मंगलवार, 16 अगस्त 2011

जहाज को बन्दर पर जाने की अनुमति दे दी गई

गांधी और गांधीवाद-62

जहाज को बन्दर पर जाने की अनुमति दे दी गईGandhi (12)

दिसम्बर, 1896 – जनवरी, 1897

क्रिसमस के दूसरे दिन क्वारेंटाइन की अवधि और बढ़ा दी गई। अधिसूचित समय में जहाज के यात्रियों द्वारा सारे क़ायदे-क़ानून का उचित अनुपालन किया गया। इधर सरकार कोई नई तरकीब खोजने की जुगत में लगी रही कि क्वारेंटाइन की अवधि को बढ़ाया जा सके। अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सरकार ने डॉक्टर सदरलैंण्ड को निकाल दिया और उनकी जगह डॉ. बर्ट्वेल की नियुक्ति की गई। उसने यात्रियों और क्रू के सदस्यों के निरीक्षण के उपरांत घोषणा की कि जहाज में अभी और फ़्यूमिगेशन की ज़रूरत है और क्वारेंटाइन की अवधि को एक पखवाड़ा और बढ़ा दिया गया। पानी और अन्य सामग्रियों की कमी से यात्री परेशान थे ही, अब कपड़ों और कम्बलों को जला देने से उनकी परेशानियां और बढ़ गईं। ठंढ़ और नमी के कारण अन्य बीमारियों से ग्रसित होने का खतरा तो संभावित था ही। जहाज के बाहरी बन्दर पर लंगर डालने के दस दिनों के बाद 28 दिसम्बर को जहाज पर पानी भेजा गया। सरकारी आदेशों के तहत जिन वस्त्रों को नष्ट कर दिया गया था उसकी जगह नए वस्त्र की आपूर्ति के लिए जहाज के मुख्य अधिकारी ने सरकार से मांग की। पर सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। यात्रियों की आवश्यकता की पूर्ति के लिए स्थानीय भारतीयों ने सहायता कोष संगठित किया।

कोलोनियल पैट्रियोटिक यूनिन और योरोपियन प्रोटेक्शन असोसिएशन ने मिलकर विरोध प्रदर्शन शुरु किया। जबकि उग्र दल के लोग सीधी कार्रवाई चाहते थे। नटाल वोलन्टीयर फ़ोर्स के कैप्टेन हैरी, जो एक कसाई था, ने उनको नेतृत्व प्रदान करना शुरु कर दिया। डरबन के टाउन हॉल में 4 जनवरी 1897 को एक सभा का आयोजन किया गया। इसमे लगभग 2000 लोगों ने भाग लिया। इनका एक मात्र उद्देश्य था कि बन्दरगाह के क्षेत्र में प्रदर्शन किया जाए और अगर अवश्यकता हुई तो भारतीयों को उतरने से बलपूर्वक रोका जाए। आक्रोश चरम पर था। भड़काऊ भाषण दिए गए। एक प्रदर्शन समिति भी गठित की गई।

सरकार के ऊपर दवाब बढ़ रहा था कि वो अपने खर्चे पर दोनों जहाज के यात्रियों को वापस हिन्दुस्तान भेज दे। सरकार को आन्दोलनकारियों से सहानुभूति भी थी। वह इस विषय पर विधेयक भी पेश करने जा रही थी। सरकार ने उपद्रवकारियों से संयम बरतने को कहा। प्रेस ने भी हिंसा का सहारा न लेने की अपील की। कोलोनियल पैट्रियोटिक यूनिन ने भी संवैधानिक तरीक़े से ही विरोध जताने का आह्वान किया। इस सब के बावज़ूद अधिकांश लोगों का मानना था कि सरकार के हाथ में यह अधिकार नहीं है कि जहाज के यात्रियों को वह वापस भेज सके। फिर भी प्रदर्शन समिति के नेता कैप्टेन स्पार्क्स ने सरकार को इस आशय का अनुरोध भेजा कि वह यात्रियों को लोगों की भावना से अवगत कराते हुए यह निर्देश दे कि वे वापस लौट जाएं। प्रशासन दुविधा में था। क्वरेंटाइन की अवधि ने समस्या के समाधान के लिए काफ़ी अवसर प्रदान कर ही दिया था। किंतु सरकार खुद भारत विरोधी शक्तियों के आगे इस कदर झुकी हुई थी कि वह विवेक का प्रयोग न कर पा रही थी। प्रधानमंत्री सर जॉन रॉबिन्सन स्वास्थ्य लाभ के लिए इंगलैंड चले गए थे। एटॉर्नी जनरल हैरी एस्कॉम्ब ने कार्यकारी प्रधानमंत्री का पद संभाला हुआ था। वे गांधी जी के पड़ोसी थे। आंदोलनकारियों से वह सख़्ती से निपट नहीं पा रहे थे। एफ़.ए. लाटन जब उनसे यात्रियों के अधिवक्ता के तौर पर मिले तो वह उन्हें भी यात्रियों की उपद्रवकारियों से सुरक्षा का कोई आश्वासन न दे सके।

