बृहस्पतिवार, 31 मार्च 2011

महात्मा पर विवादास्पद पुस्तक पर प्रतिबंध

विचार-129

महात्मा पर विवादास्पद पुस्तक पर प्रतिबंधimage

महात्मा गांधी हमारे ‘राष्ट्रपिता’ हैं। जैसे राष्ट्रीय ध्वज, हमारे लिए सम्मान और आदर का प्रतीक है वैसे ही सारे देश के लिए बापू भी हैं। एक पुस्तक के द्वारा बापू पर निराधार और अपमानजनक  टिप्पणियां की गई हैं। इस तरह का लेखन राष्ट्रपिता का अपमान है।  उनके चरित्र पर सोची-समझी चाल के तहत हमला किया जा रहा है, और कुछ हमारे ब्लॉगर मित्र इस पर चटखारे ले कर पोस्ट लगा रहे हैं। अकसर महात्मा की ग़लत व्याख्या होती रहती है। हम चुप रहते हैं। यह इस देश की सहनशीलता है। लोग हमारे देवी-देवताओं तक का अपमान करने से भी नहीं चूकते। कई उदाहरण है।

बापू के व्यक्तित्व का मुक़ाबला संसार में तो कोई कर ही नहीं सकता। इसलिए दुनिया वालों की नज़र में वे खटकते रहते हैं। महात्मा गांधी न सिर्फ़ भारत के बल्कि समूचे संसार के आदर्श हैं। कुछ ऐसे देश हैं जो चाहते हैं कि बापू का व्यक्तित्व दुनिया के लोगों की नज़र में आदर्श न बने। वे इसे रोकने के लिए तमाम तरह की साज़िशें रचाते रहते हैं। उन्हें कमज़ोर इंसान बताना चाहते हैं। पर यह कोशिश न कभी कामयाब हुई है, न आगे होगी।

हालिया रिलिज़ पुस्तक के द्वारा जोसेफ़ लेलीवेल्ड के कुविचार ने करोड़ो भारतीय लोगों की भावनाओं को आहत किया है। महात्मा गांधी को बदनाम करने वाली इस किताब का एक मकसद तो बिल्कुल स्पष्ट है कि लेखक बापू के चरित्र पर उंगली उठाकर नाम कमाने की मंशा रखता है। ऐसे कुकृत्यों की घोर निंदा की जानी चाहिए।

उनके चरित्र पर उंगली उठाने की कोशिश करने वाला 74 साल का पुलित्ज़र पुरस्कार से नवाज़ा गया यह विकृत लेखक अमेरिकी है। द न्यूयार्क टाइम्स में काम कर चुका है। जोसेफ़ लेलीवेल्ड की किताब ‘महात्मा गांधी एंड हिज़ स्ट्रगल विद इंडिया’ पश्चिम के बाज़ार में आ चुकी है। जब किसी एक शख्सियत पर पहले से ही मार्केट में तीन सौ से साढ़े तीन सौ जीवनिया भरी पड़ी हों तो ज़ाहिर है कि उनके बारे में कोई नया तथ्य तो लाया नहीं जा सकता। फिर किताब बिके कैसे? इसलिए ज़रूरी है कि कुछ सनसनी फैलाया जाए, ताकि किताब बिके।

एक और बात क़ाबिले ग़ौर है, पश्चिम के देशों को गांधी जी के सत्य प्रेम से शुरु से ही परेशानी रही है। गांधी जी उनकी साम्राज्यवादी नीतियों का, शोषण का, सदैव विरोध करते रहे हैं। उन्हों ने हिंसा की ख़िलाफ़त की। युद्ध का विरोध किया। उनकी इन नीतियों की कोई काट किसी के पास नहीं रही है। इसलिए ये देश बहाना ढ़ूंढ़ते रहते हैं। वे किसी न किसी बहाने बापू को लांछित करते रहते हैं।

क्या इसे अभिव्यक्ति की आज़ादी माना जा सकता है? बिना किसी ठोस आधार के किसी के चरित्र पर कीचड़ उछालना अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं है। यह खास किस्म की साज़िश है। यह उस व्यक्ति के चरित्र के ऊपर  हमला है, जो अपना बचाव करने के लिए दुनिया में मौज़ूद नहीं है।

गुजरात सरकार ने किताब की बिक्री, वितरण, प्रकाशन और उसे प्रसारित करने पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगा दिया है। खबरें है कि महाराष्ट्र में भी जल्द ही ऐसा किया जाएगा।  लेखक को सार्वजनिक रूप से इसके लिए माफ़ी मांगनी चाहिए। इतना ही नहीं ऐसे कुत्सित मानसकिता वाले लेखक की सारी पुस्तकें सारे देश में प्रतिबंधित कर दिया जाए। न सिर्फ़ पुस्तक के ऊपर प्रतिबंध लगे बल्कि ऐसा क़ानूनी व सभ्य उपाय केन्द्र सरकार करे, कि इसके  लेखक और प्रकाशक के विरुद्ध भी क़ानूनी कार्र्वाई हो, ताकि भविष्य में कोई हमारे महात्मा के चरित्र पर उंगली उठाने की कोशिश न कर पाए।  ऐसी हम आशा रखते हैं।

मंगलवार, 29 मार्च 2011

सलाह-मशवरा

विचार-128

सलाह-मशवरा

  • लेखिका अगाथा क्रिस्टी (1890-1976) ने कहा था,

“अच्छी सलाह की उपेक्षा कर दी जाती है, लेकिन इस वजह से सलाह देना बंद नहीं करना चाहिए।”

  • कई बार दफ़्तरों, घरों, संस्थानों,  मे देखा जाता है कि अच्छी सलाह देने से लोग कतराते हैं।
  • लार्ड चेस्टरफ़ील्ड ने पुत्र को पत्र लिखते हुए कहा है, ‘Advice is seldom welcome. Those who need it most, like it least.’ अर्थात्‌

सलाह का कदाचित ही स्वागत होता है। जिन्हें इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है, वे ही इसे सबसे कम पसन्द करते हैं।

  • बड़े अधिकारी, बॉस टाइप के लोग अन्य लोगों से सुझाव लेने में रुचि नहीं दिखाते। शायद वे ये सोचते हों कि यह उनकी कमी मान ली जाएगी। उन्हें यह भी लगता होगा कि अगर उन्होंने किसी का सुझाव लिया तो लोग सोचेंगे कि वह बात उसने ख़ुद क्यों नहीं सोची। यानी उनका बड़प्पन दांव पर लग जाएगा।
  • यह सोच ग़लत है। वे शानदार वातानुकूलित कमरों में बन्द होकर आसपास के योग्य लोगों से अनजान रहते हैं। वे जितना अधिक लोगों से मिलेंगे, उनकी सुनेंगे इससे उनका बड़प्पन घट नहीं जाएगा।

जो बड़ेन को लघु कहें, नहिं रहीम घटि जाहिं।

गिरिधर मुरलीधर कहं, कछु दुख मानत नाहिं॥

  • अधिकांश लोग ऐसे ही हैं जिन्हें अपनी बात ही सबसे अच्छी लगती है।

निज कवित केहि लाग न नीका। सरस होई अथवा अति फीका।

जे पर भनिति सुनत हरषाही। ते बर पुरूष बहुत जग नाहीं।

  • जो दूसरे की बात को सुनकर हर्षित होते हैं, ऐसे लोग बहुत कम हैं। एक बात ध्यान में रखनी चाहिए कि अच्छे सुझाव संगठन के लिए लाभदायक होते हैं। इसलिए सभी लोगों को सुझाव देने की न सिर्फ़ छूट होनी चाहिए बल्कि इसका उन्हें प्रोत्साहन भी मिलना चाहिए। उन्हें यह भी महसूस होना चाहिए कि उनके सुझावों पर गंभीरतापूर्वक विचार किया जा रहा है। वर्ना वे उदासीन हो जाएंगे।
  • ‘मैं सबकुछ जानता हूं’ का भाव रखने वाला प्राणी सबसे मूर्ख होता है। इससे अहंकार की सृष्टि होती है। ऐसे लोगों के बारे में वेदव्यास, महाभारत में कहते हैं, “अभीश्चरति यो नित्यं मन्त्रोsदेयः कथंचन।’ अर्थात्‌

जो मनुष्य अपने को बुद्धिमान मानकर निर्भय विचरता है, उसे कभी कोई सलाह नहीं देनी चाहिए क्योंकि वह दूसरे की सलाह नहीं सुनता है।

  • सारे समय लोगों को निर्देश ही नहीं देते रहना चाहिए। सहकर्मियों की राय भी लेनी चाहिए।
  • जो लोगों से सलाह-मशवारा नहीं करते वे अपने लिए मुसीबत का न्यौता ही देते हैं। एक दिन यह उसके लिए असफलता का कारण भी बन सकता है। तब वह अपने को नितान्त अकेला पाएगा।
  • कहा गया है, ‘एक काम के लिए एक की जगह चार दिमाग बेहतर नतीज़ा दिखाता है।’
  • हालाकि इसके उलट भी है, ‘ज़्यादा जोगी मठ उजाड़’।
  • किन्तु जब निर्णय लेने की बारी हो तो यह सिद्धान्त काम नहीं करता। कोई भी निर्णय कई विकल्पों में से किसी एक का चयन होता है।
  • इसलिए व्यक्ति को अधिक से अधिक लोगों की राय लेनी चाहिए, जिनके आधार पर वह सही निर्णय ले सके।
  • जो लोग प्रभावी होते हैं वे विभिन्न सुझावों का स्वागत करते हैं।
  • हमें खुले दिमाग का होना चाहिए, खाली दिमाग का नहीं। खुला दिमाग लचीला होता है। यह गुणों के आधार पर किसी विचार या सुझाव को स्वीकार या अस्वीकार करता है।
  • कभी-कभी सुझाव के रूप में आलोचना भी मिलती है। सही आलोचना फ़यदा ही पहुंचाती है। इसे एक अच्छी सलाह के रूप में लेना चाहिए। बचाव की कोशिश नही करनी चाहिए। हमें तो उसका शुक्रिया अदा करना चाहिए जो रचनात्मक आलोचना करता है। वह हमारी सहायता कर रहा है।

निन्दक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय।
बिन साबुन पानी बिना, निर्मल करे सुभाय॥

  • अधिकतर ऐसा पाया जाता है कि किसी निर्देश का सही पालन तभी सहज होता है जब उसके बारे में लोगों से चर्चा कर ली जाए जिन्हें यह काम करना है। इसके लिए अपने व्यवहार में नम्रता लानी चाहिए। लोगों के पास जाकर मिलजुल कर रहना चाहिए।

ऊंचे  पानी न टिके,  नीचे   ही   ठहराय।

नीचा हो सो भरिए पिए, ऊंचा प्यासा जाय॥

सोमवार, 28 मार्च 2011

अमीरी-ग़रीबी

विचार-127

अमीरी-ग़रीबी

बापू ने कहा था,

शुभ विचार करना एक बात है, अमल करना अलग   बात है।

  • प्रतिव्यक्ति आय इस वर्ष के शुरु में 54,527 रुपए पहुंच गया। पिछले वर्ष की तुलना में 17.3 % की वृद्धि है। हम ख़ुश हैं।
  • क्या वाकेई यह खुश होने की बात है?
  • सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 8.6% की वृद्धिदर है।
  • जीडीपी के आंकड़े वास्तव में देश की हालत का बयान नहीं करते।
  • देश की खुशहाली के लिए ज़रूरी है कि ग़रीब आदमी की आमदनी बढे।
  • ब्रूएयर ने कहा था,

“ग़रीब वह है जिसका ख़र्च आमदनी से ज़्यादा है।”

  • एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत विश्व के एक तिहाई (45 करोड़) ग़रीबों का घर है।
  • यानी हमारी कुल आबादी के 42% लोग ग़रीब हैं।
  • यानी 10 में से 4 लोग ग़रीब हैं।
  • यानी ये चार लोग हर रोज़ 50 रुपए से भी कम कमाते हैं।
  • 10 करोड़ लोग झुग्गी-झोपड़ियों में जीवन गुज़ारते हैं।
  • ये झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले जिनके पास पेट भरने के लिए आमदनी नहीं है, खर्च क्या ज़्यादा कर पाएंगे?
  • विवेकानन्द ने कहा था,
    • “राष्ट्र झोपड़ी में बसा हुआ है: परन्तु शोक! उन लोगों के लिए कभी किसी ने कुछ किया नहीं।”
  • एल. ई. लण्डन ने कहा था,
    • “ग़रीबों के अलावा कुछ ही ऐसे इंसान हैं, जो ग़रीबों के विषय में सोचते हैं।”
  • पता नहीं ऐसे इंसान सत्ता में हैं भी या नहीं। ज़्यादातर सोच तो सिर्फ़ धनवालों के लिए ही दिखती है।
  • और धनवाले हैं कितने इस देश में?
    • देश में 52 खरबपति
    • और सिर्फ़ लाख से ऊपर करोड़पति!
  • प्रेमचंद के अनुसार,
    • “धन ही पाप, द्वेष और अन्याय का मूल है।”
  • जैनेन्द्र कुमार की मानें तो,
    • “पैसे में शक्ति है, शक्ति में मद।”
  • ईपीक्यूरस ने कहा था,
    • “धन अधिक संग्रह में नहीं अपितु थोड़ी आवश्यकताएं होने में है।”
  • वस्तुस्थिति यह है कि जीडीपी में वृद्धि के साथ-साथ ही असमानताएं भी बढी हैं।
  • और बढा है मध्यम वर्ग का आकार।
    • वर्तमान में तीन करोड़ चौदह लाख मध्यम वर्ग के गृहस्थ हैं।
    • यानी 16 करोड़ की जनसंख्या मध्यम वर्ग की है। इसमें वे परिवार शामिल हैं जिनकी वार्षिक आय 3.4 लाख से 17 लाख रुपये हैं।
    • 2015 तक यह जनसंख्या 27 करोड़ हो जाएगी और 2025-26 तक 55 करोड़।
    • मध्यम वर्ग भारत की कुल जनसंख्या का मात्र 13.1% है। इनके पास ढेरों सुख सुविधाएं हैं।
  • इन सबों के साथ देश में बेरोज़गारी की दर
    • 87-88 में 5.2 % थी
    • जो बढकर 04-05 में 8,2% हो गई।
  • साथ ही ग़रीबी की दर को देखें तो पाते हैं कि ग़रीबी की रेखा के नीचे रहने वाले लोग 37% हैं। भारत के 49 करोड़ नगरिक अंतर्राष्ट्रीय ग़रीबी रेखा के नीचे रह रहे हैं।
  • एक तरफ़ जहां प्रतिव्यक्ति आय में पिछले 15 सालों में 68% की वृद्धि हुई है जबकि गरीबी मात्र 8% बिन्दु ही घटी है।
  • इसके कारण अमीर लोगों की आमदनी बढी है, ग़रीब लोगों के जीवन स्तर में कोई सुधार नहीं हो आया है।
  • यानी असमानता बढी ही है, घटी नहीं है।
  • 1980-81 में 68% लोग कृषि पर निर्भर थे और 38% राष्ट्रीय आय कृषि से आती थी। 2009-10 में 50% से भी अधिक लोग कृषि पर आधारित हैं पर मात्र 15% राष्ट्रीय आय ही कृषि से प्राप्त हो रही है।
  • पिछले 20 वर्षों में खाद्यान्न उत्पादन जहां 31.6% बढा है, वहीं जनसंख्या में 41.5% की बढोत्तरी हुई है।
  • यानी प्रतिव्यक्ति खाद्यान्न की उपलब्धता में कमी आई है।
  • फलस्वरूप खाद्य वस्तुओं की महंगाई बढी है।
  • इसलिए हम आमदनी की जिस वृद्धि की बात करते हैं, खुश होते हैं, इतराते हैं, वास्तव में वह वृद्धि आम ग़रीब आदमी, किसान और मज़दूर के जीवन स्तर के सुधार का संकेत नहीं है।
  • बल्कि वह विलासिता के बढावा देने का प्रमाण है। अमीर और अमीर हो रहे हैं ग़रीब और भी ग़रीब!
  • 119 भूखे देशों की सूची में भारत का 96वां स्थान है।
  • रिचर्ड निक्सन ने कहा था,
    • “दरिद्रता के विरुद्ध युद्ध वायदों में, राजनीति में, प्रेस-वक्तव्यों में प्रथम परन्तु क्रियान्वयन में सबसे अंतिम रहा है।”
  • असमानता बढी है का प्रमाण है – एक तरफ़ – बड़े शहरों में अमीर लोगों के लिए सभी तरह की सुविधाएं हैं, दूसरी तरफ़ 77% लोग अभी भी प्रतिदिन 50 रुपए से कम पर गुजारा करने के लिए मज़बूर हैं।
  • तभी तो ब्रजनारायण चकबस्त ने कहा है,

अगर जिये भी तो कपड़ा नहीं बदन के लिए।

मरे तो  लाश   पड़ी   रह  गई    कफ़न के लिए॥

शुक्रवार, 25 मार्च 2011

अपमान का घूंट

विचार-126

गांधी और गांधीवाद-24scan0009

clip_image001[4]

clip_image001मेरित्सबर्ग में शाम को ट्रेन आयी। जगह तो तैयार थी हाइ, बिस्तर का टिकट जो गांधी जी ने डरबन में कटाने से मना कर दिया था, वह ग़लती इस बार नहीं दुहराई गई। गांधी जी आरक्षित बर्थ पर ट्रेन से यात्रा करते हुए चार्ल्सटाउन के लिए रवाना हुए।

गाड़ी सुबह चार्ल्सटाउन पहुंची। रेलवे के इस अंतिम स्टेशन शे से जोहानिस्बर्ग पहुंचने के लिए कोई ट्रेन नहीं थी। चार्ल्सटाउन से जोहान्सबर्ग जाने के लिए बग्गी (सिकरम ) पकड़नी थी। बीच में एक रात स्टैण्डरटन में रुकना पड़ता था। गांधी जी की दिक़्क़तें समाप्त नहीं हुई थीं। गांधी जी के पास सिकरम का टिकट था। पर अजनबी समझ कर और परेशान करने के लिए गोरे एजेण्ट ने पहले तो उन्हें बैठने की अनुमति ही नहीं दी। कहा, “आप एक दिन लेट आए हैं। आपका टिकट रद्द हो चुका है।” हालाकि देर से पहुंचने के कारण वह टिकट रद्द नहीं होता था, फिर भी ‘कुली’ गांधी को कैसे वे अन्य यात्रियों के साथ बग्गी के अन्दर बैठने देते। गांधी जी द्वारा काफी आग्रह करने पर गोरों ने अपमानित करने के उद्देश्य से उन्हें साथ चलने की अनुमति तो दी पर बग्गी में नहीं, बल्कि कोचवान के साथ बाहर बक्से पर बैठने को कहा। वह जगह उस गोरे एजेण्ट के बैठने की थी। वह खुद अन्दर बैठ गया। गांधी जी अपमान का घूंट पीकर बाहर कोचवान के बगल में बैठ गए।

तीन बजे जब बग्गी पारडीकोप पहुंची तो कम्पनी का गोरा मुखिया जो अन्दर बैठा था बाहर आया। उसे सिगरेट पीने की तलब लगी थी। उसने एक मैला सा बोरा पैर रखने के पटिए (पायदान) पर रखवा दिया और गांधी जी बोला, “सामी, तू यहां बैठ। मुझे कोचवान के पास बैठना है।”

अब गांधी जी के सब्र का बांध टूट गया। अपमान के आवेग से उनका शरीर कांपने लगा। यह असहनीय था। उन्होंने इसका विरोध किया। बोले, “तुमने मुझे यहां बैठाया और मैंने वह अपमान सह लिया। तुम भी जानते हो कि मेरी जगह गाड़ी के अन्दर थी। पर तुम अन्दर बैठ गए। मुझे यहां बैठाया। अब तुम्हें सिगरेट पीनी है, इसलिए तुम मुझे पैरों के पास बैठाना चाहते हो। यह नहीं हो सकता। हां, मैं अंदर बैठने को तैयार हूं, पर तुम्हारे पैरों के पास नहीं बैठूंगा।”

कोच के कण्डक्टर को यह हजम नहीं हो रहा था कि एक कुली उससे इस तरीक़े से बात कर सकता है। अभी गांधी जी बोल ही रहे थे कि कोच के कंडक्टर ने उनकी कनपट्टी पर मुक्के मारने शुरु कर दिए। तमाचों-घूसों की उनपर वर्षा कर दी। उन्हें खींच कर बाहर फेंकने लगा। गांधी जी ने पीतल के सींखचे को ज़ोर से पकड़ कर अपना बचाव किया। उन पर खुल्लम-खुल्ला हमला था यह। अन्दर बैठे यात्री सब देख रहे थे। वह गोरा गांधी जी को गालियां दे रहा था। दूसरे यात्रियों के विरोध करने पर उसने गांधी जी को पीटना बंद कर दिया। कोचवान के बगल में बैठे दूसरे नौकर को नीचे पायदान पर बिठाया गया। गांधी जी को वहीं बैठने दिया गया जहां वो पहले थे। गोरा घूर-घूर कर गांधी जी को देखता और धमकी देती रहा, “याद रख, स्टैण्डरटन पहुंचने दे, फिर तुझे मज़ा चखाऊंगा। मेरे हाथ से बचकर तू जाएगा कहां।” गांधी जी भगवान से अपनी रक्षा के लिए प्रार्थना करते रहे।

रात तक बग्गी स्टैण्डरटन पहुंच गई। वाल नदी के तट पर बसा यह छोटा शहर है। नीचे उतरते ही कुछ भारतीय को देख गांधी जी को साहस हुआ। वे

गांधी जी को स्थानीय व्यापारी सेठ ईसा की दुकान पर ले गए। रात भर के लिए उन्होंने उन्हें अपना अतिथि बना कर रखा। गांधी जी की आपबीती सुन वे भी दुखी हुए। गांधी जी अपमान, अन्याय और आघात सहने के आदी हो चुके थे। उन्होंने कोच कम्पनी के मालिक को सविस्तार शिकायत पत्र लिख कर घटना की जानकारी दी। साथ ही यह आश्वासन भी मांगा कि सुबह उन्हें दूसरे यात्रियों के साथ अंदर बैठने की जगह दी जाए। गांधी जी को बताया गया कि स्टैण्डरटन से दूसरी सिकरम जाएगी। उसमें कोचवान आदि सब बदल जाएंगे।

दूसरी सुबह गांधी जी को बिना किसी हिलो-हुज्जत के मुनासिब जगह मिली। बग्गी भी नई थी और कंडक्टर भी नया। बिना किसी और परेशानी के वे जोहानिस्बर्ग पहुंच गए।

***

पिछले पोस्ट के लिंक

1. गांधी-गांधीवाद 2. लिखावट 3. बचपन 4. शर्मिला चानू 5. पश्चाताप 6. डर और रामनाम 7. विवाह - विषयासक्त प्रेम 8. प्रायश्चित 9. जीवन-सूत्र10.विलायत क़ानून की पढाई के लिए 11.शाकाहारी गांधी 12. अंग्रेजी तौर-तरीके 13. सादगी से जीवन अधिक सारमय 14. धर्मों का परिचय 15. मिस्र ने दिखाई गांधी की ताकत 16. भारत आगमन 17. “बा के बिना जीवन की मैं कल्पना नहीं कर सकता” 18. राजकोट तथा मुम्बई में वकालत 19. अंग्रेजों के जुल्मों का स्वाद 20.दक्षिण अफ़्रीका जाने का प्रस्ताव 21. आज के दिन ही गांधी जी ने डांडी मार्च किया था 22. सम्मान पगड़ी का२ 23. प्रतीक्षालय में ठिठुरते हुए

बुधवार, 23 मार्च 2011

23 मार्च

विचार-125

शहीद भगत सिंह

  • क्रांतिकारी भगत सिंह ने 22 मार्च 1931 को देशवासियों के नाम लिखे अपने अंतिम पत्र में कहा था,

“मेरा नाम हिन्दुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है और क्रांतिकारी दल के आदर्शों और क़ुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊंचा उठा दिया है – इतना ऊंचा कि जीवित रहने की स्थिति में इससे ऊंचा मैं हर्गिज़ नहीं हो सकता। .... देश और मानवता के लिए जो कुछ करने की हसरतें मेरे दिल में थीं, उनका हजारवां भाग भी पूरा नहीं कर सका। अगर ज़िन्दा रह सकता, तब शायद इन्हें पूरा करने का अवसर मिलता और मैं अपनी हसरतें पूरी कर सकता। .... मेरे मन में कोई लालच फांसी से बचे रहने का नहीं आया। मुझसे अधिक सौभाग्यशाली कौन होगा? आजकल मुझे ख़ुद पर बहुत गर्व है। अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इंतज़ार है। कामना है कि यह घड़ी और नज़दीक हो जाए!”

