शनिवार, 26 फरवरी 2011

विचार-114 :: “सबको शिक्षा”

“सबको शिक्षा”

  • आजकल नारे हम लगा रहें हैं “सबको शिक्षा”!
  • सर्व शिक्षा अभियान चलाया जा रहा है।
    • आज शिक्षा व्‍यवस्‍था स्‍कूल से निकल कर बाजार में पहुंच गई है।
    • बाजार में ठगे जा रहे हैं छात्र ... ठगे जा रहे हैं अभिभावक!!

कुछ आंकड़ों में बात कर लें …..

  • संयुक्त राष्ट्र द्वारा ज़ारी “एजुकेशन फ़ॉर ऑल ग्लोबल मॉनिटरिंग रिपोर्ट” में कहा गया है कि दुनिया में कुल अशिक्षित लोगों की संख्या 75.90 करोड़ है जिसमें सबसे ज़्यादा भारत में है।
    • जी हां, भारत दुनिया में सबसे अधिक अशिक्षित लोगों वाला देश है।
  • दुनिया भर के अशिक्षितों में हमारी भागीदारी लगभग 35 % है। 1951 में भारत की साक्षरता दर 18.3% थी, जो 2001 में 64.8 प्रतिशत हो गई । फिर भी भारत में अशिक्षितों की संख्‍या अभी 38 करोड़ है।
    • यह 1947 की हमारी कुल आबादी से भी अधिक है।
  • तक़रीबन 7.2 करोड़ बच्चे और 7.1 करोड़ किशोर स्कूल से वंचित हैं।
  • आज़ादी के बाद 63 साल बाद ही सही, 1 अप्रैल 2010 से देश में सभी बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार मौलिक अधिकार बन गया है।
      • इस अधिनियम के तहत 6-14 साल के बच्चों को यह अधिकार दिया जाएगा।
      • आंकड़े कहते हैं कि हमारे देश के 6-14 साल के 200 मिलियन बच्चों में से आधे से ज़्यादा अपनी आठ साल की प्राथमिक शिक्षा भी पूरी नहीं कर पाते। अब ये ... आठवीं कक्षा तक नि:शुल्क शिक्षा पाएंगे।
      • · पहुंच के भीतर वाला कोई निकटवर्ती स्कूल किसी भी बच्चे को प्रवेश देने से इनकार नहीं करेगा।
      • · प्रत्येक 40 छात्रों पर एक सुयोग्य शिक्षक की तैनाती कर दी जाएगी।
      • · 5 वर्ष के भीतर सभी शिक्षक प्रशिक्षित कर दिए जाएंगे।
      • · 3 वर्ष के भीतर खेल का मैदान, पुस्तकालय, अध्ययन कक्ष, शौचालय, पेयजल जैसी समुचित सुविधाएं सुनिश्चित कर दिया जाएगा।
      • · निजी स्कूल में भी सबसे निचली कक्षा में समाज के सबसे ग़रीब और हाशिए पर रहने वाले वर्गों के लिए 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित कर दी जाएगी।
      • · शारीरिक दंड नहीं दिया जाएगा।
      • · दाखिले के समय कोई टेस्ट नहीं लिया जाएगा।

कुछ प्रश्न

  • शिक्षा अधिकार विधेयक आया है। क्या वह सारी कमियों को दूर कर देगा?
  • · एक प्रावधान है -- निजी स्कूल में भी सबसे निचली कक्षा में समाज के सबसे ग़रीब और हाशिए पर रहने वाले वर्गों के लिए 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित कर दी जाएगी।
      • गरीब बच्‍चों की शिक्षा .... सपना पूरा हो जाएगा या सपना ही रहेगा?
      • इस अधिनियम के तहत 25 प्रतिशत सीटें गरीब बच्‍चों के लिए जो आरक्षित होने जा रही है! टयूशन फीस सरकार देगी ... बड़ी अच्‍छी बात है! लेकिन बाकी की फीस/शुल्‍क जो साल भर ऐसे स्‍कूल मांगते रहते हैं – वह कौन देगा? गरीबी रेखा के नीचे जीने वाला अभिभावक !!
      • क्या इतना आसान है निजी स्कूलों को इसके लिए मनवा लेना?
  • सवाल यह है कि इस अधिनियम के तहत 6 से 14 साल ही क्यों यह 0 से 18 साल तक क्यों नहीं रखा गया? संयुक्त राष्ट्र की बाल अधिकार संधि में 18 वर्ष से कम आयु वालों को बच्चा माना गया है। भारत ने इस संधि पर हस्ताक्षर किया है।
  • यह प्रावधान 0 से 6 तथा 14 से 18 साल के बच्चों को इस अधिकार से वंचित करता है।

कुछ वस्तु स्थिति ---

  • सर्वशिक्षा अभियान के अंतर्गत ग्रामीण इलाकों में नियमित शिक्षक 19% और शहरी इलाकों के 12% पद खाली है ।
  • ग्रामीण इलाकों के 7% प्राथमिक स्‍कूल सिर्फ एक शिक्षक के बूते ही चल रहे हैं ।
  • 2009-10 में 29 फ़ीसदी प्राथमिक स्कूल पक्के भवन में नहीं चल रहे, 07-08 में यह 27 फ़ीसदी था।
  • 49 फीसदी स्कूलों में चहारदीवारी नहीं है।
  • 50 फ़ीसदी स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय नहीं है
  • ग्रामीण क्षेत्र में पाचवीं कक्षा के 53 फीसदी बच्चे अपनी किताबें तक नहीं पढ पाते। 64 फीसदी बच्चे साधारण गुणा-भाग नहीं जानते।
  • सरकार के कुल खर्च का शिक्षा पर होने वाला खर्च 11.6 फीसदी पर स्थिर हो गया है। यह जीडीपी का केवल 3.4 फीसदी है।
  • शिक्षा के अधिकार क़ानून पर अमल के लिए 1.82 लाख करोड़ रुपये का खर्च आयेगा। इसके लिए केन्द्र सरकार राज्य सरकारों को सिर्फ़ पांच साल तक वित्तीय मदद करेगी। उसके बाद???
  • एक अनुमान के मुताबिक प्राथमिक स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मुहैया कराने के लिए प्रति स्कूल एक करोड़ का खर्च आएगा। अभी सर्व शिक्षा अहियान के तहत 22 लाख रुपये ही खर्च किए जा रहे हैं। जबकि इस साल प्रत्येक केन्द्रीय विद्यालय पर सालाना 2.04 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं।
  • क्या सरकार बजट आवंटन बढाएगी ... देखना है, आगामी बजट शिक्षा के स्तर को कितना ठीक करना चाहता है?

मंगलवार, 22 फरवरी 2011

“बा के बिना जीवन की मैं कल्पना नहीं कर सकता”

कस्तूरबा गांधी की पुण्य तिथि पर

विचार-113

गांधी और गांधीवाद-17

“बा के बिना जीवन की मैं कल्पना नहीं कर सकता”

भारत की आज़ादी की लड़ाई में बापू का कदम-कदम पर साथ देने वाली कस्तूरबा गांधी का 22 फरवरी 1944 को निधन हुआ।

तेरह वर्ष की उम्र में 1882 में गांधीजी का विवाह कस्तूरबाई से हुआ। उनके चार पुत्र थे, हरिलाल, मणिलाल, रामदास और देवदास। बा और बापू एक आदर्श और असाधरण दंपती थे। उनके 62 साल के विवाहित जीवन में भारत के किसी भी साधारण विवाहित इकाई की तरह उतार-चढाव आते रहे। कस्तूरबाई साहसी और निर्भिक महिला थीं। साथ ही मितभाषी भी। दक्षिण अफ्रिका में बिताए वर्ष कस्तूरबा गांधी के लिए भी अत्यधिक महत्त्वपूर्ण थे। वहां के प्रवास के दौरान कई बार जेल गईं। उन्होंने न सिर्फ़ यह साबित किया कि वो एक अच्छी धर्मपत्नी हैं बल्कि यह भी कि उनमें इतना साहस है कि वे लड़े बिना हार नहीं मान सकतीं। दक्षिण अफ्रिका के बिताए जीवन गांधी और बा के जीवन के निर्णायक वर्ष साबित हुए। बा में काफ़ी परिपक्वता आ गई। उनकी इच्छा शक्ति काफ़ी दृढ हुई। गांधी जी अपनी सफलता में बा के योगदान को स्वीकरते हुए कहा था कि बा के बिना वे अपनी महती योजना में सफल नहीं हो सकते थे। बा ने गांधी जी को निरंतर और निःस्वार्थ समर्थन दिया था। निराशा के क्षणों में भी वो उन्हें साहस दिलाती रहती थीं। कहा जाता है कि सत्याग्रह का पहला पाठ गांधी जी ने बा से ही सीखा था। गांधी जी ने बा द्वारा दी गई सहायता के लिए उनकी प्रशंसा करते हुए स्वीकार भी किया कि बा बहादुर महिला थीं। अहिंसा के पालन में बा उनकी पहली गुरु साबित हुईं। गांधी जी ने कहा भी है, “अहिंसा का पाठ मैंने अपनी पत्नी से उसे अपनी इच्छा के आगे झुकाने की कोशिश करते सीखा। ... अंततः वह मुझे अहिंसा का पाठ पढाने में मेरी गुरु बन गई।”

