पक्षियों का संसार
पथ में विचलन प्रवासी पक्षियों में पाई जाने वाली एक बहुत ही रोचक घटना है। आइए आज इस विषय पर चर्चा करें। हम पहले भी कह आए हैं कि प्राकृतिक व भौगोलिक बनावट पक्षियों के लिए मार्ग-निर्धारण में सहायक होता है। झील, तालाब, जलाशय, पर्वत, सागर आदि पक्षियों को विशेष रूप से आकर्षित करते हैं। परन्तु सभी पक्षियों में एक ही प्रकार के प्राकृतिक व भौगोलिक बनावट आकर्षण का ही कारण नहीं होते।
सागर को पार करने वाले कुछ प्रवासी पक्षी सागर पर से उड़ते-उड़ते अपनी पहले से निर्धारित दिशा में उड़ते हुए एकाएक रास्ता बदल कर सागर से दूर चले जाते हैं। अपना मार्ग बदल कर दीपों पर से उड़कर उसे पार करते हैं। यह तट से नहीं जाना चाहते और वो करीब ५-६ कि.मी. दूर चले जाते हैं। ऐसा लगता है कि वे सागर के तट से उड़ान भरने से कतराते हैं। कुछ पक्षी भटक कर अगर सागर की तरफ़ चले भी आते हैं तो वे फिर से लौट कर अपनी टोली में शामिल हो जाते हैं। इसका खामियाजा भी उन्हें भुगतना पड़ता है पर वे अपनी आदत नहीं छोड़ते। इस आदत के कारण उन्हें एक पतली सी कतार में दूर तक उड़ान भरनी पड़ती है। शिकारी तो इसी ताक में बैठे रहते हैं। वे घात लगाकर इस दल पर हमला कर देते हैं, जिससे काफ़ी बड़ी संख्या में इनकी जान चली जाती है।
दूसरी तरफ़ कुछ पक्षी को थलीय मार्ग से जाना नहीं भाता। खासकर समुद्री पक्षी स्थल के रास्ते से जाना नहीं चाहते। थल के ऊपर से उड़ने की क्षमता रहते हुए भी गेन्नोर तट के सहारे ही उड़ान भरते हैं। ईडर सर्दी बिताकर डेनमार्क से वापस अपने गृहस्थल बाल्टिक सागर की ओर लौटते हैं तो ये सागर के ऊपर से ही जाना पसंद करते हैं जबकि यदि ये थलीय मार्ग से जाएं तो काफ़ी दूरी की बचत कर सकते थे। एक और कारण यह है कि जो पक्षी सागर के तट पर रहते हैं उन्हें उनका प्रिय भोजन भी तो सागर के किनारे ही मिलता है इसलिए भी वे तट के साथ-साथ उड़ना पसंद करते होंगे।
कुछ तो बिन्दास उड़ान भरते हैं। काले पीठ वला गल किसी भी तरह की भौगोलिक बनावट पर से बेहिचक उड़ान भरते हैं। जाड़े को बिताने के लिए ये पक्षी बाल्टिक सागर से भूमध्य सागर के तट पर आते हैं, फिर यहां से पूर्वी अफ़्रीका चले जाते हैं। इस उड़ान के लिए वे सीधी उड़ान न भरकर लम्बा रास्ता चुनते हैं। ताज्जुब की बात तो यह है कि वे सुरक्षित नील नदी की घाटी से न जाकर मरुस्थलीय रास्ता चुनते हैं।
सारस के भी अनेक किस्म मरुस्थल के ऊपर से उड़ना पसंद करते हैं। कई पक्षी तो शरद प्रवास में किसी एक रास्ते से यात्रा करते हैं जबकि वसंत प्रवास में उनका रास्ता अलग होता है।
प्रवासी पक्षियों द्वारा प्रवास-यात्रा के दौरान अपनाए जाने वाले अलग-अलग तरीक़ों और पथ में विचलन यानी सीधा रास्ता न अपनाकर लंबा रास्ता अपनाने का सीधा सा कारण तो यह समझ में आता है कि वे उन हवा के प्रवाह का लाभ उठाते हैं जो उनके रास्ते में मिलते हैं। वे हवा के वेग के साथ उड़कर अपनी ऊर्जा बचा लेते हैं, भले ही रास्ता कुछ लंबा हो जाए। इसके अलावा उनका प्रिय भोजन भी शायद उस रास्ते में मिल जाता हो। उसे पाने की हसरत लिए ये लम्बी उड़ान से नहीं कतराते। एक कारण यह भी हो सकता है कि वे