बृहस्पतिवार, 30 जून 2011

संवेदना

लघुकथा
संवेदना

मनोज कुमार

उस दिन दफ्तर में अफरातफरी का महौल था। बौस नहीं आये थे। दोपहर होते-होते धीरे-धीरे पूरा दफ्तर ही ख़ाली हो गया। मुझे भी आज एक आवश्यक काम से राधावल्लभ स्ट्रीट जाना था। बीमार बेटे बिट्टू के लिए डाक्टर की सलाह लेने। पर क्या करता, दफ्तर में कोई और था भी नहीं। कम-से-कम एक आदमी को तो दफ्तर में रहना ही चाहिए। शायद कोई कस्टमर आ जाए। मुझे दफ्तर में रहना ही उचित लगा।

दूसरे दिन दफ्तर आया तो सुबल ने पूछा, “तुम कल बौस के घर नहीं गए, .. जाना चाहिए था”। मैंने उत्सुकता से पूछा, “क्यों, क्या हुआ था?” सुबल ने बताया, “अरे! तुम्हें मालूम नहीं? बौस का डॉगी मर गया। बॉस उसे बहुत लाइक करते थे। चलो, कल नहीं गए तो आज ही उनसे मिल लो।”

मैंने धीरे से बौस के कक्ष में प्रवेश किया। मेरे हाथ में एक फाइल थी। वे उदास, डबडबाई आंखों से मेरी ओर देखते हुए बोले, “खन्ना, .. आओ, .. चौदह .. चौदह वर्षों से हमारे साथ था मौंटी। घर के सदस्य की तरह..” बड़ी मुश्किल से शब्द निकल रहे थे, “कल हमें अकेला छोड़ गया। मेरा तो किसी काम में दिल नहीं लग रहा है। फाइल-वाइल कल ..” उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे। मैं जाने को मुड़ा, तो वो बोले, “तुम कल नहीं आए? ऑफिस से सब आए थे। ” “ज्ज जी .. वो .. कल दफ्तर के ...” “चलो छोड़ो ठीक है।” वो मुझे पूरा बोलने ही नहीं दिए, रोते रहे। मैं बोला, “सर मैं आपके दुख को समझ सकता हूं। मेरी संवेदना आपके साथ है।” मैं निकल आया।

कुछ दिनों के बाद मुझे घर से फोन आया। राम प्रसादजी अंकल गुज़र गए। मुझे गहरा धक्का लगा। वे हमारे सगे नहीं थे, पर सगे से भी ज़्यादा थे। मेरा कैरियर बनाने और मुझे इस मुकाम तक लाने में उनका बहुत बड़ा योगदान था। अभावग्रस्त पिता के बुरे दिनों में वे पिता की तरह आगे आए और मुझे इस लायक बनाया। मैं बौस के पास गया, उन्हें बताया कि मुझे छुट्टी जाहिए। घर जाना होगा। बौस ने कहा, “”देखो तुम बहुत छुट्टी ले चुके हो ... कभी पिता के देहांत के नाम पर तो कभी साले की शादी के लिए। वैसे भी ऑफिस में बहुत काम अटका पड़ा है। तुम्हारा यहां रहना ज़रूरी है।” बॉस नहीं माने।

मैं अपनी सीट पर आ गया। सुबल ने पूछा “क्या हुआ।” मैं बोला, “छुट्टी नहीं मिली। बॉस का कुत्ता मर जाए तो सारा दफ़्तर ग़ायब हो सकता है और मेरे पिता सरीखे अंकल के निधन पर मैं संवेदना भी प्रकट करने नहीं जा सकता।”सुबल ने समझाया “बॉस का कुत्ता नहीं डौगी बोल, जब मौंटी मरा तो तुम तो बॉस के दुख में शरीक हुए नहीं अब वो तुमसे क्या सहानुभूति रखे।” मैंने पूछा, “बॉस का कुत्ता कुत्ता नहीं कोई बहुत ही इज्ज़तदार प्राणी है और मेरे पिता तुल्य अंकल क्या कुत्ते से भी गये बीते हैं ?”

मंगलवार, 28 जून 2011

छः माह के लिए भारत आगमन

गांधी और गांधीवाद-47

1895-1896

छः माह के लिए भारत आगमन

गांधी जी प्राकृतिक चिकित्सा में विश्वास रखते थे। उनका मानना था कि सूई चुभोना भी एक हिंसा ही है।

दक्षिण अफ़्रीका के विभिन्न भागों में रह रहे प्रवासी भारतीय काफ़ी निराश थे। हर क्षेत्र में भारतीय व्यापारियों और प्रवासियों पर तरह-तरह के बंधन लगाए जा रहे थे जिससे वे गोरों से मुक़ाबला नहीं कर पा रहे थे। गोरों का लालच, रंगभेद की नीति और इस बात का भय कि यदि भारतीय को समान अधिकार दे दिए गए तो न जाने क्या होगा, से उनके मन में प्रवासी भारतीयों के प्रति घृणा बढ़ती गई। क़ानून बनाने वालों पर दवाब बढने लगा और उन्होंने ऐसे क़ानून बनाए कि नेटाल में बिना लाइसेंस कोई व्यापार ही नहीं कर सकता था। प्रवासी के लिए किसी एक यूरोपीय भाषा का ज्ञान अनिवार्य कर दिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि भारत से अपनी मर्ज़ी से जानेवालों के लिए दक्षिण अफ़्रीका के दरवाज़े बंद हो गए। हां, इकरारनामे के तहत लाए जाने वाले अर्द्धगुलाम गिरमिटियों के लिए ऐसी कोई शर्त नहीं थी।

ट्रांसवाल (बोअर) के प्रेसिडेंट क्रूगर ने तो भारतीय प्रतिनिधि मंडल को यहां तक कह दिया, “तुम इस्माइल के वंशज हो, इसलिए तुम्हारा जन्म ही हुआ है ईसू के वंशजों की ग़ुलामी करने के लिए।” परिस्थिति ऐसी थी कि दक्षिण अफ़्रीका में अंग्रेज़ों से न्याय पाने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। हर दिन गोरों से अपमानित होते रहते थे। जीवन कष्टदायी था। नेटाल के संवैधानिक ग्रंथ में उन्हें अर्द्ध-बर्बर एशियाई और असभ्य जाति के लोग कहकर उल्लेख किया गया था। ट्रांसवाल में भारतीय व्यापारी खास जगहों के बाहर न तो रह सकते थे और न व्यापार ही कर सकते थे। ‘लंदन टाइम्स’ ने इन स्थानों को यहूदियों की बंदी बस्तियों, ‘गेटों’ का नाम दिया था।

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गांधी जी ने उनके अधिकारों की न सिर्फ़ लड़ाई लड़ना शुरु किया बल्कि उन्हें उनके अधिकारों के प्रति जागरूक भी करते रहे। वे लगातार प्रतिवेदन देते रहे, जिसका मुख्य उद्देश्य यह होता था कि गोरे इस बात को समझें कि भारतीय यहां उनकी ही मदद कर रहे हैं। दक्षिण अफ़्रीका में उनके संघर्ष का उद्देश्य यह नहीं था कि वहां के भारतीयों के साथ गोरों के समान बर्ताव किया जाए। वे तो एक सिद्धांत स्थापित करना चाहते थे कि भारतीय ब्रिटिश साम्राज्य के नागरिक हैं और इसलिए उसके क़ानून के अधीन उन्हें उसी समानता का अधिकार है। दुर्भाग्य से अधिकांश लोग उनके विचार को सही ढ़ंग से स्वीकार नहीं पाए। परन्तु बहुत से ऐसे भी थे जिन्होंने गांधी जी के शान्तिपूर्ण प्रयासों की सराहना भी की और इस बात को सही परिप्रेक्ष्य में लिया कि उनका प्रयास तो प्रवासियों के ऊपर हो रहे अन्याय के प्रति एक शान्तिपूर्वक किया गया प्रतिरोध है। गांधी जी के प्रयासों की सराहना करते हुए ‘द केप टाउन टाइम्स’ ने लिखा,

“जिन लोगों के बिना उसका काम एक क्षण भी नहीं चल सकता, उन्हीं से भयंकर घृणा का विचित्र दृश्य नेटाल में हमें देखने को मिलता है। यहां से सारे भारतवासियों के चले जाने पर इस उपनिवेश के वाणिज्य और व्यवसाय की जो दुर्व्यवस्था होगी उसकी कल्पना करते भी डर लगता है। लेकिन फिर भी भारतीयों को यहां बड़ी बुरी तरह दुरदुराया जाता है।”

प्रवासी भारतीय अच्छा काम कर रहे थे। थोड़े में अपना काम चला लेते थे। परिश्रमी तो थे ही। उनकी ये अच्छाइयां ही उनकी दुश्मन बन गई थीं। उनके इन अच्छे गुणों के कारण गोरे उन्हें अपना प्रतिद्वन्द्वी मानने लगे थे। इसलिए उनपर तरह-तरह की बंदिशें लगा रहे थे। अत्याचार और अन्याय कर रहे थे।

DSCN1350नटाल कांग्रेस और गांधी जी की गतिविधियों का एक बहुत बड़ा फ़ायदा यह हुआ ही कि दादा भाई नौरोजी और उनके सहयोगी इन प्रवासी भारतीयों की समस्याओं को हुक़ूमत-ए-बरतानिया के समक्ष आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित हुए। 29 अगस्त 1895 को दादा भाई नौरोजी के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का एक प्रतिनिधि मंडल उपनिवेश सचिव जोसेफ चैम्बरलेन से लंदन में उसके कार्यालय में मिलकर नेटाल, केप उपनिवेश और बोअर गणराज्य में रह रहे प्रवासी भारतीयों की शिकायतों से उन्हें अवगत कराया। हालाकि सचिव का रवैया टालमटोल वाला ही रहा और उसने कोई भी ऐसा आश्वासन नहीं दिया कि वो कुछ ठोस क़दम उठाने वाला है, फिर भी वह स्थानीय प्रशासन को इन शिकायतों के बारे में बताने को राज़ी हुआ।

भारतीयों को मताधिकार से वंचित करने वाला विधेयक नेटाल की विधान सभा पास कर चुकी थी और वह ब्रिटिश हुकूमत की मंज़ूरी के लिए विचाराधीन था। 13 सितम्बर 1895 को चैम्बरलेन ने नेटाल सरकार को यह सूचित किया कि महारानी ने मताधिकार क़ानून पर अपनी सहमति नहीं दी है। लंदन के उपनिवेश मंत्रालय ने उसे इस आधार पर अस्वीकार किया था कि यह विधेयक ब्रिटिश साम्राज्य के एक भाग के निवासियों के साथ भेदभाव बरतनेवाला है। इस सफलता का श्रेय गांधी जी के प्रभावशाली प्रचार-आंदोलन को जाता है।

नेटाल के गोरे निरुत्साहित नहीं हुए, और उन्होंने दूसरी चाल चली। अब जो संशोधित विधेयक उन्होंने बनाया उसमें वर्ण-बाधा और रंगभेद का ज़िक्र ही नहीं था। संशोधित विधेयक पारित हो गया। इसके अनुसार, गवर्नर जनरल की विशेष अनुमति के बिना जिन देशों (यूरोप को छोड़कर) में पार्लामेंटरी ढ़ंग की चुनाव प्रणाली और उससे बनी जन प्रतिनिधि संस्थाएं नहीं हैं, वहां के मूल निवासियों का नाम मतदाता सूची में दर्ज़ नहीं हो सकता था। यह भी तो भारतीय को मताधिकार से वंचित करता ही था।

DSCN1352गांधी जी उस वक़्त काफ़ी कम उम्र के ही थे, फिर भी उन्होंने आ रही बाधाओं से हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने दक्षिण अफ़्रीका के गोरों से अपील करते हुए एक पम्फलेट ज़ारी किया। 12 दिसम्बर 1895 को गांधी जी ने नेटाल से प्रकाशित एक पुस्तिका “दक्षिण अफ़्रीका में बसने वाले हरेक अंग्रेज़ से अपील” (An Appeal to Every Briton in South Africa) ज़ारी की।

3 मार्च 1896 को मताधिकार बिल राजपत्रित हो गया। होना ही था। 4 अप्रील 1896 को भारतीय समुदाय के लोगों ने विधान सभा के अध्यक्ष को एक ज्ञापन देकर मताधिकार बिल के प्रति अपना विरोध दर्ज़ किया। इस बीच प्रधान मंत्री जौन रोबिन्सन ने समाचार पत्रों को कहा कि नेटाल इंडियन कांग्रेस एक रहस्यमयी संस्था है। 24 मई को गांधी जी ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इसको चुनौती दी।

