गांधी और गांधीवाद- 64
जानलेवा हमला
13 जनवरी 1897
भीड़ छंटने के बाद वहां पुलिस का नामो निशान नहीं था। तकरीबन साढ़े चार बजे गांधीजी एवं लाटन जहाज से उतरे और रुस्तमजी के घर की तरफ बढ़े। उनका रास्ता डरबन के बड़े-से-बड़े मुहल्ले से होकर जाता था। आकाश में कुछ थोड़े से बादल थे। पर सूरज उनके पीछे छूपा हुआ था। सेठ रुस्तम जी के घर जाने में क़रीब एक घंटे का समय लगता। कुछ ही दूर चलने पर कुछ गोरे लड़कों ने रास्ते में ही गांधीजी को पहचान लिया। गांधी जी जैसी पगड़ी पहनते थे वैसा पहननेवाला अकेला वे ही तो थे। इससे लड़कों को पहचानने में देरी नहीं हुई। वे चिल्लाने लगे, “गांधी, गांधी”, “इसको मारो”, “घेरो”।
वे उनकी तरफ़ बढ़े। काफ़ी लोग इकट्ठा हो गए। चिल्लाने का शोर बढ़ने लगा। भीड़ बापू और लाटन के पीछे-पीछे चलने लगी। प्रतिक्षण भीड़ बढ़ती और उत्तेजित होती जा रही थी। जब वे वेस्ट स्ट्रीट पहुंचे तो भीड़ ने हिंसक रूप धारण कर लिया। उन्हें भीड़ ने घेर लिया। पत्थर व सड़े अंडों की वर्षा की गई। रुस्तमजी का घर वहां से लगभग दो मील की दूरी पर था। भीड़ को बढ़ते देख लाटन ने सोचा पैदल जाने में खतरा लेना है। इसलिए उन्होंने रिक्शा बुलाया। जिस सवारी को आदमी खींचता हो उसमें बैठने से गांधी जी को सख़्त नफ़रत थी। पर उस दिन न चाहते हुए भी गांधी जी उसमें बैठने को तैयार हो गए। लेकिन गोरे लड़कों ने रिक्शेवाले को धमकाया कि तुमने इस आदमी को रिक्शा में बैठाया तो हम तुम्हें पीटेंगे और रिक्शावाला उन्हें छोड़कर भाग खड़ा हुआ।
वे पैदल ही आगे बढ़े। भीड़ बढ़ती ही जा रही थी। वेस्ट स्ट्रीट पर अभी कुछ ही दूरी उन्होंने तय की थी कि भीड़ ने लाटन को उनसे अलग कर दिया। अब तो गांधी भीड़ की दया पर निर्भर थे। भीड़ गांधी जी की ओर मुड़ी। गांधी जी को उन्होंने गालियां दी। उनपर पत्थरों और अंडों की वर्षा शुरु हो गई। किसी ने उनकी पगड़ी उछाल कर फेंक दिया। गुस्से से भरा एक आदमी उनपर लपका। लातों से उनकी पिटाई की। किसी ने उनका कुर्ता खींचा तो कोई उन्हें पीटने लगा, धक्के देने लगा। एक पत्थर आकर उनके सिर में लगा। सर से ख़ून बहने लगा। एक चिल्लाया, “तुम वही हो ना जिसने प्रेस को पत्र लिखा था?” उसने गांधी जी के गाल पर तमाचा जड़ा। उसके बाद उसने उनके पेट में लात से वार किया। फिर तो भीड़ द्वारा उनकी पीटाई-कुटाई चलती रही। गांधी जी को गश आ गया। चक्कर खाकर गिरते वक्त उन्होंने सामने के घर की रेलिंग को थामा।
उनके ऊपर फिर मार पड़ने लगी। उनकी मौत निश्चित थी। इतने में एक पुलिस अधीक्षक की पत्नी, श्रीमती एलेक्जेंडर, जो गांधीजी को पहचानती थी, वहां से गुज़र रही थी। वह बहादुर महिला गांधीजी एवं भीड़ के बीच दीवार की तरह खड़ी हो गई। धूप के न रहते भी उसने अपनी छतरी खोल ली ताकि पत्थरों से गांधी जी को और चोट न पहुंचे। अब स्थिति यह थी कि यदि बापू पर प्रहार करने हों तो मिसेज एलेक्ज़ेंडर को बचाकर ही किये जा सकते थे। क्रुद्ध गोरे गोरी महिला श्रीमती एलेक्जेंडर पर तो हाथ छोड़ नहीं सकते थे। इससे भीड़ कुछ नरम हुई।
