गांधी और गांधीवाद – 28
प्रवासी भारतीयों की समस्या के निदान के लिए कुछ दिनों के बाद गांधी जी ने वहां के ब्रिटिश एजेण्ट मि. जेकोब्स डि-बेट से भी सम्पर्क साधा। हालाकि उसे स्थानीय भारतीय समुदाय की समस्याओं के प्रति काफ़ी सहानुभूति थी, पर उन्हें दूर करना उसके बस के बाहर था। पर उस अधिकारी से सम्पर्क का गांधी जी को यह फ़ायदा हुआ कि भारतीय समस्याओं से सम्बधित कई महत्वपूर्ण दस्तावेज़ पढ़ने का मौक़ा उन्हें मिला जिससे इन समस्याओं के प्रति उनकी समझ बेहतर हुई। उन्होंने वहां की रंगभेद नीति का गराई से अध्ययन किया। हालाकि वहां गोरों की संख्य़ा कम थी, फिर भी वे शासक बने हुए थे। जो गोरे नहीं थे वे उन सबसे घृणा करते थे।
गांधी जी को यह पता चला कि ऑरेन्ज फ़्री स्टेट से भारतीयों को किस निर्दयता के साथ निकाल बाहर किया गया था। शायद गांधी जी ने तब यह कल्पना भी नहीं की होगी कि इस अध्ययन का आगे चलकर उनके द्वारा पूरा उपयोग होने वाला है। वे तो अब भी यही जानते थे कि एक साल के बाद या मुकदमा समाप्त हो जाने के बाद स्वदेश लौट जाएंगे। पर विधाता ने कुछ और ही सोच रखा था।
ऑरेन्ज फ़्री स्टेट में एक क़ानून बनाकर 1888 में भारतीयों के सारे अधिकार छीन लिए गए थे। वे सिर्फ़ होटल के वेटर के रूप में काम कर सकते थे या फिर कोई दूसरी मज़दूरी वाला काम। व्यापारियों को नाम-मात्र का मुआवज़ा देकर निकाल दिया गया था। उन्हें मताधिकार भी नहीं था। ट्रांसवाल में प्रवेश के लिए उन्हें तीन पाउंड का प्रवेश-कर देना पड़ता था।
इसके अलावा एक ऐसा क़ानून भी था जो सिर्फ़ काले रंग के लोगों पर लागू होता था। इस नियम के तहत रात मे नौ बजे के बाद वे बाहर नहीं निकल सकते थे। यदि निकलना पड़ता तो उसके लिए विशेष अनुमति-पत्र ज़रूरी था। वे सार्वजनिक फुटपाथ से नहीं चल सकते थे। उन्हें पशुओं के साथ गलियों में ही चलना पड़ता था। अगर कोई भारतीय फ़ुटपाथ पर चलता हुआ पकड़ा गया तो उसकी ख़ूब पिटाई होती थी। पर यह रोक सिर्फ़ भारतीय लोगों पर लागू होता था। अरब के निवासियों को पुलिस नहीं रोकती थी। इस तरह की राहत देना पुलिस की मर्ज़ी पर रहता था।
एक बार तो गांधी जी को राष्ट्रपति क्रूगर के घर मे नज़दीक फुटपाथ पर चलने के लिए पुलिस के हाथों दुर्व्यवहार भी झेलना पड़ा। गांधी जी को पैदल घूमने का शौक था। वे अकसर माइकल कोट्स के साथ देर शाम को फुटपाथ पर टहला करते थे, और उन्हें कभी भी रोका-टोका नहीं गया। पर गांधी जी के मन में इस बात कि चिंता बनी रहती थी कि उनके साथ जा रहे उनके किसी भारतीय मित्र को पुलिस अरेस्ट न कर ले। गांधी जी पब्लिक प्रोजिक्यूटर डॉ. क्राउज से मिले, उसे अपनी कठिनाई बताई। उसने उन्हें स्वतंत्रतापूर्वक घूमने का पत्र दे दिया। गांधी जी हमेशा उस पत्र को साथ रख कर घूमने निकला करते थे।
राष्ट्रपति मार्ग (प्रेसिडेण्ट स्ट्रीट) से शाम को टहलना उन्हें बेहद ताज़गी प्रदान करता था। इस पर टहलते हुए वे राष्ट्रपति क्रूगर के आवास के पास से गुजरा करते थे। अन्य बंगलों की तुलना में यह बड़ा ही साधारण और आडंबरों से रहित आवास था। राष्ट्रपति की सादगी बहुत प्रसिद्ध थी। हां, कुछ संतरी अवश्य उस घर की सुरक्षा के लिए तैनात रहते थे। उस घर के सामने के संतरी समय-समय पर बदल जाया करते थे। हर रोज़ की तरह एक बार वे उसी फुटपाथ से घर लौट रहे थे कि एक सुरक्षा गार्ड, जो उस समय ड्यूटी पर था, बिना किसी चेतावनी या फुटपाथ छोड़ देने के निर्देश के उन्हें धक्का मार कर नीचे गिरा दिया और ज़ोर से पैर की एक ठोकर भी मारी। गांधी जी अवाक रह गए।
संयोगवश माइकल कोट्स उसी समय घोड़े पर सवारी करता हुआ उधर से जा रहा था। उसने अपनी आंखों से यह दुष्कांड देखा। वह चिल्लाया,
“मि. गांधी! मैंने सब देखा है। अगर आप इस व्यक्ति के ख़िलाफ़ अदालती कार्रवाई करें, आपकी गवाही मैं दूंगा। मुझे खेद है कि आपके साथ इस तरह का व्यवहार हुआ है।”