दुश्मन से बचने के लिए रास्ता बदल लेते हों, या फिर खराब मौसम में फंसने के बजाए लंबा रास्ता चुन लेते हों। इन सब कारणॊं में से एक या अधिक कारणों से कई प्रवासी-पक्षी किसी भी क़ीमत पर समुद्र के ऊपर से उड़ान नहीं भरते, चाहे उन्हें सैंकड़ो मील की लंबी यात्रा क्यों न करना पड़े! पर कुछ प्रवासी पक्षी सर्दी के मौसम को बिताकर घर लौटने की जल्दी में होते हैं इसलिए वे आने वाले रास्ते के बजाए दूसरा छोटा रास्ता अपनाते हैं।
: ग्रुस ऐंटिगॉन
उत्तर, उत्तर-पश्चिम, मध्य और उत्तर-पूर्व भारत के देहाती इलाकों में पाए जाने वाले इन पक्षियों की पहचान है राख के रंग का शरीर, लम्बी टांग, लम्बी गर्दन, बड़ा आकार। इसके लाल सिर का ऊपरी भाग सफ़ेद होता है। गर्दन सफ़ेद होती है। जलाशय के नज़दीक ये अपने भोजन की चाहत में खड़े रहते हैं। अधिक संख्या में पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पूर्वी राजस्थान, उत्तरी गुजरात, मध्य भारत, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश के कुछ इलाकों में पाए जाने वाले सारस की भारत में पाए जाने वाले पक्षियों में ऊंचाई सबसे अधिक होती है। व्यस्क सारस की ऊंचाई लगभग 175 से.मी. होती है। नर आकार में मादा से कुछ बड़े होते हैं।
मूलतः शाकाहारी स्वभाव वाले ये पक्षी कोमल टहनियां, अनाज, कंद आदि खाते हैं पर कभी-कभार कीड़े-मकोड़े भी खा लेते हैं। इनका प्रणय निवेदन देखने लायक होता है। नर और मादा एक साथ मीठी स्वर लहरी निकाल कर नृत्य करते हैं। जोड़ा एक साथ मिलकर आवाज़ निकालते हैं। इनका स्वर काफ़ी रोचक, आनंदकर और गीत-सा प्रतीत होता है।
यह पक्षी दलदली क्षेत्रों में रहता है पर अपना घोंसला बनाने के लिए धान के खेत को पसंद करता है। जोड़ा घास-फूस का बड़ा घोंसला बनाता है जिसमें मादा दो अंडे देती है। व्यस्क सारस सदैव जोड़े में होते हैं। ऐसा माना जाता है कि सारस का जोड़ा जीवन-भर के लिए बनता है। यदि उनमें से एक मर जाता है तो दूसरा भी दुख से प्राण त्याग देता है। लोग इस पक्षी को इस प्रेम के कारण पवित्र मानते हैं और इन्हें नहीं मारते।
बड़े दुख की बात है कि अब ये दुर्लभ होते जा रहे हैं। हमें इस ख़ूबसूरत पक्षी को लुप्त होने से बचाना चाहिए।

प्रकृति ने प्राणियों के जीवन निर्वाह के लिए अनोखी युक्तियां प्रदान की हैं, पक्षियों का प्रवास उनमें से एक हैं।
प्रत्युत्तर देंहटाएंप्रकृति की इस व्यवस्था को देखकर आश्चर्य होता है।
सारस के संरक्षण का प्रयास हम सबको करना होगा।
आपकी यह लेखमाला रोचक और ज्ञानवर्धक है।
उत्तम जानकारी, पक्षियों के बारे में,
प्रत्युत्तर देंहटाएंमनोज जी आज का पोस्ट बहुत रोचक है |जानकारी भी और उड़ते हुए पक्षिओं का नज़ारा भी ....!!
प्रत्युत्तर देंहटाएंहार्दिक बधाई .
बहुत उपयोगी जानकारी!
प्रत्युत्तर देंहटाएंसारस का जोड़ा बहुत सुन्दर है!
very nice information . thanks.
प्रत्युत्तर देंहटाएंमैंने पूर्व में भी निवेदन किया था कि इन पोस्टों के साथ यदि स्पष्ट किया जाए कि जानकारियों का कौन सा हिस्सा आपके अवलोकन का परिणाम है और इसमें क्या प्रकाशित संदर्भ-ग्रंथों का अंश है तो पोस्ट बेहतर और अघिक उपयोगी होगा.