कस्तूरबा की त्याग शक्ति भी बेमिसाल थी। श्रद्धा और सपना देखने की शक्ति बा के सबसे बड़े संबल थे। 1909 के आरंभिक महीनों के दौरान बा गंभीर रूप से बीमार रहीं। अपने पेशे के प्रति सजग डॉक्टर ने बा को गोमांस का शोरबा पिलाने को कहा। उसने गांधी जी से इसकी अनुमति मांगी। गांधी जी की ना के बावज़ूद डॉक्टर नहीं माना, क्योंकि चिकित्सा की आचार संहिता के अधीन वह उन्हें गोमांस का शोरबा पिलाने को मज़बूर था। गांधी जी ने उस डॉक्टर के इलाज से बा को हटाने का निर्णय लिया। बा ने इस फैसले का अनुमोदन किया और अपनी गंभीर स्थिति की परवाह न करते हुए जो कहा, वह याद करते हुए गांधी जी ने अपनी आत्मकथा में ‘पत्नी की दृढता’ शीर्षक अध्याय में कहा है, बा ने दृढता-पूर्वक उत्तर दिया, “मैं गो-मांस का शोरबा नहीं लूंगी। मनुष्य की देह बार-बार नहीं मिलती। चाहे आपकी गोद में मर जाऊं, पर अपनी इस देह को भ्रष्ट नहीं होने दूंगी।”

गांधी जी घुटने टेक कर उनसे अनुनय-विनय कर रहे थे, कि इस संबंध में फैसला आप ही करें। यह एक विरल दृश्य था। बा को किसी प्रोत्साहन की ज़रूरत नहीं थी। बोलीं, “मुझे कुछ नहीं होगा, आप चिंता मत कीजिए।”

दक्षिण अफ्रिका में गांधी जी लोगों के सत्याग्रह में शामिल होने की सलाह दे रहे थे, तो बा ने नाराज़गी के साथ बापू से कहा, “मुझे दुख है कि आप मुझसे जेल जाने के संबंध में कुछ नहीं कह रहे। मुझमें क्या खराबी है कि मैं जेल नहीं जा सकती? जिस रास्ते पर चलने की सलाह आप औरों को दे रहे हैं उस पर मैं भी चलना चाहती हूं।”

समय बीतने के साथ कई बार बा जेल गईं और बा ने अपने जीवन के अंतिम दिन जेल में ही गुजारे। 1942-1944 तक के आगा खां पैलेस के दीर्घ कारावास के दौरान कई तरह के दुख और कष्ट ने बा को काफ़ी कमज़ोर बना दिया। कारागार में महादेव देसाई की मृत्यु ने उन्हें अस्त-व्यस्त कर दिया। वे उन्हें अपना पांचवां पुत्र मानती थीं। महादेव देसाई की समाधि उनके लिए एक मंदिर ही बन गया था। उनका विषाद काफ़ी बढ गया था। उन्हें अपनी मृत्यु का भी पूर्वाभास हो रहा था। गांधी जी के 21 दिनों के उपवास से उन्हें गहरा दुख पहुंचा था। 17 मार्च 1943 को उन्हें दिल का दौरा पड़ा। जनवरी 1944 में उन्हें दो दौरे और पड़े। उनका स्वास्थ्य तेज़ी से बिगड़ने लगा। उनकी बड़ी इच्छा थी कि उस वक्त उनके बेटे उनके पास रहें। देवदास को तो प्रतिदिन जेल में जाने की इज़ाज़त दे दी गई, लेकिन हरिलाल को सिर्फ़ एक बार अनुमति मिली। जेल के अधिकारियों के इस भेदभाव वाले रवैये पर उन्हें क्षोभ हुआ, “दो भाइयों के बीच यह भेद-भाव क्यों? कोई ग़रीब अपनी मां से मिलने उतनी बार क्यों नहीं आ सकता जितनी बार अमीर आदमी आ सकता है?”

देवदास जब अंतिम बार मां से मिल रहे थे, तो बा ने कहा, “तुम्हारे पिताजी साधू हैं, उनकी देखभाल करना।”

22 फरवरी 1944 को महाशिवरात्रि का दिन था। गांधी जी हमेशा के लिए टहलने के लिए तैयार थे। बा ने उनसे एक क्षण के लिए भी अलग न होने का अनुरोध किया। उनकी इच्छा थी कि जब उनकी अंतिम सांसे निकले तो बापू की गोद में उनका सिर हो।

उनके अंतिम क्षणों को याद करते हुए बापू कहते हैं ‘‘कुछ हिचकियां आईं और एक बार गले में घरघराहट हुई। उन्होंने मुंह खोला, तीन-चार बार हांफीं और सब कुछ समाप्त हो गया।” .... गांधी जी ने इस बात पर संतोष प्रकट किया कि उस क्षण वे उनके पास थे, ....“और उन्होंने मेरी गोद में विदा ली। इससे अच्छा और क्या होता? मैं बेहिसाब खुश हूं।”

2 अक्तूबर 1943 को गांधी जी ने बा को अपने द्वारा बुनी गई लाल किनारी की साड़ी भेंट किया था। बा के लिए बापू के जन्म दिन पर दिया गया यह बेशक़ीमती उपहार था। इसे सुरक्षित रखते हुए बा ने मनु से कहा, “मैं चाहती हूं कि मैं मरूं तो मुझे यही पहनाई जाए।”

बा के शव को उसी साड़ी में लपेटा गया। देवदास ने मुखाग्नि दी। गांधी जी चुपचाप बैठे गहरे विचार में मग्न थे, “बा के बिना जीवन की मैं कल्पना नहीं कर सकता। मैंने हमेशा चाहा कि वह मेरी बाहों में अंतिम सांस लें ताकि मुझे मन पर यह बोझ लेकर न जाना पड़े कि मेरे बाद उनका क्या होगा? लेकिन वह मेरा अविभाज्य अंग थी। उनकी मृत्यु से ऐसा शून्य पैदा हो गया है जो कभी भरा नहीं जा सकेगा।”

सोमवार, 21 फरवरी 2011

विचार-112 :: 21 फरवरी - विश्व मातृभाषा दिवस है आज

विचार-112

21 फरवरी

विश्व मातृभाषा दिवस है आजimages (24)

  • आज 21 फरवरी है। आज विश्व मातृभाषा दिवस है। इंटरनेश्नल मदर टंग डे!
  • जन्म लेने के बाद इंसान जो प्रथम भाषा सीखता है उसे उसकी मातृभाषा कहते हैं।

  • मातृभाषा, किसी भी व्यक्ति की सामाजिक एवं भाषाई पहचान होती है।

  • मार्कण्डेय पुराण स्मृति में कहा गया है,

दिव्यभाषापरिज्ञानविकलो यः स तु स्वयम्‌।

स्वीयाकेव वदेद्‌ भाषां न स्वन्यां मनसाsपि च॥

अर्थात्‌ जो व्यक्ति दिव्य भाषा के ज्ञान से रहित है, उसे अपनी मातृभाषा ही बोलनी चाहिए; अन्य भाषा को तो मन से भी नहीं बोलना चाहिए।

  • अन्य भाषाओं की जानकारी अच्छी बात है। पर अपनी मातृभाषा की जानकारी होना सबसे ज़्यादा अहमियत रखती है। महावीर परसाद द्विवेदी ने कहा है,

“ज्ञान कहीं भी मिलता हो उसे ग्रहण कर लेना चाहिए। परन्तु अपनी ही भाषा और उसी के साहित्य को प्रधानता देना चाहिए, क्योंकि अपने देश का, अपनी जाति का उपकार और कल्याण अपनी ही भाषा के साहित्य की उन्नति से हो सकता है।”

  • आज विश्व मातृभाषा दिवस के अवसर पर अपनी मातृभाषा में ज़रूर बातें करें। घर में, बाहर भी। हम बाहर में अपनी मातृभाषा में बातें करने में शायद लजाते हैं। इसीलिए तो तथाकथित आधुनिक, सभ्य और प्रगतिशील बनने, दिखने-दिखाने के चक्कर में अंग्रेज़ी में बातचीत करते हवाई अड्डे, एसी फ़र्स्ट या सेकेंड क्लास, मॉल आदि पर लोग मिल जाते हैं।
  • महात्मा गांधी का मानना था,

“मातृभाषा का अनादर मां के अनादर के बराबर है।”

  • नई पीढी तो मातृभाषा से लगभग कटती ही जा रही है। आज के दिन उन्हें भी प्रोत्साहित करें अपनी मातृभाषा में बातें करने के लिए। महात्मा गांधी ने इंडियन ओपिनियन में कहा था,

हम अपनी भाषाओं को पढाना इसलिए आवश्यक मानते हैं कि अपनी मातृभाषा के ज्ञान के बिना कोई सच्चा देश-भक्त बन ही नहीं सकता।”