इस बीच में एक भारतीय युवक जो यह सब घटना देख रहा था दौड़ा हुआ थाने में गया। जब थाने में यह खबर पहुंची तो पुलिस सुपरिण्टेण्डेण्ट एलेक्ज़ेण्डर ने एक टुकड़ी गांधी जी को घेर कर बचा लेने के लिए भेजी। पुलिस आई और गांधी जी को सुरक्षित लेकर पुलिस स्टेशन की ओर वेस्ट स्ट्रीट होकर आगे बढ़ी। भीड़ फिर से उत्तेजित हो रही थी और साथ-साथ ही आगे बढ़ रही थी। रास्ते के बीच में थाना पड़ता था। वहां पहुंचने पर उन्होंने देखा कि पुलिस सुपरिंटेंडेंट खड़े उनकी राह देख रहे थे। एलेक्ज़ेण्डर ने थाने में ही आश्रय लेने की सलाह दी। गांधी जी ने इन्कार कर दिया। उन्होंने कहा, “जब लोगों को अपनी भूल मालूम हो जायेगी, तो वे शान्त होकर चले जाएंगे। मुझे उनकी न्याय बुद्धि पर विश्वास है।”
फिर भी गांधी जी इस बात पर राज़ी हो गए कि पुलिस उन्हें रुस्तमजी के घर तक पहुंचा दे। पुलिस दस्ते ने उन्हें सही सलामत रुस्तमजी के घर तक छोड़ दिया। लेकिन शहर के लोगों को अब गांधी जी का ठिकाना मालूम हो गया था।
बा बड़ी बेचैनी से गांधी जी के लौटने की प्रतीक्षा कर रही थी। उन्होंने जब गांधी जी को घर में प्रवेश करते देखा तो उनकी जान में जान आई। जब उन्होंने ठीक से गांधी जी को देखा तो उनके तो होश उड़ गए। उन्हें जगह जगह चोट लगी थी। कपड़े कई जगह से फट गए थे। सर से खून बह रहा था। बाल बेतरतीब थे। सर पर पगड़ी भी नहीं थी। वह गांधी जी की तरफ़ दौड़ पड़ीं और पूछा, “यह सब क्या हुआ आपको?” गांधी जी ने कहा, “कुछ नहीं हुआ मुझे। थोड़ी सी खरोंच है और कुछ नहीं।” पर बा को संतोष नहीं हुआ। पानी में रुई भिंगा कर वे खुद ही उनका उपचार करने लगीं। गांधी जी की पीठ पर अन्दरूनी मार पड़ी थी। एक जगह से ख़ून निकल आया था। स्टीमर का डॉक्टर डाडीबुरजो जो एक पारसी था और वहां मौज़ूद था, ने गांधीजी की चोटों का इलाज किया।
भीड़ ने यहां भी उनका पीछा न छोड़ा। आठ बजते-बजते लोगों की संख्या काफ़ी बढ़ गई और घर को चारो तरफ़ से उन्होंने घेर रखा था। रात घिर आई थी। वे गांधीजी की मांग कर रहे थे। सफेद कपड़ों में तैनात की गई पुलिस इतनी कम संख्या में थी कि वह सिर्फ़ तमाशा ही देख सकती थी। परिस्थिति का ख्याल करके पुलिस सुपरिण्टेण्डेण्ट एलेक्ज़ेंडर वहां पहुंच गये थे। उन्हें जब यहां हो रहे उत्पात की खबर मिली थी तो वे अपनी ख़ुफ़िया पुलिस के साथ आकर चुपके से उस मजमें घुस गए थे। एक चौकी मंगाकर वे उसके ऊपर खड़े हो गये। लोगों से बातचीत के बहाने रुस्तमजी के मकान के दरवाज़े पर उन्होंने क़ब्ज़ा जमा लिया था, जिससे कोई उसको तोड़कर घुस न सके। डरबन का मेयर शहर से बाहर गया हुआ था इसलिए उन्होंने डिप्टी मेयर रामसे कोलिन्स से सहायता मांगी। रामसे कोलिन्स ने घटना स्थल पर पहुंच कर भीड़ को शांत करने की कोशिश की। हैरी स्पार्क्स जो इस उत्पात का मास्टर माइंड था ने भी लोगों को शांत होने के लिए अपील की।
रात घिरने लगी थी। कई लोग जा चुके थे, लेकिन जो बाक़ी थे वे अपनी ज़िद पर अड़े हुए थे। कुछ देर के बाद कुछ ऐसे लोग आकर भीड़ में शामिल हो गए जो उत्पाती थे और उन्हों ने शराब पी रखी थी। उत्तेजना फिर से भड़क उठी। पत्थर फेंके जाने लगे। स्थिति नियंत्रण से बाहर जा रही थी। भीड़ धमकी दे रही थी कि यदि गांधी जी को उन्हें नहीं दे दिया गया तो घर में आग लगा देंगे। गांधी जी और परिवार के सदस्य ऊपर की मंजिल पर थे। लोगों का शोर वहां तक पहुंच ही रहा था। बा डर से कांप रही थीं। इस शहर को क्या हो गया है? क्यों वे इनको जान से मार देने पर उतारू हैं? हरिलाल और मणिलाल का क्या होगा? बेचारा गोकुलदास तो मुफ़्त में ही इस फ़साद में फंस गया है।
एलेक्ज़ेण्डर भीड़ को धमकी से नहीं, बल्कि उनका मन बहला कर वश में कर रहे थे। अवसर के अनुरूप गीतों और भाषण से भीड़ को रिझा रहे थे। वे उस घर के सामने भीड़ से गाना गवा रहे थे,