छह महीने का अवकाश

गांधी जी कस्तूरबा से यह कहकर दक्षिण अफ़्रीका आए थे कि वो सिर्फ़ एक साल के लिए वहां जा रहे हैं, यदि किसी कारण से उन्हें छह माह से अधिक रुकना पड़ा तो वे उन्हें भी बुला लेंगे। मई में वे तीन साल पूरा कर चुके थे। इन तीन वर्षों में गांधी जी एक संपन्न वकील और प्रमुख भारतीय राजनैतिक नेता बन गए थे। नटाल भारतीय कांग्रेस का बिरवा जम गया था। जो हालात बन गए थे, उसके मद्दे-नज़र वे यहां हाथ में लिए काम को अधूरा छोड़कर जा नहीं सकते थे। उन्होंने भांप लिया था कि इन कामों को पूरा होने में समय लगने वाला था। इसलिए उन्होंने निर्णय लिया कि जिस काम का श्रीगणेश उन्होंने किया है उसके सुपरिणाम निकलने तक उन्हें वहां ठहरना होगा। इस बात से वे निश्चिंत थे ही कि वकालत की कमाई इतनी तो है कि अपनी पत्नी और बच्चों को डरबन में वे सुविधा और आराम की ज़िन्दगी दे सकते हैं। इसलिए उन्होंने अपने भारतीय मित्रों से छह महीने का अवकाश देने का निवेदन किया ताकि अपने परिवार और उनका जो कुछ भी माल-असबाव है, ला सकें और साथ ही मातृभूमि के वासियों को दक्षिण अफ़्रीका में रह रहे प्रवासी भारतीयों की स्थिति से अवगत भी करा सकें। इस संदर्भ की चर्चा करते हुए गांधी जी ने अपनी “आत्मकथा” में लिखा है,

“तीन पौंड का कर एक नासूर था – सदा बहने वाला घाव था। जब तक वह रद्द न हो, चित्त को शांति नहीं मिल सकती थी।”images (50) - Copy

रविवार, 26 जून 2011

प्रवासी यात्रा के दौरान प्राप्त की गई ऊंचाई

पक्षियों का संसार

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प्रवास-यात्रा के दौरान पक्षी दूरी के साथ-साथ अपनी उड़ान में जो ऊंचाई ये छूते हैं वह भी कम रोचक नहीं है।

छोटी गोरैया सामान्यतः 50-60 मीटर से कम ऊंचाई पर उड़ती हैं। कुछ तो जमीन के काफी साथ-साथ ही चलते हैं, और इसको उड़ते देख कर ऐसा लगता है मानो वे जमीन पर ही दौड़ रहे हों, या पानी की लहरों पर तैर रहे हों। पिल्लख (पीला वैगटेल, मौटेसिला फ्लावा) 50 मीटर, अबाबील (स्वैलो) 70 मीटर और थ्रस (टुरडस) 150 मीटर पर उड़ान भरते हैं।

जबकि सामान्य रूप से प्रवासी पक्षी तीन हज़ार फीट की ऊंचाई पर उड़ान भरते हैं। यहां तक देखा गया है कि ये सपाट मैदान पार करते वक़्त भी काफ़ी ऊंचाई पर उड़ान भरते हैं। कॉमन चेफिंच सपाट मैदान जिसमें वृक्ष नहीं होते, के ऊपर जंगल की तुलना में अधिक ऊंचाई पर उड़ते हैं। पर इसे कोई जेनरल नियम नहीं बनाया जा सकता। स्टरलिंग पर जंगल का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। अलग-अलग प्रजातियों के पक्षी तरह-तरह के तरीक़ों का इस्तेमाल करते हैं।

उंचाई पर उड्डयन में कठिनाई यह होती है कि ज्यों-ज्यों उड़ान की ऊंचाई अधिक होती जाती है त्यों-त्यों संतुलन एवं गति बनाए रखना काफी मुश्किल हो जाता है। क्योंकि ऊपर में हवा का घनत्व काफी कम होता है और हवा की उत्प्लावकता (बुआएंसी) काफी कम हो जाती है।

डेविड लक ने रडार के द्वारा बहुत सी प्रजातियों के पक्षियों की उड़ानों का अध्ययन किया। इससे पता लगा कि कि कुछ छोटे-मोटे पक्षी रात के समय उड़ान भरते वक़्त पांच हज़ार से पंद्रह हज़ार फीट तक की ऊंचाई पर भी उड़ान भरते हैं। यहां तक कि हिमालय, आल्प्स या एंडेस की पहाड़ियों को पार करते समय ये पक्षी बीस हज़ार फीट या उससे भी अधिक की ऊंचाई प्राप्त कर लेते हैं।

लेपविंग  1,000 से 2,000 मीटर की उंचाई पर उड़ते हैं। रुक (कोरवस फ्रुजिलेगस), लिन्नेट (कारडुइलिस), गूज, सारस आदि तो 3,500 मीटर की उंचाई भी छू लेते हैं। वे पक्षी जो साइबेरिया से या उत्तरी यूरोप से सर्दी बिताने के लिए हिमालय की चोटियों की तरफ़ की प्रवास-यात्रा करते हैं और भारतीय भू-भागों में आश्रय लेते हैं उन्हें तो हिमालय की ऊंची-ऊंची चोटियों को भी पार करना पड़ता है, और तब वे सबसे अधिक ऊंचाई को छू रहे होते हैं। गिद्ध, गुडविट, गूज, सींकपर, हंस, बत्तख आदि ऐसे ही पक्षी हैं। ये पक्षी तो 5,000 से 10.000 मीटर की उंचाई तक छू लेते हैं।

माउंट एवरेस्ट के खुंबु ग्लेशियर पर काली पूंच वाले गुडविट के कंकाल मिले हैं। इससे यह साबित होता है कि इस ग्लेशियर, जिसकी ऊंचाई 5,500 मीटर है पर यह पक्षी उड़ान भरता है। भारत में देहरादून के निकट रात को उड़ान भरते हुए गूज को पाया गया है, और इसी पक्षी के नाम सबसे अधिक ऊंचाई पर, लगभग 10,000 मीटर तक, उड़ान भरने का रिकॉर्ड है।

दरअसल उड़ान की ऊंचाई अनेक बातों पर निर्भर करती है। जैसे उस क्षेत्र की बनावट, जंगल, पहाड़, आदि जिस पर से पक्षी उड़ान भरते हैं, हवा की दिशा, हवा की गति आदि ऐसे कारक हैं जो प्रवासी पक्षियों की उड़ान की उंचाई को प्रभावित करते हैं। जो थलीय पक्षी हैं, वे जब सागार पार कर रहे होते हैं तो अक्सर उंची उड़ान भरते हैं। इसी तरह समुद्री पक्षी जब स्थल के ऊपर से उड़ते हैं तो उंची उड़ान भरते हैं। ईडर (सोमोटरिया मोल्लीसिमा) एक समुद्री पक्षी है, और यह जब सागर पर उड़ता है तो बहुत नीची उड़ान भरता है, पर जैसे ही यह थल के नज़दीक आता है तो बहुत ऊंचाई पर उड़ान भरने लगता है। सुरक्षा की दृष्टि से शायद वे ऐसा करते हों।

एक और ग़ौर करने वाली बात है। जब काफ़ी तेज़ हवा की गति होती है तो वे अक्सर नीची उड़ान भरते हैं। जब वर्षा हो रही होती है तो इन्हें दूर तक नहीं दिखता, तब ये ऊंचाई बढ़ा लेते हैं। इसी तरह जब जंगल के ऊपर से उड़ना होता है, तब भी ये ऊंचाई अधिक कर लेते हैं।

चूकि पक्षियों की प्रवास यात्राएं उद्देश्यपूर्ण होती हैं, इसलिए यात्राओं के दौरान पक्षी बड़ी-बड़ी बाधाओं को पार कर जाते हैं। वे बीस से पचीस हजार फ़ीट की ऊंचाई को प्राप्त कर लेते हैं। इन यात्राओं में उन्हें प्राकृतिक आपदाओं, स्वाभाविक शत्रुओं और मानवनिर्मित बाधाओं का भी सामना करना पड़ता है। इस क्रम में वे बड़ी संख्या में हताहत भी होते हैं। पर अपनी धुन के पक्के ये पक्षी अपने निर्धारित गंतव्य पर पहुंच कर ही दम लेते हैं।

शुक्रवार, 24 जून 2011

आत्म-दर्शन की अभिलाषा

गांधी और गांधीवाद-46
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आत्म-दर्शन की अभिलाषा
DSCN1348नटाल इंडियन कांग्रेस के अभियान और न्यायालय में आजीविका कमाने के साथ-साथ गांधी जी दक्षिण अफ़्रीका में भारतीय समाज की सेवा में पूरे मनोयोग से लग गए थे। इसमें उन्हें जीवन का आनंद आ रहा था। साथ ही वे आत्मदर्शन का सुख पा रहे थे। सेवा में ईमानदारी का गुण सफलता को मूर्त बना देता है। जो सच्ची भावना से सेवा करता है उसे ईश्वर के दर्शन होते हैं। गांधी जी ने भी यह मानकर कि ईश्वर की पहचान सेवा से ही होगी, सेवा-धर्म स्वीकार किया था। जब आप समझते है कि आपके सभी कार्य परमात्‍मा के लिए हैं तो हर कार्य एक सुखदायी अनुभव बन जाता है। उन्हें भारतीयों की सेवा करना रुचिकर लग रहा था। वे तो काठियावाड़ के सियासी षडयंत्रों से बचने और रोज़ी-रोटी कमाने के लिए दक्षिण अफ़्रीका आए थे। यहां आकर उन्हें मानव-सेवा के रूप में एक ऐसा ज़रिया मिला जिसमें वे आत्म-दर्शन के द्वारा ईश्वर को खोजने लगे। इस संदर्भ में यह याद दिलाना ज़रूरी है कि आरंभिक महीनों में ही प्रिटोरिया के ईसाइयों ने धर्म के प्रति उनकी जागृत दिलचस्पी को तेज़ कर दिया। उनकी जिज्ञासा शान्त होने की जगह बढ़ती ही जा रही थी।

शुरु से ही मिशनरी ईसाई दोस्तों से उनके संबंध अच्छे थे। इनमें से एक थे डरबन में स्थित स्पेन्सर वॉल्टन। वे दक्षिण अफ़्रीकी जनरल मिशन के मुखिया थे। उन्होंने गांधी जी के धर्मान्तरण का कोई प्रयास नहीं किया। वे गांधी जी को बुलवा भेजे। गांधी जी उनसे मिले। जब गांधी जी उनके यहां पहुंचे तो अपने प्रति घर के सदस्य सा व्यवहार पाकर काफ़ी ख़ुश हुए। वॉल्टन कुछ अलग हट के विचार रखते थे। पहले भी उनसे प्रिटोरिया में गांधी जी का समागम हो चुका था। उन्होंने गांधी जी के सामने अपने जीवन के विभिन्न पहलुओं को रख दिया। उनकी प्रवृत्तियों और क्रियाकलापों से गांधी जी वाकिफ़ हुए।

DSCN1313उनकी धर्मपत्नी बहुत नम्र और तेजस्वी महिला थीं। इस दम्पत्ति की नम्रता, उद्यमशीलता और कर्तव्यपरायणता से गांधी जी काफ़ी प्रभावित हुए। वे अकसरहां एक दूसरे से मिलते रहते थे। हालाकि दोनों के विचारों में आधारभूत मतभेद थे। और ये मतभेद आपसी वार्तालाप से मिटने वाले नहीं थे। इस बात का दोनों को पता था। पर गांधी जी का मनना था, “जहां उदारता, सहिष्णुता और सत्य होता है वहां मतभेद भी लाभदायक सिद्ध होते हैं।”

1893 से 1896 के बीच कार्य की व्यस्तता ने गांधी जी को धार्मिक पुस्तकों के अध्ययन से वंचित रखा। फिर भी जब भी उन्हें समय मिलता उसका उपयोग वे पुस्तकों को पढ़ने में करते। पत्र-व्यवहार उनका प्रिय शगल था। रायचन्द उनका मार्गदशन करते ही रहते थे। उन्हें वे हमेशा रायचंद भाई कहा करते थे। लंदन से वापसी के समय वे उनसे मिले थे। उनके ज्ञान और चरित्र से गांधी जी काफ़ी प्रभावित हुए थे। उन्होंने गांधी जी को नर्मदा शंकर की पुस्तक ‘धर्म-विचार’ भेजी पढ़ने के लिए। इसके अलावा गांधी जी ने मैक्समूलर की पुस्तक ‘हिन्दुस्तान क्या सिखाता है?’ बड़े चाव से पढ़ी। थियॉसॉफिकल सोसायटी द्वारा प्रकाशित उपनिषदों का रूपान्तर भी उन्होंने पढ़ा। इन सब अध्ययन से हिन्दू धर्म के प्रति उनका सम्मान और अधिक से अधिक जानने की जिज्ञासा बढ़ती जा रही थी।
DSCN1314उन्हीं दिनों, उन्होंने इस्लाम के बारे में कुछ और पुस्तकें भी पढ़ीं, जिसमें वाशिंग्टन इरविंग की लिखी “लाइफ ऑफ मोहम्मद” (मुहम्मद का चरित्र) और कार्लाइल कृत “मुहम्मद-स्तुति” शामिल था। इनके अध्ययन से मुहम्मद पैगम्बर के प्रति उनका सम्मान बढ़ा। उन्होंने ‘ज़रथुस्त के वचन’ नामक पुस्तक भी पढ़ी।