  • 21 फरवरी 1952 में आज के बांग्लादेश में उस समय की पाकिस्तानी सरकार द्वारा बांग्लाभाषियों पर उर्दू थोपने का निर्णय लिया गया था। इसके विरोध में पूर्वी पाकिस्तान में जबर्दस्त जनान्दोलन हुआ। ढाका के राजपथ पर लोग इसके विरोध में निकले थे। छात्र, युवा, गृहणी व समाज के अन्य सभी वर्ग के लोगों ने मातृभाषा बांग्ला के सम्मान की रक्षा के लिये संग्राम किया था। आम आदमी के द्वारा बांग्ला भाषा की रक्षा के लिये चलाए गए इस आन्दोलन में कई लोग शहीद हुये थे। मातृभाषा की रक्षा के लिये जान न्यौछावर करने की यह एक अभूतपूर्व घटना है। उस वक्त आम आदमी के तीव्र विरोध के कारण पाकिस्तान सरकार को पीछे हटना पड़ा था और बाद में बांग्ला देश एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित हुआ तो उसकी राष्ट्रभाषा बांग्ला हुई। इसी की याद में 21 फरवरी को वर्ष 1999 में राष्ट्रसंघ विश्व मातृभाषा दिवस के घोषित किया है। बांग्लादेश में इस दिन एक राष्ट्रीय अवकाश होता है।
  • वर्ष 17 नवंबर 1999 को यूनीसेफ़ ने हर किसी की मातृभाषा के प्रति सम्मान का प्रदर्शन करने के लिए इसकी स्वीकृति दी थी। यूनीसेफ़ का मानना है कि हमें अपनी मातृभाषा को लेकर गर्व का एहसास होना चाहिए। क्योंकि इससे हमारी और हमारी संस्कृति की पहचान जुड़ी हुई है।
  • महात्मा गांधी ने कहा था,

“स्वदेशाभिमान की एक शाखा यह भी है कि हम अपनी भाषा का मान रखें, उसे ठीक तरह से बोलना सीखें और उसमें विदेशी भाषा के शब्दों का उपयोग यथासंभव कम करें।”

  • हमें अपने बच्चों को मातृभाषा सिखाना बेहद ज़रूरी है। हमारे समाज का सुधार हमारी मातृभाषा से ही हो सकता है। विदेशी भाषा महात्मा गांधी के अनुसार, सुवर्णमय होने पर भी उपयोगी नहीं हो सकती। हमारी भाषा तृणवत्‌ हो, तो उसे स्वर्णमय बनाना चाहिए।’
  • आज के दिन भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की यह कविता ज़रूर याद करें

निज भाषा  उन्नति अहै,       सब उन्नति को मूल।

बिनु निज भाषा ज्ञान के मिटत न हिय को सूल॥

अंग्रेज़ी   पढि  के जदपि,    सब गुन   होत परवीन।

पै   निज  भाषा  ज्ञान  बिन,     रहत हीन के हीन॥

निज भाषा उन्नति बिना,   कबहुं न हलै है सोय।

लाख उपाय अनेक यों,        भले करे किन कोय॥

इक भाषा इक जीव,       मति सब घर के लोग।

तबै बनत है सबन सों,        मिटत मूढता सोग॥

और एक अति लाभ यह,   या में परगट लखात।

निज भाषा में कीजिए,      जो विद्या की बात॥

तेहि सुनि पावे लाभ सब,     बात सुनै जो कोय।

यह गुन भाषा और महं,         कबहूं नाहीं होय॥

भारत में सब भिन्न अति,      ताहीं सों उत्पात।

विविध देस मतहू विविध, भाषा विविध लखात॥

सब मिलि तासों छांड़ि कै,         दूजे और उपाय।

उन्नत भाषा की करहु,        अहो भारतगन आय।

रविवार, 20 फरवरी 2011

भारत आगमन

गांधी और गांधीवाद-16
clip_image001भारत आगमन
1. गांधी-गांधीवाद 2. लिखावट 3. बचपन 4. शर्मिला चानू 5. पश्चाताप 6. डर और रामनाम 7. विवाह - विषयासक्त प्रेम 8. प्रायश्चित 9. जीवन-सूत्र 10. विलायत क़ानून की पढाई के लिए 11. शाकाहारी गांधी 12. अंग्रेजी तौर-तरीके 13. सादगी से जीवन अधिक सारमय 14. धर्मों का परिचय 15. मिस्र ने दिखाई गांधी की ताकत
1891
गांधी जी बैरिस्टर बनने के लिए विलायत गए थे। क़ानून की पढाई सरल थी। परीक्षा का मूल्य नहीं के बराबर था। प्रश्न सरल और परीक्षक उदार होते थे। अनुत्तीर्ण होने का डर नहीं के बराबर था। यदि कोई विद्यार्थी सत्रों में उपस्थित (12 सत्र होते थे) रहता, तो लगभग 3 वर्षों के बराबर होते, तो वकालत की सदस्यता अपने आप ही मिल जाती। वर्ष में चार बार परीक्षा होती थी। वर्ष में जो चार सत्र होते थे उन सत्रों में उपस्थित रहना अनिवार्य था। उसमें दावत होती थी, जिसमें उपस्थित रहना ज़रूरी था। ऐसी दावतों में शराब भी चलती थी। शराब पीने के पीछे लोग इतना पैसा क्यों बरबाद करते थे, यह गांधी की समझ में नहीं आता था। शराब तो उनके काम की नहीं थी। वे रोटी, उबले आलू और गोभी से काम चलाते थे।
परीक्षा काफ़ी सुविधा वाली थी। पर गांधी जी को बिना पढे परीक्षा देना धोखेबाज़ी लगी। उन्हें लगा कि मूल पुस्तक तो पढ ही जानी चाहिए। उन्होंने काफ़ी पैसे ख़र्च कर पुस्तकें पढी। उनके लिए, इन प्रारम्भिक वर्षों का महत्त्व बहुत अधिक रहा। उन्होंने यूनानी क़ानून का अध्ययन किया। लैटिन में “जस्टिनियन” को पढा। यह अध्ययन बाद में दक्षिण अफ़्रीका में उन्हें काफ़ी काम आया।
10 जून 1891 में गांधीजी कानून की परीक्षा में उत्तीर्ण हो गये। पर मन में नई चिन्ताएं और सन्देह उभरने लगे। वे बहुत शर्मीले थे। इसी कारण उन्हें भविष्य में कई कठिनाइयों से दो-चार होना था। उन्हें लगा कानून तो पढ़ लिया, पास भी हो गये, पर ऐसी कोई भी चीज़ नहीं सीखी। उन्हें संशय था कि वकालत कर भी पाएंगे ? क़ानून तो पढे पर वकालत करना नहीं सीखा। चार अजनबी व्यक्तियों के बीच तो उनसे बोलते नहीं बनता था, भरी अदालत में विरोधी पक्ष के वकील से जिरह और बहस कैसे कर सकेंगे ? पढे हुए क़ानून में हिन्दुस्तान के क़ानून का तो नाम तक न था। वे यह नहीं जान पाए कि हिन्दू शास्त्र और इस्लामी क़ानून कैसे हैं? न ही उन्होंने अर्ज़ी-दावा तैयार करना सीखा था। वे बहुत परेशान हुए।
बम्बई के सर फीरोजशाह मेहता जैसे महान वकीलों के विषय में वह सुन चुके थे। वे अदालत में सिंह की तरह गर्जना करते थे। ऐसे धाकड़ वकीलों के सामने पड़ जाने पर उनकी जो दुर्गति होगी, उसकी कल्पना वह सहज ही कर सकते थे। इस प्रकार जब वह भारत के लिए 12 जून 1891 को रवाना हुए तो उनके मन में “घोर निराशा के बीच आशा की एक किरण मात्र विद्यमान थी।”
कांपते पैरों से ‘आसाम’ जहाज से बम्बई के बन्दरगाह पर जब वे उतरे तो उस समय बन्दरगाह में समुद्र क्षुब्ध था। बाहर के तूफ़ान की तरह ही उनके अन्दर भी तूफ़ान चल रहा था। वे मां के दर्शन के लिए अधीर थे। घाट पर उनके बड़े भाई मौज़ूद थे। बम्बई में जहाज से उतरते ही उन्हें एक बड़ा आघात लगा। जब वे बम्बई बंदरगाह पर उतरे तो अपने भाई से उन्होंने एक दुखद समाचार सुना। कुछ सप्ताह पहले उनकी मां का स्वर्गवास हो गया था। यह दुखद घटना बताकर भाई उन्हें परीक्षावधि में परेशान नहीं करना चाह रहे थे। अतः उन्होंने यह समाचार दबाए रखा।
गांधीजी तो अपनी मां को यह कहने आए थे कि विदेश जाने के समय जो शपथ उन्होंने ली थी, जो वादे उन्होंने किए थे, वे पूरे कर दिखाए। पर मां अब इस दुनियां में नहीं थीं। गांधीजी के लिए यह बड़ा ही कठोर आघात था। अपनी आत्मकथा में वे लिखते हैं,
“पिता की मृत्यु से मुझे जो आघात पहुंचा था, उसकी तुलना में माता की  मृत्यु की खबर से मुझे बहुत अधिक आघात पहुंचा। मेरे बहुतेरे मनोरथ मिट्टी में मिल गए।”
कितना दुखद भारत आगमन था उनका! वापसी विषाद से भरी थी।