  • इस महान क्रांतिकारी का जन्म 27 सितम्बर 1907 को पंजाब के ज़िला लायलपुर के बंगा गांव में हुआ था।
  • 1917 में लहौर के डीएवी स्कूल में पढाई के वक़्त इनका सम्पर्क लाला लजपतराय से हुआ।
  • 13 अप्रैल 1919 को हुए जालियांवाला कांड ने भगत सिंह पर काफ़ी प्रभाव डाला।
  • 1921 में लहौर के नेशनल कॉलेज में पढाई के दौरान इनका सम्पर्क यशपाल, सुखदेव आदि क्रांतिकारी से हुआ।
  • 1924 में ये गणेश शंकर विद्यार्थी, बटुकेश्वर दत्त और चन्द्र शेखर आज़ाद के सम्पर्क में आए और 1925 में हिन्दुस्तान सोशलिष्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य बने।
  • 1926 में लाहौर नौजवान भारत सभा की स्थापना की। इसका उद्देश्य था युवाओं को एक जुट कर उनमें देश भक्ति की भावना जगाना।
  • 30 अक्तूबर 1928 को साइमन कमीशन लाहौर पहुंचा। कमीशन का विरोध कर रही भीड़ पर लाठी चार्ज किया गया, जिसमें लाला लाजपत राय की चोट लगने से मृत्यु हो गई। लाला लाजपत राय पर लाठी चार्ज का बदला लेने के लिए इन्होंने राजगुरु, सुखदेव, आज़ाद और जयगोपाल के साथ 18 दिसंबर 1928को सांडर्स की हत्या कर दी।
  • पब्लिक सेफ़्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल का विरोध करने के लिए 8 अप्रैल 1929 को बटुकेश्वर दत्त के साथ – दिल्ली में केन्द्रीय विधान सभा में बम फेंका था, लेकिन ध्यान रखा था कि किसी का नुकसान न हो। पर्चे भी बांटे जिसमें लिखा था, “बहरों को सुनाने के लिए बहुत ऊंची आवाज़ की ज़रूरत होती है …”
  • 6 जून 1929 को अपने पक्ष में वक्तव्य देते हुए कहा,
    • “क्रांति के लिए ख़ूनी लड़ाइयां ज़रूरी नहीं हैं और न ही उसमें व्यक्तिगत प्रतिहिंसा के लिए कोई स्थान है। वह बम और पिस्तौल का सम्प्रदाय नहीं है। क्रांति से हमारा अभिप्राय है – अन्याय पर आधारित मौजूदा समाज व्यवस्था में आमूल परिवर्तन।”
  • 12 जून 1929 को सेशन जज ने सजा सुना दी जिसे लहौर हाई कोर्ट ने मान्य ठहराया।
  • भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सजा दी गयी जबकि बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास की सजा दी गयी।
  • 23 मार्च 1931 को क्रांतिकारी भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी गयी।
  • देश की आज़ादी के लिए अपना जीवन क़ुर्बान कर देने वाले भगत सिंह न सिर्फ़ एक क्रांतिकारी योद्धा थे बल्कि एक विचार के तौर पर आज भी हमारे बीच हैं। उनकी प्रासंगिकता आज भी बरकरार है। आज के दिन उन्हें याद करने की सार्थकता तभी है जब हम उनके विचारों को अमल में लाएं।

डॉ. राममनोहर लोहिया

  • उत्तर प्रदेश के फ़ैज़ाबाद ज़िला के अकबरपुर में समाजवादी राजनेता डॉ. राममनोहर लोहिया का जन्म 23 मार्च 1910 को हुआ था।
  • वे एक स्वंत्रता सेनानी थे।
  • गांधी जी का उनपर गहरा प्रभाव था।
  • प्रखर चिंतक और समाजवादी नेता ने नमक सत्याग्रह विषय पर 1932 में शोध पूराकर बर्लिन विश्व विद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि ग्रहण की।
  • 23 मार्च को लाहौर मे भगत सिंह को फांसी दिए जाने के विरोध में लीग ऑफ़ नेशन्स की बैठक में बर्लिन में पहुंचकर सीटी बजाकर दर्शक दीर्घा से विरोध प्रकट किया। सभागृह से उन्हें निकाल दिया गया।
  • अखिल बंग विद्यार्थी परिषद के सम्मेलन में सुभाष चंद्र बोस के न पहुंच पाने पर उन्होंने सम्मेलन की अध्यक्षता की।
  • साइमन कमीशन के बहिष्कार के लिए छात्रों के साथ आन्दोलन किया।
  • भूमिगत रहकर “भारत छोड़ो आन्दोलन” को पूरे देश में फैलाया। जेल भी गए।
  • कई सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक आन्दोलनों का नेतृत्व किया।
  • साठ के दशक में अंग्रेज़ी हटाओ आन्दोलन चलाया।
  • समाजवाद के लिए आजीवन संघर्ष करते रहे।
  • उनका 12 अक्तूबर 1967 को निधन हो गया।
  • उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं जैसे लोहिया के विचार, भारत माता धरती माता, इतिहास-चक्र, भारत के शासक, आदि।

विश्व मौसम दिवस

  • 1873 में आस्ट्रिया के वियाना में प्रथम अंतरराष्ट्रीय कॉंग्रेस में अंतरराष्ट्रीय मौसम संगठन की स्थापना हुई।
  • इस संगठन ने 23 मार्च 1950 को विश्व मौसम संगठन का रूप लिया।
  • 1951 में यह संयुक्त राष्ट्र की मौसम विज्ञान, पानी विज्ञान और संबंधित भू भौतिक विज्ञानों के क्षेत्र में एक विशेषज्ञ एजेंसी बन गई।
  • मौसम पूर्वानुमान और उसकी प्रणालियों के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए व्यापक प्रचार-प्रसार की ज़रूरत को ध्यान में रख कर 1961 से 23 मार्च को विश्व मौसम दिवस मनाया जाता है।
  • इस वर्ष का विश्व मौसम दिवस का ध्येय वाक्य है – “जलवायु आपके लिए”।
  • आज ज़रूरत है कि मौसम पूर्वानुमान में उत्तरोत्तर सुधार हो ताकि उस पर भरोसा कायम हो। सटीक पूर्वानुमान से प्राकृतिक आपदा के दौरान जानमाल की कम से कम क्षति होती है।
  • विश्व मौसम संगठन में 188 शामिल हैं।

22 मार्च - विश्‍व जल दिवस के अवसर पर

विचार-124
विश्‍व जल दिवस के अवसर पर

जान लें

सूखती जा रही है धरा की कुक्षि

दिन ब दिन गिर रहा है स्तर जल का

करें कल्पना उस पल का

आने वाले भयानक कल का!

जब समस्या होगी विकट

पृथ्वि पर होगा जल का संकट

लोग हैरान होंगे

हालात से परेशान होंगे

भयावह है आने वाला कल

जल जब न होगा सारा जग जाएगा जल।

इसी लिये आज से ही बूंद-बूंद बचाओ जल!

वरना हो जाएगा बिन पानी जग सून!

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

बापू ने कहा था

प्रकृति हमारी ज़रूरतों को तो

कर सकती है पूरा

लेकिन हमारे लालचों को नहीं।

सिंचाई पंप का इस्तेमाल

तालाब पाट कर बनते बस्तियों का जाल

औद्योगीकरण विशाल

शहरीकरण का कमाल

कि दुनिया में एक अरब से अधिक लोगों को

मिलता नहीं साफ़ पानी पीने को ..!

सच है यह कि

संसार में तीन चौथाई भाग पानी है

सागर है, ग्लेशियर है, खाड़ियां हैं

पर इनका जल हमारे किस काम का?

ये तो नमकीन है

इंसान को जीने के लिए

जो साफ़ जल है पीने के लिए

तीन प्रतिशत से भी कम

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

पानी

यानी

आबरू, इज़्ज़त, गौरव, प्रतिष्ठा, मान-सम्मान

सब धरा रह जाएगा ...!

 

पानी

यानी

आभा, कांति, चमक

सब फींकी पड़ जाएगी …!!

 

पानी

यानी

जौहर और धार

हम किसे दिखाएंगे .....!!!

 

पानी

यानी

अंबु, अंभ, अप, क्षीर

आप, आब, उदक, नीर

तोय, पय, पानीय, वन

वारि, सलिल, पाथ, जीवन

जल जीवन जीवन जल

जल बिन जीवन ...  जल-जल

कर मानव तू जल का संचय,

जल का संचय!!

(चित्र साभार गूगल)

मंगलवार, 22 मार्च 2011

प्रतीक्षालय में ठिठुरते हुए

विचार-123

गांधी और गांधीवाद-23clip_image001

प्रतीक्षालय में ठिठुरते हुए

clip_image001

दक्षिण अफ़्रीका में भारतीयों का पहला जत्था 1860 में पहुंचा था। दक्षिण अफ़्रीका के गोरे गन्ने की खेती के लिए इकरारनामे के तहत भारतीय मज़दूरों को अपने यहां ले गये। इसके बाद भारतीयों (विशेषकर दक्षिण भारत से) का दक्षिण अफ़्रीका में बसने का सिलसिला ही शुरु हो गया। मज़दूर गये, तो पीछे-पीछे व्यापारी भी गये, ज़्यादातर मेमन मुसलमान। दक्षिण अफ़्रीका में तीसरा वर्ग उनका था, जो इकरारनामे की अवधि समाप्त होने के बाद वहीं बस गये थे। दक्षिण अफ़्रीका में बसे भारतीयों में ज़्यादातर तो अशिक्षित थे और जो थोड़ा-बहुत पढे-लिखे थे, उनका अंग्रेज़ी का ज्ञान नाममात्र का था। पैसेवाले धनी व्यापारी भी बस उतना ही अंग्रेज़ी समझ-बोल सकते थे, जो व्यापार करने के लिए ज़रूरी था।

भारतीयों के प्रति गोरी जाति, जातीय भेदभाव बरतती थी। भारतीयों ने इस अत्याचार को अपनी नियति मान लिया था। कभी यदि उनके दिल में विरोध की भावना उठती भी, तो वे उसे दबा देते। क्योंकि उन्हें मालूम ही न था कि कैसे इसका विरोध किया जाये।

लेकिन ब्रिटेन से बैरिस्टर बन कर लौटे नौजवान मोहनदास करमचंद गांधी इन अत्याचारों के आदि नहीं थे। वे गुजरात के एक सम्मानित परिवार के सदस्य थे, दीवान के बेटे थे। ब्रिटेन में तीन साल रह चुके थे। दक्षिण अफ़्रीका में रंगभेदी अत्याचार से पहली बार उनका साबका पड़ा।

पगड़ी वाली घटना को लेकर न सिर्फ़ गांधी जी को प्रसिद्धि मिली बल्कि कई महत्त्वपूर्ण भारतीय जैसे पारसी रुस्तमजी और आदमजी मियाखान तथा क्रिश्चियन सुभन गौडफ़्रे आदि से परिचय हुआ। डरबन में मेल-मिलाप, जान-पहचान का सिलसिला चल ही रहा था कि फ़र्म के वकील ने पत्र लिख कर सूचित किया कि मुकदमे की तैयारी के लिए खुद अब्दुल्ला सेठ को या उसके किसी प्रतिनिधि को प्रिटोरिया जाना चाहिए। प्रिटोरिया ट्रांसवाल की राजधानी थी। मुकदमे की सुनवाई वहीं पर होनी थी। अब्दुल्ला सेठ ने गांधी जी से पूछा कि क्या वे प्रिटोरिया जाएंगे। गांधी जी ने हामी भर दी। डरबन में एक सप्ताह रहने के बाद वे प्रिटोरिया के लिए रवाना हुए।

ट्रांसवाल की राजधानी प्रिटोरिया में मुक़दमे की सुनवाई होनी थी। वहां जाने के लिए गांधी जी द्वारा हामी भरने के बाद अब्दुला चिंतित था। भारतीयों के लिए ट्रांसवाल में नाटाल की अपेक्षा हालात और भी खराब थे। समस्या यह थी कि गांधी जी को प्रिटोरिया में कहां ठहराया जाय। सेठ अब्दुल्ला यह नहीं चाहते थे कि सेठ के मेमन दोस्त के यहां ठहरें। सेठ को आशंका थी कि प्रतिपक्षी का मेमन मित्र के यहां आना-जाना था, इसलिए इस बात की संभावना थी कि गांधी जी को सौंपे गए निजी काग़ज़ पत्रों में से कोई उसे पढ कर सूचना प्रतिपक्षी को दे सकता था, जिससे मुकदमें को नुकसान हो सकता था। ऐसे लोगों से मुकदमे के दौरान संबंध नहीं रखना ही अच्छा रहेगा।

दरअसल गांधी जी प्रतिपक्ष से मित्रता करना चाहते थे। वे मुकदमे को आपस में निबटाने की कोशिश करना चाहते थे। प्रतिपक्षी तैयब हाजी खान मोहम्म्द अब्दुल्ला सेठ के निकट सम्बन्धी थे। गांधी जी ने अब्दुल्ला को समझाया, “समझौते की नीति मुक़दमेबाज़ी से अच्छी रहेगी। ” यह सुनकर अब्दुल्ला सेठ ने कहा, “लेकिन आप तैयब सेठ को नहीं जानते। वे हमारे प्रतिपक्षी हैं, रिशतेदार भी। समझौते की बातचीत में वह आपके पेट से हमारे सारे भेद निकाल लेंगे। फिर वे इस सूचना का हमारे ख़िलाफ़ उपयोग करेंगे। वे बहुत ही होशियार आदमी हैं।