गांधी जी ने संयत स्वरों में कहा,
“आप नाहक दुखी मत होइए। इसमें इस ग़रीब का क्या दोष? सिपाही बेचारा क्या जाने? सभी काले इसके लिए एक ही समान हैं। यह तो सबके साथ वही करता है जो इसने मेरे साथ किया। मैंने तो यह नियम बना लिया है कि अपने प्रति व्यक्तिगत अन्याय या दुर्व्यवहार की शिकायत लेकर अदालत नहीं जाऊंगा। इसलिए इस व्यक्ति के ख़िलाफ़ भी मैं कोई अदालती कार्रवाई नहीं करूंगा। मैं इसे क्षमा करता हूं।”
क्षमा और सद्भाव की मूर्ति गांधी जी को श्रद्धा भाव से देखते हुए माइकल कोट्स ने कहा,
“बिल्कुल अपने स्वभाव के अनुरूप ही आपने यह बात कही है! पर क्या आप सोचते हैं कि इस तरह की घटना दुबारा नहीं होगी। आप फिर सोचिए। हमें इस तरह के लोगों को सबक देना ही चाहिए।”
परन्तु कोट्स का गुस्सा शांत नहीं हो रहा था। उसने डच में उस संतरी को डांटना शुरु कर दिया। हालाकि यह भाषा गांधी जी के समझ से परे थी पर थोड़ी ही देर में उन्होंने पाया कि वह संतरी गांधी जी से माफ़ी मांगने लगा। लेकिन गांधी जी के लिए यह क्षमायाचना निरर्थक थी, क्योंकि उनके मन में इस व्यक्ति के खिलाफ़ कोई दुर्भावना थी ही नहीं। वे तो उसे पहले ही माफ़ कर चुके थे।
अगले बारह महीने गांधीजी उस दीवानी मुकदमे में व्यस्त रहे, जिसके लिए वे प्रिटोरिया आए थे।
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पिछले पोस्ट के लिंक
1. गांधी-गांधीवाद 2. लिखावट 3. बचपन 4. शर्मिला चानू 5. पश्चाताप 6. डर और रामनाम 7. विवाह - विषयासक्त प्रेम 8. प्रायश्चित 9. जीवन-सूत्र10.विलायत क़ानून की पढाई के लिए 11.शाकाहारी गांधी 12. अंग्रेजी तौर-तरीके13.सादगी से जीवन अधिक सारमय 14. धर्मों का परिचय 15. मिस्र ने दिखाई गांधी की ताकत16. भारत आगमन 17.“बा के बिना जीवन की मैं कल्पना नहीं कर सकता” 18. राजकोट तथा मुम्बई में वकालत 19. अंग्रेजों के जुल्मों का स्वाद20.दक्षिण अफ़्रीका जाने का प्रस्ताव21. आज के दिन ही गांधी जी ने डांडी मार्च किया था 22. सम्मान पगड़ी का२ 23.प्रतीक्षालय में ठिठुरते हुए 24. अपमान का घूंट 25. विनम्र हठीले गांधी 26. धार्मिक विचारों पर चर्चा 27. पहला भाषण
गांधीजी के बारे में एक सुन्दर जानकारीपूर्ण अभिलेख प्रस्तुत किया है आपने.पढकर बहुत अच्छा लगा.आभार .
प्रत्युत्तर देंहटाएंप्रेरक प्रसंग... गाँधी जी और उनके स्वभाव के बारे में बेहतरीन जानकारी... बहुत खूब!
प्रत्युत्तर देंहटाएंगाँधी जी की विचारधारा अनुकरणीय है.क्षमा करना भी वाक़ई एक गुण होता है.
प्रत्युत्तर देंहटाएंप्रेरक प्रसंग जीने को दिशा देता है।
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत अच्छा लगा ..गाँधी जी के बारे में नयी जानकारी पाकर |
प्रत्युत्तर देंहटाएंमहात्मा तो महान आत्मा ही थे ..
गांधीजी के बारे में पढ़कर बेहद अच्छा लगा. जानकारीपूर्ण लेख.
प्रत्युत्तर देंहटाएंप्रेरक प्रसंग ..आभार.
प्रत्युत्तर देंहटाएंजीवन में अपनाने लायक खुबसूरत विचार..आभार
प्रत्युत्तर देंहटाएंमनुष्य को न जाने कितनी छोटी-छोटी बातें यूँ ही मिलकर बड़ा बना देती है. गाँधी जी को इसतरह पढ़ना प्रेरक है.आभार
प्रत्युत्तर देंहटाएंहर दुर्भावनाग्रस्त आदमी को किसी न किसी मोड़ पर पछतावा होता है। अच्छा यही है कि यह रोग पाला ही न जाए।
प्रत्युत्तर देंहटाएंसर जी नमस्कार
प्रत्युत्तर देंहटाएंगांधीजी के बारे प्रेरक प्रसंग पढ़कर अच्छा लगा.
इतने महत्वपूर्ण विचारों को कितनी आसानीसे समझा देते हैं आप।
प्रत्युत्तर देंहटाएं---------
भगवान के अवतारों से बचिए!
क्या सचिन को भारत रत्न मिलना चाहिए?
गांधी जी के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी .
प्रत्युत्तर देंहटाएंभाई मनोज जी सुंदर और ज्ञानवर्धक पोस्ट बधाई
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