मंगलवार, 15 फरवरी 2011

विचार-110 :: आत्महत्या

विचार-110

आत्महत्या

  • तीन-चार दिनों से शहर से बाहर था। संगठन के पूर्वक्षेत्रीय राजभाषा सम्मेलन के सिलसिले में नालंदा जाना हुआ। लौटा तो कई दिनों का अखबार पड़ा था। उन्हें पढने के दौरान एक खबर पढकर मन काफ़ी व्यथित हो उठा।
  • दक्षिण कोलकाता के कसबा थाना के अंतर्गत बोसपुकुर लेन में रहने वाला पांचवीं कक्षा का एक बच्चा संदीप मंडल, जिसकी उम्र 10 साल की थी, एक रियलिटी डांस शो में भाग लेना चाहता था। पर ऑडिशन में असफल रहा। बहुत दिनों से संजोये सपने के साथ-साथ उसका दिल टूट गया। संदीप के परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। इस कारण से उसके माता-पिता डांसर बनने का उसका शौक पूरा करने के लिए उसे किसी डांसिंग स्कूल में भेजने में असमर्थ थे। पर डांस का दीवाना संदीप घर पर ही टीवी देख कर डांस सीखा करता था। पिछले कुछेक महीनों में उसने कुछेक डांस रियलिटी शो के लिए 5-6 ऑडिशन्स भी दिए थे। पर कहीं भी उसका चयन नहीं हुआ था। वह बहुत ही तनाव और अवसाद से ग्रस्त हो गया था। अगले ऑडिशन्स के लिए उसने अपने अभिभावक से पैसे मांगे, पर आर्थिक तंगी के कारण उन्होंने पैसे देने से इंकार कर दिया। इसको लेकर उसकी अपनी मां और पिता से काफ़ी बहस हुई। संदीप की मां बाहर गई थी, जब रात को नौ बजे घर लौटी तो बेटे को घर की छत से झूलता पाया। संदीप ने फांसी लगा ली थी।
  • असफलता के बाद खुदकुशी को इम्पल्सिव बिहैवियर कहा जाता है। टीवी और सिनेमा आदि का बुरा असर बाल मन पर पड़ता है।
  • NCRB (National Crime Record Bureau) राष्‍ट्रीय अपराध ब्‍यूरो का आकंड़ा बताता है कि वर्ष भर में कुल 2,951 बच्‍चों ने जान दी।
    • 6 लोग प्रतिदिन असफलता के कारण आत्महत्या करते हैं।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में कहा गया है कि विश्व में मौत का 13वां प्रमुख कारण आत्म हत्या है।
  • 3000 लोग विश्व में प्रतिदिन आत्महत्या करते हैं।
  • भारत में आत्‍महत्‍या करने वाले तीन लोगों में से एक युवा होता है।
  • देश में हर चार मिनट में कोई एक अपनी जान दे देता है।
  • यानी देश में हर 12 मिनट में 30 वर्ष से कम आयु का एक युवा अपनी जान ले लेता है।
  • खुदकुशी के कारणों पर गौर करें तो पाते हैं कि
      • परिवारिक परेशानी के कारण 23% लोग खुदकुशी करते हैं।
      • बीमारी के कारण 21% लोग खुदकुशी करते हैं।
      • प्‍यार मोहब्‍बत के कारण 2.9% लोग खुदकुशी करते हैं।
      • दहेज, झगड़े, ड्रग्‍स, गरीबी के कारण 2.3% लोग खुदकुशी करते हैं।
  • पुरूष – अधिकांश सामाजिक और आर्थिक परेशानी के कारण खुदकुशी करते हैं।
  • जबकि महिला- व्‍यक्तिगत और भावनात्‍मक कारण से।
  • प्रतिदिन 348 आत्‍महत्‍या करने वाले इस देश में 2009 में 1,27,151 लोगों ने की आत्‍महत्‍या की। इनमें से 68.7% 15-44 वर्ष की उम्र के लोग थे।
    • इसी दौरान कुल 2,951 बच्‍चों ने जान दी।
  • 2008 की तुलना में आत्‍महत्‍या में 1.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई कुल
  • प्रतिदिन 223 पुरूष आत्महत्या करते हैं वहीं 125 महिलाएं प्रति दिन खुदकुशी करती हैं जिनमें से 69 हाउस वाईफ/गृहणी होती हैं।
  • 73 लोग प्रतिदिन बीमारी के कारण आत्महत्या करते हैं।
  • 10 प्रतिदिन प्‍यार के कारण, 9 प्रतिदिन बैंकरपट्सी के कारण, 6 प्रतिदिन असफलता और 153 अन्‍य कारण से आत्मह्त्या करते हैं।
  • 8 प्रति‍दिन गरीबी के कारण, और देश में प्रतिदिन 7 बरोजगार खुदकुशी करता है। बेरोजगारी के कारण आत्‍महत्‍या में 18.8% की एवं नौकरी के कारण 15.1% की वृद्धि
  • 82 पारिवारिक समस्‍या के कारण प्रतिदिन खुदकुशी करते हैं।
  • कृषक में आत्‍महत्‍या करने का मामला बढ़ा है। 2008 से 7% की वृद्धि
  • 30% लोग कीटनाशक खाने का रास्ता अपनाते हैं, वहीं अन्य उपायों में से जहर 8%, रेल 7.8%, डूबना 7.7% और आग 7 % है।
  • गांधी जी ने कहा था,
    • “आत्‍महत्‍या का‍ विचार करना सरल है, आत्‍महत्‍या करना सरल नहीं ।”
    • आत्‍महत्‍या भगवान की अवज्ञा है। जिस प्रकार सुख-दुख उसके दान हैं, उन्हें मनुष्‍य झेलती है, उसी प्रकार प्राण भी उसकी धरोहर है ।
  • 10 सितम्बर को विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस मनाया जाता है।

सोमवार, 14 फरवरी 2011

विचार-109 :: गांधी और गांधीवाद-15 :: मिस्र ने दिखाई गांधी की ताकत

विचार-109

गांधी और गांधीवाद-15

मिस्र ने दिखाई गांधी की ताकत

  • मिस्र के राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक का इस्तीफ़ा देना जनशक्ति की जीत है।
  • अब वहां लोकतंत्र की बहाली होने की संभावना बढ गई है।
  • मिस्र के तहरीर चौक पर लाखों जनता के अहिंसक प्रदर्शन के सामने झुकना पड़ा हुस्नी मुबारक को।
  • उसे आखिरकार गदी छोड़नी ही पड़ी।
  • मिस्र की जनता के शांतिपूर्ण प्रदर्शन ने महात्मागांधी के अहिंसात्मक आन्दोलन के सिद्धांत को फिर से एक बार सही साबित कर दिया।
  • एक बार फिर से यह ग़लत साबित हुआ कि हिंसा न्याय पाने का सबसे अच्छा रास्ता है।
  • एक बार फिर से यह साबित हुआ कि असली ताकत अहिंसा में है, आतंकवाद में नहीं।
  • अपने आंदोलन के दर्शन की परिभाषा करते हुए गांधी जी ने कहा था,
    • “वह आत्मा की शक्ति या प्यार की शक्ति है जो सत्य और अहिंसा से जन्मी है। एक सत्याग्रही हर उस चीज़ के सामने झुकने से इंकार करेगा जो उसकी दृष्टि में ग़लत होगी। वह सारी उत्तेजनाओं के बीच शांत रहेगा। वह पाप का विरोध करेगा लेकिन पापी से घृणा नहीं करेगा। वह सत्य का प्रतिपादन करेगा, लेकिन विरोधी को आघात पहुंचाकर नहीं, वरन्‌ स्वयं को पीड़ित करके।”
  • उन्हें उम्मीद थी कि ऐसा करके वह पापी की अंतरआत्मा को जगाएगा। सफलता के लिए आवश्यक है कि सत्याग्रही भय, घृणा और असत्य से पूरी तौर पर मुक्त रहे।
  • सत्याग्रह, उनके अनुसार बलवानों का हथियार था।
  • उनके अनुसार, “सत्याग्रह अपने अधिकारों को आत्म-उत्पीड़न के द्वारा प्राप्त करने का माध्यम है, यह शस्त्रों द्वारा विरोध का विलोम है। इसका उद्देश्य युद्धबल के उद्देश्य से बिल्कुल उल्टा है।”
  • महात्मा गांधी कहा करते थे,
    • “अहिंसापूर्वक सत्य का पालन करके आप संसार को अपने चरणों में झुका सकते हैं।”
    • “मेरी अहिंसा का सिद्धांत एक अत्यधिक सक्रिय सिद्धांत है। इसमें कायरता तो दूर, दुर्बलता तक के लिए स्थान नहीं है। एक हिंसक व्यक्ति के लिए यह आशा की जा सकती है कि वह किसी दिन अहिंसक बन सकता है, किन्तु कायर व्यक्ति के लिए ऐसी आशा कभी नहीं की जा सकती।”
    • “अहिंसात्मक युद्ध में अगर थोड़े भी मर मिटने वाले लड़ाके होंगे तो वे करोड़ों की लाज रखेंगे और उनमें प्राण फूकेंगे। अगर यह मेरा स्वप्न है, तो मेरे लिए मधुर है।”