DSCN1310प्राणायाम संबंधी क्रियायों के प्रति उनकी रुचि जगी और वे इसे करने भी लगे। पर जब वे नहीं सधीं तो आगे नहीं बढ़ा पाए। टॉल्सटॉय की किताब तो पहले भी वे पढ़ चुके थे, ‘गॉस्पेल इन ब्रीफ़’ (नये करार का सार), ‘व्हॉट टु डू’ (तब क्या करें?) ने उनके मन पर गहरी छाप छोड़ी। उन्हीं दिनों उन्होंने ‘लाइट ऑफ एशिया’ का अध्ययन किया। एक वर्ष बाद निकली “व्हाट इज़ आर्ट” गांधी जी के लिए किसी भी धर्म ग्रंथ से कम नहीं था। इन सब के अध्ययन से विश्व-प्रेम संबंधी उनकी अवधारणा और अधिक मज़बूत हुई। इस प्रकार भिन्न-भिन्न सम्प्रदायों के ज्ञान अर्जन से उनका आत्म-निरीक्षण बढ़ा।

गांधी जी ने लियो टालस्टॉय की पुस्तक “दि किंगडम ऑफ गॉड इज विदिन यू” पढ़ी थी। इस पुस्तक ने उनके मन को मथ डाला। टालस्टॉय का मत था कि नैतिक सिद्धांतों का हमें दैनिक जीवन में प्रयोग करना चाहिए। गांधीजी ने इस आदर्श को जीवन में प्रयोग करने की ठान ली।
जो पढ़ा और अच्छा लगा उसे आचरण में लाने का वो प्रयत्न करते रहे। गांधी जी एक सरल व्यक्ति थे। उन्हें कोई उपदेश देता और कहता कि यही नियम है तो वे उसे मान लेते और उसे अपने लिए वैसा ही बनाने का प्रयास करते। उन्हें कभी भी इस बात का पता नहीं चलता कि जिस व्यक्ति ने उन्हें उपदेश दिया था, वह स्वयं तो उस पर अमल ही नहीं करता। वे सदैव ही दूसरों की सच्चाई को पूर्णता में मान लिया करते थे। इस प्रकार उन्होंने माना,
“मेरा अस्तित्व नहीं है। सफलता के लिए विशेष गुण मुझमें नहीं है। लेकिन फिर भी मैं यदि कर सकता हूं, तब दूसरे क्यों नहीं? जो मैं एक निरीह प्राणी अनुशासन के दायरे में रह कर पाता हूं, दूसरों images (50) - Copyके लिए अत्यंत सरल होना चाहिए या कम से कम इतना ही सरल होना चाहिए।”

वे यही सोचते थे कि जो वे कर रहे हैं, कर सकते हैं, वह दूसरे भी कर सकते हैं। क्योंकि वे यही मानते थे कि कर्म करने की दृष्टि से सभी उनसे श्रेष्ठ हैं। शायद यह उनका सबसे बड़ा भ्रम था।

एक ईसाई परिवार के सम्पर्क में आने के कारण उन्होंने रविवार को वेस्लियन गिरिजाघर में जाना शुरु किया। उस दिन उन्हें उसके घर पर ही भोजन करना पड़ता था। जिस परिवार में वे जाते थे उसकी मालकिन भोली पर संकुचित स्वभाव की थी। भोजन करते वक़्त उसका पांच साल का बच्चा भी साथ होता था। गांधी जी को बच्चे प्रिय थे ही, उन्होंने उस बच्चे से दोस्ती कर ली। उन्होंने उसकी प्लेट में पड़े मांस के टुकड़े का मज़ाक़ किया और अपनी प्लेट में से सेव को उठा कर उसका गुणगान शुरु कर दिया। निर्दोष बालक ने भी गांधी जी के साथ सेव की स्तुति शुरु कर दी। बच्चे की मां उसकी यह हरकत देख कर दुखी हो गई। गांधी जी को लगा कि उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए, वे चुप हो गए। उन्होंने तुरत ही चर्चा का विषय बदल दिया।

दूसरे हफ़्ते जब वे उसके यहां गए तो बहुत ही सावधान थे। थोड़े पेशोपेश में भी थे कि जाऊं या न जाऊं। उस महिला ने गांधी जी से कहा, “मि. गांधी! आप बुरा मत मानियेगा, पर मुझे तो आपको बताना ही चाहिए कि मेरे बेटे पर आपकी सोहबत का बुरा असर पड़ने लगा है। अब वह रोज़ मांस खाने में आनाकानी करता है। पिछले रविवार को हुई आपसे चर्चा का हवाला देता है और खाने के लिए फल मांगता है। मुझसे यह न निभ सकेगा। मेरा बेटा मांसाहार छोड़ने से बीमार चाहे न पड़े, कमज़ोर तो हो ही जाएगा। इसे मैं कैसे सह सकती हूं? आप जो चर्चा करते हैं, वह हम सयाने के बीच शोभा दे सकती है। लेकिन बच्चों पर तो उसका बुरा ही असर हो सकता है।”

गाधी जी ने उसे समझाया “मुझे दुख है। माता के नाते मैं आपकी भावना को समझ सकता हूं। मेरे भी बच्चे हैं। इस आपत्ति का अन्त सरलता से हो सकता है। मेरे बोलने का जो असर होगा, उसकी अपेक्षा मैं जो खाता हूं या नहीं खाता हूं, उसे देखने का असर बच्चे पर बहुत अधिक होगा। इसलिए अच्छा रास्ता तो यह है कि अबसे आगे मैं रविवार को आपके यहां न आऊं। इससे हमारी मित्रता में ओई बाधा न पहुंचेगी।”

उस महिला ने ख़ुश होकर जवाब दिया, “मैं आपका आभार मानती हूं।”
***

संदर्भ :

१. सत्य के प्रयोग – आत्मकथा, गांधी जी २. बापू के साथ – कनु गांधी और आभा गांधी ३. Gandhi Ordained in South Afrika – J.N. Uppal  ४. गांधी, सचित्र जीवन गाथा – बल राम नंदा ५. शांति दूत गांधी – मनोरमा जफ़ा ६. मोहनदास करमचंद गांधी – एक प्रेरक जीवनी – नरेंद्र शर्मा ७. गांधी जी एक महात्मा की संक्षिप्त जीवनी – विंसेंट शीन ८. गांधी जी और ईसाइयत – रामेश्वर मिश्र ‘पंकज’ और कुसुमलता केडिया ९. गांधी, आम्बेडकर, लोहिया और भारतीय इतिहास की समस्याएं – डॉ. रामविलास शर्मा १०. गांधी – नलिनी पंडित ११. महात्मा गांधी प्रथम दर्शन : प्रथम अनुभूति शंकरदयाल सिंह १२. गांधी ने कहा था – गिरिराज शरण १३. कविगुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर – सौम्या सरकार, एस. मुखर्जी १४. गीता बोध – मो.क. गांधी १५. महात्मा गांधी और उनकी महिला मित्र – गिरिजा कुमार १६. हिंद स्वराज गांधी का शब्द-अवतार – गिरिराज किशोर १७. महात्मा गांधी जीवन और दर्शन – रोमां रोलां १८. नमक आंदोलन – डॉ. प्रभाकर माचवे १९. बापू की ऐतिहासिक यात्रा – वियोगी हरि २०. इतिहास का स्पर्शबोध एक आत्मकथा – कृष्ण कुमार बिड़ला २१. Mahatma Gandhi Essays and Reflections on His Life and Work – Ed. S. Radhakrishnan २२. The Men Who Killed Gandhi – Manohar Malgaonkar २३. महात्मा गांधी प्रथम दर्शन : प्रथम अनुभूति – शंकर दयाल सिंह २४. गांधी अध्ययन – सं. मनोज सिन्हा २५. बापू की कारावास की कहानी – सुशीला नैयर २६. गीता बोध – मो.क. गांधी, अनुवादक – आनंदवर्धन  २७. Mahatma Gandhi – a chronology, - K.P. Goswami २८. डॉ. नगेन्द्र ग्रंथावली खंड-7 २९. नीतिशास्त्र – डॉ. बी.एन. सिंह ३०. Satyagraha – Savita Singh ३१. महात्मा गांधी ब्रह्मचर्य के प्रयोग – दयाशंकर शुक्ल सागर ३२. गांधी की कहानी, लुई फ़िशर, सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन ३३. The Life And Death Of Mahatma Gandhi – Robert Payne ३४. महात्मा गांधी एक जीवनी – बी.आर. नन्दा ३५. महात्मा गांधी और अस्पृश्यता समस्या और विकल्प – द्वारकाप्रसाद गुप्ता ३६. सुनो विद्यार्थियों – महात्मा गांधी

बृहस्पतिवार, 23 जून 2011

ये मेरा जीवन एकाकी

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एक पुरानी कविता बिना किसी ’डिस्क्लेमर’ के ..

                                                                                          मनोज कुमार

 

 

कवि योगेन्द्र मौद्गिल की सलाह पर आभार सहित इस गीत में यह परिवर्तन किया है।

ये     मेरा       जीवन     एकाकी।

कट      जाए    जीवन    एकाकी।

 

नित - नित नूतन रूप तुम्हारा, देखूं      मैं       तो    हारा - हारा।

कभी   उर्वशी,    कभी    मेनका,   लगो परी तुम इन्द्र सभा की।

कट      जाए    जीवन    एकाकी।

 

डालो   एक   नज़र   है    काफी,  अंतिम सफ़र अभी भी बाक़ी।

मैं पीऊं  तुम  मुझे  पिलाओ,  पल भर को बन जाओ साक़ी।

कट      जाए    जीवन    एकाकी।

 

कहने   को   अधराधर      तरसे,    वही     बात   आंखों    से   बरसे।

गहन   वेदना   से     भारी    मन,  लेकर   आया       बूंद   घटा   की।

कट      जाए    जीवन    एकाकी।

 

नियति जाल में उलझ-उलझ कर, लुप्त हुआ ख़ुशियों का दिनकर।

संध्या       के     नर्तन में     क्रंदन,   कहां     छुपी   मुस्कान   उषा   की।

कट      जाए    जीवन    एकाकी।

(देवेन्द्र जी की सलाह पर अंतिम पंक्ति में परिवर्तन कर दिया हूं)

मंगलवार, 21 जून 2011

गिरमिटियों पर कर

गांधी और गांधीवाद

गिरमिटियों पर कर

मई 1895

DSCN1399दक्षिण अफ़्रीका में गांधी जी का संघर्ष ज़ारी रहा। उनके संघर्ष का यह उद्देश्य नहीं था कि वहां के भारतीयों के साथ गोरों के समान व्यवहार किया जाए। वो तो यह जताना चाहते थे कि ये प्रवासी भारतीय भी ब्रिटिश साम्राज्य के नागरिक हैं। इसलिए ब्रिटिश साम्राज्य के क़ानून के तहत उन्हें भी उसी समनता का अधिकार है। बीतते दिनों के साथ उन्होंने खुद को एक प्रभावशाली नेता के रूप में स्थापित कर लिया था। वे गिरमिटिया मज़दूरों के हिमायती के रूप में काफ़ी प्रसिद्ध हो गए थे।

दिनोंदिन नेटाल में प्रवासी भारतीयों की संख्या बढ़ती जा रही थी। इसके कारण वहां के गोरों को काफ़ी चिंता हो रही थी। सरकार पर यह दवाब बढ़ने लगा कि भारत से आने वाले मज़दूरों के लिए एक नया क़ानून बनाया जाए। नेटाल की सरकार चाहती थी कि गिरमिटिया मज़दूर वहां पर अपने करार की अवधि पूरा हो जाने के बाद भारत वापस चले जाएं। क़ानून ऐसा हो कि वे वहां पर स्वतंत्र रूप से बस नहीं पाएं। नटाल की सरकार ने एक ऐसा मसविदा तैयार किया जिसमें यह प्रावधान था कि यदि कोई भारतीय मज़दूर करार की अवधि के बाद रुकता है तो उसे प्रवास कर देना होगा। यह कर पच्चीस पौंड प्रति वर्ष के हिसाब से था। यह मसविदा स्थानीय कांग्रेस के सामने गांधी जी ने रखा। कांग्रेस ने इसके ख़िलाफ़ उचित आन्दोलन करने का प्रस्ताव पास किया। नेटाल इंडियन कांग्रेस ने गांधी जी के नेतृत्व में इसका विरोध किया। सर हेनरी बिन्स और एच.एल. मैसन का दस्ता भारत में उस समय के गवर्नर जेनरल लॉर्ड एलगिन से मिला। एलगिन ने इस प्रस्ताव को मंज़ूरी दे दी पर पचीस नहीं तीन पौंड सालाना की राशि पर।

