मंगलवार, 30 अगस्त 2011

मध्यकालीन भारत - धार्मिक सहनशीलता का काल (एक)

मध्यकालीन भारत - धार्मिक सहनशीलता का काल (एक)

हमारे देश में हिन्दू समाज में प्राचीन काल से ही वेदों पर आधारित परंपरा मान्य रही है। मध्यकाल तक आते-आते वर्णाश्रम व्यवस्था जटिल हो चुकी थी। जातियों में विभाजित समाज में ब्राह्मणों का वर्चस्व था। समाज में तरह-तरह के भेद-भाव विद्यमान थे। मनुष्यता स्त्री-पुरुष, ऊंच-नीच एवं धर्मों के आधार पर बंटी हुई थी। छुआछूत के कठोर नियम थे। ईश्‍वर की उपासना एवं मोक्ष प्राप्ति में भी भेद-भाव था। वैदिक कर्मकांड तथा रूढ़िवादिता से स्थिति बड़ी जटिल थी। समय-समय पर इस तरह की व्यवस्था के प्रति प्रतिक्रियाएं जन्म लेती रहीं। ये प्रतिक्रियाएं रूढ़िवादी समाज में परिवर्तन के लिए अल्प प्रयास ही साबित हुईं। किन्तु चौदहवीं तथा पंद्रहवीं शताब्दी में आस्था एवं भक्ति के मध्य से व्यापक आंदोलन की एक ऐसी बलवती धारा फूटी जिसने वर्ण-व्यवस्था पर आधारित समाज, कट्टरता और रूढ़िवादिता पर आधारित धर्मान्धता को चुनौती दी।

यह सुव्यवस्थित, योजनाबद्ध और क्रमिक रूप से चलने वाला आंदोलन नहीं था, बल्कि समय-समय पर संत, विचारक और समाज सुधारक भक्ति-मार्गी विचारधारा के द्वारा सुधारों का प्रयास करते रहे और यह एक आंदोलन का रूप लेता गया।

यह सुव्यवस्थित, योजनाबद्ध और क्रमिक रूप से चलने वाला आंदोलन नहीं था, बल्कि समय-समय पर संत, विचारक और समाज सुधारक भक्ति-मार्गी विचारधारा के द्वारा सुधारों का प्रयास करते रहे और यह एक आंदोलन का रूप लेता गया। इस आंदोलन से संतों का एक नया वर्ग आगे आया। जातिप्रथा, अस्पृश्यता और धार्मिक कर्मकांड का विरोध कर सामाजिक और धार्मिक प्रथाओं में सुधार उनका लक्ष्य था। इनमें से अधिकांश संत समाज की छोटी जातियों से आए थे। इस आंदोलन के संतों ने अनेक जातियों एवं सम्प्रदायों में विभक्त समाज, अनेक कुसंस्कारों से पीड़ित देश, सैंकड़ों देवताओं और आडंबरों एवं कट्टरता में उलझे धर्म, के भेद-भाव की दीवार ढ़हाने का एक सार्थक प्रयास किया। संतों ने समाज में लोगों के बीच वर्तमान आपसी वैमनस्य को मिटाने और सामाजिक वर्ग विभेद को समाप्त कर सबको समान स्तर पर लाने का प्रयास किया।

ईश्‍वर की प्राप्ति के लिए ज्ञान और तप का मार्ग छोड़ कर भक्ति का मार्ग अपनाना इस आंदोलन का विशेष गुण था। यद्यपि भक्ति-मार्ग के विभिन्न संतों के विचारों में पूर्ण समानता नहीं थी, तथापि अधिकांश एकेश्‍वरवाद में विश्‍वास रखते थे। उनका मानना था कि ईश्‍वर एक है, उसके नाम अलग-अलग हैं। वे मानते थे कि यदि पूर्ण श्रद्धा से ईश्‍वर की भक्ति की जाए तो मोक्ष की प्राप्ति होगी। अत: मनुष्य को ईश्‍वर के चरणों में पूर्ण समर्पण कर देना चाहिए। काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ को जीत कर ईश्‍वर की भक्ति में रम जाना चाहिए। उनका मानना था कि ईश्‍वर मंदिरों में नहीं, बल्कि लोगों के हृदय में बसते हैं। अगर सच्ची भक्ति हो तो जीवात्मा का परमात्मा से मिलन संभव है। परन्तु इसके लिए सांसारिक इच्छाएँ एवं प्रलोभनों का त्याग करना होगा। इसके अलावा भक्त को एक गुरु की आवश्यकता पड़ेगी जो कि भक्ति के मार्ग पर उसे दिशा-निर्देश देगा। गुरु के बिना ईश्‍वर की प्राप्ति संभव नहीं हो सकती क्योंकि वही अत्मा को सुषुप्तावस्था से जागृत कर सकता है।

संतों ने किसी नये धर्म की स्थापना के बजाए समाज में प्रचलित धार्मिक-सामाजिक कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया साथ ही इन आंदोलनकारी संतों ने अन्य पंथों या धर्मों के प्रति आदर का भाव रखते हुए विश्‍व-प्रेम और विश्‍व-बंधुत्व का संदेश दिया। इन संतों ने दोहा, गीत आदि छांदसिक कविताओं के माध्यम से सरल और स्थानीय भाषाओं में अपने-अपने मतों का प्रचार किया। फलत: भक्ति आंदोलन का काफी स्वागत हुआ। दिल्ली सल्तनत की स्थापना के बाद भारत में हिन्दू धर्म और इस्लाम धर्म के बीच मतों, धारणाओं एवं आस्थाओं का आदान-प्रदान हुआ। परिणामस्वरूप कुछ ऐसे पंथ और अनेक ऐसे संत आए जो हिन्दू और इस्लाम धर्म के बीच के भेद-भाव को मिटाना चाहते थे।

मध्यकाल में धार्मिक सुधार की भावना का विचारधारा के रूप में एक आंदोलन का रूप लेना कोई नई बात नहीं थी। एक धारणा के रूप में भक्ति मार्ग काफी पहले से प्रचलित था। भक्ति आंदोलन का आरंभ सातवीं शताब्दी में दक्षिण भारत में हो चुका था। हिन्दू धर्म में मोक्ष प्राप्ति के तीन मार्ग बताए गये थे : ज्ञान मार्ग, कर्म मार्ग एवं भक्ति मार्ग। मध्यकालीन भारत में ज्ञान मार्ग पर शंकराचार्य ने विशेष बल दिया था। उन्होंने अद्वैतवाद के सिद्धान्त को प्रतिपादित किया। उनके अनुसार संसार में एक ही सर्वोच्च सत्ता है अन्य सारी घटनाएं उसी सत्ता का प्रतिबिम्ब हैं। हमारा अस्तित्व एक मिथ्या है। ब्रह्म सत्य है, जगत् मिथ्या है। आत्मा-परमात्मा ही है, अलग नहीं। सांसारिक माया के कारण मनुष्य आत्मा-परमात्मा के एकत्व को न पहचानने की भूल करता है। जीवात्मा का परमात्मा के मिलन से ही मोक्ष संभव है। इसकी प्राप्ति ज्ञान से संभव है।

इस विचारधारा के साथ कठिनाई यह थी कि यह सामान्य लोगों की समझ से बाहर थी। इसके अलावा जातिप्रथा एवं रूढ़िवादिता के कारण पढ़ाई-लिखाई एवं अक्षरों का ज्ञान उस समय में समाज के ऊंचे तबके के लोगों तक ही सीमित था। अत: जनसाधरण इस दार्शनिक मार्ग को न तो अधिक समझ ही पाया और न ही यह आम जनता का लोकप्रिय समर्थन ही पा सका।     ….. ….. (ज़ारी …)

रविवार, 28 अगस्त 2011

जानलेवा हमला

गांधी और गांधीवाद- 64

जानलेवा हमला

13 जनवरी 1897

gandhi (10)भीड़ छंटने के बाद वहां पुलिस का नामो निशान नहीं था। तकरीबन साढ़े चार बजे गांधीजी एवं लाटन जहाज से उतरे और रुस्तमजी के घर की तरफ बढ़े। उनका रास्ता डरबन के बड़े-से-बड़े मुहल्ले से होकर जाता था। आकाश में कुछ थोड़े से बादल थे। पर सूरज उनके पीछे छूपा हुआ था। सेठ रुस्तम जी के घर जाने में क़रीब एक घंटे का समय लगता। कुछ ही दूर चलने पर कुछ गोरे लड़कों ने रास्ते में ही गांधीजी को पहचान लिया। गांधी जी जैसी पगड़ी पहनते थे वैसा पहननेवाला अकेला वे ही तो थे। इससे लड़कों को पहचानने में देरी नहीं हुई। वे चिल्लाने लगे, “गांधी, गांधी”, “इसको मारो”, “घेरो”।