धर्मों का परिचय

विचार-108
गांधी और गांधीवाद-14
clip_image001धर्मों का परिचय


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गांधी जी को गीता का न तो संस्कृत में ज्ञान था न ही अपनी मातृभाषा गुजराती में। विलायत प्रवास के दौरान उनकी दो थियॉसॉफिकल मित्रों से पहचान हुई। दोनों सगे भाई थे। उनमें से एक थे सर एडविन आर्नल्ड। वो ‘लाइट आफ एशिया’ (एशिया की ज्योति : बुद्ध चरित) और ‘दि सांग सेलेस्टियल’ (दिव्य संगीत : ‘भगवद्गीता’ का अनुवाद) नाम की उन दो पुस्तकों के लेखक थे, जिनका गांधीजी पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा था। ‘दि सांग सेलेस्टियल’ जीवन भर गीता का उनका प्रिय अनुवाद बना रहा। वे श्रीमद्‌भगवद्‌गीता के मतवाले हो उठे। उस प्रवास में उन्हें भारत के इसी आलोक की ज़रूरत थी। उसने उनकी आस्था लौटा दी। उन्हें आत्मा की सर्वोच्चता की अनुभूति हुई। उनको गीता से सत्य की अनुभूति हुई। कुरुक्षेत्र के युद्ध के पहले भगवान श्री कृष्ण का अर्जुन को गीता का उपदेश, वास्तव में गांधी जी की विशिष्ट आस्थाओं का आधार था। इसी आधार पर उन्होंने अपने जीवन-संग्राम को टिकाया था। गीता के उपदेश उनके मन में पैठ गए। उनकी प्रकृति को गीता से बल मिला। धीरे-धीरे गीता उनके जीवन की सूत्रधार बन गई।
बुद्ध के जीवन और गीता के संदेश ने उनके जीवन को एक नई चेतना प्रदान की। लंदन के निरामिष जलपान-गृहों और भोजनालयों में उनकी भेंट केवल खान-पान में परहेज की धुन रखने वालों से ही नहीं, कुछ सच्चे धर्माचार्यों से भी हुई। इनमें से एक के द्वारा गांधीजी का बाइबिल से पहला परिचय हुआ।
‘न्यू टेस्टामेंट’, प्रभू यीशु का सुसमाचार और विशेष कर ‘सर्मन ऑन दी माउण्ट’ (गिरि प्रवचन) ने गांधीजी के हृदय पर गहरा असर किया। उनकी बुद्धि ने गीता से इसकी तुलना की।
  • जो तुझसे कुर्ता मांगे उसे अंगरखा भी दे दे
  • जो तेरे दाहिने गाल पर तमाचा मारे, बांया गाल भी उसके सामने कर दे
इन बातों ने उन्हें अपार आनन्द प्रदान किया।
यह पढ़कर उन्हें गुजराती कवि श्यामल भट्ट का निम्न छप्पय याद आ गया, जिसे वह बचपन में गुनगुनाया करते थे : पाणी आपने पाय भलुं भोजन तो दीजे; आवी नमाये शीश, दण्डवत कोडे कीजे। आपण घासे दाम, काम महोरोनूं करीए; आप उगारे प्राण, ते तणा दुखमां मरीए। गुण केडे तो गुण दशगणो, मन, वाचा, कर्मे करी। अवगुण केडे जे गुण करे, ते जगमां जीत्यो सही।।
उनके बालमन ने गीता, आर्नल्ड कृत बुद्ध-चरित और ईसा के वचनों का एकीकरण किया। घृणा के बदले प्रेम और बुराई के बदले भलाई करने की बात ने उन्हें मुग्ध कर दिया। हालाकि इसका मर्म उन्होंने अभी पूरी तरह नहीं समझा था, लेकिन उनके अति ग्रहणशील मन को ये शिक्षाएं आन्दोलित करने लगी थी।
उन्होंने दूसरे धर्माचार्यों की जीवनियां भी पढी। हीरोज़ एण्ड हीरो-वर्शिप से उन्होंने हजरत मुहम्मद की महानता, वीरता और तपश्चया के बारे में ज्ञान प्राप्त किया।
ये सारे अध्ययन आने वाले दिनों में गांधी जी के सम्पूर्ण चिंतन में समाहित हो गए। उनका मानना था,
स्तुति, उपासना प्रार्थना वहम नहीं हैं। ये निरा वाणी-विलास नहीं होती। यदि हम हृदय की निर्मलता को पा लें, उसके तारों को सुसंगठित रखें, तो उनसे जो सुर निकलते हैं, वे गगन-गामी होते हैं। विकाररूपी मलों की शुद्धि के लिए हार्दिक उपासना एक रामबाण औषधि है।

शनिवार, 12 फरवरी 2011

विचार-107 :: एक महिला को पढाओगे तो पूरा परिवार पढेगा

विचार-107

एक महिला को पढाओगे तो पूरा परिवार पढेगा

  • आज के विचार का शीर्षक एक सलाह जैसा है।
  • लेखिका अगाथा क्रिस्टी (1890-1976) ने कहा था,

“अच्छी सलाह की उपेक्षा कर दी जाती है, लेकिन इस वजह से सलाह देना बंद नहीं करना चाहिए।”

  • राष्‍ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्‍यूरो के अनुसार देश में हर 29 मिनट पर एक महिला के साथ दुष्‍कर्म होता है। और प्रतिदिन दहेज हिंसा के नाम पर 50 मामले दर्ज होते हैं।
    • महिला सशक्तिकरण महज एक नारा है, या सच्चाई?
  • हर तीन मिनट पर दर्ज होता है महिला हिंसा का मामला। हर साल 7600 महिलाएं होती है दहेज हत्‍या का शिकार। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार देश में बलात्कार, दहेज प्रथा और महिला शोषण से जुड़े मुकदमों की तादाद देश में सालाना एक लाख से ऊपर है।
    • महिला सशक्तिकरण महज एक नारा है, या सच्चाई?
  • प्रतिदिन 125 महिलाएं आत्म हत्या करती हैं, इनमें से 69 हाउस वाईफ/गृहणी होती हैं। इसका प्रमुख कारण व्‍यक्तिगत और भावनात्‍मक होता है।
    • महिला सशक्तिकरण महज एक नारा है, या सच्चाई?
  • महिला और बाल विकास मंत्रालय के अनुसार भारत में किशोरियों की कुल संख्‍या तकरीबन 8.3 करोड़ है, जिनमें 2.74 करोड़, यानि लगभग 33% लड़कियां कुपोषण का शिकार है।
    • महिला सशक्तिकरण महज एक नारा है, या सच्चाई?
  • माताओं की सेहत पर 77 विभिन्न देशों की स्थिति बताने वाली सूची में भारत का स्थान 73वां है। बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था “सेव चिल्ड्रेन” ने “स्टेट ऑफ द वर्ल्ड मदर्स – 2010” नामक रिपोर्ट में यह खुलासा किया है।
    • महिला सशक्तिकरण महज एक नारा है, या सच्चाई?
  • 50% लड़कियां स्कूल नहीं जाती हैं।
  • पिछली जनगणना के अनुसार देश की 49.46 करोड़ महिलाओं में से सिर्फ़ 53.67% साक्षर हैं।
  • यानी 22.91 करोड़ महिलाएं निरक्षर हैं।
  • एशिया महाद्वीप में भारत की महिला साक्षरता दर सबसे कम है।
  • क्राइ के अनुसार भारत में 5 से 9 साल की 53% लड़कियां पढना नहीं जानती।
  • इनमें से अधिकतर रोटी के चक्कर में घर या बाहर काम करती हैं।
  • इस चक्कर में 4 या 8 साल के बीच 19% लड़कियां यौन-उत्पीड़न या दुर्व्यवहार का शिकार बनती हैं। 8 से 12 साल के बीच 28% और 12 से 16 साल के बीच 35% लड़कियों के साथ ऐसा होता है।
    • महिला सशक्तिकरण महज एक नारा है, या सच्चाई?
  • इस बात से शायद ही कोई इनकार करे कि बिना शिक्षित किए उन्हें सशक्त नहीं किया जा सकता। आइए देखें तस्वीर क्या है?
    • लड़कियों की शिक्षा के लिए कई योजनाएं हैं
      • घरों के पास स्कूल खोलना
      • स्कॉलरशिप देना
      • मिड-डे-मील चलाना
      • समाज में जागरूकता बढाना
      • ग्रामीण और ग़रीब लड़की के लिए ब्रिज कोर्स
    • बीते तीन सालों में 2000 से अधिक आवासीय स्कूल मंजूर हुए हैं।
    • राष्ट्रीय बालिका शिक्षा कार्यक्रम के तहत 31 हजार आदर्श स्कूल खुले।
    • आदर्श स्कूल के 2 लाख शिक्षकों को लैंगिक संवेदनशीलता में ट्रेनिंग दी गयी।
  • इन सबके बावज़ूद क्या शिक्षा व्यवस्था लड़कियों के अनुकूल बना है?
    • योजनाएं तो अच्छी हैं। महात्वाकांक्षी भी। पर इन्हें सरकारी स्कूलों के भरोसे कार्यान्वित किया जाएगा। लड़कियों की एक बड़ी संख्या सरकारी स्कूलों में हैं। इसलिए स्कूलों की व्यवस्था में सुधार से लड़कियों की स्थिति बदल सकती है, ऐसा माना जा सकता है।
  • पर वास्तविक स्थिति यह है कि
    • समाज का पितृसत्तात्मक रवैया बरकरार है।
    • क्लासरूम में इनकी उपस्थिति कम रहती है।
    • लड़कियों के महत्व को कम करके आंका जाता है।
    • हर जगह भेद भाव वाला रवैया है।
    • भारतीय लड़कियां अपनी अलग पहचान के लिए जूझती रहती हैं।
    • उनके ख़िलाफ़ जो वातावरण है वह उन्हें ग़ैरबराबरी से बराबरी की तरफ़ आने नहीं देता।
  • स्कूल को सशक्तिकरण का माध्यम माना जा रहा है। क्या समाज शिक्षित हुआ? या अब भी स्कूल औरतों के हकों से बेपरवाह है।
  • पाठ्यपुस्तकों में भी लिंग के आधार पर भेदभाव की झलक आज भी है।
  • ज़्यादातर पाठों के विषय, चित्र और चरित्र लड़कों के इर्द-गिर्द ही घूमते हैं।
  • चरित्रों में लड़कियों की भूमिकाएं या तो कमज़ोर होती हैं या सहयोगी।
  • ऐसी बाते बच्चों के दिलो-दिमाग को प्रभावित करती हैं।
  • बच्चों को जागरूक बनाने के लिए स्कूल मददगार हो सकता है, इसमें कोई शक नहीं।
  • पर स्कूल के मार्फ़त समाज को बदलने के पहले स्कूलों को बदलना चाहिए।
  • आज भी ज़्यादातर लड़कियों के लिए शिक्षा का मतलब केवल साक्षर बनाने तक ही है।
  • कई जगह तो सिर्फ़ इसलिए दाखिला करा दिया जाता है कि शादी ब्याह में कहा जाए कि वो फलां क्लास में पढती है।
  • लड़कियों की शिक्षा के लिए रचनात्मक ढंग से सोचने की ज़रूरत है।
  • गांधी जी ने कहा था,