गांधी जी ने अब्दुल्ला सेठ को आश्वस्त किया, “आप की कोई बात मेरे मुंह से न निकलेगी। आपके हित और विश्वास को भी मुझसे कोई क्षति नहीं पहुंचेगी। आप निश्चिंत रहें। आपको यह भी समझना चाहिए कि मुक़दमेबाज़ी में समय और पैसे की बर्बादी होती है। समझौता कर लेना कहीं अच्छा है।”

फिर भी अब्दुल्ला सेठ ने अपनी तरफ़ से गांधी जी को सचेत करना बेहतर समझा। बोले, “प्रिटोरिया में प्रतिपक्षी तैयब सेठ का बहुत प्रभाव है। स्थानीय व्यापारियों में उनके भेदिये भी हो सकते हैं। उनसे बचकर रहना ही बेहतर होगा। उनसे मेल-जोल बढाना फ़ायदेकारक नहीं भी हो सकता है। दस्तावेज़ और अन्य कानूनी काग़ज़ात को सावधानी से संभालकर रखना होगा। ये किसी के हाथ न लग जाएं।”

गांधी जी ने उन्हें आश्वस्त किया कि ऐसा कुछ न होगा।

डरबन में एक सप्ताह रहने के बाद युवा बैरिस्टर गांधी जी उन कठिनाइयों पर ध्यान नहीं देते हुए जो उस लंबी यात्रा में हो सकती थी, ट्रेन से प्रिटोरिया के लिए रवाना हुए। डरबन से चार्ल्स टाउन जाने की यात्रा लंबी काफ़ी कठिन थी। पहले दर्ज़े की कोच का टिकट मिल गया। अब्दुल्ला सेठ ने सलाह दी कि खर्च की परवाह न करके वे अपने लिए बिस्तर भी सुरक्षित करा लें। बिस्तर प्राप्त करने के लिए पांच शिलिंग अतिरिक्त देना पड़ता था। मितव्ययी मोहनदास ने उनका अधिक ख़र्च न कराना ही उचित समझा। इसका नतीज़ा यह हुआ कि रास्ते में उन्हें तरह-तरह तरह-तरह का अपमान झेलना पड़ा। रात के नौ बजे जब गाड़ी डरबन से 73 मील दूरी पर नाटाल की राजधानी मार्टिज़बर्ग पहुंची। एक रेलवे कर्मचारी ने बिस्तरे के बारे में पूछा कि क्या वह उन्हें चाहिए? गांधी जी ने कहा, उनके पास बिस्तर है। तभी कोच में एक गोरे यात्री ने डिब्बे में प्रवेश किया। एक भारतीय को सहयात्री के रूप में देख कर उसकी त्यौरियां चढ गईं। तीसरे दर्ज़े की ओर संकेत करते हुए उसने गांधी जी से कहा, “वहां जाओ!”

बैरिस्टर गांधी ने विनम्रतापूर्वक कहा, “मेरे पास पहले दर्ज़े का टिकट है।”

यह जवाब सुनकर गोरा क्रोध से आग-बबूला हो गया। चिल्लाया, “फ़र्स्ट क्लास का टिकट है तो क्या हुआ?” गांधी जी के भिन्न वर्ण का होने के कारण परेशान होकर उसने रेलवे के दो अधिकारियों को बुला लिया। अधिकारी ने गांधी जी से कहा, “तुम इस डिब्बे से उतर जाओ। तुम्हें आख़िरी डिब्बे में जाना होगा।”

गांधी जी ने संयत स्वर में कहा, “मेरे पास पहले दर्ज़े का टिकट है।”

अधिकारी कुछ भी सुनने को तैयार नहीं था। वह अड़ा रहा। बोला, “तुम्हें आख़िरी डिब्बे में ही यात्रा करनी होगी।”

गांधी जी ने स्पष्ट स्वरों में कहा, “इस दर्ज़े में मुझे डरबन में बैठाया गया है। यहां तक मैं इसी डिब्बे में आया हूं। आगे भी इसी में जाने का इरादा रखता हूं।”

अधिकारी ने धमकी दी, “यह नहीं हो सकता। इस डिब्बे से तुम्हें उतरना पड़ेगा। अगर न उतरे तो सिपाही तुम्हें उतारेगा। उठते हो या सिपाही को बुलाऊं?”

गांधी जी ने पक्के इरादे के साथ कहा, “तो फिर सिपाही भले उतारे, मैं ख़ुद नहीं उतरूंगा।”

सिपाही बुलाया गया। उसने गांधी जी का सामान उठाकर बाहर फेंक दिया। फिर उसने उन्हें भी धक्के मारकर उतार दिया। गांधी जी प्लेटफॉर्म पर गिर पड़े। उन्हें गोरे लोगों की व्यंग्य भरी हंसी सुनाई दे रही थी। कोई गोरा कह रहा था, “वाह रे वाह! एक कुली प्रथम श्रेणी में यात्रा करने के कोशिश कर रहा था!”

गांधी जी ने दूसरे डिब्बे में जाने से इंकार कर दिया। ट्रेन चली गई। वे मुसाफ़िरख़ाने में जाकर बैठ गए। उन्होंने सिर्फ़ हैण्ड बैग अपने साथ रखा। बाक़ी के सामान उन्होंने नहीं उठाया। रेलवे वालों ने उसे कहीं रख दिया।

यह जून का महीना था। मारिट्ज़बर्ग ट्रॉपिक ऑफ कैप्रिकॉर्न से 60 अंश दक्षिण में पड़ता है। यह समुद्र तल से 2000 फीट ऊपर है। यह वहां पर सरदी का मौसम था। कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। उन्हें ख़ूब ठंड लग रही थी। उनका ओवर कोट उनके बाक़ी के सामान में था। अपमान के भय से सामान मांगने की उनकी हिम्मत नहीं हुई। चूंकि उन्होंने सिद्धान्त के आधार पर अन्य किसी प्रकार से यात्रा करना स्वीकार नहीं किया था, इसलिए उन्हें ठिठुरती ठंड में रात बितानी पड़ी। कमरे में रोशनी की व्यवस्था भी नहीं थी। आधी रात में कुछ सहयात्री कमरे में आए। उसने गांधी जी से बात करनी चाही। पर विचारों में मग्न गांधी जी उससे बात करने की मनःस्थिति में नहीं थे। उस समय भावी सत्याग्रही नेता का ध्यान रंग-भेद की दुर्नीति और मानवता पर उसके भीषण प्रभाव और परिणामों पर केन्द्रित था। मोहनदास करमचंद गांधी के जीवन में यह क्रांति की रात थी।

वे दुखी थे। इस घटना ने उन्हें झकझोड़ कर रख दिया था। उनको यह सोच कर बहुत बुरा लग रहा था कि गोरों ने उनके साथ ऐसा दुर्व्यवहार किया, सिर्फ़ इसलिए कि उनकी त्वचा का रंग गोरा नहीं था। उस रात मारिट्ज़बर्ग के ठंडे अंधियारे प्रतिक्षालय में अपमान की टीस उनके अंदर उठती रही। लेकिन वे जल्द ही संभल गए। सारी घटना पर वे काफ़ी देर तक विचार करते रहे। वे सोचने लगे, क्या ऐसी दशा में इकरारनामे को रद्द कर भारत लौट जाना उचित होगा? या फिर जो भी अपमान सिर पड़े, पीकर रह जायें और काम पूरा करके लौटें? उन्होंने तय किया कि उन्हें अधिकारों के लिए यहीं रहकर संघर्ष करना होगा। साथ ही चाहे जो हो, प्रिटोरिया पहुंचकर मुक़दमा तो लड़ना ही होगा। मुक़दमा आधा छोड़कर भागने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। जो कष्ट सहना पड़ेगा, सहेंगे। ये तो बाहरी कष्ट हैं, जो वे झेल रहे हैं। ऊपरी हैं। गहराई तक पैठा हुआ रोग तो रंग-द्वेष का है। इस बीमारी को मिटाने का संकल्प उन्होंने उसी प्रतिक्षालय में लिया। आततायी के प्रति आक्रोश या गोरी जाति के प्रति विद्वेष उनके मन में नहीं था, बल्कि कर्तव्य के प्रति निष्ठा, स्वाभिमानी नागरिक की तरह निर्भीक जीने की आस्था और पशु पर हाथ उठाए बिना पशुता का प्रतिकार करने की अदम्य आकांक्षा थी।

अब वे एक बदले हुए व्यक्ति थे। स्वभाव से झेंपू और एकान्तप्रिय गांधी जी का काया पलट हो गया। उनमें फौलादी दृढता और निश्चय का जन्म हुआ। यह उनके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक थी। उन्होंने दक्षिण अफ़्रीका में व्याप्त असभ्यता और अन्याय के विरुद्ध कमर कस ली। उन्होंने रंग-भेद और जातीय हेंकड़ी के आगे न झुकने का प्रण लिया। यह प्रश्न अकेले उनके अपने आत्मसम्मान और न्यायोचित निजी अधिकार की रक्षा का नहीं था, बल्कि सभी भारतीयों और पूरे भारत देश ही नहीं सम्पूर्ण मानवजाति के गौरव की स्थापना का था, मानवता की मर्यादा की रक्षा का था। मोहनदास ने निश्चय किया कि वे अब नहींकहेंगे। उन्होंने प्रण किया कि चाहे जो भी क़ीमत चुकानी पड़े, वे इस तरह के अन्यायों के ख़िलाफ़ लड़ेंगे। गांधी जी की जीवनी लिखने वाले लुई फीशर (Louis Fischer) ने उल्लेख किया है कि मोहनदास को महात्मा में बदलने में जिन दो महत्त्वपूर्ण घटनाओं का हाथ है, उनमें से यह दूसरी महत्त्वपूर्ण घटना है। (पहली घटना राजकोट के पोलीटिकल एजेण्ट के आदेश पर चापरासी द्वारा गांधी जी को धक्के देकर दरवाज़े के बाहर कर देने की घटना थी, जिसके बारे में हम चर्चा कर चुके हौं यहां देखें।)

एक निश्चय के साथ उन्होंने दूसरी ट्रेन में, जैसे भी हो, आगे जाने का फैसला लिया। सुबह उन्होंने रेलवे के जेनरल मैनेजर और दादा अब्दुला को तार द्वारा लंबी शिकायत भेजी। दादा अब्दुल्ला ने उचित कदम उठाए। मारिट्ज़बर्ग के भारतीय व्यापारी गांधी जी से मिलने आए। उन्होंने भी इस भेद-भाव की व्यथा-कथा गांधी जी को सुनाई। बताया कि उन्हें हीनतम लांछनाएं सहनी पड़ती है। बिना कारण अपमानित किया जाता है। शाम तक एक बार फिर गांधी जी चार्ल्स टाउन जाने के लिए ट्रेन का टिकट लेकर तैयार थे।

***

पिछले पोस्ट के लिंक

1. गांधी-गांधीवाद 2. लिखावट 3. बचपन 4. शर्मिला चानू 5. पश्चाताप 6. डर और रामनाम 7. विवाह - विषयासक्त प्रेम 8. प्रायश्चित 9. जीवन-सूत्र10.विलायत क़ानून की पढाई के लिए 11. शाकाहारी गांधी 12. अंग्रेजी तौर-तरीके 13. सादगी से जीवन अधिक सारमय 14. धर्मों का परिचय 15. मिस्र ने दिखाई गांधी की ताकत 16. भारत आगमन 17. “बा के बिना जीवन की मैं कल्पना नहीं कर सकता” 18. राजकोट तथा मुम्बई में वकालत 19. अंग्रेजों के जुल्मों का स्वाद 20.दक्षिण अफ़्रीका जाने का प्रस्ताव 21. आज के दिन ही गांधी जी ने डांडी मार्च किया था 22. सम्मान पगड़ी का

बृहस्पतिवार, 17 मार्च 2011

सम्मान पगड़ी का

विचार-122

गांधी और गांधीवाद-22

clip_image001[1]

clip_image001

24 वर्ष की आयु में अप्रैल 1893 में गांधी जी को दक्षिण अफ्रीका जाना पड़ा। एक गुजराती कंपनी दादा अब्दुल्लाह एण्ड कंपनी के मुक़दमे की पैरवी करने के लिए। इस कंपनी ने एक अन्य कंपनी के ख़िलाफ़ चालीस हजार पाउंड हर्जाना का एक केस किया था। कंपनी के मालिक की इच्छा थी कि गांधीजी उनका मुक़दमा लड़ें क्योंकि गांधी जी अच्छी तरह से अंगरेजी बोल सकते थे एवं उन्हें अंगरेजी क़ानून की भी अच्छी जानकारी थी। इसके अतिरिक्त वे चाहते थे कि उनके फार्म के लिए अंगरेजी पत्राचार भी गांधी जी ही करें।