वे उनकी तरफ़ बढ़े। काफ़ी लोग इकट्ठा हो गए। चिल्लाने का शोर बढ़ने लगा। भीड़ बापू और लाटन के पीछे-पीछे चलने लगी। प्रतिक्षण भीड़ बढ़ती और उत्तेजित होती जा रही थी। जब वे वेस्ट स्ट्रीट पहुंचे तो भीड़ ने हिंसक रूप धारण कर लिया। उन्हें भीड़ ने घेर लिया। पत्थर व सड़े अंडों की वर्षा की गई। रुस्तमजी का घर वहां से लगभग दो मील की दूरी पर था। भीड़ को बढ़ते देख लाटन ने सोचा पैदल जाने में खतरा लेना है। इसलिए उन्होंने रिक्शा बुलाया। जिस सवारी को आदमी खींचता हो उसमें बैठने से गांधी जी को सख़्त नफ़रत थी। पर उस दिन न चाहते हुए भी गांधी जी उसमें बैठने को तैयार हो गए। लेकिन गोरे लड़कों ने रिक्शेवाले को धमकाया कि तुमने इस आदमी को रिक्शा में बैठाया तो हम तुम्हें पीटेंगे और रिक्शावाला उन्हें छोड़कर भाग खड़ा हुआ।

वे पैदल ही आगे बढ़े। भीड़ बढ़ती ही जा रही थी। वेस्ट स्ट्रीट पर अभी कुछ ही दूरी उन्होंने तय की थी कि भीड़ ने लाटन को उनसे अलग कर दिया। अब तो गांधी भीड़ की दया पर निर्भर थे। भीड़ गांधी जी की ओर मुड़ी। गांधी जी को उन्होंने गालियां दी। उनपर पत्थरों और अंडों की वर्षा शुरु हो गई। किसी ने उनकी पगड़ी उछाल कर फेंक दिया। गुस्से से भरा एक आदमी उनपर लपका। लातों से उनकी पिटाई की। किसी ने उनका कुर्ता खींचा तो कोई उन्हें पीटने लगा, धक्के देने लगा। एक पत्थर आकर उनके सिर में लगा। सर से ख़ून बहने लगा। एक चिल्लाया, “तुम वही हो ना जिसने प्रेस को पत्र लिखा था?” उसने गांधी जी के गाल पर तमाचा जड़ा। उसके बाद उसने उनके पेट में लात से वार किया। फिर तो भीड़ द्वारा उनकी पीटाई-कुटाई चलती रही। गांधी जी को गश आ गया। चक्कर खाकर गिरते वक्त उन्होंने सामने के घर की रेलिंग को थामा।

उनके ऊपर फिर मार पड़ने लगी। उनकी मौत निश्चित थी। इतने में एक पुलिस अधीक्षक की पत्नी, श्रीमती एलेक्जेंडर, जो गांधीजी को पहचानती थी, वहां से गुज़र रही थी। वह बहादुर महिला गांधीजी एवं भीड़ के बीच दीवार की तरह खड़ी हो गई। धूप के न रहते भी उसने अपनी छतरी खोल ली ताकि पत्थरों से गांधी जी को और चोट न पहुंचे। अब स्थिति यह थी कि यदि बापू पर प्रहार करने हों तो मिसेज एलेक्ज़ेंडर को बचाकर ही किये जा सकते थे। क्रुद्ध गोरे गोरी महिला श्रीमती एलेक्जेंडर पर तो हाथ छोड़ नहीं सकते थे। इससे भीड़ कुछ नरम हुई।

इस बीच में एक भारतीय युवक जो यह सब घटना देख रहा था दौड़ा हुआ थाने में गया। जब थाने में यह खबर पहुंची तो पुलिस सुपरिण्टेण्डेण्ट एलेक्ज़ेण्डर ने एक टुकड़ी गांधी जी को घेर कर बचा लेने के लिए भेजी। पुलिस आई और गांधी जी को सुरक्षित लेकर पुलिस स्टेशन की ओर वेस्ट स्ट्रीट होकर आगे बढ़ी। भीड़ फिर से उत्तेजित हो रही थी और साथ-साथ ही आगे बढ़ रही थी। रास्ते के बीच में थाना पड़ता था। वहां पहुंचने पर उन्होंने देखा कि पुलिस सुपरिंटेंडेंट खड़े उनकी राह देख रहे थे। एलेक्ज़ेण्डर ने थाने में ही आश्रय लेने की सलाह दी। गांधी जी ने इन्कार कर दिया। उन्होंने कहा, “जब लोगों को अपनी भूल मालूम हो जायेगी, तो वे शान्त होकर चले जाएंगे। मुझे उनकी न्याय बुद्धि पर विश्वास है।”

फिर भी गांधी जी इस बात पर राज़ी हो गए कि पुलिस उन्हें रुस्तमजी के घर तक पहुंचा दे। पुलिस दस्ते ने उन्हें सही सलामत रुस्तमजी के घर तक छोड़ दिया। लेकिन शहर के लोगों को अब गांधी जी का ठिकाना मालूम हो गया था।

बा बड़ी बेचैनी से गांधी जी के लौटने की प्रतीक्षा कर रही थी। उन्होंने जब गांधी जी को घर में प्रवेश करते देखा तो उनकी जान में जान आई। जब उन्होंने ठीक से गांधी जी को देखा तो उनके तो होश उड़ गए। उन्हें जगह जगह चोट लगी थी। कपड़े कई जगह से फट गए थे। सर से खून बह रहा था। बाल बेतरतीब थे। सर पर पगड़ी भी नहीं थी। वह गांधी जी की तरफ़ दौड़ पड़ीं और पूछा, “यह सब क्या हुआ आपको?” गांधी जी ने कहा, “कुछ नहीं हुआ मुझे। थोड़ी सी खरोंच है और कुछ नहीं।” पर बा को संतोष नहीं हुआ। पानी में रुई भिंगा कर वे खुद ही उनका उपचार करने लगीं। गांधी जी की पीठ पर अन्दरूनी मार पड़ी थी। एक जगह से ख़ून निकल आया था। स्टीमर का डॉक्टर डाडीबुरजो जो एक पारसी था और वहां मौज़ूद था, ने गांधीजी की चोटों का इलाज किया।

भीड़ ने यहां भी उनका पीछा न छोड़ा। आठ बजते-बजते लोगों की संख्या काफ़ी बढ़ गई और घर को चारो तरफ़ से उन्होंने घेर रखा था। रात घिर आई थी। वे गांधीजी की मांग कर रहे थे। सफेद कपड़ों में तैनात की गई पुलिस इतनी कम संख्या में थी कि वह सिर्फ़ तमाशा ही देख सकती थी। परिस्थिति का ख्याल करके पुलिस सुपरिण्टेण्डेण्ट एलेक्ज़ेंडर वहां पहुंच गये थे। उन्हें जब यहां हो रहे उत्पात की खबर मिली थी तो वे अपनी ख़ुफ़िया पुलिस के साथ आकर चुपके से उस मजमें घुस गए थे। एक चौकी मंगाकर वे उसके ऊपर खड़े हो गये। लोगों से बातचीत के बहाने रुस्तमजी के मकान के दरवाज़े पर उन्होंने क़ब्ज़ा जमा लिया था, जिससे कोई उसको तोड़कर घुस न सके। डरबन का मेयर शहर से बाहर गया हुआ था इसलिए उन्होंने डिप्टी मेयर रामसे कोलिन्स से सहायता मांगी। रामसे कोलिन्स ने घटना स्थल पर पहुंच कर भीड़ को शांत करने की कोशिश की। हैरी स्पार्क्स जो इस उत्पात का मास्टर माइंड था ने भी लोगों को शांत होने के लिए अपील की।