बात 1860 के आस पास की है जब वहां की सरकार ने ईंख की खेती के लिए मज़दूरों की ज़रूरत को महसूस किया। नेटाल के हब्शी यह काम कर नही सकते थे। इसलिए वहां के गोरों ने भारत की सरकार से बात की और भारत के मज़दूरों को नेटाल जाने की अनुमति दी गई। उन्हें यह बताया गया कि पांच साल तक मज़दूरी करने का बंधन रहेगा। पांच साल के बाद उन्हें स्वतंत्र रूप से नेटाल में बसने की छूट रहेगी। जमीन का मालिक बनने का अधिकार भी उन्हें दिया गया था। उस समय तो गोरे यही चाहते थे कि करार की अवधि पूरी हो जाने के बाद भी भारतीय मज़दूर उनकी जमीन जोतें और उसका लाभ नेटाल सरकार को मिले।

मज़दूरों ने जी-जान से मन लगा कर मेहनत की। फल-सब्जियां उगाए। भारत से आम का पेड़ लाकर लगाया। कृषि के साथ उन्होंने व्यापार भी शुरु कर दिया। घर बनाने के लिए जमीन खरीदी और इस प्रकार मजदूर से मकान मालिक बन गए। बाद में स्वतंत्र व्यापारी भी नेटाल आए। उनकी इस प्रगति से गोरे व्यापारियों की आंखें खुली। जब उन्होंने भारतीय मज़दूरों का स्वागत किया था तब उन्हें उनके व्यापार करने की क्षमता का अंदाज़ा नहीं रहा होगा। अब तो वे उनके प्रतिद्वन्द्वी हो गए थे, और यह उन्हें रास नहीं आ रहा था। विरोध शुरु हो गया।

पहले तो उनका मताधिकार छीनने के लिए बिल पारित किया गया। अब गिरमिटियों पर कर लगाने की बात हो रही थी। यह सुझाव दिया गया कि गिरमिट पूरा होने के कुछ दिन पहले ही भारतीयों को जबरदस्ती भारत वापस भेज दिया जाए ताकि उनकी इकरारनामे की अवधि भारत में पूरी हो। पर यह प्रस्ताव भारत सरकार मानने से रहती। इसलिए यह सुझाया गया कि मज़दूरी का इकरार पूरा हो जाने के बाद गिरमिटिया वापस भारत लौट जाए। हर दूसरे साल नया गिरमिट लिखवाया जाए और हर बार उसके वेतन में कुछ बढोत्तरी की जाय। अगर वे वापस न जाएं और नया इकरारनामा न लिखें तो हर साल तीन पौंड का कर दें। कमाई के हिसाब से मज़दूरों के लिए यह कर बहुत ही भारी था। वे इसे चुका पाने की स्थिति में नहीं थे।

इस प्रस्तावित क़ानून के द्वारा नटाल सरकार ने अप्रत्यक्ष रूप से मज़दूरों को भारत वापस भेजने का प्रबंध कर लिया था। मई 1895 के पहले सप्ताह में नटाल एसेम्बली में नया क़ानून इंडियन इमिग्रेशन अमेंडमेंट बिल प्रस्तुत किया गया। साथ-ही साथ प्रवासी भारतीयों की तरफ़ से 5 मई 1895 को एसेम्बली के स्पीकर को एक प्रतिवेदन दिया गया। इस प्रतिवेदन का मसौदा गांधी जी ने तैयार किया था। इसमें प्रस्तावित बिल की आलोचना की गई थी और यह भी कहा गया था कि यह भारतीय मज़दूरों को दक्षिण अफ़्रीका से भगाने का प्रयास है। निचले सदन से पारित होकर जब बिल एसेम्बली में पहुंचा तो भारतीयों ने दूसरा प्रतिवेदन प्रेसिडेंट को दिया। इसमें कुछ नए तर्कों का समावेश किया गया था। यह कहा गया था कि इस बिल के प्रस्ताव अन्य ब्रिटिश उपनिवेशों से बिल्कुल हटकर है। इस तरह के नियमों से तो मज़दूरों को बंधुआ मज़दूर की तरह जीवन जीना पड़ेगा। तीन पौंड के कर के बारे में भी यह प्रश्न उठाया गया था कि केवल एक खास वर्ग को ही इस कर के लिए निशान क्यों बनाया गया है? जब यह बिल पास होकर क़ानून बन जाएगा तो यह उन ग़रीबों के ऊपर दोहरी मार होगी जो पहले से ही सताए लोग हैं।

जैसी की उम्मीद थी बिल बिना किसी विरोध के पास हो गया। अब तो एक ही उपाय बचा था कि व्हाइटहॉल से सम्पर्क साधा जाए और हस्तक्षेप करने को कहा जाए। 11 अगस्त 1895 को उपनिवेश सचिव लॉर्ड जोसेफ चैम्बरलीन को गांधी जी द्वारा तैयार एक लम्बा ज्ञापन भेजा गया। भारत के वाइसराय लॉर्ड एलगिन से भी निवेदन किया कि वे इस विषय पर ध्यान दें और भारतीय मज़दूरों को दक्षिण अफ़्रीका आने से रोकें। भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस की तरफ़ से दवाब डलवाने के लिए गांधी जी ने सर फिरोज़ शाह मेहता को भी मदद के लिए लिखा।

इन सब दवाबों के कारण बिल का मसौदा भारत की सरकार को भेजा गया। बिना किसी खास जांच-पड़ताल के कलकत्ते से उत्तर आ गया । बिल महारानी के अनुमोदन के लिए भेजा गया। उपनिवेश सचिव ने लॉर्ड एलगिन को लिखा कि प्रवासी भारतीयों द्वारा दिए गए प्रतिवेदन के आधार पर वो इसका पुनरीक्षण करें। इसके बावज़ूद भी भारत की सरकार ने अपने विचार नहीं बदले। अब तो सचिव के पास भी कोई आधार नहीं था कि वो इस बिल को खारिज़ कर सकते थे। इसलिए इस विधेयक पर राजशाही मुहर लग गई।

इस कर के ख़िलाफ़ ज़ोरों की लड़ाई छिड़ी। नटाल कांग्रेस ने इसके विरुद्ध आवाज़ उठाई। कांग्रेस ने निश्चय किया कि इस कर को हटना चाहिए। इस लड़ाई में सारे भारतीय एक जुट होकर लड़े। फिर भी इस निश्चय को पूरा होने में बीस साल लग गए। इस लड़ाई में कुछ लोगों को गोली खाकर जान से हाथ धोना पड़ा। दस हजार से अधिक भारतीयों को जेल भुगतनी पड़ी। पर अंत में जीत सत्य की हुई। अटल श्रद्धा, अटूट धैर्य और सतत कार्य करने का बल लोग जुटा पाए।

गांधी जी की प्रेरणा और नेतृत्व से ही यह संभव हुआ।

संदर्भ :

१. सत्य के प्रयोग – आत्मकथा, गांधी जी २. बापू के साथ – कनु गांधी और आभा गांधी ३. Gandhi Ordained in South Afrika – J.N. Uppal ४. गांधी, सचित्र जीवन गाथा – बल राम नंदा ५. शांति दूत गांधी – मनोरमा जफ़ा ६. मोहनदास करमचंद गांधी – एक प्रेरक जीवनी – नरेंद्र शर्मा ७. गांधी जी एक महात्मा की संक्षिप्त जीवनी – विंसेंट शीन ८. गांधी जी और ईसाइयत – रामेश्वर मिश्र ‘पंकज’ और कुसुमलता केडिया ९. गांधी, आम्बेडकर, लोहिया और भारतीय इतिहास की समस्याएं – डॉ. रामविलास शर्मा १०. गांधी – नलिनी पंडित ११. महात्मा गांधी प्रथम दर्शन : प्रथम अनुभूति शंकरदयाल सिंह १२. गांधी ने कहा था – गिरिराज शरण १३. इतिहास का स्पर्शबोध एक आत्मकथा – कृष्ण कुमार बिड़ला १४. कविगुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर – सौम्या सरकार, एस. मुखर्जी १५. गीता बोध – मो.क. गांधी १६. महात्मा गांधी और उनकी महिला मित्र – गिरिजा कुमार १७. हिंद स्वराज गांधी का शब्द-अवतार – गिरिराज किशोर १८. महात्मा गांधी जीवन और दर्शन – रोमां रोलां १९. नमक आंदोलन – डॉ. प्रभाकर माचवे २०. बापू की ऐतिहासिक यात्रा – वियोगी हरि २१. इतिहास का स्पर्शबोध एक आत्मकथा – कृष्ण कुमार बिड़ला २२. Mahatma Gandhi Essays and Reflections on His Life and Work – Ed. S. Radhakrishnan २३. The Men Who Killed Gandhi – Manohar Malgaonkar २४. महात्मा गांधी प्रथम दर्शन : प्रथम अनुभूति – शंकर दयाल सिंह२५. गांधी अध्ययन – सं. मनोज सिन्हा २६. बापू की कारावास की कहानी – सुशीला नैयर २७. गीता बोध – मो.क. गांधी, अनुवादक – आनंदवर्धन २८. Mahatma Gandhi – a chronology, - K.P. Goswami २९. डॉ. नगेन्द्र ग्रंथावली खंड-7 ३०. नीतिशास्त्र – डॉ. बी.एन. सिंह ३१. Satyagraha – Savita Singh ३२. महात्मा गांधी ब्रह्मचर्य के प्रयोग – दयाशंकर शुक्ल सागर ३३. गांधी की कहानी, लुई फ़िशर, सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन 34. The Life And Death Of Mahatma Gandhi – Robert Payne

रविवार, 19 जून 2011

प्रवासी पक्षी द्वारा तय किए जाने वाली दूरी

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पक्षियों की प्रवास यात्रा बहुत ही खास मकसद से होती है और उद्देश्यपूर्ण भी। जब कोई काम किसी ख़ास मकसद से हो तो रास्ते की बड़ी-बड़ी बाधाएं भी पार कर लेने का जज़्बा होता है। पक्षियों के साथ भी ऐसा ही होता है। हजारों किलोमीटर तक कई पक्षी बिना बिना रुके लगातार लगातार उड़ते चले जाते हैं। रास्ते में मिलने वाले आंधी, तूफान, भारी वर्षा, ठंडी हवा के झोंके का ये बड़ी खूबी से सामना करते हैं।

अबाबील, मार्टिन और कुछ शिकारी पक्षी प्रवास-यात्रा के दौरान कुछ नहीं खाते। दरअसल ये पूरी प्रवास-यात्रा के दौरान रुकते ही नहीं। बिना रुके ये 350 से 600 कि.मी. तक की उड़ान भर लेते हैं। उत्तर अमरीका के पक्षी दक्षिण की ओर जाते समय मैक्सिको की खाड़ी के ऊपर 800 से 1,000 कि.मी. तक लगातार उड़ते रहते हैं। न्यूज़ीलैंड में सर्दी बिताने वाले पक्षी 1,000 से 1,500 कि.मी. लगातार बिना रुके उड़ान भरकर आते हैं। बिना रुके लंबी उड़ान भरने में सबसे अधिक दूरी अलास्का से पवनई द्वीप की 3,300 कि.मी. की दूरी गोल्डन प्लोवर तय करता है।

अपनी प्रवासीय यात्रा के दौरान ये पक्षी कितनी दूरी तय करते हैं यह उनकी स्थानीय परिस्थिति एवं प्रजाति के ऊपर निर्भर करता है। इनके द्वारा तय की गई यात्रा की दूरी मापने के लिए पक्षी विज्ञानी इन्हें बैंड लगा देते हैं या फिर इनके ऊपर रिंग लगा देते हैं। फिर जहां वे पहुंचते हैं, उसका उन्हें अंदाज़ा हो जाता है। और तब दूरी माप ली जाती है।

आर्कटिक क्षेत्र के कुररी (टर्न) पक्षी को सबसे ज़्यादा दूरी तय करने वाला पक्षी माना जाता है। लेबराडोर की तटों से ये ग्यारह हज़ार मील की दूरी तय कर अन्टार्कटिका में जाड़े के मौसम में पहुंचते हैं। इतनी ही दूरी तय कर गर्मी में ये वापस लौट जाते हैं। इस प्रकार देखें तो आर्कटिक टर्न (स्टेर्ना पैराडिसेया) साल भर में 35,000 कि.मी. से अधिक लंबी यात्रा करता है।

इसी तरह की मराथन उड़ान भरने वाली अन्य प्रजातियां हैं सुनहरी बटान, टिटिहरी (सैंड पाइपर) एवं अबाबील। ये आर्कटिक क्षेत्र से अर्जेन्टिना तक की छह से नौ हज़ार मील की दूरी तय करते हैं। यूरोप के गबर (व्हाइट स्टौर्क) जाड़ों में आठ हज़ार माल की दूरी तय कर दक्षिण अफ्रीका पहुंच जाते हैं।