उनका न्यौता तो गांधी जी ने स्वीकार कर लिया, पर दक्षिण अफ़्रीका जाने वाले स्टीमर में कोई केबिन ख़ाली न थी। अगर इस मौक़े को वे चूक जाते तो एक महीने तक उन्हें मुम्बई की हवा खानी पड़ती। लेकिन वे इस बात के लिए तैयार न थे कि तीसरे दर्ज़े के यात्री की हैसियत से जहाज पर चढें। स्थानाभाव के कारण दादा अब्दुल्ला के एक एजेण्ट ने ऐसा प्रबंध किया कि गांधी जी जाएं तो डेक-यात्री बनकर, किन्तु नाश्ता और खाना वे ऊंचे दर्ज़े के यात्रियों के भोजनगृह में कर सकें।। बैरिस्टर गांधी ने डेक पर जाने से इंकार कर दिया। एजेण्ट के वजाय सीधे स्टीमर पर पहुंचे और अधिकारी से मिले। कप्तान से उन्होंने कहा, “क्या आप मेरे लिए गुंजाइश नहीं निकाल सकते?” अधिकारी गांधी जी के व्यवहार से प्रसन्न होकर मुस्कुराते हुए बोला, “सिर्फ़ मेरे केबिन में एक अतिरिक्त बर्थ है, जो यात्रियों को दी नहीं जाती। लेकिन आपको मैं वह जगह दे सकता हूं।” इस प्रकार गांधी जी को केबिन का टिकट मिला और वे अप्रैल 1893 में डरबन के लिए रवाना हो गए। यात्रा के दौरान कप्तान ने उन्हें शतरंज सिखाई। सहयात्री भी बड़े स्नेही थे। लामू, जंजीबार और मोजाम्बिक होते हुए 23 मई 1893 को नटाल के डरबन बंदरगाह पर गांधी जी काठियावाड़ी पोशाक में उतरे। मई का महीना था, लेकिन दक्षिणी गोलार्द्ध होने के कारण नटाल में जाड़ों का मौसम था।

scan0010

संयोग से दक्षिण अफ्रीका की धरती पर क़दम रखने वाले वे पहले भारतीय बैरिस्टर थे। चौबीस वर्षीय गांधीजी को इस बात का अंदाजा नहीं था कि वहां उनका जीवन ही बदल जाने वाला था। दक्षिण अफ़्रीका में बिताए दो दशक ने उन्हें और भी अधिक भारतीय बना दिया था। वहां उन्होंने संस्कृत सीखी, गीता कंठस्थ की, दुनिया को छोड़ा और महात्मा बने। वे वहां कलफ़ लगे कालर और कोटधारी युवक के रूप में गए थे तथा ऊंचे दर्ज़े में सफ़र करना व बैरिस्टर के रूप में शानोशौकत से रहना ही उनका ध्येय था। लेकिन वे दक्षिण अफ़्रीका से हाथ के कते सूत को पहनने और एक ग़रीब भारतीय की तरह रहने का व्रत लेकर लौटे थे।

उन्हें लेने के लिए अब्दुल्ला सेठ आए थे। दादा अब्दुल्ला अपने कारोबार के मालिक व एक धनी व्यापारी थे। जल्द ही गांधी जी को भारतीय के प्रति यूरोपियों के व्यवहार में अंतर का अहसास हुआ। गोरे लोग अब्दुल्ला सेठ से ऐसा बर्ताव करते थे, जैसे बड़े लोग छोटों के प्रति करते हैं। अपनी पोशाक के कारण गांधी जी दूसरे हिन्दुस्तानियों से अलग दिखते थे। बैरिस्टर गांधी बढिया विलायती सूट पहने हुए थे। उनकी पगड़ी विलायती सूट से मेल नहीं खाती थी। लोग उन्हें कुतूहल की दृष्टि से देखते थे।

अब्दुल्ला सेठ उन्हें अपने घर ले गए। अब्दुल्ला सेठ को गांधी जी को देख कर शुरु में तो कोई खास प्रसन्नता नहीं हुई। अंग्रेज़ी का अल्पज्ञान रखने वाले चतुर और तेज़ दिमाग वाले सेठ अबदुल्ला के मन में यह ख्याल आया कि अब्दुल करीम ने कहीं ‘सफ़ेद हाथी’ तो नहीं भेज दिया। सेठ के मन में संशय हुआ कि यह साहबनुमा आदमी महंगा पड़ेगा ही, शायद निरुपयोगी भी सिद्ध हो। पहले तो उसकी समझ में ही नहीं आया कि गांधी जी के साथ कैसे व्यवहार करे। गांधी जी जैसा कोई भी व्यक्ति, जो अंग्रेज़ी लिबास में लंदन का बैरिस्टर और पढा-लिखा कोई भारतीय नटाल में पहले कभी आया ही नहीं था। दक्षिण अफ़्रीका में भारतीय व्यापारी काफ़ी समृद्ध थे। फिर भी उन्हें अन्य कोई सुविधा नहीं थी। अंग्रेज़ी उन्हें न के बराबर आती थी। जब सामूहिक रूप से कोई खतरा उन पर आता तभी भाई-चारे की भावना उनकी प्रकट होती। यूरोपीय आकाओं से मिलने वाली अवमानना व तिरस्कार को वे प्रायः बिना न-नुकर के सह लिया करते थे।

उन दिनों दक्षिण अफ़्रीका की चार इकाईयां थीं नटाल, आरेंज फ़्री स्टेट, ट्रांसवाल और केप कोलोनी। इनमें से केवल केप कोलोनी पर अंग्रेज़ का प्रभाव था। तब, आरेंज फ़्री स्टेट और ट्रांसवाल, बोर गणराज्य हुआ करते थे। डच वहां की राजकीय भाषा थी। 1845 में नटाल ब्रिटिश साम्राज्य का एक हिस्सा बन गया था। 1890-91 में सारे दक्षिण अफ़्रीका में कुल डेढ लाख भारतीय रहते थे। इनका एक बड़ा भाग नेटाल मे रहता था। 1893 का द्क्षिण अफ़्रीका घृणा, द्वेश, लालच और महात्वाकांक्षाओं के ज्वार में उद्वेलित हो रहा था। वहां के गोरे निवासियों में इन विदेशियों के प्रति एक प्रकार का जातिगत क्रोध और उदासीनता थी। सरकार तरह-तरह के उपायों से इन्हें समाज से तिरस्कृत करती रहती थी। ऐसे ऐसे उपाय किए जाने लगे थे जिससे अब कोई एशियावासी स्थायी रूप से बसने के लिए देश के अंदर न जा सके या जो काफ़ी दिनों से जड़ जमा कर बैठे हैं उन्हें वापस जाना पड़े। दरअसल एशियाई मूल में भारतीय ही आते थे क्योंकि अन्य मूल के लोग वहां गिने चुने ही थे। सोची समझी रणनीति के तहत किए जाने वाले अत्याचारों से विदेशियों का जीवन दूभर हो गया था। तरह-तरह के अत्यधिक कर लगाना, लज्जाजनक पुलिस क़ानून, सार्वजनिक रूप से अपमान करना, सम्पत्ति नष्ट करना, लूटना आम बात थी।

सेठ अब्दुल्ला ने गांधी जी को बताया, “गोरे अंग्रेज़ भारतवासियों के साथ बुरा व्यवहार करते हैं। हमें कुली कह कर पुकारते हैं और हमें बराबरी का दर्ज़ा भी नहीं देना चाहते हैं।”

गांधी जी ने उत्सुकता से पूछा, “लेकिन क्यों?”

सेठ अब्दुल्ला ने बताया, “हमारे गेहुएं रंग के कारण।”

हिन्दूस्तानी अफ़्रीका में गुटों मे रहते थे। एक गुट था मुसलमान व्यापारियों का जो अपने को ‘अरब’ कहते थे। दूसरा गुट था हिन्दू मुनीमों का। तीसरा गुट था पारसी कारमुनों का, वे अपने को ‘पर्शियन’ कहते थे। चौथा गुट था तमिल, तेलुगु और उत्तर भारतीय गिरमिटिया मज़दूरों का। भारतीयों को, चाहे वे कोई भी काम क्यों न करते हों या किसी भी धर्म या जाति के क्यों न हों, यूरोपिय द्वारा इन्हें ‘कुली’ ही कहा जाता था। और दक्षिण अफ़्रीका के एकमात्र भारतीय बैरिस्टर गांधी जी को ‘कुली बारिस्टर’ कहा गया। ऐसे शब्द अपमानित करने के लिए प्रयोग किए जाते थे।

गांधी जी जल्दी ही बहुत कुछ जान गए। अब्दुल्ला सेठ उनका गुरु था। कुछ ही दिनों में अजनबी गांधी जी के लिए उसके दिल में जगह बन गई थी। सेठ अब्दुल्ला का मुकदमा ट्रान्सवाल में चल रहा था। मुकदमा, एक भारी रकम के लिए (40000 पाउंड) था और खातों संबंधी विवादों के कारण काफ़ी पेचीदा भी हो गया था। उसे समझने के लिए गांधी जी को गंभीर अध्ययन करना था। प्रतिवादी प्रिटोरिया में रहता था। इस प्रक्रिया के शुरु में ही गांधी जी ने फैसला कर लिया था कि वे इस मामले को अदालत से बाहर निपटाने का प्रयास करेंगे। उनका विचार था कि इससे फीस में भारी बचत होगी साथ ही उन लोगों के बीच होने वाली मुकदमेबाज़ी खत्म हो जायेगी। आखिर वे आपस में सगे सम्बंधी हैं और जिन्हें मित्र होना चाहिए।

तीसरे दिन अब्दुला सेठ गांधी जी को डरबन की अदालत दिखाने ले गए, ताकि वहां के कामकाज का गांधी जी को कुछ पता चल सके। इन दिनों गांधी जी अंग्रेज़ी वेश-भूषा पहनते थे। हां सिर पर पगड़ी अवश्य थी। गांधी जी न्यायालय कक्ष में पगड़ी पहने ही प्रविष्ट हुए। मजिस्ट्रेट ने उन्हें घूर कर देखा। कुछ देर बाद एकाएक गरजा, “अदालत में अपनी पगड़ी उतार कर बैठो।” यह सुन गांधी जी ने अदालत छोड़ देना बेहतर समझा, पर पगड़ी नहीं उतारी। अदालत में हुई घटना ने गांधी जी के मन में हलचल मचा दी। गांधी जी के लिए पगड़ी पहनने का प्रश्न एक महत्त्व का प्रश्न बन गया। पगड़ी उतारने का मतलब था अपमान का सहन करना। गांधी जी ने सोचा-विचारा और निर्णय किया कि वे दक्षिण अफ़्रीका में पगड़ी को त्यागकर केवल पश्चिमी कपड़े, कोट-पतलून और अंग्रेज़ी टोपी पहनना शुरु कर दें ताकि अनर्थक विवाद और झंझट से मुक्ति मिले। पर सेठ अब्दुल्ला ने समझाया कि यह उचित न होगा। इससे जो अपने देश की पगड़ी पहनना चाहेंगे उनकी स्थिति नाज़ुक होगी। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि गांधी जी के ऊपर तो देशी पगड़ी ही शोभा देगी। इंग्लैंड की बात और है, यहां अगर टोपी पहन लिए तो उनकी गिनती ‘वेटरों’ में होगी।

अब्दुल्ला सेठ की दलील गांधी जी को अच्छी लगी। नंगे सिर रहना बैरिस्टर गांधी जी को स्वीकार न था। इसलिए यही निश्चय हुआ कि वह अपनी पगड़ी न उतरने देंगे। सवाल स्वाभिमान और भारतीय होने के नाते, जातीय सम्मन का था। उन्होंने पगड़ी के किस्से को लेकर अपने और पगड़ी के बचाव में समाचारपत्रों को पत्र लिखा, खासकर ‘Natal Advertiser’ को, जो उनकी आलोचना करने वालों में प्रमुख अखबार था। एक भारतीय होने के नाते पगड़ी पहनने के अपने अधिकार का उन्होंने प्रतिपादन किया। यह भी स्पष्ट किया कि अदालत के प्रति असम्मान का भाव तो उनके मन में, एक बैरिस्टर होने के नाते, आ ही नहीं सकता था। अख़बारों में उनकी पगड़ी को लेकर ‘अनवेलकम विज़िटर’ (मान-न-मान मैं तेरा मेहमान) शीर्षक से ख़ूब चर्चा हुई। Natal Mercury ने लिखा कि हमें सुनने में आया है कि क़ानूनी बिरादरी के बीच एक इंग्लैंड से बैरिस्टरी की डिग्री-धारी महाशय, जो हमारे बीच तंबू डाल कर अपना भाग्य आजमाने वाले हैं, को लेकर काफ़ी उत्सुकता और उत्तेजना है। तीन-चार दिन के भीतर ही उन्हें दक्षिण अफ़्रीका में ख़ूब प्रसिद्धि मिली। किसी ने उनका पक्ष लिया तो अन्य ने निन्दा की। इस वाद-विवाद का एक अप्रत्याशित फ़ायदा यह हुआ कि बैरिस्टर गांधी का नाम तो चर्चा का विषय बना ही, आन भी रह गई। न उनका सिर नीचा हुआ और न सिर से पगड़ी ही हटी।