रात घिरने लगी थी। कई लोग जा चुके थे, लेकिन जो बाक़ी थे वे अपनी ज़िद पर अड़े हुए थे। कुछ देर के बाद कुछ ऐसे लोग आकर भीड़ में शामिल हो गए जो उत्पाती थे और उन्हों ने शराब पी रखी थी। उत्तेजना फिर से भड़क उठी। पत्थर फेंके जाने लगे। स्थिति नियंत्रण से बाहर जा रही थी। भीड़ धमकी दे रही थी कि यदि गांधी जी को उन्हें नहीं दे दिया गया तो घर में आग लगा देंगे। गांधी जी और परिवार के सदस्य ऊपर की मंजिल पर थे। लोगों का शोर वहां तक पहुंच ही रहा था। बा डर से कांप रही थीं। इस शहर को क्या हो गया है? क्यों वे इनको जान से मार देने पर उतारू हैं? हरिलाल और मणिलाल का क्या होगा? बेचारा गोकुलदास तो मुफ़्त में ही इस फ़साद में फंस गया है।

एलेक्ज़ेण्डर भीड़ को धमकी से नहीं, बल्कि उनका मन बहला कर वश में कर रहे थे। अवसर के अनुरूप गीतों और भाषण से भीड़ को रिझा रहे थे। वे उस घर के सामने भीड़ से गाना गवा रहे थे,

“चलो, हम गांधी को फांसी पर लटका दें,

इमली के उस पेड़ पेड़ पर फांसी लटका दें।”

इसबीच एलेक्ज़ेंडर ने गांधी जी को संदेश भिजवाया, “यदि आप अपने मित्र का मकान, अपना परिवार और माल-असबाब बचाना चाहते हों, तो आपको इस घर से छिपे तौर पर निकल जाना चाहिए।”

हम उसे जिन्दा जला देंगे। भीड़ चीख रही थी। इस सेव के पेड़ से उसे फांसी पर लटका देंगे। गांधीजी के पास चोरी-छुपे भागने के अलावा कोई चारा नहीं था। भागने के प्रयास में वे अपनी चोटों को भूल गए थे। उन्होंने भारतीय सिपाही की वर्दी पहनी। सिर पर लाठी आदि की चोट से बचने के लिए पीतल की एक तश्तरी रखी और ऊपर से मद्रासी तर्ज़ का बड़ा साफ़ा बांधा। साथ में खुफ़िया पुलिस के दो जवान थे। उनमे से एक ने भारतीय व्यापारी की पोशाक पहनी और अपना चेहरा भारतीय की तरह रंग लिया। दूसरे ने वाहन चालक का वेश धरा। वे सभी बगल की गली से होकर पड़ोस की एक दुकान में पहुंचे। गोदाम में लगी हुई बोरों की थप्पियों को लांघते हुए दुकान के दरवाज़े से भीड़ में घुसकर आगे निकल गये। गली के नुक्कड़ पर गाड़ी खड़ी थी उसमें बैठाकर उन्हें उसी थाने में ले जाया गया जहां आश्रय लेने की सलाह एलेक्ज़ेण्डर ने दी थी।

गांधी जी ने अपनी आत्मकथा में जो लिखा है,

“कौन कह सकता है कि मैं अपने प्राणों के संकट से डरा या मित्र के जान-माल की जोखिम से अथवा अपने परिवार जी प्राणहानि से या तीनों से? कौन निश्चय-पूर्वक कह सकता है कि संकट के प्रत्यक्ष सामने आने पर छिपकर भाग निकलना उचित था? पर घटित घटनाओं के बारे में इस तरह की चर्चा ही व्यर्थ है। उनका उपयोग यही है कि जो हो चुका है, उसे समझ लें और उससे जितना सीखने को मिले, सीख लें। अमुक प्रसंग में अमुक मनुष्य क्या करेगा, यह निश्चय-पूर्वक कहा ही नहीं जा सकता। इसी तरह हम यह भी देख सकते हैं कि मनुष्य के बाहरी आचरण से उसके गुणों की जो परीक्षा की जाती है, वह अधूरी और अनुमान-मात्र होती है।”

जब एलेक्ज़ेंडर को यह खबर मिली कि गांधी जी सही-सलामत थाने पहुंच गए हैं तो उसने भीड़ से कहा, “आपका शिकार तो इस दुकान में से सही सलामत निकल भागा है।” भीड़ को विश्वास न हुआ। उनके प्रतिनिधि ने अन्दर जाकर कर तलाशी ली। उन्हें निराशा हुई। धीरे-धीरे भीड़ बिखर गई। तब तक रात के ग्यारह बज चुके थे।

गांधी जी के लिए यह एक बहुत बड़ी संकट की घड़ी थी। साथ ही साथ कस्तूरबा की भी यह एक ज़बरदस्त कसौटी थी। उन्हें मार तो नहीं पड़ी थी, लेकिन एक अनजान देश में पैर रखते ही पति के प्राण संकट में पड़ गये। उन्हें बहुत घबराहट हो रही थी।

ऑक्सफ़ोर्ड के प्रोफ़ेसर एडवर्ड टामसन ने लिखा है, - “गांधी जी को चाहिए था कि जीवन भर हर एक गोरी शक्ल से नफ़रत करते।”

लेकिन गांधी जी ने डरबन के उन गोरों को क्षमा कर दिया, जो उन्हें ज़िन्दा जला डालने के लिए जमा हुए थे। उनको भी क्षमा कर दिया जिन्होंने उन्हें घायल किया और मारा था। जब आक्रमणकारियों पर मुकदमा चलाने की बात चली तो गांधी जी ने कहा, “मुझे किसी पर मुकदमा नहीं चलाना है। उन्हें सज़ा दिलाने से मेरा क्या लाभ होगा। मैं तो उन्हें दोषी ही नहीं मानता हूं। उन्हें तो भड़काया गया था। दोष तो बड़ों का है। वे सही रास्ता दिखा सकते थे। जब वस्तु-स्थिति प्रकट होगी और लोगों को पता चलेगा, तो वे खुद पछताएंगे।”

उस दिन के बारे में गांधी जी लिखते हैं, “जब भी मैं उस दिन को याद करता हूं तो मुझे लगता है कि ईश्वर मुझे सत्याग्रह का अभ्यास करवा रहा था!”

शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

अमरलता


अमरलता
--- --- मनोज कुमार


हे अमरलता !
    हे अमरबेल !

दिखने में कोमल  पर क्रूर,
चूसे  पादप  को   भरपूर,
टहनी-टहनी,   डाली-डाली,
छिछल रही है तू मतवाली,
री ! परजीवी
    खेल  रही    तू,
शोषण का
    व्यापक यह खेल।
हे अमरलता !
    हे अमरबेल !

ना जड़ है, ना पत्र पुहुप,
वृष्टि शीत या ग्रीष्म धूप,
फैली शाखाएँ  चहूं ओर,
दिखे न तेरा  ओर-छोर,
उसका ही
    करती विनाश,
करती जिससे
    तू  हेल-मेल।
हे अमरलता !
    हे अमरबेल !

ना औषधि  है,  न  कोई खाद्य,
तू प्रकृति विनाशनि  शक्ति आद्य,
शोषक का जग में क्या उपयोग?
बस भोग,  निरन्तर भोग, भोग,
बढ़ते हैं  
    जग मे वही आज,
जो देते
औरों को धकेल।
हे अमरलता !
    हे अमरबेल !

***      ***

बुधवार, 24 अगस्त 2011

डरबन लौटने पर विरोध-प्रदर्शन

गांधी और गांधीवाद-63

डरबन लौटने पर विरोध-प्रदर्शन

13 जनवरी 1897

DSCN1374गांधी जी अपने परिवार के साथ भारत से नेटाल कि लिए स्टीमर से चले थे। उधर डरबन में एक अलग किस्म की लड़ाई चल रही थी। उसका केन्द्र बिन्दू गांधी जी थे। उनपर दो आरोप थे .. उन्होंने भारत में नेटाल-वासी गोरों की अनुचित निन्दा की थी, वे नेटाल को भारतीयों से भर देना चाहते थे।

गांधी जी निर्दोष थे। उन्होंने भारत में कोई ऐसी नई बात नहीं कही थी जो उन्होंने इसके पहले नेटाल में न कही हो। और जो कुछ भी उन्होंने कहा था पक्के सबूत के बल पर कहा था। जब स्टीमर दिसम्बर 1896 में डरबन के बन्दर पर पहुंचा तो कई दिनों तक बन्दरगाह पर जहाज लगा रहा, उन्हें जहाज से उतरने की इज़ाज़त नहीं मिली। धमकी दी गई कि जान खतरे में है। आखिर 13 जनवरी 1897 को उतरने का आदेश मिला।

