तरु- तरु लिपट रहीं वल्लरियां,
भंवरों से चुम्बित मधु कलियां,
और अकेला खड़ा विजन में,
नित देखे तू सांझ – सवेरा ।
पादप ! यहां न कोई तेरा !
सरसिज पर क्रीड़ा मराल की,
लहरें चूमें तृषा डाल की।
तुमको मिला न कोई साथी,
करे रात जो यहां बसेरा।
पादप ! यहां न कोई तेरा !
सबके साथी अपने-अपने,
देख रहे सब सौ-सौ सपने
तेरे भी कुछ सपने होंगे
साथी प्रिय हो कोई मेरा।
पादप! यहां न कोई तेरा!
*** ***
सबके साथी अपने-अपने,
प्रत्युत्तर देंहटाएंदेख रहे सब सौ-सौ सपने
तेरे भी कुछ सपने होंगे
साथी प्रिय हो कोई मेरा।
पादप! यहां न कोई तेरा!
सादगी और सहजता से लबरेज़ बेहतरीन कविता.
अच्छा लिखा. बधाई
प्रत्युत्तर देंहटाएंमेरा ब्लॉग भी देखें
दुनाली
अच्छा लिखा है.
प्रत्युत्तर देंहटाएंमेरे ब्लॉग पर आयें, स्वागत है
दुनाली
आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रत्युत्तर देंहटाएंप्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (14-4-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com/
पादप से संवाद , उसका दर्द ,इतने सुन्दर शब्दों में ..उत्कृष्ट रचना .आभार
प्रत्युत्तर देंहटाएंवाह! बहुत शानदार अभिव्यक्ति,दिल को छूती हुई.पहली बार आपके ब्लॉग पर आया,विशालजी के ब्लॉग से लिंक पाकर.खूबसूरत अहसास हुआ.मेरे ब्लॉग 'मनसा वाचा कर्मणा'पर आपका स्वागत है.
प्रत्युत्तर देंहटाएंआप की भावो की अभिव्यक्ति के क्या कहने.. निरुतर हूँ...हम तो इन्सान की भावना उकेरते थे आप ने तो पौधों की भाषा भी सिख ली..
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत बहुत बधाई...
बहुत शानदार अभिव्यक्ति,दिल को छूती हुई| धन्यवाद|
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत खूबसूरत एवं अनूठे बिम्ब के माध्यम से आपने भावनाओं को उकेरा है ! बहुत ही सुन्दर रचना ! बधाई स्वीकार करें !
प्रत्युत्तर देंहटाएंजिस पादप के जीवन में इतना कुछ है,वह अकेला कैसे हुआ!
प्रत्युत्तर देंहटाएंसबके साथी अपने-अपने,
प्रत्युत्तर देंहटाएंदेख रहे सब सौ-सौ सपने
तेरे भी कुछ सपने होंगे
साथी प्रिय हो कोई मेरा।
पादप! यहां न कोई तेरा!
एक सार्थक सन्देश और जीवन से जुडी हुई बातें ..आपकी अभिव्यक्ति बहुत सार्थक है ...आपका आभार
पादप से सार्थक सम्वाद.दिल को छूती हुई अभिव्यक्ति.
प्रत्युत्तर देंहटाएंसुंदर भावनाओं को व्यक्त करती रचना !
प्रत्युत्तर देंहटाएंakelepan ki aakulta ko darshati sunder marmik rachna.
प्रत्युत्तर देंहटाएंसबके साथी अपने-अपने,
प्रत्युत्तर देंहटाएंदेख रहे सब सौ-सौ सपने
तेरे भी कुछ सपने होंगे
साथी प्रिय हो कोई मेरा।
पादप! यहां न कोई तेरा!...
सार्थक सन्देश......
अच्छी प्रस्तुति के लिए बधाई तथा शुभकामनाएं !
पादप ! यहां न कोई तेरा !
प्रत्युत्तर देंहटाएंइतना सुंदर गीत !
ऐसा शैल्पिक-सौष्ठव और सुंदर-संश्लिष्ट शब्दों का ताना-बाना !
ऐसी परिपक्व लयात्मकता और गेयता !
आदरणीय मनोज जी
सादर अभिवादन !
आपके दो ब्लॉग्स पर ताज़ा प्रविष्टियां देखी-पढ़ीं …
अचानक इस गीत पर दृष्टि पड़ी … अभी नेट पर अनियमितता है …
तरु- तरु लिपट रहीं वल्लरियां,
भंवरों से चुम्बित मधु कलियां,
और अकेला खड़ा विजन में,
नित देखे तू सांझ – सवेरा ।
पादप ! यहां न कोई तेरा !
इस रचना के लिए आपको हृदय से बधाई और आभार !
शुभकामनाओं सहित
- राजेन्द्र स्वर्णकार
यह बहुत सुन्दर और मधुर गीत रहा भाई , आभार आपका !
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