***

पिछले पोस्ट के लिंक

1. गांधी-गांधीवाद 2. लिखावट 3. बचपन 4. शर्मिला चानू 5. पश्चाताप 6. डर और रामनाम 7. विवाह - विषयासक्त प्रेम 8. प्रायश्चित 9. जीवन-सूत्र10.विलायत क़ानून की पढाई के लिए 11. शाकाहारी गांधी 12. अंग्रेजी तौर-तरीके 13. सादगी से जीवन अधिक सारमय 14. धर्मों का परिचय 15. मिस्र ने दिखाई गांधी की ताकत 16. भारत आगमन 17. “बा के बिना जीवन की मैं कल्पना नहीं कर सकता” 18. राजकोट तथा मुम्बई में वकालत 19. अंग्रेजों के जुल्मों का स्वाद 20. दक्षिण अफ़्रीका जाने का प्रस्ताव 21. सम्मान पगड़ी का

सोमवार, 14 मार्च 2011

अंतरराष्ट्रीय प्रश्न पूछो दिवस

विचार-121

अंतरराष्ट्रीय प्रश्न पूछो दिवस

  • आज (14 मार्च) अंतरराष्ट्रीय प्रश्न पूछो दिवस (International Ask a Question Day) है। इसका लक्ष्य लोगों को अधिक और बेहतर प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करना है ताकि वो मिलने वाले उत्तर से लभान्वित हो सकें। प्रश्न तो हममें से हर कोई पूछता है। कोई इसे प्रभावशाली औज़ार के रूप में प्रयोग करता है, कोई दूसरे का ज्ञान जांचने परखने के लिए।
  • प्रश्न पूछने के कुछ रोचक कारण नीचे दिए जा रहे हैं,

1. जानकारी संग्रह करने के लिए।

2. संबंध बनाए रखने के लिए।

3. सीखने और सिखाने के लिए।

4. जागरूकता बढाने के लिए।

5. स्पष्ट और नीतिगत चिंतन को बढाने के लिए।

6. समस्याओं के समाधान और निर्णय प्राप्त करने के लिए।

7. मनगढंत बातों को चुनौती देने के लिए।

8. लक्ष्य निर्धारण और प्राप्ति के लिए।

9. सुनने के क्रम में स्पष्टीकरण के लिए।

10. वार्तालाप को फलदायक बनाने के लिए।

11. गतिरोध दूर करने के लिए।

12. नई संभावनाओं की तलाश के लिए।

  • जागरूकता और अभ्यास से ही कोई व्यक्ति असाधरण प्रश्न पूछने वाला बन सकता है।
  • स्वयं से भी प्रश्न पूछते रहना चाहिए। प्रश्न पूछते रहने से हम नई-नई चीज़ें सीखते हैं।
  • प्रश्न न तो किसी को परेशान करने के लिए होना चाहिए न ही किसी की विद्वता परखने के लिए।
  • उत्सुकता हमारे पास एक महत्वपूर्ण औज़ार है। इसे हमेशा तराशते रहना चाहिए। कभी यह कुंद न हो। हमने देखा है कई छात्र प्रश्न पूछने में हिचकिचाते रहते हैं। उन्हें दोनों तरह की परेशानी होती है। एक तो वे प्रश्न को सही तरीक़े से बना ही नहीं पाते, दूसरे सटीक प्रश्न भी नहीं पूछ पाते। इसका परिणाम यह होता है कि जो वो जानना चाहते है, वह जवाब उन्हें नहीं मिल पाता। सही प्रश्न पूछना भी एक कला है।
  • कोई प्रश्न पूछे तो उसे हतोत्साहित नहीं करना चाहिए।
  • तो आइए आज हम एक दूसरे से तरह-तरह के प्रश्न पूछें?

शनिवार, 12 मार्च 2011

आज के दिन ही गांधी जी ने डांडी मार्च किया था

विचार-120

गांधी और गांधीवाद-21

आज के दिन ही गांधी जी ने डांडी मार्च किया था

clip_image002

आज का दिन कुछ खास है। आज के दिन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण और निर्णायक मोड़ आया था जब गांधी जी के नेतृत्व में नमक क़ानून के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए दाण्डी यात्रा आरंभ की गयी थी।

आज इस बात पर बहस हो रही है कि गांधी जी के विचार आज सार्थक हैं या नहीं। कितनी भूल कर रहे हैं हम। बहस का विषय तो यह होना चाहिए कि गांधी जी के विचारों की अनदेखी करके हम कितने असफल हुए हैं और हो रहे हैं।

एक विद्वान ने कहा है कि गांधीवाद को छोड़ने का यह अच्छा नतीज़ा रहा कि आज देश में 72 खरबपति हैं। कारपोरेट जगत इस पर गर्व कर रहा है। लेकिन उन्हें यह पता नहीं कि राष्ट्र शर्म मह्सूस कर रहा है कि 36 करोड़ लोग ग़रीबी रेखा के नीचे हैं।

गांधी जी ने हमें विभिन्न समस्याओं से जूझने के लिये कई रास्ते दिखलाए। उन्हीं में से एक था नमक क़ानून के प्रति ख़िलाफ़त। वैसे तो नमक-कर अन्य करों से तुलनात्मक रूप में कम था, परन्तु उसका बोझ देश के सबसे ग़रीब लोगों पर पड़ता था। नमक जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक चीज़ है। हमारे खाने का वह एक ज़रूरी हिस्सा है। अन्यायी और जालिम ब्रिटिश सरकार ने भारत में नमक जैसी ज़रूरी चीज़ पर टैक्स लगा रखा था।

1930 कई बातों के लिए स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में काफ़ी महत्त्वपूर्ण है। जनवरी 1930 में गांधी जी ने लिखा था कि मैं आन्दोलन शुरु करने के बारे में रात-दिन प्रचण्ड रूप से विचारमग्न रहता हूं। 26 जनवरी को स्वाधीनता दिवस मनाने का उन्होंने निर्णय लेकर इस दिशा में पहला क़दम उठाया। स्वतंत्रता की घोषणा होते ही सारा विश्व जान गया था कि शीघ्र ही गांधी जी, सरकार के ख़िलाफ़ एक नया अभियान चलाने वाले हैं। इस समारोह में जब जनता की उमंग उभर कर सामने आई तो उन्हें विश्वास हो गया कि देश जन-आन्दोलन के लिए तैयार है। उन्होंने नमक-क़ानून तोड़कर आन्दोलन शुरु करने का प्रस्ताव रखा। देशव्यापी स्वतंत्रता संग्राम की योजना में नमक आन्दोलन का महत्व लोगों की समझ में नहीं आ रहा था। जब गांधी जी ने इसकी घोषणा की तो उस समय के बुद्धिजीवी वर्ग के साथ सरकार ने भी इसे “बचकानी राजनैतिक क्रान्ति” कहकर इसकी खिल्ली उड़ाई। इस विचार का मज़ाक़ बनाया कि कड़ाही में समुद्र का पानी उबाल कर वह सम्राट से मुल्क और हुक़ूमत छीन लेंगे।

आने वाली घटनाओं ने दिखा दिया कि नमक और स्वराज्य के पारस्परिक सम्बन्ध को ठीक से न समझ सकने के कारण जिन लोगों ने नमक-सत्याग्रह का उपहास किया था, उन्हें भारतीय जनता को सामूहिक आन्दोलन के लिए संगठित करने की गांधी जी की कुशलता का सही ज्ञान नहीं था।

भारत में नमक पर ब्रिटिश सरकार का एकाधिकार था। कोई भी न तो इसे बना सकता था और न ही सरकार के अलावा किसी और से ख़रीद सकता था। ब्रिटिश सरकार ने नमक पर जो कर लगाया था उसे नमक क़ानून (साल्ट एक्ट) कहा गया था। इसमें कहा गया था, “बिना लाइसेंस नमक बनाना ग़ैर क़ानूनी है।” गांधी जी इस क़ानून को तानाशाही के एक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करना चाहते थे।

2 मार्च 1930 को गांधी जी ने सत्याग्रह आश्रम, साबरमती से भारत के वायसराय लॉर्ड इर्विन को एक पत्र लिखा,

“... नमक पर कर लगाने से ग़रीबों पर और भी बोझ बढा गया है। सभी लोगों को मालूम है कि अमीरों की तुलना में ग़रीब मनुष्य को नमक की अधिक आवश्यकता है .... केवल सुव्यवस्थित अहिंसा ही हिंसा को रोक सकती है। .... मैं आपसे सम्मानपूर्वक निवेदन करता हूं कि ऐसी बुराइयों को ख़त्म करें। लेकिन यदि मेरे इस पत्र से आप पर कोई असर नहीं पड़ा तो इस महीने की 11 तारीख को मैं अधिक से अधिक संख्या में अपने आश्रम वासियों के साथ मिलकर आपके नमक क़ानून का विरोध करूंगा। ...”

गांधी जी का पत्र लेकर सफ़ेद खादी वेशधारी अंग्रेज़ युवक,  नई दिल्ली स्थित वायसराय आवास पहुंचा। उसने पत्र वायसराय को दिया। वायसराय ने बिना कुछ कहे उसे विदा कर दिया।

गांधी जी नौ दिन तक वायसराय के उत्तर की प्रतीक्षा करते रहे। गांधी जी के पत्र से उत्पन्न तात्कालिक स्थिति में, वायसराय ने आंखें मूंद लेने का फैसला किया। उसके निजी सचिव जी. कनिंघम ने उत्तर लिखा, जिसमें केवल यही कहा गया था कि “वायसराय महोदय को गांधी जी महाशय के इरादे के बारे में जानकर खेद हुआ क्योंकि उनकी कार्यवाही से एक तरह से स्पष्ट रूप से क़ानून का उल्लंघन होगा और सार्वजनिक शांति को खतरा होगा।”

गांधी जी ने इसका करारा जवाब दिया,

“दुनिया में भारत के अलावा कौन-सा देश है जिसमें सालाना आमदनी 360 रुपये हो और उसमें से 3 रुपये देने पड़ते हों, सिर्फ़ नमक कर के। ब्रिटिश शासक केवल एक ही तरह की शांति चाहता है और वह है सार्वजनिक कारागार की शांति। भारत एक विशाल कारागार ही तो है।”

उर्दू कवि ब्रजनारायण ने उन दिनों लिखा था, “एक लाश बेकफ़न है, हिंदोस्तां हमारा”।

दसवें दिन गांधी जी ने अपने अनुयायियों की एक सभा बुलाई। उन्होंने मज़बूत इरादों के साथ कहा,

“भाइयों! मैं इसी आश्रम से सागर तट स्थित डांडी तक जुलूस का नेतृत्व करूंगा। वहां पहुंच कर हम क़ानून तोड़कर नमक बनाएंगे।”

गांधी जी के ओज भरे आह्वान सुनकर श्रोताओं में बिजली-सी लहर दौड़ गई। “नमक क़ानून तोड़ो” अभियान का समाचार चारो ओर फैल गया। उधर सरकार ने घोषणा कर दी, “इस तरह से नमक बनाना ग़ैर क़ानूनी माना जाएगा।” किन्तु गांधी जी अपने इरादे पर दृढ थे।

सावरमती आश्रम में चहल-पहल चरम पर थी। आश्रमवासी तैयारियों में जुटे थे। इसी बीच ब्रिटिश अधिकारियों ने एक अंग्रेज़ पत्रकार को गांधी जी के “विद्रोही विचारों” का पता लगाने के लिए आश्रम भेजा। संवाददाता को डर था कि कहीं उसके प्रति लोग अपना गुस्सा और रोष न प्रकट करें। वह डरता-डरता आश्रम पहुंचा। आश्रम में उसका एक सम्मानित अतिथि के रूप में गांधी जी ने स्वागत किया। यही नहीं, उन्होंने एक आश्रमवासी को उसकी सुख-सुविधा व देखभाल के लिए नियुक्त कर दिया। गांधी जी की मित्रतापूर्ण मुस्कान और खुले दिल से किया गया स्वागत ने उस अंग्रेज़ पत्रकार का दिल जीत लिया।

12 मार्च 1930 का दिन था। आश्रमवासी सुबह-सुबह उठ गए। सबने एक साथ प्रार्थना की और भजन गाया। सबों ने सफ़ेद खादी के वस्त्र पहन रखा था। गांधी जी ने घोषणा की, “मैं नमक क़ानून तोड़ने के बाद ही आश्रम में वापस लौटूंगा।”

डांडी साबरमती से 358 किलोमीटर दूर था। हाथ में लाठी लेकर गांधी जी ने अपने आश्रम के – 78 सदस्यों के साथ सवेरे साढे छह बजे साबरमती आश्रम से चलना शुरु कर दिया। वे बहुत तेज़ चाल से चल रहे थे। उनके साथी उनके पीछे दौड़ रहे थे।