जैसे ही यह खबर फैली कि दोनों जहाज, कुर्लैण्ड और नादरी, बन्दरगाह पर आ रहे हैं, उपद्रवी गलियों में उतर आए और लोगों से बन्दरगाह पहुंचने की अपील करने लगे। तुरत ही दुकानों के शटर गिरा दिए गए ताकि सारे काम करने वाले लोग प्रदर्शनकारियों का साथ दे सकें। कुछ ही समय में एलेक्ज़ेण्ड्रा स्क्वायर पर तीन हजार से ज़्यादा की भीड़ इकट्ठी हो गई जिसमे तीन सौ से अधिक काले लोग भी थे, और उनके हाथ में लाठी आदि थे। वे लोग किसी भी हाल में भारतीय यात्रियों को जहाज से न उतरने देने पर उतारू थे, चाहे बल प्रयोग करना क्यों न पड़े।

इस बीच हैरी एस्कॉम्ब बन्दर क्षेत्र पहुंच गया। एक नाव के द्वारा वह कुर्लैण्ड की ओर रवाना हुआ। उसका एक मात्र उद्देश्य था जहाज के कप्तान और यात्रियों को समझाना कि उन्हें चिन्ता करने की ज़रूरत नहीं है। वे इस सरकार के अंदर उसी तरह सुरक्षित हैं जैसे वे अपने गांव में होते। नादरी के यात्रियों को भी उसने इसी तरह का आश्वासन दिया और जहाज-घाट की तरफ़ लौट आया। तब तक पांच हजार से अधिक की भीड़ जुट चुकी थी। जैसे ही कुर्लैण्ड जहाज-घाट की तरफ़ बढ़ने लगा, सरा माहौल तनाव से भर गया। गांधी जी और कुछ अन्य यात्री डेक पर से यह नज़ारा देख रहे थे।

एटॉर्नी जनरल हैरी एस्कॉम्ब को प्रदर्शन कमेटी वाले अपने साथ एलेक्ज़ैण्डर स्क्वायर ले गए। भीड़ क्रुद्ध थी। एक बजे के आस पास हैरी एस्कॉम्ब ने भाषण देना शुरु किया। भीड़ के उत्तेजित स्वरूप को देखकर वह घबड़ाया हुआ था। इसके लिए वह भी कम उत्तरदायी नहीं था। लेकिन अब यह उसके लिए आवश्यक हो गया था कि उन्हें नियंत्रण में रखे। श्रोताओं को समझाने के लिए उसने अपनी पूरी कुशलता और योग्यता का परिचय दिया। उसने कहा, “डरबन में यूरोपियों ने खूब एकता और हिम्मत दिखाई। आप लोगों से जितना हो सकता था उतना आपने किया, सरकार ने भी आपकी सहायता की। इन लोगों को 23 दिनों तक जहाज से उतरने नहीं दिया। अब आपने बल प्रयोग करके एक भी भारतीय मुसाफ़िर को उतरने से रोका तो अपना काम आप अपने हाथों से बिगाड़ देंगे। नटाल सरकार की स्थिति भी कठिन हो जाएगी। ऐसा करके भी आप इन लोगों को रोकने में सफल नहीं होंगे। इसलिए आप मेरी सलाह मानकर अपने-अपने घर चले जाएं। मैं आप लोगों को वचन देता हूं कि सरकार आपकी भावनाओं का पूरा सम्मान करते हुए एक ऐसा विधेयक लाएगी जो आपकी इच्छा के अनुरूप होगा। साथ ही यह अपील भी करता हूं कि आप कोई ऐसी हरकत न करें जो इंगलैण्ड की महारानी की भावनाओं को आहत करे। आप लोग उसी प्रकार सरकार पर भरोसा रखें जिस तरह से सरकार ने आप पर भरोसा जताया है।”

भीड़ की प्रतिक्रिया मिश्रित थी। कुछ सहमत थे, कुछ असहमत। प्रदर्शन समिति के नेता, जो अब तक आग को भड़काने में लगे थे, अब उनका उसे बुझाने का कोई इरादा नहीं दिख रहा था। उनमें से एक ने भाषण देते हुए कहा कि अब तक सरकार आंखें बन्द कर सारा खेल देख देख रही थी। उनके प्रयासों ने सरकार की आंखें खोल दी है। अब यह उम्मीद की जा सकती है कि सरकार स्थिति को सही तरीक़े से संभालेगी। इन सब का इच्छित परिणाम हुआ। भीड़ छंटी। दुकानें फिर से खुल गईं। लेकिन जो कट्टर उग्रवादी थे, उन्होंने खुद को ठगा हुआ महसूस किया।

13 जनवरी 1897 को जहाज घाट पर लगा। शहर शांत हो चुका था। किसी ने इस बात पर तवज़्ज़ो नहीं दिया। भारतीय यात्री छोटे-छोटे ग्रुप में उतर कर जा रहे थे। दोपहर हो चुकी थी। कस्तूरबाई और बच्चे नये कपड़े पहनकर सुबह से ही तैयार बैठे थे। उनका सामान बांधा जा चुका था। वे जहाज से उतरने को उतावले थी, पर गांधी जी कहीं दिख नहीं रहे थे। कुछ देर पहले एक आदमी आया था और वह उन्हें बुलाकर जहाज के कैप्टेन की केबिन की तरफ़ ले गया था। कस्तूरबाई इस न खत्म होने वाली प्रतीक्षा से ऊब चुकी थी। अन्य यात्री उतर रहे थे। यह सब देख बच्चे अधीर हो रहे थे। पांच वर्ष के मणिलाल को झपकियां आ रही थीं। आठ साल के हरिलाल और दस साल के गोकुलदास की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। हरिलाल हर पांच मिनट के बाद मां से पूछते, “और कितनी देर हमें यहां रुकना होगा?” हर बार मां कस्तूर उनकी पीठ प्यार से थपकाते हुए कहती, “मुझे नहीं मालूम।”

इधर हैरी एस्कॉम्ब ने जहाज के कैप्टेन मिल्ने को खबर भिजवाई,

``बैरिस्टर गांधी और उनके परिवार को शाम को जहाज से उतारा जाए क्योंकि गोरे बहुत जोश में हैं और गांधी जी की जान को खतरा है। शाम को पोर्ट सुपरिण्टेण्डेण्ट टेटम आएंगे और उन्हें अपने साथ ले जाएंगे।”

यह कोई हुक्म नहीं था, बल्कि कप्तान के लिए गांधी जी को उतरने न देने की सलाह थी। गांधी जी के सर पर जो खतरा मंडरा रहा था उसकी चेतावनी थी। कप्तान गांधी जी को जबरदस्ती तो रोक नहीं सकता था। लेकिन गांधी जी ने सोचा कि उन्हें यह सलाह मान लेनी चाहिए। गांधी जी इस प्रस्ताव पर सहमत हो गए।

केबिन में लौट कर गांधी जी कस्तूर और बच्चों को सूचना दी कि उन्हें शाम तक जहाज पर ही रहना होगा। कस्तूर और बच्चों के लिए तो यह वज्रपात था। उन्होंने समझाया कि हालाकि भीड़ छंट चुकी है, शहर शांत हो चुका है पर मेरे एक मित्र एस्कॉम्ब ने सलाह दी है कि हमें अंधेरा घिर आने के बाद ही जाना चाहिए। कस्तूर बाई की तो सांस ही थम गई। “कैसे लोग रहते हैं यहां?” यही ख्याल उनके मन में आया।

अभी आधा घंटा भी नहीं हुआ था कि एफ़.ए. लाटन, सेठ अब्दुल्ला के क़ानूनी सलाहकार आ गए। उन्होंने गांधी जी से पूछा, “आप अब तक क्यों नहीं उतरे?” गांधी जी ने उन्हें एस्कॉम्ब के संदेश की बात कही।

लाटन ने कप्तान से कहा कि स्टीमर एजेण्ट के वकील के नाते वे गांधी जी को अपनी जिम्मेवारी पर ले जाएंगे। फिर लाटन ने गांधी जी से कहा, “अगर आपको ज़िन्दगी का डर न हो, तो मैं चाहता हूं कि श्रीमती गांधी और बच्चे गाड़ी में पारसी रुस्तम सेठ के घर जायें और आप और मैं सरेआम रास्ते से पैदल चलें। आप अंधेरा होने पर चुपचाप शहर में दाखिल हों, यह मुझे तो ज़रा भी नहीं जंचता। मैं तो मानता हूं कि आपका बाल भी बांका नहीं होगा। अब तो सब शान्त है, गोरे सब तीतर-बीतर हो गये हैं। और मेरी राय है कि कुछ भी क्यों न हो, आपको छिप कर तो हरगिज नहीं जाना चाहिए।”

