विचार-123
गांधी और गांधीवाद-23
प्रतीक्षालय में ठिठुरते हुए

दक्षिण अफ़्रीका में भारतीयों का पहला जत्था 1860 में पहुंचा था। दक्षिण अफ़्रीका के गोरे गन्ने की खेती के लिए इकरारनामे के तहत भारतीय मज़दूरों को अपने यहां ले गये। इसके बाद भारतीयों (विशेषकर दक्षिण भारत से) का दक्षिण अफ़्रीका में बसने का सिलसिला ही शुरु हो गया। मज़दूर गये, तो पीछे-पीछे व्यापारी भी गये, ज़्यादातर मेमन मुसलमान। दक्षिण अफ़्रीका में तीसरा वर्ग उनका था, जो इकरारनामे की अवधि समाप्त होने के बाद वहीं बस गये थे। दक्षिण अफ़्रीका में बसे भारतीयों में ज़्यादातर तो अशिक्षित थे और जो थोड़ा-बहुत पढे-लिखे थे, उनका अंग्रेज़ी का ज्ञान नाममात्र का था। पैसेवाले धनी व्यापारी भी बस उतना ही अंग्रेज़ी समझ-बोल सकते थे, जो व्यापार करने के लिए ज़रूरी था।
भारतीयों के प्रति गोरी जाति, जातीय भेदभाव बरतती थी। भारतीयों ने इस अत्याचार को अपनी नियति मान लिया था। कभी यदि उनके दिल में विरोध की भावना उठती भी, तो वे उसे दबा देते। क्योंकि उन्हें मालूम ही न था कि कैसे इसका विरोध किया जाये।
लेकिन ब्रिटेन से बैरिस्टर बन कर लौटे नौजवान मोहनदास करमचंद गांधी इन अत्याचारों के आदि नहीं थे। वे गुजरात के एक सम्मानित परिवार के सदस्य थे, दीवान के बेटे थे। ब्रिटेन में तीन साल रह चुके थे। दक्षिण अफ़्रीका में रंगभेदी अत्याचार से पहली बार उनका साबका पड़ा।
पगड़ी वाली घटना को लेकर न सिर्फ़ गांधी जी को प्रसिद्धि मिली बल्कि कई महत्त्वपूर्ण भारतीय जैसे पारसी रुस्तमजी और आदमजी मियाखान तथा क्रिश्चियन सुभन गौडफ़्रे आदि से परिचय हुआ। डरबन में मेल-मिलाप, जान-पहचान का सिलसिला चल ही रहा था कि फ़र्म के वकील ने पत्र लिख कर सूचित किया कि मुकदमे की तैयारी के लिए खुद अब्दुल्ला सेठ को या उसके किसी प्रतिनिधि को प्रिटोरिया जाना चाहिए। प्रिटोरिया ट्रांसवाल की राजधानी थी। मुकदमे की सुनवाई वहीं पर होनी थी। अब्दुल्ला सेठ ने गांधी जी से पूछा कि क्या वे प्रिटोरिया जाएंगे। गांधी जी ने हामी भर दी। डरबन में एक सप्ताह रहने के बाद वे प्रिटोरिया के लिए रवाना हुए।
ट्रांसवाल की राजधानी प्रिटोरिया में मुक़दमे की सुनवाई होनी थी। वहां जाने के लिए गांधी जी द्वारा हामी भरने के बाद अब्दुला चिंतित था। भारतीयों के लिए ट्रांसवाल में नाटाल की अपेक्षा हालात और भी खराब थे। समस्या यह थी कि गांधी जी को प्रिटोरिया में कहां ठहराया जाय। सेठ अब्दुल्ला यह नहीं चाहते थे कि सेठ के मेमन दोस्त के यहां ठहरें। सेठ को आशंका थी कि प्रतिपक्षी का मेमन मित्र के यहां आना-जाना था, इसलिए इस बात की संभावना थी कि गांधी जी को सौंपे गए निजी काग़ज़ पत्रों में से कोई उसे पढ कर सूचना प्रतिपक्षी को दे सकता था, जिससे मुकदमें को नुकसान हो सकता था। ऐसे लोगों से मुकदमे के दौरान संबंध नहीं रखना ही अच्छा रहेगा।