‘‘एक महिला को पढाओगे तो पूरा परिवार पढेगा।

“ज़रूरी यह है कि शिक्षा प्रणाली को दुरुस्त किया जाए। उसे आम जनता को ध्यान में रख कर बनाया जाए।”

“ऐसी शिक्षा होनी चाहिए जो लड़का-लड़कियों को ख़ुद के प्रति उत्तरदायी और एक-दूसरे के प्रति सम्मान की भावना पैदा करे। लड़कियों के भीतर अनुचित दबावों के खिलाफ़ विद्रोह पैदा हो। इससे तर्कसंगत प्रतिरोध होगा।”

बुधवार, 9 फरवरी 2011

ठहाके

विचार-106
ठहाके .. ठ - हा - के … ठ .. ह … आ .. के
  ( और एक लघुकथा)
  • मनुष्य ही सिर्फ़ एक ऐसा प्राणी है जिसमें हंसने की शक्ति है।
  • हंसी प्रकृति की सबसे बड़ी देन है।
  • हंसी मन की गांठें बड़ी आसानी खोल देती है – मेरे मन की ही नहीं, तुम्हारे मन की भी। -- प्रेमचन्द
  • ज़ोर की हंसी को ठहाके कहते हैं।
  • रागदरबारी में श्रीलाल शुक्ल के अनुसार सब वर्गों की हंसी और ठहाके अलग-अलग होते हैं,
    • कॉफ़ी हाउस में बैठे हुए साहित्यकारों का ठहाका कई जगहों से निकलता है, वह किसी के पेट की गहराई से निकलता है, किसी के गले से, किसी के मुंह से और उनमें से एकाध ऐसे भी रह जाते हैं जो सिर्फ़ सोचते हैं कि ठहाका लगाया क्यों गया है।
    • डिनर के बाद कॉफ़ी पीते हुए, छके हुए अफ़सरों का ठहाका दूसरी किस्म का होता है। वह ज़्यादातर पेट की बड़ी ही अन्दरूनी गहराई से निकलता है। उस ठहाके के घनत्व का उनकी साधारण हंसी के साथ वही अनुपात बैठता है जो उनकी आमदनी का उनकी तनख़्वाह से होता है।
    • राजनीतिज्ञों का ठहाका सिर्फ़ मुंह के खोखल से निकलता है और उसके दो ही आयाम होते हैं, उसमें प्रायः गहराई नहीं होती।
    • व्यापारियों का ठहाका होता ही नहीं है और अगर होता भी है तो ऐसे सूक्ष्म और सांकेतिक रूप में, कि पता लग जाता है, ये इनकम टैक्स के डर से अपने ठहाके का स्टॉक बाहर नहीं निकालना चाहते।
  • हमने पाया है कि ठहाके के संस्करण अलग-अलग किस्म के होते हैं, किसी के अखबार की तरह, तो किसी के सजिल्द मोटी किताब की तरह, कोई पुस्तकालय एडिशन संस्करण की तरह प्रकाशित करता है तो कोई और पॉकेट-बुक-संस्करण की तरह प्रकाशित करता है। कोई साप्ताहिक पत्रिका की तरह प्रकाशित प्रकाशित करता है तो कोई मसिक संकरण की तरह। कई तो त्रैमासिक संस्करण निकालते हैं, तो कुछेक के तो वार्षिक संस्करण, वह भी बड़ी कठिनाई और मशक्कत से निकलते हैं।
"इक्कीसवीं सदी की घोर भौतिकता में हम कितने लाचार हो गए हैं कि सहज मानवीय संवेदनाओं को भी तराजू में तौल रहे हैं। उर के उदगार भी बाज़ार के मोहताज हैं ! !"
अब एक लघुकथा
ठहाके
-- मनोज कुमार
शर्माजी और वर्माजी में गहरी दोस्ती है। दोनों एक साथ एक ही दफ़्तर में काम करते थे। तीन दशक से भी अधिक की नौकरी करने के बाद दोनों एक साथ ही दो वर्ष पूर्व सेवा निवृत्त हुए। उनकी मित्रता आज भी यथावत बनी हुई है। वे रोज़ मॉर्निंग वाक के लिए साथ ही जाते हैं। घर के समीप ही एक पार्क है, गोल्डन पार्क। प्रतिदिन उस पार्क में गप-शप करते, हँसी-ठहाके लगाते हुए वे सैर करते हैं और टहलना सबसे अच्छा व्यायाम है को चरितार्थ करते हैं। पार्क के कोने में लाफ्टर क्लब के कुछ सदस्य एकत्रित होते हैं। शर्माजी-वर्माजी को यह क्लब रास नहीं आता। ‘इस अर्टिफिशियल हँसी के लिए कौन इसका सदस्य बने। हम तो नेचुरल ठहाके लगाते ही हैं।’
उस दिन पार्क के कोने वाले हिस्से से गुज़रते हुए उन्हें ठहाकों की आवाज़ सुनाई नहीं दी। विस्मय हुआ। शर्माजी ने वर्माजी से पूछा, “बंधु, इन्हें क्या हुआ? आज इनके ठहाके नहीं गूंज रहे !”
वर्माजी ने कहा, “रेसेशन का दौर है। मंहगाई आसमान छू रही है।”
शर्माजी ने कहा, “उसका ठहाकों से क्या लेना देना?”
वर्माजी ने समझाया, “शर्माजी ये नया युग है। हमारा ज़माना थोड़े ही रहा। हम तो फाकामस्ती में भी ठहाके लगाते रहें हैं। आज तो हर चीज़ में कटौती करनी पड़ रही है। लोग अब ठहाकों की जगह छोटी सी मुस्कान से ही काम चला ले रहें हैं।”
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रविवार, 6 फरवरी 2011

विचार-105 :: ज़िन्दगी को दें मुस्कान का उपहार

विचार-105

ज़िन्दगी को दें मुस्कान का उपहारimages (22)