…. और उनके पीछे चल रही थी एक विशाल भीड़, जिसमें लोग तो बराबर बदलते जाते थे, लेकिन उसकी विशालता में कमी नहीं आती थी। सारी यात्रा के दौरान एक घोड़ा भी साथ-साथ चल रहा था, ताकि थक जाने पर गांधी जी उस पर सवारी कर सकें, परन्तु वे उस पर नहीं बैठे। “हम परमात्मा का नाम लेकर यात्रा कर रहे हैं”, उन्होंने कहा था। जब गांधी जी किसी काम को परमात्मा का काम मानकर करते, उन्हें उस काम में प्रसन्नता होती थी। वे स्वस्थ भी थे।

गांधी जी का नमक आंदोलन और दांडी पदयात्रा आधुनिक काल के शांतिपूर्ण संघर्ष का सबसे अनूठा उदाहरण है। यह गांधी जी के ही नेतृत्व और प्रशिक्षण का चमत्कार था कि लोग अंग्रेजी हुकूमत की लाठियों के प्रहार को अहिंसात्‍मक सत्‍याग्रह से नाकाम बना गए। यह एक ऐसा सफल आंदोलन था जिसने न सिर्फ ब्रिटेन को बल्कि सरे विश्‍व को स्‍तब्‍ध कर दिया था।

पिछले पोस्ट के लिंक

1. गांधी-गांधीवाद 2. लिखावट 3. बचपन 4. शर्मिला चानू 5. पश्चाताप 6. डर और रामनाम 7. विवाह - विषयासक्त प्रेम 8. प्रायश्चित 9. जीवन-सूत्र 10.विलायत क़ानून की पढाई के लिए 11. शाकाहारी गांधी 12. अंग्रेजी तौर-तरीके 13. सादगी से जीवन अधिक सारमय 14. धर्मों का परिचय 15. मिस्र ने दिखाई गांधी की ताकत 16. भारत आगमन 17. “बा के बिना जीवन की मैं कल्पना नहीं कर सकता” 18. राजकोट तथा मुम्बई में वकालत 19. अंग्रेजों के जुल्मों का स्वाद 20. दक्षिण अफ़्रीका जाने का प्रस्ताव

दक्षिण अफ़्रीका जाने का प्रस्ताव

विचार-119

गांधी और गांधीवाद-20scan0008

दक्षिण अफ़्रीका जाने का प्रस्ताव

1892-93

1884 में जन्मे हरिलाल आठ साल के हो चुके थे। 1892 में कस्तूरबाई ने दूसरे पुत्र को जन्म दिया। मोहनदास दो बेटों के पिता बन गए। इस पुत्र का नाम मणिलाल रखा गया।

उन दिनों राजकोट का पोलीटिकल एजेण्ट गांधी जी से नाराज़ था। उनका अधिकांश काम तो उसी की अदालत में रहता था। अनुचित रीति से उस अधिकारी को रिझाना गांधी जी के आचरण में नहीं था। इस बीच उन्हें काठियावाड़ के रियासती षड्यंत्रों का भी कुछ अनुभव हुआ। गांधी जी निराश रहने लगे। ऐसे में उनके पास दक्षिण अफ़्रीका में नौकरी का प्रस्ताव आया।

दक्षिण अफ़्रीका में काफ़ी संख्यां में भारतीय, व्यापार में अपनी जड़ें जमा चुके थे। इसके अलावा काफ़ी सारे लोगों को अनुबंधित मज़दूरों के रूप में वहां लाया गया था। भाई लक्ष्मी दास के पास पोरबंदर की एक मेमन फर्म दादा अब्दुल्लाह एंड कं. का संदेशा आया। दक्षिण अफ़्रीका में उनका व्यापार था। दक्षिण अफ़्रीका की अदालत में इस व्यापारिक फर्म का एक बड़ा मुकदमा कई सालों से लटका पड़ा था। चालीस हज़ार पौंड का दावा था। उन्हें एक ऐसे वकील की तलाश थी जो दक्षिण अफ़्रीका में उनके काम की देख-रेख कर सके। जो उनके मामले को उनके दक्षिण अफ़्रीकी वकील को अच्छी तरह से समझा सके। अंधा क्या मांगे दो आंखें।

दादा अब्दुल्ला के साझी सेठ अब्दुल करीम झावेरी ने बताया कि गांधी जी को ज़्यादा काम नहीं करना होगा। वहां गांधी जी को इस मुकदमे में आगे की कार्रवाई के बारे में तथा फ़र्म के अंग्रेज़ी पत्र-व्यवहार व अन्य मामले में मदद करनी थी। पोरबंदर के प्रवासी व्यापारी दादा अब्दुल्ला के फ़र्म के लिए एक दीवानी मुकदमे के सिलसिले में एक साल का इकरारनामा था। आने-जाने के फ़र्स्ट क्लास के किराये और रहने-खाने के ख़र्च के अलावा 105 पौंड मिलने की बात थी। यह कोई बढिया प्रस्ताव नहीं था। पारिश्रमिक भी अधिक नहीं थी। यह भी तय नहीं हो पाया कि वे क़ानूनी सलाहकार की हैसियत से जा रहे थे या क्लर्क की। पर इतना तो तय था कि यह बैरिस्टरी नहीं, नौकरी थी। लेकिन गांधी जी उस समय की परिस्थिति से ऊबे हुए थे। आजीविका की आवश्यकता तो थी ही, काठियावाड़ के उस समय विषाक्त सामाजिक वातावरण से भी गांधी जी ऊब चुके थे, उस पर से अपमान करने वाले अंग्रेज़ अधिकारी की अदालत में वकालत न करने की मंशा उन्होंने बना ली थी। इन सब के कारण गांधी जी ने विदेश जाने का निश्चय कर प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

बात कस्तूरबाई को बताई गई। बा ने भी अपने पति को एक वर्ष के लिए दक्षिण अफ़्रीका जाने की हामी भर दी। दोनों पुत्र, हरिलाल और मणिलाल, और पत्नी से बिछड़ना उन्हें अखर तो रहा था पर अफ़्रीका के आकर्षण ने वियोग को सह्य बना दिया। उन्होंने पत्नी से कहा, “एक साल के बाद तो हम फिर मिलेंगे ही।” भारी मन से मोहन दास अपने परिवार से विदा लेकर पानी के जहाज से दक्षिण अफ़्रीका में नटाल रवाना होने के लिए मुम्बई पहुंचे।

इस समय को अनुभव करते हुए गांधी जी लिखते हैं, “वियोग का जो दुख विलायत जाते समय हुआ था, वैसा दक्षिण अफ़्रीका जाते समय नहीं हुआ।” 24 गांधी जी को इस बात का भी कोई अंदाज़ा नहीं था कि अफ़्रीका में जाकर उनका जीवन ही बदल जाने वाला था। दक्षिण अफ़्रीका में जन-सेवा और आत्म-विकास के जो अपूर्व अवसर मिलने वाले थे, उनकी तो गांधी जी ने सपने में भी कल्पना नहीं की थी। नियति उन्हें एक नए राह पर ले जाना चाह रही थी, कि जब वे वहां से भारत लौटेंगे तो एक राष्ट्र नायक के रूप में लौटेंगे। एक महात्मा के रूप में लौटेंगे। 1894 से 1914 की 21 वर्षों की उनकी कर्म साधना के बारे में रोमां रोलां का कहना है,

“उनकी यह कर्म साधना आत्मा का एक महाकाव्य है, जो इस युग में अतुलनीय है केवल अविचलित आत्मत्याग की अपनी शक्ति के कारण नहीं, अपनी अंतिम विजय के कारण भी।”

***

पिछले पोस्ट के लिंक

1. गांधी-गांधीवाद 2. लिखावट 3. बचपन 4. शर्मिला चानू 5. पश्चाताप 6. डर और रामनाम 7. विवाह - विषयासक्त प्रेम 8. प्रायश्चित 9. जीवन-सूत्र 10. विलायत क़ानून की पढाई के लिए 11. शाकाहारी गांधी 12. अंग्रेजी तौर-तरीके 13. सादगी से जीवन अधिक सारमय 14. धर्मों का परिचय 15. मिस्र ने दिखाई गांधी की ताकत 16. भारत आगमन 17. “बा के बिना जीवन की मैं कल्पना नहीं कर सकता” 18. राजकोट तथा मुम्बई में वकालत 19. अंग्रेजों के जुल्मों का स्वाद

बृहस्पतिवार, 10 मार्च 2011

विश्व किडनी दिवस पर ….

विचार-118

विश्व किडनी दिवस पर ….

  • आज विश्व किडनी दिवस है।
  • विश्व किडनी दिवस प्रत्येक वर्ष मार्च माह के दूसरे गुरूवार को मनाया जाता है।
  • विश्व किडनी दिवस 2006 से मनना शुरू हुआ था।
  • इस दिवस का मुख्य उद्देश्य लोगों को किडनी संबंधी रोगों के प्रति जागरूक करना और समस्या का निदान करना है।
  • इंटरनेशनल सोसायटी ऑफ किडनी डिसीजेस और इंटरनेशनल सोसायटी ऑफ नेफ्रोलॉजी द्वारा लगातार बढ़ रही किडनी संबंधी बीमारी को बढ़ता देख यह दिवस मनाने का निर्णय लिया गया।
  • इंटरनेशनल सोसायटी ऑफ़ नेफ्रोलॉजी और इंटरनेशनल फ़ेडरेशन ऑफ़ किडनी फ़ाउण्डेशन की एक संयुक्त पहल विश्व गुर्दा दिवस का उद्देश्य हमारे समग्र स्वास्थ्य के लिए हमारे गुर्दे के महत्व के प्रति दुनिया भर में जागरूकता बढ़ाने के लिए और गुर्दे की बीमारी और उसके संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं की आवृत्ति और प्रभाव को कम करना है।
  • अगर जल्दी पता लगाया जाए तो क्रोनिक किडनी रोग का इलाज किया जा सकता है
  • किडनी से संबंधित बीमारियों में गुर्दे में पथरी होना, गुर्दे का कैंसर और गुर्दे का निश्क्रिय होना है। इन तीनों ही परिस्थितियों में समय रहते अगर उपचार करा लिया जाए तो किडनी को बचाया जा सकता है।
  • गुर्दे में पथरी के लक्षण - किडनी में पथरी होना आम बात है पर उसे समय रहते नहीं निकाला जाए तो वह गंभीर रूप ले लेती है जिससे किडनी काम करना बंद भी कर सकती है। दर्द, बुखार, उल्टी, पेशाब में खून आना व जलन होना हैं। पथरी का होना आम बात है पर उसे समय रहते नहीं निकाला जाए तो वह गंभीर रूप ले लेती है जिससे किडनी काम करना बंद भी कर सकती है।

  • किडनी कैंसर के लक्षण - दर्द, पेट के बाजुओं में भारीपन, बुखार व पेशाब में खून आना है। बात अगर किडनी फैल की करें तो ऐसी परिस्थिति में पीड़ित को उल्टी या उबकाई आती है, चेहरे और पैरों पर सूजन रहती है तथा पेशाब की मात्रा कम हो जाती है।
  • किडनी के निष्क्रिय होने का मूल कारण है लापरवाही है, उचित जानकारी के अभाव में। किडनी को क्षति पहुँचाने में डायबिटीज दूसरा प्रमुख कारण है। किडनी फेल होने के कारणों में डायबिटीज या ब्लड प्रेशर का होना बहुत मायने रखता है। इसके अलावा पथरी भी किडनी डेमेज कर उसे फेल कर देती है। यदि किसी को ब्लड प्रेशर और डायबिटीज दोनों है तो किडनी को क्षति पहुँचने की संभावना और भी बढ़ जाती है। ऐसे में उचित सलाह और ध्यान रखकर किडनी की सुरक्षा की जा सकती है।
  • किडनी फेल्योर की संख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है!
  • इसे कम किया जा सकता है। इसके लिए नीचे दिया गया चित्र देखें। यह गूगल सर्च से साभार लिया गया है।

बुधवार, 9 मार्च 2011

अंग्रेजों के जुल्मों का स्वाद

विचार-117

1. गांधी-गांधीवाद 2. लिखावट 3. बचपन 4. शर्मिला चानू 5. पश्चाताप 6. डर और रामनाम 7. विवाह - विषयासक्त प्रेम 8. प्रायश्चित 9. जीवन-सूत्र 10.विलायत क़ानून की पढाई के लिए 11. शाकाहारी गांधी 12. अंग्रेजी तौर-तरीके 13. सादगी से जीवन अधिक सारमय 14. धर्मों का परिचय 15. मिस्र ने दिखाई गांधी की ताकत 16. भारत आगमन 17. “बा के बिना जीवन की मैं कल्पना नहीं कर सकता” 18. राजकोट तथा मुम्बई में वकालत