प्रत्युत्तर देंहटाएं@ राहुल सिंह जी,
प्रत्युत्तर देंहटाएंइसमें कोई हिस्सा मेरे अवलोकन का परिणाम नहीं है।
संदर्भ ग्रंथों की सूची हमने एक पोस्ट (http://www.testmanojiofs.com/2011/04/2.html) में दिया था। बस इन्हीं पुस्तकों के अध्ययन के आधार पर इसे बांटने का प्रयास है।
संदर्भ
1. The Book of Indian Birds, Salim Ali, 2. Birds of the world, O.L. Austin, 3. The Migration Of Birds, Jean Dorst, 4. The Birds, R.L. Kotapal, 5. World Atalas, Readers Digest, 6. A Photographic Guide To Birds of India and Nepal, Bikram Grewal, 7. Hand Guide To the Birds of Indian Sub-continent, Martin Wudcock, 8. Our Birds, Asad R. Ansari, 9. Migratory Birds, Dr. A.K. Malhotra
इतना सबकुछ इतना ज्ञान वर्धक फिर भी इतना रोचक ..कैसे लिख लेते हैं आप?
प्रत्युत्तर देंहटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
प्रत्युत्तर देंहटाएंपक्षियों के प्रवास के विषय में और उनके द्वारा प्रवास के लिए अपनाए गए तरीकों के बारे में विस्तृत जानकारी देती अच्छी पोस्ट .
प्रत्युत्तर देंहटाएंपर्यावरण मेरा प्रिय विषय है.पक्षियों की जानकारी इससे सम्बद्ध है इसलिए मुझे पढ़ने में बहुत अच्छा लगता है.इस पोस्ट को busy होने के कारण देर से पढ़ पाया.क्षमा करियेगा. मेरे लिए ज्ञानवर्धक रहती है आपकी हर पोस्ट.आभार.
प्रत्युत्तर देंहटाएंगजब की रोचक जानकारी भरी पोस्ट. आनन्द आ गया.
प्रत्युत्तर देंहटाएंसारस विषयक जानना रुचिकर रहा.
रोचक तरीके से बहुत ही बढ़िया जानकारी दी है...
प्रत्युत्तर देंहटाएंआशा है यह श्रृंखला जारी रहेगी और दुर्लभ पक्षियों के विषय में जानकारी प्राप्त होगी.
सार्थक और रोचक पोस्ट ! उड़ते हुए सुंदर पंछी आपकी पोस्ट की ओर आकर्षित करते है..
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत ही सुन्दर और रोचक पोस्ट
प्रत्युत्तर देंहटाएंआदरणीय मनोज कुमारजी
प्रत्युत्तर देंहटाएंपोस्ट करने का अंदाज़ पसंद आया. बधाई स्वीकारें....
उड़ते हुए सुंदर पंछी और उन पर जानकारी....दोनों ही दिलचस्प.......
प्रत्युत्तर देंहटाएंआदरणीय मनोज कुमार जी.......
प्रत्युत्तर देंहटाएंआपकी यह लेख रोचक और ज्ञानवर्धक है।
प्रवास के बारे में और भी कुछ : (१) गीज़ का फ्लोक एक "वी" फोरमेशन में उड़ता है - इससे हर एक पक्षी के पंखों की मूवमेंट से उसके पीछे वाले पक्षी को अधिक उठाव मिलता है - जिससे पूरा झुण्ड ७१% अधिक फासला तय कर पाता है (तो हमें टीम के साथ मिलजुल कर काम करना चाहिए ) (२) जब झुण्ड के आगे वाला पक्षी थक जाए - तो वह पीछे हो जाता है और कोई दूसरा उसकी जगह आता है (तो हमें कठिन कार्य में शेयरिंग करनी चाहिए) (३) जब लीडर धीमा पड़े - तो पीछे के पक्षी होंक करते हैं (एन्करेज्मेंट ) (४) कोई घायल हो, या बीमार, तो दो पक्षी उसके साथ नीचे उतारते हैं - और तब तक साथ रहते हैं जब तक कि या तो वह फिर उड़ सके,या कि उसकी मृत्यु हो जाए (एक दूसरे का ख्याल और मदद करनी चाहिए) बाद में वे अगले झुण्ड के साथ जुड़ जाते हैं |
प्रत्युत्तर देंहटाएं@ अति सुंदर व्याख्या की है आपने।
प्रत्युत्तर देंहटाएंउद्देश्य भी यही है कि हम इनसे सीख लें, और अपने जीवन में उतारें और इनके जीवन की रक्षा करें।
आभार आपका।