साइबेरियाई सारस (गुस ल्यूकोजेरेनस) हर साल 5,000 कि.मी. की यात्रा करके रूस से केवला देव राष्ट्रीय पक्षी विहार, भरतपुर, राजस्थान में आते हैं। छोटा पनलोव्वा या रूनी (लिटिल स्टिंट) (कालिड्रिस माइन्यूटा) हर साल 10,000 कि.मी. की यात्रा करती है।

इसमें कोई शक नहीं कि प्रवासी पक्षियों में ज़बरदस्त दमखम होता हागा, नहीं तो इतनी दूरी तय करना कोई आसान बात नहीं है। इस जगत में इनसे ज़्यादा एथलीट शायद ही कोई जीव होगा। प्रवासी यात्रा आरंभ करने के पहले ये पक्षी अपने अंदर काफी वसा एकत्र कर लेते हैं जो उनकी उड़ान वाली यात्रा के दौरान इंधन का काम करते हैं।

शुक्रवार, 17 जून 2011

एलेक्ज़ेंडर से पहचान

गांधी और गांधीवाद

एलेक्ज़ेंडर से पहचान

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DSCN1374गांधी जी ने समाज की जड़ता को भंग कर लोगों को सोचने का नया दृष्टिकोण प्रदान किया और समाज में बदलाव के लिए आवश्यक ऊर्जा का संचार किया। जात-पात, छुआ-छूत, साप्रदायिक भेद-भाव को दूर करने के लिए सारी उम्र लड़ते रहे। गांधी जी एक कठोर और सिद्धांतप्रिय व्यक्ति थे।

दक्षिण अफ़्रीका में आवारागर्दी के ख़िलाफ़ एक नियम था। इसके प्रावधानों में से एक प्रमुख नियम यह था कि रात के नौ बजे के बाद से काले घर से बाहर सड़क पर चल-फिर नहीं सकते थे। कुछलोगों को अधिकृत पास दिया गया था, जिसे उन्हें दिखाना पड़ता था अथवा पकड़े जाने पर उन्हें अपनी पहचान के रूप में संतोषजनक उत्तर देना पड़ता था। प्रवासी भारतीयों को इस नियम के कारण काफ़ी तंग किया जाता था। इकरारनामे के करार से मुक्त हुए मज़दूर और उनके वंशज इस नियम के घेरे में आते थे। लेकिन वे भारतीय जो ख़ुद से नेटाल आए थे, वे इस नियम से मुक्त थे। लेकिन वस्तुस्थिति यह थी कि अधिकतर मामलों में यह पुलिस की मर्ज़ी पर निर्भर करता था कि किसके साथ वह कैसा व्यवहार करती है। गुजराती व्यापारी, जिन्हें अरब कहा जाता था, अपनी वेश-भूषा से ही पहचान में आ जाते थे। लेकिन साधारणतया कौन गिरमिटिया मज़दूर है और कौन नहीं, फ़र्क़ कर पाना कठिन था। यह भी सच था कि जिस तरीक़े का व्यहवार पुलिस उनके साथ करती थी, वह भी उचित नहीं था। कई बार तो उन लोगों को भी पुलिस परेशान करती थी जो इस नियम के अंतर्गत नहीं आते थे।

गांधी जी के पास कई ऐसे मामले आए जिनमें प्रवासी भारतीय पर आरोप था कि उन्होंने इस नियम का उल्लंघन किया, हालाकि वे इस नियम के अंतर्गत नहीं आते थे। गांधी जी ने उनका सफलतापूर्वक बचाव किया। एक ऐसे ही मामले में जिसमें पुलिस ने वैध पास रहने के बावज़ूद एक व्यक्ति की पिटाई कर दी थी। गांधी जी ने अदालती कार्र्वाई में जीत हासिल की और उस कांस्टेबल को ही अदालत ने जुर्माना भी भरने को कहा। फिर भी उन्होंने महसूस किया कि सिर्फ़ मामला जीत भर लेने से बात नहीं बनती है। इससे समस्या का कोई स्थाई निदान तो हुआ नहीं। वे चाहते थे कि पुलिस लोगों के साथ रूख़ा व्यवहार न करे। उनके इस विचार पर पुलिस अधिक्षक ने कोई तवज़्ज़ो नहीं दी। गांधी जी ने निश्चय किया कि प्रेस के द्वारा इस तरह के मामलों को लोगों के सम्मुख लाएंगे। एक मामले में पुलिस अधिक्षक ने प्रेस में वक्तव्य ज़ारी कर दिया कि अदालत ने बिना अधिकार के निर्णय दिया है। इस मामले के दोनों आरोपी लड़कों को उसने नवसमृद्ध कहा। गांधी जी ने इस लड़ाई को अपने हाथ में लिया और अंजाम दिया। बचाव पक्ष के लिए सहानुभूति हासिल करने में भी वे सफल हुए। इस पूरे प्रकरण में पुलिस अधिकारी की अच्छी खासी दुर्गति हुई। लेकिन एक बात उसकी समझ में आ गई कि गांधी जी के सामने तलवार न भांजने में ही उसकी भलाई है। गांधी जी को भी यह महसूस हुआ कि वह पुलिस अधिकारी जिसका नाम एलेक्ज़ेंडर था, सिर्फ़ दिखावे के लिए ही निर्मम और कठोड़ था, अंदर से दिल का वह बड़ा ही नेक ख़्याल और दयालु इंसान था। धीरे-धीरे गांधी जी और एलेक्ज़ेंडर एक दूसरे को अच्छी तरह से पहचानने लगे और कुछ ही दिनों के बाद दोनों के बीच एक-दूसरे के प्रति अच्छी समझ विकसित हो गई।

यही एलेक्ज़ेंडर और उसकी पत्नी ने कुछ दिनों के बाद गांधी जी को जानलेवा हमले से बचाया था। उसका किस्सा समय आने पर।

दक्षिण अफ़्रीका के प्रवासी भारतीयों की नज़रों में एक वकील के रूप में गांधी जी की इज़्ज़त दिन ब दिन बढ़ती गई।

मंगलवार, 14 जून 2011

समझदारी

लघुकथा
समझदारी
मनोज कुमार
 
सरिता ने अपने बच्चों की परवरिश के लिए अपनी ज़रूरतों को हमेशा ही पीछे हटा दिया। इन बच्चों के चक्कर में सरिता वह सब भूल गई जो सपने हर एक कुंवारी लड़की अपने यौवन के दिनों में सजाती है। वो सजना, वो संवरना, गहने-कपड़े, पाउडर-क्रीम, मेकअप, सब भूल गई। वह सारा ध्यान अपने बेटों को सजाने संवारने में, उनकी ज़रूरतें पूरी करने में लगाती रही।

वे बच्चे अब बड़े होने लगे हैं। उनके दोस्त घर में आते हैं। “मम्मी ज़रा चार कप चाय बना कर लाना।” अब उनके इस हुक्म की तामील भी करनी होती है। जब दोस्त चले जाते हैं, तो छोटा राजू बोलता है, “क्या मम्मी, तुम कपड़े भी ढ़ंग की नहीं पहन सकती?” तब सरिता को ख़्याल आimages (18)ता है ‘हे भगवान, इसी साधारण लिवास में वह बच्चों के मित्रों को ड्राईंग रूम में चाय दे आई थी।’ फिर मुस्कुराकर यह बोलते हुए चल देती है कि “घर में खाना पकाना ज़्यादा ज़रूरी है कि टिप-टॉप।” पीछे से राजू की आवाज़ आती है “सज-संवरकर और साफ-सुथरा रहने में क्या जाता है? पता नहीं कब तुम्हें समझदारी आएगी मम्मी?’’ सूरज जो अब तक उनकी बातें सुन रहा था बोला, “सबकी मम्मी घर चलाती है, पर वे सब तुम्हारे जैसे गंवार की तरह नहीं रहतीं। क्या सोच रहें होंगे हमारे दोस्त?’’

सरिता को लगा कि दोस्तों के सामने मां की उपस्थिति से बच्चों को शर्मिंदगी होती है। अब वह उनके दोस्तों के सामने नहीं जाएगी, इस तरह तो बिलकुल ही नहीं। अब जब उनके दोस्त आएंगे तो परदे के पीछे से चाय आदि भेज देगी। वह सोचती है सुरेश ने तो कभी ऐसा नहीं कहा। उनके भी दोस्त आते हैं। पर वह ख़ुशी-ख़ुशी उनसे इंट्रोड्यूस करवाता है--“मीट माई वाइफ। -- सरिता! बैठो सरिता।’’ --“जी, वो चाय .. ।’’ --“कोई बात नहीं। थोड़ी देर बाद बना लाना”। उसके पति के कई दोस्त ऊंचे पदों पर आसीन हैं। उनके सामने जाने में सरिता को कभी हीन भावना ने ग्रसित नहीं किया, न सूरज ने ही कभी असहज महसूस किया। पर बच्चे .. ...। वे अब बड़े हो गए हैं।

शनिवार, 11 जून 2011

सत्य और ईमानदारी के सिद्धांत पर

सत्य और ईमानदारी के सिद्धांत पर

images (39)सत्य और ईमानदारी के सिद्धांत के बल पर वे अपना कानूनी पेशा निभाते गए और उन्हें सफलता मिलती गई। अपनी आत्मकथा में वे पारसी रुस्तमजी की कथा का बयान करते हैं। वह न सिर्फ़ उनका मुवक्किल था बल्कि एक घनिष्ट मित्र भी था। व्यापार के अपने पेशे में वह कभी कभार स्मगलिंग भी करता था। यह सिलसिला बहुत दिनों से चला आ रहा था। जब यह अपराध उजागर हुआ तब तक वह काफ़ी गड़बड़ी कर चुका था। कठिन परिस्थित्यों में घिरा रुस्तमजी अपनी नैय्या डूबती देख गांधी जी की शरण लेना बेहतर समझा। वह दौड़ा उनके पास आया और सब कुछ बता कर खुद को बचाये जाने के लिए गिड़गिड़ाने लगा। गांधी जी ने कहा कि यह तो उनके हाथ में है कि तुम बचोगे या नहीं। जहां तक मेरा सवाल है तुम तो जानते ही हो मेरे काम करने का ढंग। मैं तो ग़लती की स्वीकारोक्ति में विश्वास रखता हूं।”

रुस्तमजी ने कहा कि आपके सामने की गई मेरी स्वीकारोक्ति क्या काफ़ी नहीं है?

गांधी जी ने जवाब दिया, ग़लती तुमने सरकार के खिलाफ़ की है इसलिए स्वीकारोक्ति भी उनके समक्ष ही किया जाना चाहिए। गांधी जी कहने पर वे दोनों एक बड़े वकील के पास गए। सारी बात सुनने और समझने के बाद उसने कहा कि तुम इसका नतीज़ा भी सुन लो। कस्टम अधिकारी और एटॉर्नी जेनरल से मैं तो बात करूंगा, पर अगर सिर्फ़ फ़ाइन पर वो नहीं माने तो तुम्हें जेल जाने के लिए भी तैयार रहना होगा। गांधी जी इस कोशिश में कामयाब हुए कि मामला फाइन देकर ही बंद कर दिया गया।

नटाल की रेलवे में भारत से आए बहुर से मज़दूर काम करते थे। इनकी भी दशा दयनीय ही थी। 1895 अप्रील-मई के आसपास उनका पुलिस के साथ कुछ झगड़ा-झंझट हो गया। मामला यह था कि रेलवे की तरफ़ से इन मज़दूरों को लकड़ी दी जाती थी, जिस पर वे अपना भोजन बनाते थे। पर रेलवे ने बचत के दृष्टिकोण से यह निर्णय लिया कि उन्हें अब कोयला दिया जाएगा। पर समस्या यह थी कि कोयला बिना लकड़ी की सहायता से जल नहीं सकता था। उसे जलाने के लिए वे जहां-तहां से लकड़ी का जुगाड़ करते थे। एक दिन एक अफ़्रीकी कन्स्टेबल ने उन्हें ऐसा करते हुए पकड़ लिया। बाद में उनपर यह आरोप लगाया गया कि कुछ भारतीयों ने लकड़ी से ही उनकी पिटाई कर दी। एक यूरोपीय पुलिस ने उसके घर जाकर उस व्यक्ति को हिरासत में ले लिया।

हालाकि इस बार प्रोटेक्टर बीच में आया और उसने इसे छोटी ग़लती मानते हुए यह कहकर छोड़ दिया कि यह उनकी रोज़मर्रा की ज़रूरत है। पर नटाल एडवर्टाइज़र ने इस निर्णय के खिलाफ़ बहुत उल्टा सीधा लिखा जिसका गांधी जी ने डटकर विरोध किया और कहा कि भारतीय समुदाय को नीचा दिखाने के लिए अखबार में बढ़ा-चढा कर लिखा गया है। क्षमा याचना के साथ नटाल एडवर्टाइज़र ने गांधी जी का बयान छापा।