दरअसल गांधी जी प्रतिपक्ष से मित्रता करना चाहते थे। वे मुकदमे को आपस में निबटाने की कोशिश करना चाहते थे। प्रतिपक्षी तैयब हाजी खान मोहम्म्द अब्दुल्ला सेठ के निकट सम्बन्धी थे। गांधी जी ने अब्दुल्ला को समझाया, “समझौते की नीति मुक़दमेबाज़ी से अच्छी रहेगी। ” यह सुनकर अब्दुल्ला सेठ ने कहा, “लेकिन आप तैयब सेठ को नहीं जानते। वे हमारे प्रतिपक्षी हैं, रिशतेदार भी। समझौते की बातचीत में वह आपके पेट से हमारे सारे भेद निकाल लेंगे। फिर वे इस सूचना का हमारे ख़िलाफ़ उपयोग करेंगे। वे बहुत ही होशियार आदमी हैं।”
गांधी जी ने अब्दुल्ला सेठ को आश्वस्त किया, “आप की कोई बात मेरे मुंह से न निकलेगी। आपके हित और विश्वास को भी मुझसे कोई क्षति नहीं पहुंचेगी। आप निश्चिंत रहें। आपको यह भी समझना चाहिए कि मुक़दमेबाज़ी में समय और पैसे की बर्बादी होती है। समझौता कर लेना कहीं अच्छा है।”
फिर भी अब्दुल्ला सेठ ने अपनी तरफ़ से गांधी जी को सचेत करना बेहतर समझा। बोले, “प्रिटोरिया में प्रतिपक्षी तैयब सेठ का बहुत प्रभाव है। स्थानीय व्यापारियों में उनके भेदिये भी हो सकते हैं। उनसे बचकर रहना ही बेहतर होगा। उनसे मेल-जोल बढाना फ़ायदेकारक नहीं भी हो सकता है। दस्तावेज़ और अन्य कानूनी काग़ज़ात को सावधानी से संभालकर रखना होगा। ये किसी के हाथ न लग जाएं।”
गांधी जी ने उन्हें आश्वस्त किया कि ऐसा कुछ न होगा।
डरबन में एक सप्ताह रहने के बाद युवा बैरिस्टर गांधी जी उन कठिनाइयों पर ध्यान नहीं देते हुए जो उस लंबी यात्रा में हो सकती थी, ट्रेन से प्रिटोरिया के लिए रवाना हुए। डरबन से चार्ल्स टाउन जाने की यात्रा लंबी काफ़ी कठिन थी। पहले दर्ज़े की कोच का टिकट मिल गया। अब्दुल्ला सेठ ने सलाह दी कि खर्च की परवाह न करके वे अपने लिए बिस्तर भी सुरक्षित करा लें। बिस्तर प्राप्त करने के लिए पांच शिलिंग अतिरिक्त देना पड़ता था। मितव्ययी मोहनदास ने उनका अधिक ख़र्च न कराना ही उचित समझा। इसका नतीज़ा यह हुआ कि रास्ते में उन्हें तरह-तरह तरह-तरह का अपमान झेलना पड़ा। रात के नौ बजे जब गाड़ी डरबन से 73 मील दूरी पर नाटाल की राजधानी मार्टिज़बर्ग पहुंची। एक रेलवे कर्मचारी ने बिस्तरे के बारे में पूछा कि क्या वह उन्हें चाहिए? गांधी जी ने कहा, उनके पास बिस्तर है। तभी कोच में एक गोरे यात्री ने डिब्बे में प्रवेश किया। एक भारतीय को सहयात्री के रूप में देख कर उसकी त्यौरियां चढ गईं। तीसरे दर्ज़े की ओर संकेत करते हुए उसने गांधी जी से कहा, “वहां जाओ!”
