे बिम्ब के माध्यम से आपने भावनाओं को उकेरा है ! बहुत ही सुन्दर रचना ! बधाई स्वीकार करें !

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  10. जिस पादप के जीवन में इतना कुछ है,वह अकेला कैसे हुआ!

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  11. सबके साथी अपने-अपने,
    देख रहे सब सौ-सौ सपने
    तेरे भी कुछ सपने होंगे
    साथी प्रिय हो कोई मेरा।
    पादप! यहां न कोई तेरा!

    एक सार्थक सन्देश और जीवन से जुडी हुई बातें ..आपकी अभिव्यक्ति बहुत सार्थक है ...आपका आभार

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  12. पादप से सार्थक सम्वाद.दिल को छूती हुई अभिव्यक्ति.

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  13. सुंदर भावनाओं को व्यक्त करती रचना !

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  14. सबके साथी अपने-अपने,
    देख रहे सब सौ-सौ सपने
    तेरे भी कुछ सपने होंगे
    साथी प्रिय हो कोई मेरा।
    पादप! यहां न कोई तेरा!...


    सार्थक सन्देश......
    अच्छी प्रस्तुति के लिए बधाई तथा शुभकामनाएं !

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  15. पादप ! यहां न कोई तेरा !
    इतना सुंदर गीत !
    ऐसा शैल्पिक-सौष्ठव और सुंदर-संश्लिष्ट शब्दों का ताना-बाना !
    ऐसी परिपक्व लयात्मकता और गेयता !

    आदरणीय मनोज जी
    सादर अभिवादन !

    आपके दो ब्लॉग्स पर ताज़ा प्रविष्टियां देखी-पढ़ीं …

    अचानक इस गीत पर दृष्टि पड़ी … अभी नेट पर अनियमितता है …

    तरु- तरु लिपट रहीं वल्लरियां,
    भंवरों से चुम्बित मधु कलियां,
    और अकेला खड़ा विजन में,
    नित देखे तू सांझ – सवेरा ।
    पादप ! यहां न कोई तेरा !


    इस रचना के लिए आपको हृदय से बधाई और आभार !

    शुभकामनाओं सहित
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  16. यह बहुत सुन्दर और मधुर गीत रहा भाई , आभार आपका !

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