“चलो, हम गांधी को फांसी पर लटका दें,
इमली के उस पेड़ पेड़ पर फांसी लटका दें।”
इसबीच एलेक्ज़ेंडर ने गांधी जी को संदेश भिजवाया, “यदि आप अपने मित्र का मकान, अपना परिवार और माल-असबाब बचाना चाहते हों, तो आपको इस घर से छिपे तौर पर निकल जाना चाहिए।”
“हम उसे जिन्दा जला देंगे”। भीड़ चीख रही थी। “इस सेव के पेड़ से उसे फांसी पर लटका देंगे”। गांधीजी के पास चोरी-छुपे भागने के अलावा कोई चारा नहीं था। भागने के प्रयास में वे अपनी चोटों को भूल गए थे। उन्होंने भारतीय सिपाही की वर्दी पहनी। सिर पर लाठी आदि की चोट से बचने के लिए पीतल की एक तश्तरी रखी और ऊपर से मद्रासी तर्ज़ का बड़ा साफ़ा बांधा। साथ में खुफ़िया पुलिस के दो जवान थे। उनमे से एक ने भारतीय व्यापारी की पोशाक पहनी और अपना चेहरा भारतीय की तरह रंग लिया। दूसरे ने वाहन चालक का वेश धरा। वे सभी बगल की गली से होकर पड़ोस की एक दुकान में पहुंचे। गोदाम में लगी हुई बोरों की थप्पियों को लांघते हुए दुकान के दरवाज़े से भीड़ में घुसकर आगे निकल गये। गली के नुक्कड़ पर गाड़ी खड़ी थी उसमें बैठाकर उन्हें उसी थाने में ले जाया गया जहां आश्रय लेने की सलाह एलेक्ज़ेण्डर ने दी थी।
गांधी जी ने अपनी आत्मकथा में जो लिखा है,
“कौन कह सकता है कि मैं अपने प्राणों के संकट से डरा या मित्र के जान-माल की जोखिम से अथवा अपने परिवार जी प्राणहानि से या तीनों से? कौन निश्चय-पूर्वक कह सकता है कि संकट के प्रत्यक्ष सामने आने पर छिपकर भाग निकलना उचित था? पर घटित घटनाओं के बारे में इस तरह की चर्चा ही व्यर्थ है। उनका उपयोग यही है कि जो हो चुका है, उसे समझ लें और उससे जितना सीखने को मिले, सीख लें। अमुक प्रसंग में अमुक मनुष्य क्या करेगा, यह निश्चय-पूर्वक कहा ही नहीं जा सकता। इसी तरह हम यह भी देख सकते हैं कि मनुष्य के बाहरी आचरण से उसके गुणों की जो परीक्षा की जाती है, वह अधूरी और अनुमान-मात्र होती है।”
जब एलेक्ज़ेंडर को यह खबर मिली कि गांधी जी सही-सलामत थाने पहुंच गए हैं तो उसने भीड़ से कहा, “आपका शिकार तो इस दुकान में से सही सलामत निकल भागा है।” भीड़ को विश्वास न हुआ। उनके प्रतिनिधि ने अन्दर जाकर कर तलाशी ली। उन्हें निराशा हुई। धीरे-धीरे भीड़ बिखर गई। तब तक रात के ग्यारह बज चुके थे।
गांधी जी के लिए यह एक बहुत बड़ी संकट की घड़ी थी। साथ ही साथ कस्तूरबा की भी यह एक ज़बरदस्त कसौटी थी। उन्हें मार तो नहीं पड़ी थी, लेकिन एक अनजान देश में पैर रखते ही पति के प्राण संकट में पड़ गये। उन्हें बहुत घबराहट हो रही थी।
ऑक्सफ़ोर्ड के प्रोफ़ेसर एडवर्ड टामसन ने लिखा है, - “गांधी जी को चाहिए था कि जीवन भर हर एक गोरी शक्ल से नफ़रत करते।”
लेकिन गांधी जी ने डरबन के उन गोरों को क्षमा कर दिया, जो उन्हें ज़िन्दा जला डालने के लिए जमा हुए थे। उनको भी क्षमा कर दिया जिन्होंने उन्हें घायल किया और मारा था। जब आक्रमणकारियों पर मुकदमा चलाने की बात चली तो गांधी जी ने कहा, “मुझे किसी पर मुकदमा नहीं चलाना है। उन्हें सज़ा दिलाने से मेरा क्या लाभ होगा। मैं तो उन्हें दोषी ही नहीं मानता हूं। उन्हें तो भड़काया गया था। दोष तो बड़ों का है। वे सही रास्ता दिखा सकते थे। जब वस्तु-स्थिति प्रकट होगी और लोगों को पता चलेगा, तो वे खुद पछताएंगे।”
उस दिन के बारे में गांधी जी लिखते हैं, “जब भी मैं उस दिन को याद करता हूं तो मुझे लगता है कि ईश्वर मुझे सत्याग्रह का अभ्यास करवा रहा था!”