  • सिक्कों की खनक तो सुनी ही होगी आपने। सिक्के एक, दो, पांच के मूल्य वाले होते हैं पर आवाज़ ज़्यादा निकालते हैं। वहीं दस, बीस, पचास, सौ, पांच सौ और हज़ार के नोट शांत होते हैं, ख़ामोश रहते हैं
  • जो शांत होते हैं, ख़ामोश रहते हैं, उनका मूल्य अधिक होता है। जैसे-जैसे महत्व एवं उपयोगिता बढ़ती जाती है व्यक्ति उत्तेजनारहित और शांत होता जाता है। ऐसी स्थिति तो ज्ञान के संचय से ही आती है। ऐसी अवस्था में जीवन सुंदर होता है।
  • सुंदर जीवन बस यूं ही नहीं हो जाता। अपनी प्रार्थनाओं से, नम्रता से, त्याग से एवं प्रेम से रोज़ बनाना पड़ता है जीवन के रास्ते को।
  • जीवन के रास्ते सदैव समतल तो नहीं ही होते। कभी-कभी ऊँची चढ़ाई चढ़नी होती है।
  • जब चढाई चढनी होती है तो लोग कहते हैं भगवान का नाम लेकर चढ़ जाओ।
  • भगवान का नाम लेकर चढने से पहाड़ छोटा नहीं हो जाता, हां हो सकता है चढना थोड़ा आसान हो जाए। मुश्किलें हल्की हो जाएं। पर यदि भगवान को याद ही करना है तो मुश्किलें आसान हो जाएं यह मांगने के वजाए हामारी पीठ और मज़बूत हों, यह मांगना चाहिए। ताकि जीवन की दुश्‍वारियों का सामना हम दृढ़ता से कर सकें। प्रार्थना से परिस्थिति नहीं बदल जाती। हां इससे परिस्थिति के प्रति हमारी सोच में बदलाव आ सकता है। हम समस्या के सम्मुख खड़े हो पाते हैं -- और मज़बूत इरादे के साथ ।
  • यदि मज़बूत इरादे हों, सात ही मन में दृढ़ निश्‍चय व विश्‍वास है, तो विजय निश्चित है। अगर संकल्‍प कमजोर हैं तो पराजय होगी। अपने मार्ग में आने वाले किसी भी विघ्‍न से घबराए नहीं। विघ्‍न तो उन्‍नति की ओर ले जाने वाली सीढ़ी समान है।
  • सीढ़ी से ही जाना पड़ेगा, सफलता के लिये कोई लिफ्ट नही जाती न इसलिये। ये सीढियां हमें सफलता की ऊंचाई की ओर ले जाती हैं।
  • सफलता की ऊंचाई तो जीवन में हर कोई प्राप्त करना चाहता है। पर वह कितनी ऊँचाई प्राप्त कर सकता है तब तक नहीं जान पाएगा जब तक उड़ान भरने के लिए  अपने पंख नहीं फैलाएगा, अपने हाथों को नहीं चलाएगा।
  • हाथों का इस्तेमाल करने से मत घबराएं, ये आपको अपने दिमाग का इस्‍तेमाल करने से कहीं नहीं रोकेंगे।
  • दिमाग कई बार ऐसी परिस्थितियों में घिर जाता हैं कि हमें कोई राह नहीं सूझता। तब वह तर्क-वितर्क करने लगता है। समस्या के समाधान को ले कर एक मत नहीं बनता।
  • एक मत पर पहुंचने के लिए हम लोगों से बात-चीत करते हैं।
  • बात-चीत बहस में तबदील हो जाती है और मुद्दे पर आपस में तकरार शुरु हो जाता है। तरह-तरह की दलीलें आती हैं। किसी प्रश्‍न का अगर हल ढ़ूढ़ना हो तो तर्क-दलील से काम नहीं चलता। इसके लिए विचार-विमर्श ज़रूरी है। तर्क-दलील से हम यह तो पता लगा सकते हैं कि कौन सही है पर विचार-विमर्श से हमें यह पता चलेगा कि क्या सही है।
  • सही मायने में बुद्धिपूर्ण विचार हजारों दिमागों में आते रहे हैं। लेकिन उनको अपना बनाने के लिये हमको ही उन पर गहराई से तब तक विचार करना चाहिये जब तक कि वे हमारी अनुभूति में जड न जमा लें।
  • अनुभूति से हम पाते हैं कि ज़िन्दगी चॉकलेट के बक्से की तरह है। चॉकलेट के बक्से का प्रत्येक चॉकलेट ज़िन्दगी के एक हिस्से के समान होता है। कुछ क्रंचि (करड़-मरड़ की आवाज़) है, तो कुछ नट्टी (काष्ठफल के स्वाद वाला), वहीं कुछ हिस्स सॉफ्ट (मुलायम) है। पर सारे के सारे स्वादिष्ट! अतः जीवन के हर पल को एन्ज्वाय करें, मज़े लें, आनंद उठाएं।
  • आनंद लोगों से मिलने-जुलने में है। मिल-जुल कर रहने में है। ज़िन्दगी में हम विभिन्न प्रकार के लोगों से मिलते हैं। कुछ लोग अन्य की तुलना में हमारे ज़्यादा प्रिय हो जाते हैं। ऐसा क्यों होता है? इसका कारण यह नहीं है कि जब आप ऐसे लोगों से मिलते हैं तो आपको अधिक ख़ुशी, प्रसन्नता का अनुभव होता बल्कि जब वे आपके पास नहीं होते, ईर्द-गीर्द नहीं होते तो आप बड़ा ख़ाली-ख़ाली महसूस करते हैं, अकेलापन का अनुभव करते हैं। ऐसे लोगों से ज़िन्दगी के मतलब बदल जाते हैं। ऐसे लोग हमारे हृदय तंतुओं को छूते हैं। हममें मधुर भावनाओं का संचार होता है।
  • संबंध मधुर हो, मधुर बना रहे इसके लिए वाणी का भी बड़ा ही महत्वपूर्ण योगदान होता है। वाणी यदि कठोर हो तो किसी कोमल हृदय को क्या छूएगा? हां, कोमल वाणी से किसी भी कठोर हृदय प्राणी के दिल को जीता जा सकता है। इसलिए मधुर बोलें, मीठा बोलें, जग जीत जाएंगे। किसी ने ठीक ही कहा है कि सूई बनो, कैंची नहीं। इससे ख़ुशी मिलेगी।
  • ख़ुशी हमें चाहिए। प्रसन्नता चाहिए। ज़िन्दगी हमें यूं ही ख़ुशियां नहीं दे देती। इसे हमें पाना होता है। ज़िन्दगी तो हमें टाइम और स्पेस देती है। यह तो हम पर निर्भर करता है कि हम इसे कैसे भरते हैं, हर गुज़रते पल के साथ
  • हर गुज़रते पल के साथ हम उम्रदराज़ होते जाते हैं। पर .. ऐसा नहीं है कि ज्यों-ज्यों हम उम्रदराज़ होते जाते हैं तो हमारी मुस्कान कम होती जाती है। बल्कि सच तो ये है कि हम बूढ़े इसलिए दिखते हैं क्योंकि हमने मुस्काते रहना कम कर दिया है। इसलिए अपने आप को, अपनी ज़िन्दगी को मुस्कान का उपहार दीजिए और लंबी ज़िन्दगी जिएं।

शुक्रवार, 4 फरवरी 2011

सादगी से जीवन अधिक सारमय

विचार-91
 गांधी और गांधीवाद-13Photo of Gandhiji
सादगी से जीवन अधिक सारमय
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1. गांधी-गांधीवाद 2. लिखावट 3. बचपन 4. शर्मिला चानू 5. पश्चाताप 6. डर और रामनाम 7. विवाह - विषयासक्त प्रेम 8. प्रायश्चित 9. जीवन-सूत्र 10. विलायत क़ानून की पढाई के लिए 11. शाकाहारी गांधी 12. अंग्रेजी तौर-तरीके
लंदन मे गांधीजी के आरंभ के कई महीने अनिश्चय में बीते। वे कुछ प्रयोग करते, उसमें ठगे जाते, और इन सब से सीखते जाते। लेकिन गांधीजी इन प्रयोगों में अपने को पूर्ण स्वच्छंदता और सहज भाव से नहीं लगा सके। ‘जेण्टिलमैन’ बनने की लालसा में उन्होंने न सिर्फ़ समय बल्कि गठरी भर रुपया भी गंवाया। आत्मनिरीक्षण की अपनी आदत को वह कभी नहीं छोड़ सके। अंग्रेजी नाच और गाना सीखना उनके लिए आसान काम नहीं था। उन्होंने अनुभव किया कि यह अंग्रेज़ियत सिर्फ बाहरी और ऊपरी होगी। तीन महीने फैशन की चकाचौंध में भटकने के बाद उनका सहज अन्तर्मुखी मन फिर अपनी खोल में आ बैठा।
उन्होंने अपने जीवन को सुदृढ श्रृंखला और कठोर कर्म बंधन में बांधने का निश्चय किया। उन्हें समझ में आ गया कि अंग्रेज़ी परिवेश में रहकर किस प्रकार अपने ढंग से काम किया जा सकता है। अंधाधुंध फिजूलखर्ची ने अब अत्यधिक सतर्कता पूर्ण मितव्ययिता का रूप ले लिया। वे पाई-पाई का हिसाब रखने लगे। हर महीने पन्द्रह पौण्ड से अधिक ख़र्च न करने का निर्णय लिया। दिनभर के ख़र्चे को लिखते और रात में सोने से पहले उसे मिला लेते। बाद में यह आदत उन्हें काफ़ी काम आई। अपनी आत्मकथा में कहते हैं,
“मेरी देख रेख में जितने आन्दोलन चले, उनमें मैंने कभी क़र्ज़ नहीं लिया, बल्कि हर एक में कुछ न कुछ बचत ही रही।”
वकालत में प्रवेश सरल था। परीक्षाएं भी आसान थी। इसलिए गांधीजी ने बैरिस्टर बनने के अलावा कुछ और पढने के बारे में सोचा। लंदन की मैट्रिक परीक्षा के लिए उन्होंने तैयारी शुरु कर दी। उन्होंने पूरा एक साल लगा दिया इसमें। हर छह महीने पर परीक्षा होती थी, पर पहली परीक्षा के लिए केवल पांच महीने ही मिले, और वे फ्रेंच, इंगलिश एवं केमिस्ट्री में तो पास कर गए, किंतु लैटिन में फेल हो गए। छह महीने बाद वे फिर परीक्षा में बैठे। इस बार लैटिन उनके विषयों में नहीं थी। वे सभी विषयों में पास कर गए। अनावश्यक मेहनत की यह घटना गांधी जी की चारित्रिक विशेषता का एक पहलु है। अनावश्यक इस तरह कि किसी ने भी उन्हें ऐसा करने को नहीं कहा था, पर उन्होंने किया, और उसके उत्कृष्ट परिणाम उनको मिले, जो बाद में कई तरह से उपयोगी सिद्ध हुए।
गांधीजी ने अनुभव किया कि अभी, परिवार की ग़रीबी के अनुरूप उनका जीवन सादा नहीं बना है। भाई की आर्थिक तंगी और उनकी उदारता के विचारों ने उन्हें व्याकुल बना दिया। ख़र्च आधा करने के निश्चय के साथ वे सस्ते कमरे में रहने लगे, नाश्ते के लिए ओट मील की लपसी और कोको खुद बना लेते और बस का किराया बचाने के लिए रोज आठ-दस मील पैदल चलते। इस तरह वह अपना पूरे महीने का खर्च सिर्फ दो पौण्ड में चला लेते थे। परिवार के प्रति आभार और अपने दायित्व को वे बड़ी गंभीरता से अनुभव करने लगे और उन्हें इस बात से खुशी होती कि अब खर्च के लिए भाई से ज्यादा पैसा नहीं मंगवाना पड़ेगा। जीवन सादा बन जाने से समय अधिक बचने लगा। सादगी ने अब उनके जीवन के बाह्य और आन्तरिक दोनों पक्षों को संतुलित कर दिया था। इस प्रयोग से हुए अनुभव के बारे में गांधी जी कहते हैं,
“यह न मानें कि सादगी से मेरा जीवन नीरस बना होगा। उलटे, इन फेरफारों के कारण मेरी आन्तरिक और बाह्य स्थिति के बीच एकता पैदा हुई, कौटुम्बिक स्थिति के साथ मेरी रहन-सहन का मेल बैठा, जीवन अधिक सारमय बना और मेरे आत्मानन्द का पार न रहा!”