प्रदर्शन समिति ने अनगिनत सभाएं की। दादा अब्दुल्ला के नाम धमकियां भेजी जाती रहीं। लालच भी दिया जाता रहा। अगर दादा अब्दुल्ला दोनों स्टीमरों को वापस ले जायें तो गोरे नुकसान की भरपाई कर देंगे। दादा अब्दुल्ला किसी धमकी से डरने वालों में से नहीं थे। उन्होंने यह ठान ली थी कि चाहे कितना भी नुकसान उठाना पड़े वे स्टीमरों को बन्दर पर लगायेंगे और यात्रियों को उतारेंगे। जब तक हमारा सारा कार-बार चौपट न हो जाए, हम बिल्कुल बरबाद न हो जाएं, हम लड़ते रहेंगे।

इधर स्पार्क्स के नेतृत्व में आग उगलने वाले भाषण दिए गए। अफ़वाहों को हवा दी गई। कहा गया कि जहाज से भर कर लोग लाये गए हैं कि ताकि डरबन के शहर-बाज़ार पर क़ब्ज़ा जमा लिया जाए। गांधी अपने साथ प्रिटिंग प्रेस लाया है, ताकि वह यहां अपना प्रचार अभियान तेज़ कर सके। उनके साथ पचास छपाई के काम करने वाले लोग भी आए हैं। इन भारतीयों के लिए हिन्द महासागर सही जगह है। जहाज को उसी में डुबा दिया जाना चाहिए। एजेण्ट को तो धमकी मिल ही रही थी, अब तो गांधी के नाम भी धमकियां आने लगीं। “अगर तुम वापस नहीं गये, तो तुम्हें समुद्र में डुबो दिया जायगा।” उपद्रवकारियों ने जहर उगलते शब्दों से तरह-तरह के अफ़वाह फैलाए। उन्हें यह लगता था कि सरकार उनके साथ है। फिर भी उन्हें लगता था कि अगर सरकार असफल हुई तो वे खुद कार्रवाई करेंगे। किंतु सही बात तो यह थी कि जहाज पर कोई छपाई की मशीन नहीं थी और जितने भी लोग थे, उनमें से कोई पचास-साठ लोग ही ऐसे थे जो व्यवसाय की तलाश में वहां गए थे, बाक़ी तो महिलाएं-बच्चे थे।

भारतीय नटाल कान्ग्रेस के नेता चिंतित तो थे, लेकिन उन्होंने शांति रखी हुई थी। मेसर्स नाज़र ब्रदर्स, लंदन के मनसुखलाल हीरालाल नाज़र इन दिनों गांधी जी से मिलने डरबन आए हुए थे। वे होशियार और बहादुर आदमी थे। भारतीय समुदाय को उनका पथप्रदर्शन और सलाह बड़ा काम आया।

7 जनवरी 1897 को क्रुद्ध गोरों की एक सभा हुई, जिसमें यह निर्णय लिया गया कि वे किसी भी तरह भारतीय यत्रियों को जहाज से उतरने नहीं देंगे। भारतीय समुदाय और भारतीय नटाल कांग्रेस के लिए अब हाथ पर हाथ धरे रख कर बैठने का समय नहीं था।

दादा अब्दुल्ला और उनके सहयोगी शहर में हो रही सारी गतिविधियों की जानकारी गांधी जी को देते रहे। अब तो स्पष्ट ही हो चुका था कि क्वारेंटाइन तो मात्र एक बहाना था यात्रियों को उतरने देने से रोकने के लिए। यह बात भी स्पष्ट थी कि सरकार आन्दोलनकारियों को ख़ुश रखना चाहती है। दादा अब्दुल्ला जहाज के यात्रियों के लगातार सम्पर्क में थे। उनके मनोरंजन के साधन भी उन्होंने जहाज पर मुहैया कराए। उनके लिए खेलों का प्रबंध किया गया। जहाज पर गांधी जी तो थे ही। वे यात्रियों में घूमे-फिरे। उन्हें धीरज बंधाते रहे। यात्री भी शांत रहे और एक क्षण के लिए भी न हिम्मत हारी और न ही हौसला खोया। ज्यों-ज्यों समय बीतता गया उन्होंने तय किया कि अपने अधिकार के लिए वे अनशन करेंगे।

क्वारेंटाइन की बढ़ाई गई अवधि भी अब समाप्त होने को आ रही थी। प्रदर्शन समिति अब और भी सक्रिय हो रहे थे। इसके नेता यह उम्मीद लगाए बैठे थे कि डरबन के व्यापारी अपनी-अपनी दुकानें बन्द कर अपने मज़दूरों को उनके प्रदर्शन में साथ देने को कहेंगे। यह भी कहा गया कि जो इसमें सहयोग नहीं करेंगे उनका बहिष्कार किया जाएगा। 11 जनवरी 1897 को दोनों जहाजों को संगरोध मुक्ति (Pratique) दे दिया गया। इस जानकारी के मिलते ही कैप्टैन स्पार्क्स ने अपने हस्ताक्षर में जहाज के मुख्य अधिकारी को एक धमकी भरा नोटिस भेजा। कप्तान ने इसे पढ़कर सुनाया, “नेटाल के गोरे बहुत उत्तेजित हैं और उनके मिजाज़ की हालत जानते हुए भी अगर यात्री उतरने की कोशिश करेंगे तो बंदरगाह के ऊपर कमेटी के आदमी खड़े रहेंगे और जहाज से उतरते ही हजारों प्रदर्शनकारियों के विरोध का कोपभाजन बनना होगा।”