जून में नटाल रेलवे के 255 श्रमिक उनके कोटे के दिए जाने वाले राशन से उत्पन्न विवद के कारण अपने काम पर नहीं गए। उन्हें डेढ़ पौंड चावल प्रति दिन दिया जाता था। चावल की जगह पर सप्ताह में तीन दिन उन्हें दो पौंड मकई या अन्य अन्न दिया जाता था। उन्हें मकई पसंद नही आता था। जब उन्हें जबर्दस्ती मकई ही दिया जाने लगा तो वे प्रोटेक्टर से मिले। उनके शिकायत की सुनवाई तो हुई ही नहीं, उलटे उपद्रव फैलाने के आरोप में उन्हें ही गिरफ़्तार कर लिया गया। उनके लिए गांधी जी अदालत में उपस्थित हुए और एक सप्ताह की मोहलत मांगी ताकि मामले का निपटारा आपसी बात-चीत से कर लिया जाए। मजिस्ट्रेट इससे सहमत नहीं हुआ और दंड स्वरूप उसने एक शिलिंग का ज़ुर्माना लगा दिया साथ ही यह भी आदेश दिया कि यदि वे इसका भुगतान नहीं करते हैं तो उन्हें तीन दिन के कारावास की सज़ा भुगतनी होगी।

इस बीच गांधी जी की रेल अधिकारियों से बात हुई और समझौता हुआ कि छह पौंड अनाज की जगह श्रमिकों को आठ पौंड अनाज दिया जाएगा। जब समझौता हो गया तो श्रमिकों ने सोचा कि एक शिलिंग का ज़ुर्माना न देकर वे तीन दिन का कारावास ही भुगतेंगे। पर गांधी जी के समझाने से कि केन्द्रीय मुद्दा तो सुलझ गया है उन्हें दं दे कर काम पर लौट जाना चाहिए, श्रमिक ने वैसा ही किया।

बृहस्पतिवार, 9 जून 2011

कुछ बेतरतीब विचार

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हो गया ज्ञानी मैं

जब सारी पोथी पढ़ ली

फिर अपने चारों ओर

उँची दीवारें खड़ी कर ली।

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थी यह अभिलाषा

ज्ञान इतना पा जाऊं

हो जाए परिचय मेरा

मुझसे ही।

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पढ़-लिखकर

ज्ञान बढ़ा

सीख लिया जग की

रीति और रिवाज को

जान गया

मैं हूँ हिंदू, तू है मुस्लिम

शब्दों के भेद ने

भेद दिया समाज को!

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ययाति की तरह

पुत्र से भी यौवन लेकर

अनंत सुख भोग की

कामना, तृष्णा।

होती है अतृप्त अनंत

उनकी लिप्‍सा।

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मैं खड़ा हूँ

अस्ताचल सूर्य के प्रकाश में

सामने दर्पण

अपने ही प्रतिबिंब से

डर लगता है मुझे।

बिहारी समझ बैठा है क्या ?

बिहारी समझ बैठा है क्या ?

मनोज कुमार

आजकल मैं सभ्य दिखने लगा हूँ। असभ्य तो मैं पहले भी नहीं था, पर दिखता नहीं था। अब दिखता हूँ इसका अहसास मुझे अपनी पिछली दिल्ली यात्रा पर हुआ। दिल्ली विमान पत्तन से पूर्वभुगतान टैक्सी में सवार हो जब साउथ ब्लाक के लिए चला तो एक लाल सिग्नल पर टैक्सी को कुछ देर के लिए ठहरना पड़ा। एक सामान बेचने वाला टैक्सी के पास आया तो टैक्सी ड्राइवर ने बेची जा रही वस्तु का दाम पूछा। विक्रेता ने डेढ़ सौ कहा। इस पर टैक्सी चालक का जुमला था – “चल बे,..जा। बिहारी समझ बैठा है क्या? 40 की चीज को एक सौ पचास बोलता है।”

मुझे लगाकि टैक्सी चालक पिछली सीट पर बैठे सवारी को बिहारी नहीं मान रहा है। शायद सभ्य मान रहा है, और जो सभ्य है वह बिहार का नहीं हो सकता !

सरकार की नौकरी में नागपुर, हैदराबाद, चंडीगढ़ के रास्ते कोलकाता पहुँच गया हूँ। अन्य प्रांतों में सरकारी दौरों के कारण आना-जाना लगा ही रहता है। विभिन्न प्रांतों के रहन सहन, रीति-रिवाज,तौर-तरीक़े सीखने-अपनाने की मेरी आदत से, हो सकता है अपना बिहारीनेस दूर हो गया हो।

इसी संदर्भ में आज मुझे चंडीगढ़ का एक वाकया याद आ रहा है। एक दिन मेरा लड़का स्कूल नहीं जाने की जिद पर अड़ गया। मैंने कारण जानना चाहा तो बोला- “सब मुझे बिहारी कहते हैं। मैं नहीं जाऊँगा।” मैंने कहा, “हम बिहार के हैं इसलिए कहते हैं।” किसी तरह उसे समझा बुझा कर स्कूल भेजा। वह मेरी सर्विस में आ जाने के साथ-साथ बिहार के बाहर ही पला-बढ़ा इसी लिए उसे इस बिहारीपने का महत्व न मालूम हो। पर मुझे कोई – “इस् स्साला बिहारी !” कहता है तो मैं बुरा नहीं मानता। उस वक्त मैं माननीय डा० राजेन्द्र प्रसाद से लेकर रामधारी सिंह दिनकर तक को याद कर लेता हूँ। मेरा सीना गर्व में फूल जाता है। और सोचता हूँ जिस बुद्ध को बिहार की धरती पर ज्ञान मिला वो थोड़ा इसे भी ज्ञान दे देते। जब शांति अहिंसा की बात चलती है तो सम्राट अशोक को याद कर लेता हूँ। पौरुष और पराक्रम की बात चलती है तो चन्द्रगुप्त को याद कर लेता हूँ। शिक्षा की बात चलती है, तो नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालय की याद आ जाती है। कवियों की बात चलती है तो विद्यापति के प्रति श्रद्धा सुमन बिखेर देता हूँ, हां बाबा नागार्जुन को भी। जब नारियोंके प्रति सम्मान और प्रतीक को याद करता हूँ तो सीता मां के आगे नतमस्तक हो जाता हूँ। जब पेंटिंग का जिक्र चलता है तो मिथिला पेंटिंग को मन में रख लेता हूं। जब भाषाओं की बात चलती है तो मैथिली, भोजपुरी, मगही, अंगिका, वज्जिका, उर्दू, .. और तो और .. प्राकृत, पाली अप्रभंश उन दिनों की, .... और हिंदी, .. आज की , एक ही प्रांत में इतनी भाषाएं, याद कर लेता हूँ। फेहरिश्त लंबी है। आपका वक्त जाया नहीं करूँगा। कुछ आप भी याद कर लें। पर जो मैं गिना रहा हूँ क्या वो केवल बिहार और बिहारियों का ही है। शायद नहीं। ये पूरे हिंदुस्तान के तो हैं ही। शायद विश्व के भी हों।

कुछ खास बैठकों-सभाओं में जब मैं टाई पहन कर जाता हूँ तो लगता है फिर से पराधीन भारत में आ गया हूँ। वहां लोगों की आंग्ल भाषा की औपचारिकता के शहद में डूबो-डूबो कर तीखे शब्द मुझे रास नहीं आते। ऐसी सभ्यता उन्हें ही मुबारक। “आपसे मिलकर खुशी हुई” वाली औपचारिक मुद्रा में हम नहीं दिखते, इसमें हमें विश्वास नहीं, हम तो गलबहिया डालकर बातें करते हैं। हम बिहारी तो जब किसी अनजान से भी मिलते हैं तो हमारे चेहरे पर जिज्ञासा का नहीं स्वागतका भाव होता है, माने-या-न-मानें, यह सच है।

हम तो उन्मुक्त उड़ान चाहते हैं, गा लेते हैं जहां दिल में सफाई रहती है होठों पर सच्चाई रहती है ... हर फिक्र ... को उड़ा देते हैं और कहते हैं “तो क्या हुआ यदि हम गणेश को गनेस, सड़क को सरक और शादी को सादी कहते हैं। तब हम कुछ लोगों को विचार करने का अवसर तो दे ही देते हैं कि श,ष, और स, ड़ और र,नऔर ण क्यों? एक से काम नहीं चल सकता क्या? ”

बिहारी भी तो अब तीन तरह के हो गए हैं। नहीं-नहीं दो ही तरह के। एक तो वो जो बिहार में ही हैं और दूसरा वो जो कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण रोजगार की तलाश में बाहर आ गए। कुछ ऐसे बिहारी जिन्होंने अच्छा पद पा लिया, पैसे कमा लिये, अंग्रेजी सीख ली वे दिल्ली के टैक्सी चालकों की नजरों में बिहारी थोड़े ही हैं। वे अगर किसी को यह बताते हैं कि “मैं बिहार से हूँ” तो सामनेवाला “कोई मिल गया” के “जादू” की तरह उसे देखेंगे और एक बड़ा सा “अच्छा” ... बोलेंगे, फिर कहेंगें –“लगते तो नहीं।”

पर बात यहां बिहारी होने की नहीं है। बिहारी बुलाए जाने की है। “बिहारी” बुलाने का मतलब दीन-हीन, अज्ञानी, कुबुद्धि, हाय हैलो हाऊ डू-यू-डू से दूर, कैट टाइप का नहीं होना से है। इसे तो विशेषण के तौर पर भी इस्तेमाल किया जाता है। किसी भी प्रांत में रिक्शा चलानेवाला, रेहड़ी लगानेवाला, आइसक्रीम बेचनेवाला, ठेला खींचनेवाला, कुली, बोझा उठाने वाला खेत में मजदूरी करने वाला बिहारी है। यानी गरीब है। उसकी शालीनता कायरता है और वह लिट्टी चोखा से ऊपर उठ ही नहीं सकता। सत्तू से ज़्यादा पा नहीं सकता। वह हाशिए पर है – और रहेगा। ऐसा माना जाताहै।

क्या बिहारी होना अभिशाप है ? बड़े यत्न से कई बिहारी श को श बोल तो लेते हैं, और बिहार के बाहर की “सोशाइटी” में बिहार के “बैकवार्डनेस” को कोसते भी रहते हैं। जैसे पैर में गोबर लग जाए और आपने गंगा नहा लिया तो सारा कलंक धुल गया। पर बिहारी अगर भाषा का इस्तेमाल फूहर ढंग से करते हैं और “स्कूल” के बजाय “इसकुल” जाते हैं, वहां की लडकियां “फराक” पहिन कर “सरक” पर चलती हैं और उनका माथा “ठनकती” है यह देखकर कि “टरेन” छूट “गया” तो कुछ लोग अपना “नॉलेज” बघाड़ कर उनका ज्ञान “चैक” कर अपना “कैस” मजबूत कर लेते हैं।

छोड़िए इन सब का क्या फायदा। अब “अगले जन्म मोहे बिटिया ही कीजो” की बात आती है तो बिहारी पृष्ठभूमि का ही सहारा लेना पड़ता है। अब ये मत कहिएगा कि बेटियां पैदा करने वाला यानी “बिहारी”।

हां एक शब्द बिहारी में खूब बोला जाता है “हम”। अब आप ही बताएं “मैं” और “हम” में कौन भारी है, .. और कौन बिहारी है। “मैं”- “मैं” की रटलगाने वाला या “हम” कहकर सर झुकाने वाला। हम तो यही जानते हैं कि संघर्ष, संयम और सामूहिकता का नाम बिहारी है।

त अब हम बंद करता हूँ। आपहू कुछ सोचें।

बुधवार, 8 जून 2011

वकालत के पेशे में सत्य और ईमानदारी का मार्ग

गांधी और गांधीवाद

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images (3)कुछ दिनों के बाद गांधी जी ने एक दीवानी मुक़दमे के सिलसिले में कोर्ट में हाजिर भी हुए। गांधी जी के मुवक्किल सेठ अब्दुल्ला ने गोपी महाराज के विरुद्ध 263 पौण्ड का दावा दायर किया था। जब कोर्ट ने इस दावे को दण्ड के साथ वादी के पक्ष में मान लिया तो गांधी जी की तरफ़ सबका ध्यान आकर्षित हुआ। नटाल के बार एसोसिएशन में गांधी जी की साख बढ़ी। बहुत ही लगन और परिश्रम से गांधी जी मामले के एक-एक पहलु पर नज़र डालते थे। इस फैसले के बाद न सिर्फ़ साथियों में बल्कि जज और मजिस्ट्रेट की नज़रों में भी उनकी प्रतिष्ठा बढ़ी।