गांधी और गांधीवाद-19

अंग्रेजों के जुल्मों का स्वाद

1892

बम्बई से निराश गांधी जी राजकोट चले आए। अर्जियां लिखने का काम करने लगे। इससे इतनी आमदनी होने लगी कि उनका अच्छी तरह गुज़ारा हो सके| इसी समय एक ऐसी घटना हुई जो काफी महत्वपूर्ण साबित हुई। उनके बड़े भाई, लक्ष्मीदास, पोरबंदर के राजा के सलाहकार के रूप में काम करते थे। उन पर आरोप था कि उन्होंने राणा साहब को ग़लत सलाह दी थी। ऐसा आरोप था कि राणा ने राज्य के खजाने से कुछ जेवरात निकाल लिए थे। ऐसा माना जा रहा था कि राणा ने यह काम लक्ष्मीदास की सलाह पर किया था। यह शिकायत उस समय के पोलिटिकज एजेंट चार्ल्स ओलीवेंट के पास पहुंची। बड़े भाई, लक्ष्मीदास ने गांधीजी को राजकोट स्थित ब्रिटिश अधिकारी से मध्यस्थता करने हेतु राजी किया ताकि यह काम आसानी से हो सके। लक्ष्मीदास को मालूम था कि अपने लंदन प्रवास के समय से ही गांधीजी की इस अधिकारी से जान पहचान थी। गांधी जी  को यह बात नहीं जंची। उनका मानना था कि यदि लक्ष्मीदास ने बुरा काम किया है तो सिफ़ारिश से क्या होगा? और अगर वो निर्दोष हैं तो उन्हें प्रार्थनापत्र दे कर अपनी निर्दोषिता साबित करनी चाहिए। बड़े भाई को गांधी जी का यह तर्क नहीं जंचा। उन्होंने गांधी जी को कहा, “तुम्हें अभी दुनियादारी सीखनी है।” गांधी जी भाई की इच्छा नहीं टाल सके।

जब गांधीजी इस व्यक्ति से मिले तो उसने न सिर्फ़ मदद करने से इंकार कर दिया बल्कि गांधी जी की बात सुनने को भी राज़ी नहीं हुआ। बल्कि उसने यहां तक कहा कि तुम पहले के परिचय का लाभ उठाने के लिए यहां आए हो। गांधी जी ने कहा कि वो उनकी बात तो सुने, तब उस अधिकारी ने कहा कि उनका भाई प्रपंची है और वह कुछ सुनना नहीं चाहता।

जब गांधीजी अपनी बात कहने पर अड़ गए तो उसने अपने चपरासी को आदेश दिया कि गांधीजी को उसके कमरे से धक्के मार कर बाहर कर दे। चापरासी ने गांधी जी को धक्के देकर दरवाज़े के बाहर कर दिया। इस घटना से गांधीजी को गहरा आघात हुआ। वे उस अधिकारी पर मानहानि का दावा करना चाहते थे। इस काम के लिए फ़ीरोज़शाह मेहता से सम्पर्क किया गया। फ़ीरोज़शाह मेहता ने समझाया, “तुम अभी नए हो। विलायत की खुमारी तुम पर छाया हुआ है। ऐसे अनुभव तो वकील को होते रहते हैं। मामला चलाने से कोई फ़ायदा नहीं होगा। उलटे नुकसान ही होगा। बरबाद हो जाओगे।”

यह सलाह गांधी जी के लिए विष के समान थी। उन्होंने इस कड़वे घूंट को पिया। उन्होंने भविष्य में कभी भी किसी की सिफ़ारिश न करने की क़सम खाई। जो भी हो इस घटना ने उनकी जीवनधारा ही बदल दी। इस घटना ने उन्हें अंग्रेजों के जुल्मों का स्वाद चखा दिया साथ ही उन्हें अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने की प्रेरणा मिली। दक्षिण अफ्रिका में इसी तरह की एक और घटना ने उन्हें सबक सिखाया जब मार्टिज़बर्ग स्टेशन पर ब्रिटिश रेल अधिकारी द्वारा उन्हें घोर अपमान का सामना करना पड़ा।

शनिवार, 5 मार्च 2011

स्वास्थ्य सेवाएं-मोबाइल की रोशनी में प्रसव

विचार-116

स्वास्थ्य सेवाएं

मोबाइल की रोशनी में प्रसवimages (25)

  • पिछले दिनों एक समाचार पढा। हेडिंग थी, “मोबाइल की रोशनी में प्रसव”!
  • पढकर फ़िल्म थ्री इडियट्स की याद आ गई। फ़िल्म में गाड़ी की बैटरी की मदद से इनवर्टर बना कर डिलवरी करा दी गई। हम ताली बजाते और “ऑल इज़ वेल” गाते हॉल से बाहर निकल गए।
  • पर इस समाचार में ऐसा कोई अनोखा करतब करते थ्री इडियट्स नहीं थे। पूरा समाचार पढने के बाद मन में स्वाभाविक प्रश्न आया कि क्या हमारे देश की स्वास्थ्य सेवा में सब “ऑल इज़ वेल” है?

उत्तर खोजने के पहले आइए उस खबर के बारे में संक्षेप में बता दूं। वाकया मध्य प्रदेश के बैतूल ज़िले के सरकारी अस्पताल के उपस्वास्थ्य केन्द्र रानीपुर का है। मंटू आदिवासी की पत्नी आशा को इस अस्पताल में भर्ती कराया गया था। जब प्रसव पीड़ा हुई तो उस समय अस्पताल में बिजली नहीं थी। ऐसा नहीं है कि उस अस्पताल में इनवर्टर नहीं था, बल्कि वह डॉक्टर के घर को रौशन कर रहा था। अस्पताल की स्टाफ़ नर्स संगीता चौधरी ने दो मोबाइल की रोशनी में आशा का प्रसव कराया। पिछले तीन माह से अस्पताल में रात में होने वाले प्रसव ऐसे ही कराए जाते हैं। सफाई में डॉक्टर का कहना था, - “इंवर्टर घर पर नहीं है, बल्कि खराब है।”

  • क्या सब “ऑल इज़ वेल” है?
  • हमारा देश ग़रीबों का देश है।
    • एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत विश्व के एक तिहाई (45 करोड़) ग़रीबों का घर है।
    • यानी हमारी कुल आबादी के 42% लोग ग़रीब हैं।
    • यानी 10 में से 4 लोग ग़रीब हैं।
    • यानी ये चार लोग हर रोज़ 50 रुपए से भी कम कमाते हैं।
    • भारत के 49 करोड़ नगरिक अंतर्राष्ट्रीय ग़रीबी रेखा के नीचे रह रहे हैं।
  • क्या सब “ऑल इज़ वेल” है?
  • भारत अभावों का देश है।
    • 15 करोड़ लोगों को पीने का साफ पानी मयस्सर नहीं है।
    • 9.4 % श्रमिकों के पास काम नहीं है।
    • 119 भूखे देशों की सूची में भारत का 96वां स्थान है।
    • 10 करोड़ लोग झुग्गी-झोपड़ियों में जीवन गुज़ारते हैं।
  • क्या सब “ऑल इज़ वेल” है?
  • भारत कुपोषित पीढियों का देश है।
    • दुनिया में 14.6 करोड़ कुपोषित बच्चे हैं। भारत में 5.7 करोड़ बच्चे कुपोषित हैं।
    • तीन वर्ष की उम्र तक क़रीब ५०% बच्चे कुपोषण का शिकार हैं।
    • लगभग 33% लड़कियां कुपोषण का शिकार है।
  • क्या सब “ऑल इज़ वेल” है?
  • भारत बीमार और बीमारियों का देश है।
  • भारत महंगे इलाजों से बे-इलाजों का देश है।

अब डॉक्टर की बात करें।

  • हर साल सभी विधाओं में ढाई लाख से ज़्यादा डॉक्टर पढकर निकलते हैं।
    • लाखों रुपए ख़र्च कर वे डॉक्टर बनते हैं। इसके बाद हम उनसे दानवीर कर्ण बन जाने की उमीद तो नहीं ही कर सकते। सबसे पहले वे अपनी लागत वसूलते हैं। फिर तो वे वसूलते ही रहते हैं।
    • भारत की आबादी हर साल – औसतन तीन से चार करोड़ के बीच में बढ जाती है। इतने प्रसव तो होते ही होंगे। इसके लिए डॉक्टर भी चाहिए।
  • स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़े के अनुसार देश में छह लाख से ज़्यादा एलोपैथिक डॉक्टर हैं।
  • हर साल देश में सरकार द्वारा 18 हजार डॉक्टरों को प्रैक्टिस करने की मान्यता दी जाती है।
    • बहुत सारे अच्छे डॉक्टर विदेश चले जाते हैं
    • तो देश में आर.एम.पी. और आयुर्वेदिक प्रमाणपत्र लेकर एलोपैथी डॉक्टरी करने वालों की चांदी हो जाती है, खासकर ग्रामीण इलाकों में।
  • क्या सब “ऑल इज़ वेल” है?

देश में डॉक्टरों का अकाल है।

  • हमारे देश की 10,000 आबादी पर केवल 6 डॉक्‍टर उपलब्‍ध हैं।
  • विश्‍व के 175 देशों की स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं के मद्देनजर भारत का स्‍थान 171वां है।
  • 10,000 की आबादी पर 8 नर्सों की उपलब्‍धता है।
  • क्या सब “ऑल इज़ वेल” है?

अब बात अस्पताल की करें

  • भारत में हर एक हजार लोगों की आबादी के लिए सरकारी या निजी अस्पतालों का एक भी बिस्तर नहीं है।
  • विश्व का औसत आंकड़ा 4 बिस्तर से कम का है, और यह आंकड़ा ग़रीब देशों का है।
    • देश में 13.7 लाख बिस्तर हैं :
      • 8.33 लाख निजी अस्पतालों में और
      • 5.40 लाख सरकारी अस्पतालों में।
        • इन बिस्तरों का 40 फीसदी 20 बड़े शहरों में है, जहां देश की करीब 10 फीसदी आबादी निवास करती है।
  • उचित चिकित्सा सेवा के लिए 46 फीसदी से ज्यादा मरीज 100 किलोमीटर से ज्यादा का सफर तय करते हैं।
  • स्वास्थ्य सेवा से जुड़े क्षेत्र में दवा व्यापारियों की गिरोहबाज़ी, दलालों की गुटबंदी, एजेंटो का चक्कर, सरकारी अधिकारियों का ढुलमुल रवैया, लोगों की उदासीनता, खून बेचने वालों की मज़बूरी, किडनी बेचने खरीदने का रैकेट, आम बात है।
      • इस पर जब यह खबर आती है कि भारत का स्वास्थ्य बाज़ार अब 280 अरब डॉलर सालाना का होने जा रहा है, तो यह खबर न चौंकाती है, न ख़ुश करती है, सिर्फ़ एक फींकी हंसी आती है।
  • इस क्षेत्र में नर्स, डॉक्टर, स्वास्थ्य कर्मचारियों का वेतन कम है।
  • अगर हम चाहते हैं कि भारतीयों के स्वास्थ्य की सुरक्षा इच्छित स्तर पर होनी चाहिए तो अस्पतालों में 19 लाख बिस्तरों, 9 लाख डॉक्टरों और 18 लाख नर्सों की जरूरत है।
  • 1983 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति बनाई गई थी। 2002 में इसे संशोधित किया गया।
    • फिर भी यह स्थिति है कि अच्छी स्वास्थ्य सुविधा सिर्फ़ पैसों और पहुंच वालों के लिए है। उनके लिए है पांचतारा सुविधाओं वाला अपोलो, मैक्स, मेडिसीटी, फोर्टीस आदि। जो आम जन हैं, वे सरकारी अस्पतालों के लाइन में पर्ची बनवाने के लिए धक्के खाने को विवश हैं। उसके नसीब में है जांच के लिए भटकन, और इलाज के लिए बिस्तर नहीं है - की दुत्कार है।
      • उसपर इन आम जनों के लिए विधाता की तरफ़ से भी हर साल मिलता है बाढ, भूकम्प, महामारी, दुर्घटनाओं का उपहार।
  • स्वास्थ्य सेवाओं को प्रभावी बनाने के लिए ज़रूरत है 36 अरब रुपए का तत्काल निवेश की।
      • इस साल के बजट में 23,560 करोड़ का ही प्रावधान रखा गया है।
  • उस पर से इस साल के बजट में किए गए प्रस्ताव में व्यक्तियों द्वारा इलाज खर्च को भी सेवाकर के दायरे में ला दिया गया है। हालाकि यह कर महंगे अस्पतालों के इलाज पर लगेगा, फिर भी मध्यम वर्ग को इसका सबसे ज़्यादा नुकसान होगा। अच्छे इलाज के लिए अब सरकारी अस्पताल जाना पड़ेगा।
  • 25 बिस्तर या उससे अधिक और एसी युक्त अस्पताल अब सेवा कर के दायरे में आएंगे।
  • निजी अस्पतालों में इलाज से आपका-हमारा घरेलू बजट बिगड़ेगा। लोगों को निजी अस्पतालों में इलाज खर्च पर सेवाकर का भुगतान करना होगा। सरकार 5% सेवाकर लगाएगी।
  • कर में छूट तो नहीं, हां कर का दायरा ज़रूर बढा दिया गया है।
  • क्या सब “ऑल इज़ वेल” है?