संकट के समाधान के लिए प्रदर्शन समिति का एक प्रतिनिधि मंडल दोनों जहाज के कप्तान से जाकर मिला ताकि बातचीत के द्वारा कोई समझौता हो जाए। लगभग चौबीस घंटों तक समिति इस तरह से व्यवहार करती रही जैसे वही नाटाल की सरकार के प्रतिनिधि हों। यात्रियों को और गांधी जी को अल्टिमेटम दिए गए। कहा गया कि सबकी जान खतरे में है। किन्तु समिति के सदस्यों को इस बात का जायज़ा हो गया था कि यात्री हर हाल में डरबन जाने के अपने अधिकार का प्रयोग करने पर उतारू हैं।

दूसरी तरफ़ यूरोपिय समुदाय का पारा उफ़ान पर था। समाचार पत्र दो-दो घंटे पर बुलेटिन प्रसारित कर उनके उबाल को थमने नहीं दे रहे थे। भारतीयों की तरफ़ से कुरलैंड के कप्तान मिलने को यह सूचित कर दिया गया कि प्रदर्शन समिति का कोई क़नूनी हक़ नहीं बनता कि वो कोई समझौता करे। दोनों जहाज के एजेण्ट ने उपनिवेश सचिव, मारित्ज़बर्ग को प्रतिवेदन दिया। उन्हें इस बात की याद दिलाई गई कि भारतीय यात्रियों के जान-माल की रक्षा करना उनका दायित्व बनता है। यात्रियों के सुरक्षित रूप से उतरने में उन्होंने अपनी हर संभव सहायाता देने का भी वचन दिया। किंतु सरकार का व्यवहार बहुत ही टालमटोल वाला रहा। ऐसा लग रहा था कि जब स्थिति बेक़ाबू हो जाएगी तो सरकार यात्रियों से वापस जाने को कहेगी। सर जॉन रॉबिन्सन इंगलैंड से लौट आए थे। उन्होंने प्रधानमंत्री के रूप में अपना कार्यभार संभाल लिया था। यात्रियों का कड़ा रुख देखकर हैरी एस्कॉम्ब को भी लग रहा था क़ानूनी तौर पर तो वह उन्हें डरबन में उतरने से नहीं रोक सकता था। कई और ऐसी बातें हुईं जो गांधी जी के हक़ में गईं। कई यूरोपीय यात्री 11 जनवरी 1897 को तट पर आए तो उन्होंने गांधी जी के प्रति काफ़ी आदर और सम्मान का भाव प्रदर्शन किया। यह भी स्पष्ट हुआ कि जहाजों के सारे यात्री डरबन ही नहीं जाने वाले थे, उनमें से कई ऐसे भी थे जिन्हें आगे ट्रान्सवाल जाना था।

अगले दो दिनों तक प्रदर्शन समिति सरकार पर दवाब बनाए रखी पर कुछ हासिल करने में क़ामयाब नहीं हुई। नेटाल की सरकार हारी। अनुचित प्रतिबंध और अधिक दिन चल न सकी। बंबई से रवाना होने के 44 दिनों के बाद कुर्लैंड और नादरी अब किनारे जाने वाले थे। रोक हटा ली गई और 13 जनवरी 1897 की सुबह पोर्ट अधीक्षक ने जानकारी दी कि जहाज को बन्दर पर जाने की अनुमति दे दी गई है। बाहरी बन्दर को छोड़ने के पहले ही नटाल एडवर्टाज़र का एक रिपोर्टर जहाज पर चढ़ गया। वह गांधीजी का साक्षात्कार लेना चाह रहा था। उसने हरी पुस्तिका, भारत में गांधी जी के भाषण और जहाज के यात्रियों आदि पर तरह-तरह के प्रश्न किए और गांधी जी ने उसके हर प्रश्न का बिल्कुल खुलासा करते हुए जवाब दिया। लोगों के मन में इन दोनों जहाजों और उसके यात्रियों को लेकर जितनी भी शंकाएं थीं उसका समाधान गांधीजी ने किया। लेकिन यह रिपोर्ट तो अखबारों में दूसरे दिन सुबह आना था।

होनी टलने वाली कहां थी!

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5 टिप्‍पणियां:

  1. इतिहास का हर वो पल नज़र के सामने से गुजार गया!!

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  2. ज्ञानवर्धक लेख के लिए हार्दिक धन्यवाद!

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  3. इतिहास के रोचक पहलु को जानना अपने आप में सुखद है . वो भी आपकी लेखनी से.

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  4. इस श्रृंखला की प्रत्येक कड़ी महत्वपूर्ण है.

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