1895 के शुरुआती दिनों की बात है। गांधी जी की मुठभेड़ सुप्रीम कोर्ट के वकील सर वाल्टर रैग से हो गई। इसका लोगों में खासा प्रचार हुआ। यह हसनजी दावजी के उनकी मृत्यु के बाद सम्पत्ति के बंटवारे का मामला था। गांधी जी को इस्लाम नियमों के तहत सम्पत्ति के बंटवारे की योजना बनाने के लिए मनोनित किया गया था। गांधी जी द्वारा जब रिपोर्ट सौंपी गई तो सर वाल्टर ने जहां तक विधवा पत्नी के हिस्से की बात थी, अपनी मंज़ूरी दे दी। पर मृतक के बच्चों और भाईयों के हिस्से से संबंधित प्रस्ताव पर उसने असहमति जताई। इस पर अपने विचार व्यक्त करते हुए जज ने इस्लामिक नियमों के गांधी जी की जानकारी पर सवालिया निशान लगाया। उसने कहा कि चूंकि गांधी जी हिन्दू हैं, इसलिए उन्हें सिर्फ़ हिन्दू नियमों की जानकारी है, मुसलमानों के नियम की उन्हें जानकारी नहीं है। पर वस्तुस्थिति यह थी कि उत्तराधिकार संबंधी इसलाम के नियमों का गांधी जी ने काफ़ी ध्यानपूर्वक अध्ययन किया था। पवित्र पुस्तक और इसके व्याख्या के उद्धरणों का हवाला देते हुए उन्होंने साबित किया कि उनके जायदाद के विभाजन की प्रस्तावित योजना सही और नियमानुसार है। उन्होंने सर वाल्टर का ध्यान इस ओर भी अकृष्ट किया कि मुस्लिम नियमों पर सबसे अच्छी पुतकें ग़ैर-मुसलमानों द्वारा ही संपादित की गई हैं। नटाल के क़ानूनी जानकारों में से अधिकांश का मनना था कि इस मामले में गांधी जी सही थे। उस उपनिवेश के अधिकांश मुस्लिम समुदाय, जिनका इस मामले में रुचि थी, गांधी जी की दलीलों से अच्छे-खासे प्रभावित दिख रहे थे।

बाद में एक और मामले में कुछ रोचक वाकया हुआ। यह मामला दिवालिया का था, और इसमें गांधी जी का समना नटाल सभा के एटॉर्नी आर.एच. तथम से हुआ। जब अपनी दलीलों से वह परास्त हुआ तो उसने मज़ाकिए लहजे में कहा, “गांधी जी का जवाब नहीं, .. एक बार फिर एक काले ने गोरों पर विजय पाई!”

जज के समक्ष गांधी जी का दलील रखने का तरीक़ा विशिष्ट होता था। बिना किसी ताम-झाम के, बिना किसी शाब्दिक युद्ध के, पूरी तरह तथ्यों पर वे अपने तर्क स्थापित करते थे। अपनी बहस के लिए तैयार किए गए संक्षिप्त विवरण में वे मामले से संबंधित कोई गड़बड़ी या कमी संबंधी तथ्य नहीं छुपाते थे। अपने पक्ष के समर्थन में सत्य को सामने लाकर ही वे तर्क देते थे। अपने पक्ष से संबंधित कमज़ोर बिन्दुओं को जिस स्पष्टोक्ति के साथ वे स्वीकार करते थे वही उनके लिए एक मज़बूत बिन्दू बन जाता था और इसके आधार पर वे मामले के निर्णायक बिन्दुओं पर ध्यान केन्द्रीत करते थे। क़नूनी विवाद के अधिकांश मामलों का निर्णय इन्हीं बिन्दुओं के आधार पर होता था। हालांकि अनेकों बार गांधी जी की ईमानदारी को कठिन जांच के दौर से गुज़रना होता था, पर गांधी जी कभी हार नहीं मानते और अपने सत्य और ईमानदारी के मार्ग को छोड़ते भी नहीं थे।

ऐसे ही एक मामले का जिक्र उन्होंने किया है। यह एक दीवानी मुकदमा था। इसमें गांधी जी कनिष्ठ अधिवक्ता के तौर पर हाजिर हुए थे। जिस खाते पर विवाद था उसके निपटारे के लिए अदालत ने एक चौपाट को मामला सुलझाने के लिए आदेश दिया था। फैसाल गांधी जी के मुवक्किल के पक्ष में गया था। लेकिन पंच ने जो गणना की थी उसमें से एक संख्या उधार स्तम्भ में दिखाया था जबकि इसे ख़र्च के स्तम्भ में होना चाहिए था। यह भूल गांधी जी की नज़र में तो आ गई जबकि प्रतिपक्षी की नज़र में नहीं आई थी। गांधी जी और वरिष्ठ अधिवक्ता के बीच इस बात को लेकर मतभिन्नता थी कि इस भूल को सामने लाया जाना चाहिए या नहीं। गांधी जी इस बात पर दृढ थे कि इसे सामने लाया जाना चाहिए। पर वरिष्ठ ने चेतावनी दी कि अगर ऐसा किया जाता है तो ऐसा भी हो सकता है कि पंच का फैसला बदल दिया जाए और वह हमारे खिलाफ़ चला जाए। पर गांधी जी इस तर्क को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं थे। दोनों में समझौता होता दीख नहीं रहा था, तब वरिष्ठ काउंसिल ने कहा कि फिर यह मामला तुम ही देखो मैं नहीं देखूंगा। गांधी जी ने कहा ठीक है, यदि मुवक्किल तैयार है तो यह मामला मैं लड़ूंगा, पर इस फैसले को इस भूल के साथ मैं नहीं स्वीकार कर सकता। मुवक्किल पेशोपेश में पड़ गया। पर उसकी गांधी जी में अटूट श्रद्धा थी। उसने कहा कि मुझे इस बात में कोई आपत्ति नहीं होगी यदि आप इस केस के लिए बहस करें। हम हार भी जाएं तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। पर इसे हम भूल के साथ नहीं स्वीकार करेंगे।

गांधी जी निश्चित नहीं थे कि वे उचित ढ़ंग से सर्वोच्च न्यायलय में इस जटिल मामले में बहस कर पाएंगे या नहीं। बेंच के सामने जब वे उपस्थित हुए तो थोड़े घबड़ाए भी थे। जैसे ही उन्होंने गणना की भूल की ओर इशारा किया, एक जज ने बड़ा ही तीखा व्यंग्य कसा। इसने गांधी जी के मनोबल को बढ़ाया, तोड़ा नहीं। अपने खास सौम्य अंदाज़्ज़ में वे भूल को बताते चले गए। वे जज को इस बात के लिए राज़ी कराने में क़ायमयाब हुए कि यह चूक जानबूझकर नहीं की गई है इसलिए फैसले को बिना बदले हुए इस भूल को दूर किया जा सकता है। जब प्रतिपक्षी वकील ने इस बात पर बहस शुरु की और कहा कि चूंकि गणना में ग़लती है इसलिए फैसले को निरस्त किया जाए तो जज ने कहा कि यदि गांधी जी इस बात को सामने न लाए होते तो आप क्या कर लेते? विपक्षी वकील की दलील को नकारते हुए जज ने फैसला सुनाया कि पूर्व फैसला बरकरार रहता है और निर्देश दिया कि इस भूल को सुधारा जाए।

इस घटना पर अपने विचार व्यक्त करते हुए गांधीजी कहते हैं, मैं प्रफुल्लित था। मेरा मुवक्किल और वरिष्ठ भी। इससे मेरे इस विश्वास को और बल मिला कि यह कोई ज़रूरी नहीं कि बिना सच से समझौता किए मामला नहीं लड़ा जा सकता। सच एक ऐसा प्रकाश स्तम्भ था जिसके आलोक में अपने मुवक्किल और न्यायालय के प्रति वे अपने कर्तव्य का निर्वाह करते रहे।

मंगलवार, 7 जून 2011

भ्रष्टाचार और कालाधन

भ्रष्टाचार और कालाधन

  • मैं कोई अपनी बात नहीं कहूंगा।
  • आप समझदार हैं, खुद समझ जाएंगे। ये आंकड़े सब बयान करते हैं।

तथ्य – 1 ग़रीबी, बेकारी, भुखमरी

  • एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत विश्व के एक तिहाई (45 करोड़) ग़रीबों का घर है।
  • यानी हमारी कुल आबादी के 42% लोग ग़रीब हैं।
  • यानी 10 में से 4 लोग ग़रीब हैं।
  • यानी ये चार लोग हर रोज़ 50 रुपए से भी कम कमाते हैं।
  • 10 करोड़ लोग झुग्गी-झोपड़ियों में जीवन गुज़ारते हैं।
  • 15 करोड़ लोगों को पीने का साफ पानी मयस्सर नहीं है।
  • भारत के 49 करोड़ नगरिक अंतर्राष्ट्रीय ग़रीबी रेखा के नीचे रह रहे हैं।
  • दुनिया में 14.6 करोड़ कुपोषित बच्चे हैं। इसका 50% भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान में हैं। भारत में 5.7 करोड़ बच्चे कुपोषित हैं।
  • एक आंकड़े के मुताबिक १९९७-२००१ क बीच ८० हज़ार से ज़्यादा किसानों ने अत्महत्या कर ली थी
  • अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान (IFPRI) द्वारा ज़ारी वैश्विक भुखमरी सूचकांक में भारत को 67वां स्थान दिया गया है। भारत को कुपोषण और भरण-पोषण के मामले में महिलाओं की ख़राब स्थिति के कारण काफ़ी नीचे स्थान दिया गया है। 42% पैदायशी कमज़ोरी भारत में है। इस मामले में पकिस्तान (5%) की स्थिति बेहतर है।
  • 119 भूखे देशों की सूची में भारत का 96वां स्थान है।

दृश्य – 2 भ्रष्टाचार

  • एम्नेस्टी इंटरनेशनल के एक रिपोर्ट के मुताबिक
    • भारत दुनिया के भ्रष्ट देशों की सूची में शामिल
    • इस देश की पुलिस सर्विस सबसे भ्रष्ट सेवा
    • 75% लोग भारत में किसी न किसी तरह भ्रष्टाचार का समना करते हैं।
    • 191देशों की सूची में भारत 178वें पायदान पर है।
    • भारत को 10 में से 3.3 अंक
    • करप्शन प्रेसेप्शन इंदेक्स में भारत की 87 वां स्थान।
    • 20 लाख करोड़ रुपए से भी ज़्यादा की राशि वर्ष 1948 से 2008 तक बाहर भेजे गए।
    • ¼ सांसदों पर भ्रष्टाचार के संगीन आरोप हैं।

दृश्य – 3 कालाधन स्विस बैंक

  • स्विस बैंक एसोसिएशन की रिपोर्ट के मुताबिक स्‍वीस बैंकों में जमा सबसे ज्‍यादा रकम भारतीयों की है
    • यह राशि 66000 अरब रूपये है ।
  • · यह राशि (66000 अरब रूपये) हमारे कर्ज का 13 गुना है।
  • इस बैंक में काला धन जमा करने के मामले में रूस दूसरे स्थान और चीन पांचवे स्थान पर है।
  • · यह धन हमारे जीडीपी का छह गुना है।
  • · यह रुपया काला धन है।
  • · अगर यह भारत आ जाए तो यहां की अर्थ व्यवस्था की काया ही बदल जाए।
  • · अगर इसका कुछ प्रतिशत भी देश में वापस आ जाए तो यहां की सड़कों की दुर्दशा समाप्त हो जाएगी।
  • · काले धन के अवैध प्रसार पर निगरानी रखने वाली ग्लोबल फाइनेंशियल इंटिग्रिटि द्वारा तैयार रिपोर्ट इलिसिट फाइनेंशियल फ्लो फ्रॉम इंडिया, १९४८-२००८ के आंकड़ों के मुताबिक पिछले साठ सालों में काले धन से भारत को लगभग २० लाख करोड़ का चूना लगा है। यह राशि भारत की जीडीपी का ४० फीसदी हिस्सा है।
  • · पिछले एक दशक से हो रहे आर्थिक सुधारों के प्रयासों के कारण इस पर पर्दा पर्दा पड़ता गया है।
  • · काले धन को देश से बाहर ले जाने का कारोबार हर साल ११.५ प्रतिशत की दर से बढ रहा है।
  • कालाधन के कारण भारत हर 24 घंटे में 240 करोड़ का नुकसान उठा रहा है।
  • पिछले 60 सालों में 9.7 लाख करोड़ की काली कमाई मुल्‍क के बाहर भेजी जा चुकी है।
  • ग्लोबल फाइनेंशियल इंटीग्रिटी के अनुसार आजादी के बाद 60 सालों में 20831 अरब रूपए का नुकसान देश को उठाना पड़ा है।
  • भारत से हर 24 घंटे में 240 करोड़ रूपये देश से बाहर चला जाता है।

दृश्य – 4 कालाधन अगर वापस आए तो

  • 40% भी मिल जाए तो हम विदेशों से कर्ज नहीं लेंगे।
  • 30 साल तक बिना कोई टैक्‍स दिए हर भारतीय निश्चितं रहकर जीवन जी सकेगा।
  • 20 करोड़ नौकरियां पैदा कर सकता है कुल जमा काले धन का सिर्फ 30 प्रतिशत हिस्‍सा|
  • 500 पॉवर प्रोजेक्‍ट लग सकते हैं, जिससे, आमजन को निर्बाध बिजली आपूर्ति की जा सकेगी।
  • यह राशि अगर वापस आ जाए तो भारत की अर्थव्‍यवस्‍था अगले 30 सालों तक स्थिर रह सकती है।
  • इसके वापस आ जाने से 20 करोड़ से ज्‍यादा रोजगार पैदा होगें।
  • देश में प्राथमिक और माध्‍यमिक स्‍कूलों के लिए कुल 3 लाख शिक्षकों के पद खाली हैं। इसके लिए 36 अरब रूपये चाहिए।
  • भारत को शिक्षा बजट 40 हजार करोड़ रूपये का है स्‍वास्‍थय बजट 22 हजार करोड़ रूपये का है।
  • यदि यह 66000 करोड़ रूपये वाप आ जाते हैं तो स्‍वास्‍थ्य, शिक्षा आदि से जुड़ी आर्थिक समस्‍याएं हल हो सकती है।

प्रश्न जो हमारे सामने है ..