बैरिस्टर गांधी ने विनम्रतापूर्वक कहा, “मेरे पास पहले दर्ज़े का टिकट है।”
यह जवाब सुनकर गोरा क्रोध से आग-बबूला हो गया। चिल्लाया, “फ़र्स्ट क्लास का टिकट है तो क्या हुआ?” गांधी जी के भिन्न वर्ण का होने के कारण परेशान होकर उसने रेलवे के दो अधिकारियों को बुला लिया। अधिकारी ने गांधी जी से कहा, “तुम इस डिब्बे से उतर जाओ। तुम्हें आख़िरी डिब्बे में जाना होगा।”
गांधी जी ने संयत स्वर में कहा, “मेरे पास पहले दर्ज़े का टिकट है।”
अधिकारी कुछ भी सुनने को तैयार नहीं था। वह अड़ा रहा। बोला, “तुम्हें आख़िरी डिब्बे में ही यात्रा करनी होगी।”
गांधी जी ने स्पष्ट स्वरों में कहा, “इस दर्ज़े में मुझे डरबन में बैठाया गया है। यहां तक मैं इसी डिब्बे में आया हूं। आगे भी इसी में जाने का इरादा रखता हूं।”
अधिकारी ने धमकी दी, “यह नहीं हो सकता। इस डिब्बे से तुम्हें उतरना पड़ेगा। अगर न उतरे तो सिपाही तुम्हें उतारेगा। उठते हो या सिपाही को बुलाऊं?”
गांधी जी ने पक्के इरादे के साथ कहा, “तो फिर सिपाही भले उतारे, मैं ख़ुद नहीं उतरूंगा।”
सिपाही बुलाया गया। उसने गांधी जी का सामान उठाकर बाहर फेंक दिया। फिर उसने उन्हें भी धक्के मारकर उतार दिया। गांधी जी प्लेटफॉर्म पर गिर पड़े। उन्हें गोरे लोगों की व्यंग्य भरी हंसी सुनाई दे रही थी। कोई गोरा कह रहा था, “वाह रे वाह! एक कुली प्रथम श्रेणी में यात्रा करने के कोशिश कर रहा था!”
गांधी जी ने दूसरे डिब्बे में जाने से इंकार कर दिया। ट्रेन चली गई। वे मुसाफ़िरख़ाने में जाकर बैठ गए। उन्होंने सिर्फ़ हैण्ड बैग अपने साथ रखा। बाक़ी के सामान उन्होंने नहीं उठाया। रेलवे वालों ने उसे कहीं रख दिया।
यह जून का महीना था। मारिट्ज़बर्ग ट्रॉपिक ऑफ कैप्रिकॉर्न से 60 अंश दक्षिण में पड़ता है। यह समुद्र तल से 2000 फीट ऊपर है। यह वहां पर सरदी का मौसम था। कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। उन्हें ख़ूब ठंड लग रही थी। उनका ओवर कोट उनके बाक़ी के सामान में था। अपमान के भय से सामान मांगने की उनकी हिम्मत नहीं हुई। चूंकि उन्होंने सिद्धान्त के आधार पर अन्य किसी प्रकार से यात्रा करना स्वीकार नहीं किया था, इसलिए उन्हें ठिठुरती ठंड में रात बितानी पड़ी। कमरे में रोशनी की व्यवस्था भी नहीं थी। आधी रात में कुछ सहयात्री कमरे में आए। उसने गांधी जी से बात करनी चाही। पर विचारों में मग्न गांधी जी उससे बात करने की मनःस्थिति में नहीं थे। उस समय भावी सत्याग्रही नेता का ध्यान रंग-भेद की दुर्नीति और मानवता पर उसके भीषण प्रभाव और परिणामों पर केन्द्रित था। मोहनदास करमचंद गांधी के जीवन में यह क्रांति की रात थी।