कैप्टेन मिल्ने को यह जंच नहीं रहा था और गांधी जी खुद भी सरकार की सलाह को नकारना नहीं चाह रहे थे। पर लाटन ने कहा कि अंधेरा हो जाने पर शहर में चोरी-छुपे जाना कोई अच्छा काम नहीं है। उससे लोगों के मन में व्यर्थ का विवाद और शंका जन्म ले सकता है। और यह भी तो हो सकता है कि रात के अंधेरे में भेजने में उनकी कोई चाल हो। विचार-विमर्श के बाद गांधी जी लाटन की सलाह पर सहमत हुए।

यह सुन कर तो कस्तूरबाई के मन में विचारों का तूफान उठ खड़ा हुआ। बच्चे तो खुशी से उछल पड़े थे। गांधी जी ने सामान उठाया और बा और बच्चों को गाड़ी पर चढ़ने को कहा। बा ने पूछा, “और आप?” गांधी जी ने कहा, “हम पैदल आ रहे हैं।” यह सुनकर बा ने कहा, “मैं भी आपके साथ ही जाऊंगी।” गांधी जी ने बताया, “रुस्तमजी का घर यहां से दो मील से भी अधिक की दूरी पर है। तुम उतनी दूर नहीं चल पाओगी और बच्चों को अकेले भेजना भी उचित नहीं है।” बा के मन में तरह-तरह की शंकाएं घिरने लगीं। कुछ गड़बड़ ज़रूर है। अगर ये संकट में हैं तो मुझे भी उनके साथ ही होना चाहिए। किन्तु अधिक तर्क वो कर न सकीं और पति जो आदेश दे रहे थे उसी का पालन करना उन्होंने उचित समझा। गर्भवती कस्तूरबा एवं बच्चे गाड़ी में बैठकर गांधीजी के पारसी मित्र रुस्तमजी के घर सही सलामत पहुंच गए।

सोमवार, 22 अगस्त 2011

मुग़ल काल में सत्ता का संघर्ष-2

मुग़ल काल में सत्ता का संघर्ष-2
मुग़ल काल में सत्ता का संघर्ष-1 (लिंक)

इतिहास भी तो अपने आप को दुहराता है। मुगलों के बीच उत्तराधिकार का मामला, अधिकांशतः तलवारों के द्वारा ही निर्धारित हुआ था। शाहजहां ने भी तो खुद इस रास्‍ते गद्दी पाई थी। फिर उसके बेटे कहां चूकने वाले थे। युद्ध एवं रक्‍तपात अवश्‍यंभावी था। पर इस बार इसमें एक विशेषता थी। पहले के उत्तराधिकार का संघर्ष सम्राट की मृत्‍यु के पश्‍चात हुआ था। इस बार यह तब होने जा रहा था जबकि शाहजहां अभी जीवित था।

इस युद्ध में न सिर्फ उसके चार बेटे ही लड़े बल्कि उसकी बेटियां ने भी परोक्ष रूप से हिस्‍सा लिया। जहांआरा ने दारा शिकोह की सहायता की तो रोशन आरा ने औरंगज़ेब की मदद की तथा गौहन आरा ने मुराद बख्‍श का पक्ष लिया।

औरंगज़ेब ने मुराद को अपने पक्ष में मिलाकर आपस में राज्‍य का बंटवारा कर लेने का समझौता किया तथा दोनों की मिलीजुली सेना आगरा की तरफ़ कूच कर कई। उधर शाह शुजा भी बनारस तक आ पहुंचा था। तब शाहजहां एवं दारा के पास उनको युद्ध में पराजित करने के अलावा कोई चारा नहीं था। उन्‍होंने अपनी सेना भेजने का निश्‍चय किया।

दारा के पुत्र सुलेमान शिकोह के नेतृत्‍व में एक सेना शाह सुजा को पराजित करने के लिए भेजी गई और दूसरी सेना राजा जसवंतसिंह के नेतृत्‍व में मालवा की तरफ़ औरंगज़े‍ब एवं मुराद के ख़िलाफ़ युद्ध के लिए भेजी गई। सुलेमान शिकोह की सेना के हाथों शाह शुजा की पराजय हुई और वह बंगाल भाग गया परंतु अप्रैल, 1658 में राजा जसवंत सिंह के नेतृत्ववाली शाही सेना को औरंगज़ेब एवं मुराद के विरूद्ध धरमत के युद्ध में मुंह की खानी पड़ी। वास्‍तव में जसवंतसिंह को यह जानकारी नहीं थी कि उसे औरंगज़ेब एवं मुराद की मिलीजुली सेना का सामना करना पड़ेगा। वह तो सिर्फ मुराद की सेना की उम्मीद कर रहा था। फलतः उचित संसाधनों के अभाव में उन दोनों के संगठित सैन्‍य बल का मुकाबला वह नहीं कर पाया। यह विजय मुराद एवं औरंगज़ेब की हौसला आफ़जाई के लिए काफी थी । अब वे आगरा की तरफ बढ़े।

परिस्थिति की गंभीरता को भांपकर दारा ने भी मैदान ए जंग में कूदने का निर्णय लिया। उसने एक विशाल सेना इकट्ठी की एवं अपने बाग़ी भाइयों का सामना करने चल दिया। जून, 1658 में दोनों पक्षों की सामूगढ़ में भिड़ंत हुई। औरंगज़ेब एवं मुराद की सेना एवं उनकी युद्ध-कुशलता के आगे दारा टिक न सका। उसकी बुरी तरह से हार हुई। निराश-हताश दारा शाहजहां से भी मिलने का साहस न जुटा सका और अपने परिवार के साथ दिल्‍ली की तरफ भाग गया और वहां से लाहौर चला गया। इस प्रकार औरंगज़ेब और मुराद की स्थिति काफी मजबूत हो गई। सामूगढ़ की लड़ाई ने दारा का भविष्‍य निर्धारित कर दिया। औरंगज़ेब ने आगरे के क़िले पर आधिपत्‍य जमाया तथा अपने पिता शाहजहां को बंदी बनाकर क़ैदखाने में डाल दिया, जहां शाहजहां अपनी मृत्‍यु पर्यन्‍त जनवरी 31,1666 ई. तक क़ैद में ही रहा। बाप बेटे के बीच पत्रों का आदान-प्रदान तो होता था पर दोनों में कभी आमना-सामना नहीं हुआ।

औरंगज़ेब काफी महत्त्वाकांक्षी था। उसने अपनी और गद्दी के बीच आनेवाली हर बाधा को दूर करने का निश्‍चय किया। आगरा के किले पर फ़तह के बाद औरंगज़ेब ने दारा पर खास ध्‍यान केंद्रित नहीं किया। अब उसके सामने मुख्‍य बाधा थी – मुराद एवं उसका सैन्‍य बल। मुराद स्‍वतंत्र रूप से रहने लगा था। अतः औरंगज़ेब को उसकी तरफ़ से ख़तरे का एहसास था। उसी तरह मुराद भी उसकी तरफ़ शंका की दृष्टि रखता था। औरंगज़ेब ने अपने रास्‍ते से मुराद को हटाने का निर्णय लिया। उसने मुराद को कई बार दावत पर बुलाया, पर हर बार मुराद नकार जाता था। एक बार शिकार से लौटते हुए मथुरा के निकट एक रात की दावत के औरंगज़ेब के न्यौते को उसने अपने एक अधिकारी की सलाह पर स्‍वीकार कर लिया। उस अधिकारी को औरंगज़ेब ने धन देकर अपनी तरफ मिला लिया था। मुराद को खासी तगड़ी दावत खाने को मिली। तत्पश्‍चात एक सुंदर दासी को मुराद की मालिश करने को भेजा गया। काफी चालाकी से उसने मुराद को गहरी नींद सुला दिया एवं उसके सभी शस्‍त्र उसके पास से हटा दिए। इस प्रकार निहत्‍था मुराद आसानी से बंदी बना लिया गया।

औरंगज़ेब मथुरा से दिल्‍ली आ गया। बिना किसी प्रतिरोध के उसने दिल्‍ली पर अधिपत्‍य जमाया और राज्‍यभिषेक कर खुद को सम्राट घोषित कर दिया। दारा सामूगढ़ की हार के बाद भटकता रहा था। बाद में उसे भी पकड़ कर बंदी बना लिया गया तथा मृत्‍यु दंड दे दिया गया। शुजा भी बनारस की लड़ाई के बाद बंगाल लौटा। वहां भी औरंगज़ेब के द्वारा तंग किए जाने पर आसाम से होते हुए बर्मा गया और वहीं उसकी मृत्‍यु हो गई।