  • देश को कुल 1 अरब 25 करोड़ की आबादी में से 83 करोड़ लोगों को सिर्फ 20 रूपये रोज पर जीने के लिए मजबूर हैं। क्‍या यही विकास है।
  • क्‍या हमारी नीति वाकई बहुसंख्‍यक जनता की बेहतरी के लिए है ?
  • क्‍या काली कमाई पर रोक की बात महज छलावा है ?
  • क्या कालेधन और भ्रष्टाचार की बात करना अपराध है?
  • कौन जिम्‍मेदार है इसके लिए

कौन? कौन?? कौन???

सोमवार, 6 जून 2011

मेरे भी कुछ बेतरतीब विचार

आज ज्ञानदत्त पांडेय जी का ब्लॉग “मनसिक हलचल” पर सुबह-सुबह जाने का मौक़ा हाथ लगा। वहां “कुछ बेतरतीब विचार” शीर्षक से एक पोस्ट थी। मुझे ब्लॉगिंग का यह अंदाज़ काफ़ी भाया। सोचा मैं भी ऐसी पोस्ट डाला करूंगा। तो देर किस बात की … आज से ही शुरु कर देता हूं। वहां जो टिप्पणी दे आया, आज उसी से शुरु करता हूं अपने बेतरतीब विचारों की श्रृंखला।

  1. सोच ही नहीं पा रहा कि अखबार पढूं, टीवी देखूं या बिना पढ़े टिपियाता जाऊं।
  2. प्रथम पृष्ठ पर अखबार की सुर्खी बन गई है, पहले पेज पर ‘महिला पोशाक में पहुंचे ..’ और उसी अखबार के नौवें पेज पर है ‘पैरों तले कुचली मानवता।’ सुबह-सुबह ही अखबार क्यों दे जाता है हॉकर?
  3. एक आंकड़े पर नज़र जाती है, जो ठीक इस समाचार -‘आधी रात के बाद … महिलाओं, बच्चों को भी नहीं बख्शा ..’, के नीचे है (वह आंकड़ा), “3200 बाघ हैं इस दुनियां में, जिसमें से लगभग पचास प्रतिशत भारत में हैं!”
  4. बहुत गर्मी है। ये जून का महीना इतना गर्म क्यों हो जाता है? आज अखबार में मौसम का पूर्वानुमान भी नहीं छपा है। पता ही नहीं चल रहा कि कब आएगी बारिश?
  5. एक और हेडलाइन पर नज़र जाती है, बाज़ार में लीची की भरमार, आम ने की बेवफ़ाई।े
  6. कल विश्व पर्यावरण दिवस था, हम पर्यावरण संरक्षण का संकल्प ले ही नहीं पाए। अब इस भैंस का क्या होगा? कुछ हरा-भरा बचेगा भी उसके खाने के लिए या नहीं? “गई भैंस अब पानी में” … यह मुहावरा ही है ना?
  7. काफ़ी देर से सोच रहा हूं कुछ लिख ही डालूं, कभी सोचता एक पोस्ट ही लिख देता हूं, कभी कि पोस्ट लिखने से अच्छा है कि टिपिया ही दूं। पर आजकल तो प्रचलन है कि जो बड़ा ब्लॉगर है वह सबके ब्लॉग पर जाकर थोड़े ही टिपियाता है, … और मुझे भी तो बड़ा ब्लॉगर बनना है। है कि नहीं?
  8. ये बाई भी ना … आई ही नहीं अब तक। अब घर साफ़-सफ़ाई, चौका बरतन कौन करेगा? श्रीमती जी की सुविधा के लिए उसे रखा था। अब “वो” नहीं आई तो क्या “उन्हें” परेशानी में डालूं या खुद ही करूं? बुद्धि भ्रमित हो गई है।
  9. बाक़ी फिर कभी!

रविवार, 5 जून 2011

विश्व पर्यावरण दिवस पर गांधी और गांधीवाद

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indian-hero-mahatma-gandhiआज विश्व पर्यावरण दिवस है। हमारा नारा है, कि “हम कल के लिए आज विश्व को संरक्षित करें!” बढ़ती आबादी, आधुनिकीकरण, शहरीकरण और औद्योगीकरण की हमारी लालसा ने हमारे ऊपर ही संकट उत्पन्न कर दिया है। औद्योगिक विकास के कारण पृथ्वी के जीवन पर दबाव पड़ रहा है। जीवन खतरे में पड़ गया है। सौर प्रणाली में ढ़ेर सारे भौतिक और रासायनिक बदलाव आ रहे हैं। जीवनोपयोगी प्रणालियों में भी परिवर्तन आ रहा है। जीवन की न सिर्फ़ गुणवत्ता नष्ट हो रही है बल्कि जीवन की क्षमता भी प्रभावित हो रही है। यह गंभीर चिंता का विषय है। हम खुद को बचाने के उपाय ढ़ूंढ़ रहे हैं। अगर हम गांधी दर्शन को ठीक से अपनाएं तो बहुत सी समस्याओं का हल हमें उसमें ही मिल जाएगा।

हम आज़ाद हैं। भारत की आज़ादी की 64वीं वर्षगांठ हम कुछ ही दिनों बाद मनाने वाले हैं। हम विकासशील और विकसित देश बनने की होड़ में इतना असंतुलन पैदा कर चुके हैं कि सारा समाज ही अस्तव्यस्त हो गया है। अगर गौर से गांधीवादी अर्थशास्त्र देखें तो पाएंगे कि आम लोगों के जीवन के स्तर में यदि हम सुधार लाना चाहते हैं तो परंपरागत क्षेत्रों में हमें इसके हल तलाशने होंगे।

हमें आत्मनिरीक्षण करना होगा। इस उपभोक्तावादी संस्कृति से बाहर आना होगा। नई वैश्विक ज़रूरतों ने एक अलग किस्म की नीतियों का मार्ग प्रशस्त किया है और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मुनाफ़ा कमाने की होड़ से उत्पन्न आर्थिक गतिविधियों के कारण सारे संसार में पर्यावरण की अपूरणीय क्षति हो रही है, हो चुकी है। ग्रीन हाउस, ओज़ोन परत में छेद, आदि इसके कुपरिणाम हैं। हम जागरूक होने की जगह इस अंधी दौड़ का हिस्सा बनते जा रहे हैं, अगर तुरत न संभले तो इतनी देर हो चुकी होगी कि स्थिति संभाल के बाहर चली जाएगी और संकट के बादल हमारे सर पर तो मंडरा ही रहे हैं।

पर्यावरण हमारे लिए एक साझा संसाधन है। इस संसाधन का उचित इस्तेमाल हो, दोहन नहीं, यह सबकी जिम्मेदारी है। वर्षों पूर्व गांधी जी ने आने वाले संकट को भांप लिया था। तभी तो वे पर्यावरण के प्रति अपनी चिंता ज़ाहिर करते हुए कहते थे कि शहरी औद्योगिक सभ्यता का विकल्प ग्राम्यकरण है। उनका मानना था कि गांवों का समाज मनुष्य और प्रकृति के सामंजस्य पर आधारित होता है। मनुष्य और प्रकृति में सामंजस्य बिठाना यह चिंतन सिर्फ़ हमारे देश के लिए ही लागू नहीं होता, यह सारे संसार के लिए प्रासंगिक है।

इसका यह कदापि मतलब नहीं है कि गांधी जी आधुनिक मशीनों के ख़िलाफ़ थे। वे तो चाहते थे कि ऐसी तकनीक और ऐसी मशीनों का प्रयोग हो जो गांव वालों की पहुंच में हो। इसका मतलब यह था कि यदि अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल खुले आम होने लगा तो सिर्फ़ विकसित गांव ही उसका लाभ उठा सकते थे। महंगी तकनीक का बोझ केवल आर्थिक रूप से सक्षम गांव ही उठा सकते थे। वे तो शहर द्वारा गांवों के दोहन और शोषण का विरोध करते थे। वे गांवों के औद्योगिकरण के खिलाफ़ थे। उनका मानना था कि गांव और शहर के बीच सामंजस्य हो, संतुलन हो, सह-अस्तित्व हो। 28 जनवरी 1939 को हरिजन में उन्होंने लिखा था, “मेरी योजना के तहत शहर में उन चीज़ों के उत्पादन की अनुमति नहीं दी जाएगी जो गांवों में उत्पादित होती रही हों।”

गांधी जी का विश्वास अहिंसा की नीति में था। वे एक अहिंसक समाज की स्थापना के पक्षधर थे। एक ऐसा समाज जहां किसी भी व्यक्ति का शोषण न हो। इस तरह से स्वदेशी की भावना का भी विकास होता। यह भावना विदेशी चीज़ों के इस्तेमाल से लोगों को रोकती। ग्रामीण लोगों को रोज़गार के पर्याप्त अवसर मिलते। अंततोगत्वा वे न्यासीकरण के सिद्धांत को अमल में लाना चाहते थे। यानी भूमि का स्वामित्व सामूहिक होता। लोग मित्रवत रहते क्योंकि यह समाज अहिंसक समाज होता। ऐसा समाज आधुनिक अवधारणा और तौर तरीकों के रूप में नहीं था।

वे चाहते थे कि धरती के संसाधनों का समूची मानवता के लिए भगवान का उपहार मानकर मौज़ूदा और आने वाली पीढियों को ध्यान में रखकर इस्तेमाल किया जाना चाहिए। लोभ-लालच के कारण प्राकृतिक संतुलन बिगड़ जाता है। इससे जैविक ह्रास होता है। फलतः पारिस्थिकी तंत्र का संतुलन बिगड़ जाता है और यह तबाही का कारण बनता है। आज पर्यावरणबिद्‌ भी गांधी जी के इस विचार से सहमत हैं कि औद्योगिक समाज ही मुख्यरूप से जिम्मेदार है इस विनाश का। गांधी जी ने भौतिकवादी होने के वजाय नैतिक मूल्यों को तरजीह दी। वे साधारण और किफ़ायती जीवन के हिमायती थे।

वे औद्योगीकरण के खिलाफ़ नहीं थे। वे अमानवीय मशीन के खिलाफ़ थे। वे लघु उद्योगों को बढ़ावा दिए जाने के पक्ष में थे। वे अंधाधुंध शहरीकरण और उद्योगीकरण के खिलाफ़ थे। प्रकृति के बेहिसाब दोहन के खिलाफ़ थे। उन्होंने 1910 में कहा था, “प्रकृति अपने नियमों के तहत निरंतर कार्य करती हौ। लेकिन लोग नियमित रूप से उनका उल्लंघन करते हैं।”

उनका मानना था कि यदि हमें इस पृथ्वी को बचाकर रखना है तो विज्ञान और प्रद्योगिकी का सुनियोजित और संतुलित विकास होना चाहिए। प्राकृतिक संसाधनो का अनुशासित तरीके से इस्तेमाल होना चाहिए। ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों का व्यवहार किया जाना चाहिए।

इस तरह से हम देखते हैं कि गांधी जी के विचार समय से बहुत आगे के थे। पर्यावरण की चिंता उनकी प्राथमिकता थी। वे आश्रम में रहते थे। वहां एक खुला ग्रामीण परिवेश होता था। चाहे वह दक्षिण अफ़्रीका में फिनिक्स का हो, या साबरमती का या वर्धा का, यहां मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्य स्थापित था। गांधी जी प्रकृति के साथ प्रेम के बारे में केवल बोलते नहीं थे, बल्कि अपने आश्रमों के माध्यम से अनुभव भी करते थे। आज उनके विचार बहुत प्रासंगिक हो गए हैं। आज आर्थिक-सामाजिक, पर्यावरणीय मोर्चे पर गंभीरता से गांधीवादी दृष्टिकोण से पुनर्विचार बहुत ज़रूरी हो गया है। गांधी जी का सारा जीवन और उनके सारे काम पर्यावरण के संरक्षण का उदाहरण है। उनका पूरा जीवन ही संदेश है।