मंगलवार, 1 फरवरी 2011

विचार-103 :: स्‍वास्‍थ्‍य

विचार-103

स्‍वास्‍थ्‍य

  • हिन्दी लोकोक्ति तो आपने सुन ही रखा होगा, “तन्दुरुस्ती हज़ार नियामत।”
  • स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, “हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि स्वास्थ्य केवल साधन है किसी साध्य का।
  • हम सुख चाहते हैं।
  • हितोपदेश में कहा गया है, “सुख क्या है? प्राणी की संसार में अरोगिता।
  • बिना स्वस्थ रहे कोई देश प्रगति नहीं कर सकता। एरीफ़्रान का मानना है, “स्वास्थ्य के बिना जीवन जीवन नहीं है।”
  • इसीलिए तो साइरस ने कहा है, “अच्छा स्वास्थ्य एवं अच्छी समझ जीवन के दो सर्वोत्तम वरदान हैं।
  • कितना मिला है यह वरदान हमें?
  • गणेश शंकर विद्यार्थी ने कहा था, “बड़ा ही अभागा है वह देश, जिसके युवक और युवतियों के चेहरों पर स्वास्थ्य की आनन्ददायिनी झलक देखने में न आवे।”
  • आइए ज़रा देखें क्या हालत है हमारे देश में युवा शक्तियों के स्वास्थ्य का?
    • पहले बच्चों को जन्म देने वाली माताओं के स्वास्थ्य की जांच करें …
      • माताओं की सेहत पर 77 विभिन्न देशों की स्थिति बताने वाली सूची में भारत का स्थान 73वां है। बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था “सेव चिल्ड्रेन” ने “स्टेट ऑफ द वर्ल्ड मदर्स 2010 नामक रिपोर्ट में यह खुलासा किया है।
      • भारत में प्रति 220 महिलाओं में से एक, बच्चा जनते समय मौत का शिकार हो जाती हैं।
      • यानि कि प्रति एक लाख में क़रीब 450 माएं जचगी के समय अपना जीवन गंवा बैठती हैं।
      • भारत में आधी से अधिक महिला आबादी एनीमिया से जूझ रही है। अस्वस्थ मां किस तरह स्वस्थ बच्चों को जन्म देंगी।
    • आइए अब बच्चों के बारे में तथ्य देखें ..
      • दुनिया में 14.6 करोड़ कुपोषित बच्चे हैं। इसका 50% भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान में हैं। भारत में 5.7 करोड़ बच्चे कुपोषित हैं।
      • देश में प्रति 100 बच्चों में से 65 बच्चे पांच साल की उम्र पूरी नहीं कर पाते।
      • तीन वर्ष की उम्र तक क़रीब 50% बच्चे कुपोषण का शिकार हैं।
      • महिला और बाल विकास मंत्रालय के अनुसार भारत में किशोरियों की कुल संख्‍या तकरीबन 8.3 करोड़ है, जिनमें 2.74 करोड़, यानि लगभग 33% लड़कियां कुपोषण का शिकार है।
  • क्यों हैं ये कुपोषण के शिकार?
  • जो देश भूखों और ग़रीबों का हो वहां इससे अधिक अच्छे होने की क्या उम्मीद कर सकते हैं?
    • 119 भूखे देशों की सूची में भारत का 96वां स्थान है।
    • भारत के 49 करोड़ नगरिक अंतर्राष्ट्रीय ग़रीबी रेखा के नीचे रह रहे हैं। अब ये ग़रीब लोग, जो दो वक़्त पेट पालने के लिए मरते रहते हैं, स्वस्थ रहने के लिए क्या कर पाएंगे?
  • यह देश तो ग़रीबों का देश बन कर रह गया है।
    • एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत विश्व के एक तिहाई (45 करोड़) ग़रीबों का घर है।
    • यानी हमारी कुल आबादी के 42% लोग ग़रीब हैं।
    • यानी 10 में से 4 लोग ग़रीब हैं।
    • यानी ये चार लोग हर रोज़ 50 रुपए से भी कम कमाते हैं।
  • अब इतनी कम रकम में गुज़ारा कहां से होगा? जब गुज़ारा न हो पाता तो आत्म हत्या कर लेते हैं।
    • विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में कहा गया है कि विश्व में मौत का 13वां प्रमुख कारण आत्म हत्या है। देश में हर चार मिनट में कोई एक अपनी जान दे देता है।
    • देश में हर 12 मिनट में 30 वर्ष से कम आयु का एक युवा अपनी जान ले लेता है।
    • आत्महत्या के प्रमुख कारणों में से एक है बीमारी। यानी अस्वस्थता!!
    • 21% लोग बीमारी के कारण आत्महत्या कर लेते हैं।
    • देश में 73 लोग प्रतिदिन बीमारी के कारण आत्महत्या कर रहें हैं इस देश में।
  • जिस देश की अधिकांश जनता अपना पेट पालने के लिए जूझती रहती है उन्हें स्वस्थ रखने के लिए सरकारी प्रयास भरपूर हो, यह आशा तो की जा सकती है।
  • आइए देखें स्वास्थ्य सेवाओं का क्या हाल है?
    • विश्‍व के 175 देशों की स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं के मद्देनजर भारत का स्‍थान 171वां है।
    • हमारे देश की 10,000 आबादी पर केवल 6 डॉक्‍टर उपलब्‍ध हैं ।
    • 10,000 की आबादी पर 8 नर्सों की उपलब्‍धता है।
    • 10 लाख लोगों की मौत स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं की अनभिज्ञता के चलते हो जाती है।
    • जी.डी.पी पर स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं पर खर्च के मामले में हमारा स्‍थान 132वां है।
    • स्‍वास्थ्य बजट 22 हजार करोड़ रूपये का है।
  • स्वास्थ्य वजट समुचित नहीं है कि इस देश के नागरिक स्वस्थ रह सकें।
  • स्विस बैंक एसोसिएशन की रिपोर्ट के मुताबिक स्‍वीस बैंकों में जमा सबसे ज्‍यादा रकम भारतीयों की है। यह राशि 66000 अरब रूपये है।
  • अगर यह राशि भारत आ जाए तो 300 साल तक का स्वास्थ्य वजट की चिंता हमें नहीं करनी होगी।
    • और सरकार कहती है कि
      • देश के आम नागरिकों के लिए
      • देश की महिलाओं के लिए
      • देश के बच्चों के लिए 
    • स्वास्थ्य और भोजन के लिए उनके पास पैसे नहीं है।
  • लूट, घोटाला, भ्रष्टाचार की क़ीमत महिलाएं, बच्चे और ग़रीब जनता अदा कर रही है।
  • हमें यह ध्यान देना चाहिए कि
    • स्वस्थ तन में स्वस्थ मन का निवास होता है।
    • यानी तन स्वस्थ है तो मन स्वस्थ रहेगा।
    • … और अगर मन स्वस्थ है तो जीवन भी स्वस्थ होता है।
    • …. और स्वस्थ जीवन पर मानव की सफलता निर्भर होती है।

इन चिरागों में रोशनी बो दो, बीमार तन में जिन्दगी बो दो।

रोग हावी  है   जिन बहारों पर,   उन बहारों में ताज़गी बो दो।।