“सबको शिक्षा”
- आजकल नारे हम लगा रहें हैं “सबको शिक्षा”!
- सर्व शिक्षा अभियान चलाया जा रहा है।
- आज शिक्षा व्यवस्था स्कूल से निकल कर बाजार में पहुंच गई है।
- बाजार में ठगे जा रहे हैं छात्र ... ठगे जा रहे हैं अभिभावक!!
कुछ आंकड़ों में बात कर लें …..
- संयुक्त राष्ट्र द्वारा ज़ारी “एजुकेशन फ़ॉर ऑल ग्लोबल मॉनिटरिंग रिपोर्ट” में कहा गया है कि दुनिया में कुल अशिक्षित लोगों की संख्या 75.90 करोड़ है जिसमें सबसे ज़्यादा भारत में है।
- जी हां, भारत दुनिया में सबसे अधिक अशिक्षित लोगों वाला देश है।
- दुनिया भर के अशिक्षितों में हमारी भागीदारी लगभग 35 % है। 1951 में भारत की साक्षरता दर 18.3% थी, जो 2001 में 64.8 प्रतिशत हो गई । फिर भी भारत में अशिक्षितों की संख्या अभी 38 करोड़ है।
- यह 1947 की हमारी कुल आबादी से भी अधिक है।
- तक़रीबन 7.2 करोड़ बच्चे और 7.1 करोड़ किशोर स्कूल से वंचित हैं।
- आज़ादी के बाद 63 साल बाद ही सही, 1 अप्रैल 2010 से देश में सभी बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार मौलिक अधिकार बन गया है।
- इस अधिनियम के तहत 6-14 साल के बच्चों को यह अधिकार दिया जाएगा।
- आंकड़े कहते हैं कि हमारे देश के 6-14 साल के 200 मिलियन बच्चों में से आधे से ज़्यादा अपनी आठ साल की प्राथमिक शिक्षा भी पूरी नहीं कर पाते। अब ये ... आठवीं कक्षा तक नि:शुल्क शिक्षा पाएंगे।
- · पहुंच के भीतर वाला कोई निकटवर्ती स्कूल किसी भी बच्चे को प्रवेश देने से इनकार नहीं करेगा।
- · प्रत्येक 40 छात्रों पर एक सुयोग्य शिक्षक की तैनाती कर दी जाएगी।
- · 5 वर्ष के भीतर सभी शिक्षक प्रशिक्षित कर दिए जाएंगे।
- · 3 वर्ष के भीतर खेल का मैदान, पुस्तकालय, अध्ययन कक्ष, शौचालय, पेयजल जैसी समुचित सुविधाएं सुनिश्चित कर दिया जाएगा।
- · निजी स्कूल में भी सबसे निचली कक्षा में समाज के सबसे ग़रीब और हाशिए पर रहने वाले वर्गों के लिए 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित कर दी जाएगी।
- · शारीरिक दंड नहीं दिया जाएगा।
- · दाखिले के समय कोई टेस्ट नहीं लिया जाएगा।
कुछ प्रश्न
- शिक्षा अधिकार विधेयक आया है। क्या वह सारी कमियों को दूर कर देगा?
- · एक प्रावधान है -- निजी स्कूल में भी सबसे निचली कक्षा में समाज के सबसे ग़रीब और हाशिए पर रहने वाले वर्गों के लिए 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित कर दी जाएगी।
- गरीब बच्चों की शिक्षा .... सपना पूरा हो जाएगा या सपना ही रहेगा?
- इस अधिनियम के तहत 25 प्रतिशत सीटें गरीब बच्चों के लिए जो आरक्षित होने जा रही है! टयूशन फीस सरकार देगी ... बड़ी अच्छी बात है! लेकिन बाकी की फीस/शुल्क जो साल भर ऐसे स्कूल मांगते रहते हैं – वह कौन देगा? गरीबी रेखा के नीचे जीने वाला अभिभावक !!
- क्या इतना आसान है निजी स्कूलों को इसके लिए मनवा लेना?
- सवाल यह है कि इस अधिनियम के तहत 6 से 14 साल ही क्यों यह 0 से 18 साल तक क्यों नहीं रखा गया? संयुक्त राष्ट्र की बाल अधिकार संधि में 18 वर्ष से कम आयु वालों को बच्चा माना गया है। भारत ने इस संधि पर हस्ताक्षर किया है।
- यह प्रावधान 0 से 6 तथा 14 से 18 साल के बच्चों को इस अधिकार से वंचित करता है।
कुछ वस्तु स्थिति ---
- सर्वशिक्षा अभियान के अंतर्गत ग्रामीण इलाकों में नियमित शिक्षक 19% और शहरी इलाकों के 12% पद खाली है ।
- ग्रामीण इलाकों के 7% प्राथमिक स्कूल सिर्फ एक शिक्षक के बूते ही चल रहे हैं ।
- 2009-10 में 29 फ़ीसदी प्राथमिक स्कूल पक्के भवन में नहीं चल रहे, 07-08 में यह 27 फ़ीसदी था।
- 49 फीसदी स्कूलों में चहारदीवारी नहीं है।
- 50 फ़ीसदी स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय नहीं है
- ग्रामीण क्षेत्र में पाचवीं कक्षा के 53 फीसदी बच्चे अपनी किताबें तक नहीं पढ पाते। 64 फीसदी बच्चे साधारण गुणा-भाग नहीं जानते।
- सरकार के कुल खर्च का शिक्षा पर होने वाला खर्च 11.6 फीसदी पर स्थिर हो गया है। यह जीडीपी का केवल 3.4 फीसदी है।
- शिक्षा के अधिकार क़ानून पर अमल के लिए 1.82 लाख करोड़ रुपये का खर्च आयेगा। इसके लिए केन्द्र सरकार राज्य सरकारों को सिर्फ़ पांच साल तक वित्तीय मदद करेगी। उसके बाद???