सन 1658 तक औरंगज़ेब के सभी विरोधी खत्‍म हो गये। गद्दी के सभी दावेदार समाप्‍त हो गए। उसकी स्थिति काफी मजबूत हो गई। उसने शाहजहां को बंदी बना लिया था और स्वयं को शासक घोषित कर चुका था।

गद्दी के उत्तराधिकार के इस संघर्ष का परिणाम बहुत बुरा रहा। ढेर सारे लोग मारे गए। इसके कारण साम्राज्‍य को आर्थिक एवं सैनिक, दोनों की भारी क्षति पहुंची। एक वर्ष तक मुग़ल साम्राज्‍य इसमें उलझा रहा। इससे साम्राज्‍य विरोधियों का मनोबल काफी बढ़ा। मराठा अपनी शक्ति को बढ़ाने लगे। उत्तर पश्चिमी सीमा पर अफगानियों ने विद्रोह किया। इस बीच दक्षिण भारत से भी मुगल साम्राज्‍य का ध्‍यान हटा रहा।

दूसरी ओर उत्तराधिकार के इस संघर्ष में इसकी सफलता अभूतपूर्व थी। इसकी सफलता ने यह सिद्ध कर दिया कि भविष्‍य में सत्ता पर अधिकार करने के लिए उत्तराधिकार का फैसला तलवार द्वारा ही संभव है।

इस तरह उत्तराधिकार का यह संघर्ष, मुग़ल साम्राज्‍य के लिए तात्‍कालिक और दूरगामी, दोनों ही तरह से, हानिकारक सिद्ध हुआ । औरंगज़ेब का 50 वर्ष का शासनकाल शांति और सुव्‍यवस्‍था की जगह समस्‍याओं का काल रहा। औरंगज़ेब के अंत तक साम्राज्‍य की एकाग्रता एवं संगठन समाप्‍त हो चुका था और महान मुग़ल साम्राज्‍य का पतन शुरू हो गया था। और उस पतन के बीज उत्तराधिकार के संघर्ष में ही छिपे थे। यह संघर्ष धीरे धीरे साम्राज्‍य को खोखला करता गया और एक दिन वह बीज विशाल वृक्ष बन कर उसके पतन की राह प्रशस्‍त कर गया।

रविवार, 21 अगस्त 2011

मुग़ल काल में सत्ता का संघर्ष-1

मुग़ल काल में सत्ता का संघर्ष-1

(पक्षियों का प्रवास विषय लेख समाप्त हुआ। अब कुछेक इतिहास विषय के लेख प्रस्तुत करता हूं। उसके बाद पुनः पक्षियों के संसार की चर्चा करेंगे। आज का यह लेख १२-१३ साल पहले कादम्बिनी में छपा था।)

मुगल शासन व्‍यवस्‍था में उतराधिकार का कोई नियम नहीं था। फलतः सुलतान के मरते ही शहजादे गद्दी के लिए आपस में संघर्ष किया करते थे। मुगल साम्राज्‍य के इतिहास में गद्दी के दावे के लिए अनेक गृह युद्ध हुए हैं जिन्‍होंने मुगलों की शक्ति और प्रतिष्‍ठा को भारी क्षति पहुंचाई।

 

बाबर और हुमायूं ने भारत में मुग़ल राजवंश की स्‍थापना तो कर दी थी परंतु वे इसे स्‍थायित्‍व नहीं दे पाये। अक़बर ने इस काम को पूरा किया। उसने राज्‍य के विस्‍तार के अलावा इसके सुदृढ़ीकरण की भी व्‍यवस्‍था की पर उसके जीवनकाल में ही जहांगीर ने गद्दी पर अधिकार करने के लिए विद्रोह कर दिया था, अक़बर ने उसे समझा-बुझाकर शांत किया था।

 

जहांगीर के शासनकाल में शहज़ादों के विद्रोह ने बड़ा विकृत रूप धारण कर लिया। उसके शासनकाल में पहला विद्रोह शहज़ादा खुसरो का हुआ था परंतु जहांगीर ने अपनी क़ाबिलियत से उसे दबा दिया। खुसरो की सहायता करने के अपराध में जहांगीर ने सिखों के गुरू अर्जुन देव जी को फांसी की सजा दी। इससे मुग़ल सिख संबंध अच्‍छे नहीं रहे। खुसरो के विद्रोह से ज़्यादा महत्‍वपूर्ण खुर्रम का विद्रोह था। नूरजहां अपने दामाद शहरयार को गद्दी दिलवाना चाहती थी। इसलिए शहज़ादा खुर्रम ने विद्रोह कर दिया। हालांकि उसने बाद में जहांगीर से माफ़ी मांग ली पर उसके इस विद्रोह के कारण मुग़लों को कंधार खोना पड़ा।

 

शाहजहां ने अपने भाइयों व भतीजों का वध करके गद्दी हासिल की थी। बाप के चरण चिह्नों पर चलते हुए औरंगज़ेब ने भी यही इतिहास दुहराया। खुद औरंगज़ेब के शासनकाल में शहज़ादों के विद्रोह ने सम्राट को परेशान किये रखा। ऐसे विनाशकारी संघर्षों में धन-जन की भारी हानि हुई और साम्राज्‍य को गहरा धक्‍का लगा। इन सभी गद्दी के दावों के लिए हुए युद्धों में से जो शाहजहां के बेटों के बीच लड़ा गया, वह कई अर्थों में विशिष्‍ट था। पहली बात तो यह कि शासक के जीवित रहते हुए उत्तराधिकार का जो विद्रोह हुआ, वह शाहजहां के समय में जितने लंबे समय तक चला और जितने विस्‍तृत क्षेत्र में यह संघर्ष हुआ, ऐसा इसके पूर्व कभी नहीं हुआ। इस संघर्ष में एक विद्रोही राजकुमार विजयी होता है और स्‍वयं सत्ता संभाल लेता है। जब मुग़लकाल में उत्तराधिकार के लिए संघर्ष की बात होती है तो हमारा ध्‍यान बरबस यहीं आ टिकता है।

 

यह लड़ाई 1657-58 ई. के बीच हुई थी। हालांकि औरंगजेब के चार बेटे थे, पर यह लडाई मुख्‍य रूप से शाहजहां के पुत्र दारा और औरंगजेब के बीच लड़ी गई थी। दारा सबसे बड़ा था और हमेशा शाहजहां के साथ रहता था तथा उत्तरी भारत का उत्तराधिकारी भी था। वह उदार और दयालु स्‍वाभाव का था। शाहजहां उससे बहुत प्‍यार करता था। दूसरा बेटा शाह शुजा बंगाल का शासक था लेकिन वह अकर्मण्‍य एवं विलासी था। तीसरा औंरगजेब दक्षिण का शासक था। वह सैनिक गुणों एवं कूटनीतिज्ञता में माहिर था। चौथा मुराद गुजरात एवं मालवा का शासक था। उसमें भी सैनिक एवं प्रशासनिक योग्‍यता का अभाव था।

चूंकि चारों बेटे चार अलग-अलग क्षेत्र के शासक थे तो ऐसा प्रतीत होता है कि शायद शाहजहां अपने बेटों के बीच राज्‍य का बंटवारा करना चाहता था। पर वास्‍तविकता क्‍या थी, कहा नहीं जा सकता। स्थिति ऐसी थी कि उत्‍तराधिकार की समस्‍या पर कभी भी लड़ाई हो सकती थी क्‍योंकि चारों के पास सैनिक थे और चारों गद्दी के लिए लालायित थे। ऐसी स्थिति में 16 सितंबर, 1657 ई. में शाहजहां जब सख्‍त बीमार पड़ा और उसके बचने की उम्‍मीद न के बराबर थी, तब चारों बेटों-दारा, शुजा, औरंगजेब और मुराद के बीच उत्तराधिकार का संघर्ष शुरू हो गया क्‍योंकि वे अपनी अपनी पकड़ मजबूत करना चाहते थे। सिंहासन प्राप्‍त करने की महत्‍वकांक्षा वाले उसके सभी पुत्र अपनी अपनी योजनाएं बनाने लगे। इसकी शुरूआत शुजा ने की। उसने बंगाल में स्‍वयं को सम्राट घोषित कर दिल्‍ली की ओर प्रस्‍थान किया। फिर क्‍या था – मुराद भी खुद को शासक घोषित कर दिल्‍ली की ओर चल पड़ा। औरंगजेब ने खुद को शासक तो घोषित नहीं किया, पर दिल्‍ली की ओर इस घोषणा के साथ चल पड़ा कि वह अपने बीमार पिता को देखने जा रहा है।