वे दुखी थे। इस घटना ने उन्हें झकझोड़ कर रख दिया था। उनको यह सोच कर बहुत बुरा लग रहा था कि गोरों ने उनके साथ ऐसा दुर्व्यवहार किया, सिर्फ़ इसलिए कि उनकी त्वचा का रंग गोरा नहीं था। उस रात मारिट्ज़बर्ग के ठंडे अंधियारे प्रतिक्षालय में अपमान की टीस उनके अंदर उठती रही। लेकिन वे जल्द ही संभल गए। सारी घटना पर वे काफ़ी देर तक विचार करते रहे। वे सोचने लगे, क्या ऐसी दशा में इकरारनामे को रद्द कर भारत लौट जाना उचित होगा? या फिर जो भी अपमान सिर पड़े, पीकर रह जायें और काम पूरा करके लौटें? उन्होंने तय किया कि उन्हें अधिकारों के लिए यहीं रहकर संघर्ष करना होगा। साथ ही चाहे जो हो, प्रिटोरिया पहुंचकर मुक़दमा तो लड़ना ही होगा। मुक़दमा आधा छोड़कर भागने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। जो कष्ट सहना पड़ेगा, सहेंगे। ये तो बाहरी कष्ट हैं, जो वे झेल रहे हैं। ऊपरी हैं। गहराई तक पैठा हुआ रोग तो रंग-द्वेष का है। इस बीमारी को मिटाने का संकल्प उन्होंने उसी प्रतिक्षालय में लिया। आततायी के प्रति आक्रोश या गोरी जाति के प्रति विद्वेष उनके मन में नहीं था, बल्कि कर्तव्य के प्रति निष्ठा, स्वाभिमानी नागरिक की तरह निर्भीक जीने की आस्था और पशु पर हाथ उठाए बिना पशुता का प्रतिकार करने की अदम्य आकांक्षा थी।
अब वे एक बदले हुए व्यक्ति थे। स्वभाव से झेंपू और एकान्तप्रिय गांधी जी का काया पलट हो गया। उनमें फौलादी दृढता और निश्चय का जन्म हुआ। यह उनके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक थी। उन्होंने दक्षिण अफ़्रीका में व्याप्त असभ्यता और अन्याय के विरुद्ध कमर कस ली। उन्होंने रंग-भेद और जातीय हेंकड़ी के आगे न झुकने का प्रण लिया। यह प्रश्न अकेले उनके अपने आत्मसम्मान और न्यायोचित निजी अधिकार की रक्षा का नहीं था, बल्कि सभी भारतीयों और पूरे भारत देश ही नहीं सम्पूर्ण मानवजाति के गौरव की स्थापना का था, मानवता की मर्यादा की रक्षा का था। मोहनदास ने निश्चय किया कि वे अब “नहीं” कहेंगे। उन्होंने प्रण किया कि चाहे जो भी क़ीमत चुकानी पड़े, वे इस तरह के अन्यायों के ख़िलाफ़ लड़ेंगे। गांधी जी की जीवनी लिखने वाले लुई फीशर (Louis Fischer) ने उल्लेख किया है कि मोहनदास को महात्मा में बदलने में जिन दो महत्त्वपूर्ण घटनाओं का हाथ है, उनमें से यह दूसरी महत्त्वपूर्ण घटना है। (पहली घटना राजकोट के पोलीटिकल एजेण्ट के आदेश पर चापरासी द्वारा गांधी जी को धक्के देकर दरवाज़े के बाहर कर देने की घटना थी, जिसके बारे में हम चर्चा कर चुके हौं यहां देखें।)
एक निश्चय के साथ उन्होंने दूसरी ट्रेन में, जैसे भी हो, आगे जाने का फैसला लिया। सुबह उन्होंने रेलवे के जेनरल मैनेजर और दादा अब्दुला को तार द्वारा लंबी शिकायत भेजी। दादा अब्दुल्ला ने उचित कदम उठाए। मारिट्ज़बर्ग के भारतीय व्यापारी गांधी जी से मिलने आए। उन्होंने भी इस भेद-भाव की व्यथा-कथा गांधी जी को सुनाई। बताया कि उन्हें हीनतम लांछनाएं सहनी पड़ती है। बिना कारण अपमानित किया जाता है। शाम तक एक बार फिर गांधी जी चार्ल्स टाउन जाने के लिए ट्रेन का टिकट लेकर तैयार थे।
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