- एक अनुमान के मुताबिक प्राथमिक स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मुहैया कराने के लिए प्रति स्कूल एक करोड़ का खर्च आएगा। अभी सर्व शिक्षा अहियान के तहत 22 लाख रुपये ही खर्च किए जा रहे हैं। जबकि इस साल प्रत्येक केन्द्रीय विद्यालय पर सालाना 2.04 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं।
- क्या सरकार बजट आवंटन बढाएगी ... देखना है, आगामी बजट शिक्षा के स्तर को कितना ठीक करना चाहता है?
तेरह वर्ष की उम्र में 1882 में गांधीजी का विवाह कस्तूरबाई से हुआ। उनके चार पुत्र थे, हरिलाल, मणिलाल, रामदास और देवदास। बा और बापू एक आदर्श और असाधरण दंपती थे। उनके 62 साल के विवाहित जीवन में भारत के किसी भी साधारण विवाहित इकाई की तरह उतार-चढाव आते रहे। कस्तूरबाई साहसी और निर्भिक महिला थीं। साथ ही मितभाषी भी। दक्षिण अफ्रिका में बिताए वर्ष कस्तूरबा गांधी के लिए भी अत्यधिक महत्त्वपूर्ण थे। वहां के प्रवास के दौरान कई बार जेल गईं। उन्होंने न सिर्फ़ यह साबित किया कि वो एक अच्छी धर्मपत्नी हैं बल्कि यह भी कि उनमें इतना साहस है कि वे लड़े बिना हार नहीं मान सकतीं। दक्षिण अफ्रिका के बिताए जीवन गांधी और बा के जीवन के निर्णायक वर्ष साबित हुए। बा में काफ़ी परिपक्वता आ गई। उनकी इच्छा शक्ति काफ़ी दृढ हुई। गांधी जी अपनी सफलता में बा के योगदान को स्वीकरते हुए कहा था कि बा के बिना वे अपनी महती योजना में सफल नहीं हो सकते थे। बा ने गांधी जी को निरंतर और निःस्वार्थ समर्थन दिया था। निराशा के क्षणों में भी वो उन्हें साहस दिलाती रहती थीं। कहा जाता है कि सत्याग्रह का पहला पाठ गांधी जी ने बा से ही सीखा था। गांधी जी ने बा द्वारा दी गई सहायता के लिए उनकी प्रशंसा करते हुए स्वीकार भी किया कि बा बहादुर महिला थीं। अहिंसा के पालन में बा उनकी पहली गुरु साबित हुईं। गांधी जी ने कहा भी है, “अहिंसा का पाठ मैंने अपनी पत्नी से उसे अपनी इच्छा के आगे झुकाने की कोशिश करते सीखा। ... अंततः वह मुझे अहिंसा का पाठ पढाने में मेरी गुरु बन गई।”
समय बीतने के साथ कई बार बा जेल गईं और बा ने अपने जीवन के अंतिम दिन जेल में ही गुजारे। 1942-1944 तक के आगा खां पैलेस के दीर्घ कारावास के दौरान कई तरह के दुख और कष्ट ने बा को काफ़ी कमज़ोर बना दिया। कारागार में महादेव देसाई की मृत्यु ने उन्हें अस्त-व्यस्त कर दिया। वे उन्हें अपना पांचवां पुत्र मानती थीं। महादेव देसाई की समाधि उनके लिए एक मंदिर ही बन गया था। उनका विषाद काफ़ी बढ गया था। उन्हें अपनी मृत्यु का भी पूर्वाभास हो रहा था। गांधी जी के 21 दिनों के उपवास से उन्हें गहरा दुख पहुंचा था। 17 मार्च 1943 को उन्हें दिल का दौरा पड़ा। जनवरी 1944 में उन्हें दो दौरे और पड़े। उनका स्वास्थ्य तेज़ी से बिगड़ने लगा। उनकी बड़ी इच्छा थी कि उस वक्त उनके बेटे उनके पास रहें। देवदास को तो प्रतिदिन जेल में जाने की इज़ाज़त दे दी गई, लेकिन हरिलाल को सिर्फ़ एक बार अनुमति मिली। जेल के अधिकारियों के इस भेदभाव वाले रवैये पर उन्हें क्षोभ हुआ, “दो भाइयों के बीच यह भेद-भाव क्यों? कोई ग़रीब अपनी मां से मिलने उतनी बार क्यों नहीं आ सकता जितनी बार अमीर आदमी आ सकता है?”
बा के शव को उसी साड़ी में लपेटा गया। देवदास ने मुखाग्नि दी। गांधी जी चुपचाप बैठे गहरे विचार में मग्न थे, “बा के बिना जीवन की मैं कल्पना नहीं कर सकता। मैंने हमेशा चाहा कि वह मेरी बाहों में अंतिम सांस लें ताकि मुझे मन पर यह बोझ लेकर न जाना पड़े कि मेरे बाद उनका क्या होगा? लेकिन वह मेरा अविभाज्य अंग थी। उनकी मृत्यु से ऐसा शून्य पैदा हो गया है जो कभी भरा नहीं जा सकेगा।”


पर वास्तविक स्थिति यह है कि