इधर शाहजहां की बीमारी के समय दारा उसके साथ दिल्‍ली में ही था। उसने शाहजहां की बीमारी की खबर को रोकने के प्रयास किए। साथ ही पिता को लेकर दिल्‍ली से आगरा आ गया। पर परिणाम उलटा हुआ। लोगों में यह अफवाह फैल गई कि शाहजहां वास्‍तव में मर गया है और दारा इस खबर को छिपाकर खुद को बादशाह घोषित करना चाहता है। इस बीच दारा की सेवा-सुश्रुषा में शाहजहां थोड़ा ठीक हुआ। उसे जब उत्तराधिकारी के संघर्ष की जानकारी लगी, तो उसने अपने बेटों को पत्र लिखा कि अपने-अपने क्षेत्र वापस लौट जाएं। वे स्‍वस्‍थ हैं। इस पर किसी ने भी ध्‍यान नहीं दिया। बल्कि औरंगजेब ने कहा कि यह पत्र जाली है। इधर शाहजहां ने संघर्ष टालने के इरादे से दारा को अपना उत्तराधिकारी मनोनीत कर दिया। पर इसका प्रभाव दारा के अन्‍य भाइयों पर विपरीत ही पड़ा और वे गद्दी पर अधिकार प्राप्‍त करने के लिए व्‍याकुल हो उठे।

इतिहास भी तो अपने आप को दुहराता है। मुगलों के बीच उत्तराधिकार का मामला, अधिकांशतः तलवारों के द्वारा ही निर्धारित हुआ था। शाहजहां ने भी तो खुद इस रास्‍ते गद्दी पाई थी। फिर उसके बेटे कहां चूकने वाले थे। युद्ध एवं रक्‍तपात अवश्‍यंभावी था। पर इस बार इसमें एक विशेषता थी। पहले के उत्तराधिकार का संघर्ष सम्राट की मृत्‍यु के पश्‍चात हुआ था। इस बार यह तब होने जा रहा था जबकि शाहजहां अभी जीवित था।

…. ज़ारी है …

(कल अगला और समापन अंक)

मंगलवार, 16 अगस्त 2011

जहाज को बन्दर पर जाने की अनुमति दे दी गई

गांधी और गांधीवाद-62

जहाज को बन्दर पर जाने की अनुमति दे दी गईGandhi (12)

दिसम्बर, 1896 – जनवरी, 1897

क्रिसमस के दूसरे दिन क्वारेंटाइन की अवधि और बढ़ा दी गई। अधिसूचित समय में जहाज के यात्रियों द्वारा सारे क़ायदे-क़ानून का उचित अनुपालन किया गया। इधर सरकार कोई नई तरकीब खोजने की जुगत में लगी रही कि क्वारेंटाइन की अवधि को बढ़ाया जा सके। अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सरकार ने डॉक्टर सदरलैंण्ड को निकाल दिया और उनकी जगह डॉ. बर्ट्वेल की नियुक्ति की गई। उसने यात्रियों और क्रू के सदस्यों के निरीक्षण के उपरांत घोषणा की कि जहाज में अभी और फ़्यूमिगेशन की ज़रूरत है और क्वारेंटाइन की अवधि को एक पखवाड़ा और बढ़ा दिया गया। पानी और अन्य सामग्रियों की कमी से यात्री परेशान थे ही, अब कपड़ों और कम्बलों को जला देने से उनकी परेशानियां और बढ़ गईं। ठंढ़ और नमी के कारण अन्य बीमारियों से ग्रसित होने का खतरा तो संभावित था ही। जहाज के बाहरी बन्दर पर लंगर डालने के दस दिनों के बाद 28 दिसम्बर को जहाज पर पानी भेजा गया। सरकारी आदेशों के तहत जिन वस्त्रों को नष्ट कर दिया गया था उसकी जगह नए वस्त्र की आपूर्ति के लिए जहाज के मुख्य अधिकारी ने सरकार से मांग की। पर सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। यात्रियों की आवश्यकता की पूर्ति के लिए स्थानीय भारतीयों ने सहायता कोष संगठित किया।

कोलोनियल पैट्रियोटिक यूनिन और योरोपियन प्रोटेक्शन असोसिएशन ने मिलकर विरोध प्रदर्शन शुरु किया। जबकि उग्र दल के लोग सीधी कार्रवाई चाहते थे। नटाल वोलन्टीयर फ़ोर्स के कैप्टेन हैरी, जो एक कसाई था, ने उनको नेतृत्व प्रदान करना शुरु कर दिया। डरबन के टाउन हॉल में 4 जनवरी 1897 को एक सभा का आयोजन किया गया। इसमे लगभग 2000 लोगों ने भाग लिया। इनका एक मात्र उद्देश्य था कि बन्दरगाह के क्षेत्र में प्रदर्शन किया जाए और अगर अवश्यकता हुई तो भारतीयों को उतरने से बलपूर्वक रोका जाए। आक्रोश चरम पर था। भड़काऊ भाषण दिए गए। एक प्रदर्शन समिति भी गठित की गई।

सरकार के ऊपर दवाब बढ़ रहा था कि वो अपने खर्चे पर दोनों जहाज के यात्रियों को वापस हिन्दुस्तान भेज दे। सरकार को आन्दोलनकारियों से सहानुभूति भी थी। वह इस विषय पर विधेयक भी पेश करने जा रही थी। सरकार ने उपद्रवकारियों से संयम बरतने को कहा। प्रेस ने भी हिंसा का सहारा न लेने की अपील की। कोलोनियल पैट्रियोटिक यूनिन ने भी संवैधानिक तरीक़े से ही विरोध जताने का आह्वान किया। इस सब के बावज़ूद अधिकांश लोगों का मानना था कि सरकार के हाथ में यह अधिकार नहीं है कि जहाज के यात्रियों को वह वापस भेज सके। फिर भी प्रदर्शन समिति के नेता कैप्टेन स्पार्क्स ने सरकार को इस आशय का अनुरोध भेजा कि वह यात्रियों को लोगों की भावना से अवगत कराते हुए यह निर्देश दे कि वे वापस लौट जाएं। प्रशासन दुविधा में था। क्वरेंटाइन की अवधि ने समस्या के समाधान के लिए काफ़ी अवसर प्रदान कर ही दिया था। किंतु सरकार खुद भारत विरोधी शक्तियों के आगे इस कदर झुकी हुई थी कि वह विवेक का प्रयोग न कर पा रही थी। प्रधानमंत्री सर जॉन रॉबिन्सन स्वास्थ्य लाभ के लिए इंगलैंड चले गए थे। एटॉर्नी जनरल हैरी एस्कॉम्ब ने कार्यकारी प्रधानमंत्री का पद संभाला हुआ था। वे गांधी जी के पड़ोसी थे। आंदोलनकारियों से वह सख़्ती से निपट नहीं पा रहे थे। एफ़.ए. लाटन जब उनसे यात्रियों के अधिवक्ता के तौर पर मिले तो वह उन्हें भी यात्रियों की उपद्रवकारियों से सुरक्षा का कोई आश्वासन न दे सके।

प्रदर्शन समिति ने अनगिनत सभाएं की। दादा अब्दुल्ला के नाम धमकियां भेजी जाती रहीं। लालच भी दिया जाता रहा। अगर दादा अब्दुल्ला दोनों स्टीमरों को वापस ले जायें तो गोरे नुकसान की भरपाई कर देंगे। दादा अब्दुल्ला किसी धमकी से डरने वालों में से नहीं थे। उन्होंने यह ठान ली थी कि चाहे कितना भी नुकसान उठाना पड़े वे स्टीमरों को बन्दर पर लगायेंगे और यात्रियों को उतारेंगे। जब तक हमारा सारा कार-बार चौपट न हो जाए, हम बिल्कुल बरबाद न हो जाएं, हम लड़ते रहेंगे।

इधर स्पार्क्स के नेतृत्व में आग उगलने वाले भाषण दिए गए। अफ़वाहों को हवा दी गई। कहा गया कि जहाज से भर कर लोग लाये गए हैं कि ताकि डरबन के शहर-बाज़ार पर क़ब्ज़ा जमा लिया जाए। गांधी अपने साथ प्रिटिंग प्रेस लाया है, ताकि वह यहां अपना प्रचार अभियान तेज़ कर सके। उनके साथ पचास छपाई के काम करने वाले लोग भी आए हैं। इन भारतीयों के लिए हिन्द महासागर सही जगह है। जहाज को उसी में डुबा दिया जाना चाहिए। एजेण्ट को तो धमकी मिल ही रही थी, अब तो गांधी के नाम भी धमकियां आने लगीं। “अगर तुम वापस नहीं गये, तो तुम्हें समुद्र में डुबो दिया जायगा।” उपद्रवकारियों ने जहर उगलते शब्दों से तरह-तरह के अफ़वाह फैलाए। उन्हें यह लगता था कि सरकार उनके साथ है। फिर भी उन्हें लगता था कि अगर सरकार असफल हुई तो वे खुद कार्रवाई करेंगे। किंतु सही बात तो यह थी कि जहाज पर कोई छपाई की मशीन नहीं थी और जितने भी लोग थे, उनमें से कोई पचास-साठ लोग ही ऐसे थे जो व्यवसाय की तलाश में वहां गए थे, बाक़ी तो महिलाएं-बच्चे थे।

भारतीय नटाल कान्ग्रेस के नेता चिंतित तो थे, लेकिन उन्होंने शांति रखी हुई थी। मेसर्स नाज़र ब्रदर्स, लंदन के मनसुखलाल हीरालाल नाज़र इन दिनों गांधी जी से मिलने डरबन आए हुए थे। वे होशियार और बहादुर आदमी थे। भारतीय समुदाय को उनका पथप्रदर्शन और सलाह बड़ा काम आया।

7 जनवरी 1897 को क्रुद्ध गोरों की एक सभा हुई, जिसमें यह निर्णय लिया गया कि वे किसी भी तरह भारतीय यत्रियों को जहाज से उतरने नहीं देंगे। भारतीय समुदाय और भारतीय नटाल कांग्रेस के लिए अब हाथ पर हाथ धरे रख कर बैठने का समय नहीं था।

दादा अब्दुल्ला और उनके सहयोगी शहर में हो रही सारी गतिविधियों की जानकारी गांधी जी को देते रहे। अब तो स्पष्ट ही हो चुका था कि क्वारेंटाइन तो मात्र एक बहाना था यात्रियों को उतरने देने से रोकने के लिए। यह बात भी स्पष्ट थी कि सरकार आन्दोलनकारियों को ख़ुश रखना चाहती है। दादा अब्दुल्ला जहाज के यात्रियों के लगातार सम्पर्क में थे। उनके मनोरंजन के साधन भी उन्होंने जहाज पर मुहैया कराए। उनके लिए खेलों का प्रबंध किया गया। जहाज पर गांधी जी तो थे ही। वे यात्रियों में घूमे-फिरे। उन्हें धीरज बंधाते रहे। यात्री भी शांत रहे और एक क्षण के लिए भी न हिम्मत हारी और न ही हौसला खोया। ज्यों-ज्यों समय बीतता गया उन्होंने तय किया कि अपने अधिकार के लिए वे अनशन करेंगे।

क्वारेंटाइन की बढ़ाई गई अवधि भी अब समाप्त होने को आ रही थी। प्रदर्शन समिति अब और भी सक्रिय हो रहे थे। इसके नेता यह उम्मीद लगाए बैठे थे कि डरबन के व्यापारी अपनी-अपनी दुकानें बन्द कर अपने मज़दूरों को उनके प्रदर्शन में साथ देने को कहेंगे। यह भी कहा गया कि जो इसमें सहयोग नहीं करेंगे उनका बहिष्कार किया जाएगा। 11 जनवरी 1897 को दोनों जहाजों को संगरोध मुक्ति (Pratique) दे दिया गया। इस जानकारी के मिलते ही कैप्टैन स्पार्क्स ने अपने हस्ताक्षर में जहाज के मुख्य अधिकारी को एक धमकी भरा नोटिस भेजा। कप्तान ने इसे पढ़कर सुनाया, “नेटाल के गोरे बहुत उत्तेजित हैं और उनके मिजाज़ की हालत जानते हुए भी अगर यात्री उतरने की कोशिश करेंगे तो बंदरगाह के ऊपर कमेटी के आदमी खड़े रहेंगे और जहाज से उतरते ही हजारों प्रदर्शनकारियों के विरोध का कोपभाजन बनना होगा।”

संकट के समाधान के लिए प्रदर्शन समिति का एक प्रतिनिधि मंडल दोनों जहाज के कप्तान से जाकर मिला ताकि बातचीत के द्वारा कोई समझौता हो जाए। लगभग चौबीस घंटों तक समिति इस तरह से व्यवहार करती रही जैसे वही नाटाल की सरकार के प्रतिनिधि हों। यात्रियों को और गांधी जी को अल्टिमेटम दिए गए। कहा गया कि सबकी जान खतरे में है। किन्तु समिति के सदस्यों को इस बात का जायज़ा हो गया था कि यात्री हर हाल में डरबन जाने के अपने अधिकार का प्रयोग करने पर उतारू हैं।

दूसरी तरफ़ यूरोपिय समुदाय का पारा उफ़ान पर था। समाचार पत्र दो-दो घंटे पर बुलेटिन प्रसारित कर उनके उबाल को थमने नहीं दे रहे थे। भारतीयों की तरफ़ से कुरलैंड के कप्तान मिलने को यह सूचित कर दिया गया कि प्रदर्शन समिति का कोई क़नूनी हक़ नहीं बनता कि वो कोई समझौता करे। दोनों जहाज के एजेण्ट ने उपनिवेश सचिव, मारित्ज़बर्ग को प्रतिवेदन दिया। उन्हें इस बात की याद दिलाई गई कि भारतीय यात्रियों के जान-माल की रक्षा करना उनका दायित्व बनता है। यात्रियों के सुरक्षित रूप से उतरने में उन्होंने अपनी हर संभव सहायाता देने का भी वचन दिया। किंतु सरकार का व्यवहार बहुत ही टालमटोल वाला रहा। ऐसा लग रहा था कि जब स्थिति बेक़ाबू हो जाएगी तो सरकार यात्रियों से वापस जाने को कहेगी। सर जॉन रॉबिन्सन इंगलैंड से लौट आए थे। उन्होंने प्रधानमंत्री के रूप में अपना कार्यभार संभाल लिया था। यात्रियों का कड़ा रुख देखकर हैरी एस्कॉम्ब को भी लग रहा था क़ानूनी तौर पर तो वह उन्हें डरबन में उतरने से नहीं रोक सकता था। कई और ऐसी बातें हुईं जो गांधी जी के हक़ में गईं। कई यूरोपीय यात्री 11 जनवरी 1897 को तट पर आए तो उन्होंने गांधी जी के प्रति काफ़ी आदर और सम्मान का भाव प्रदर्शन किया। यह भी स्पष्ट हुआ कि जहाजों के सारे यात्री डरबन ही नहीं जाने वाले थे, उनमें से कई ऐसे भी थे जिन्हें आगे ट्रान्सवाल जाना था।

अगले दो दिनों तक प्रदर्शन समिति सरकार पर दवाब बनाए रखी पर कुछ हासिल करने में क़ामयाब नहीं हुई। नेटाल की सरकार हारी। अनुचित प्रतिबंध और अधिक दिन चल न सकी। बंबई से रवाना होने के 44 दिनों के बाद कुर्लैंड और नादरी अब किनारे जाने वाले थे। रोक हटा ली गई और 13 जनवरी 1897 की सुबह पोर्ट अधीक्षक ने जानकारी दी कि जहाज को बन्दर पर जाने की अनुमति दे दी गई है। बाहरी बन्दर को छोड़ने के पहले ही नटाल एडवर्टाज़र का एक रिपोर्टर जहाज पर चढ़ गया। वह गांधीजी का साक्षात्कार लेना चाह रहा था। उसने हरी पुस्तिका, भारत में गांधी जी के भाषण और जहाज के यात्रियों आदि पर तरह-तरह के प्रश्न किए और गांधी जी ने उसके हर प्रश्न का बिल्कुल खुलासा करते हुए जवाब दिया। लोगों के मन में इन दोनों जहाजों और उसके यात्रियों को लेकर जितनी भी शंकाएं थीं उसका समाधान गांधीजी ने किया। लेकिन यह रिपोर्ट तो अखबारों में दूसरे दिन सुबह आना था।

होनी टलने वाली कहां थी!

नोट : पिछले पोस्टों के लिंक और संदर्भ के लिए इस लिंक पर देखें।

सोमवार, 15 अगस्त 2011

क्या यही है स्वतंत्रता!


स्वाधीनता दिवस पर …

क्या यही है स्वतंत्रता!

स्वतंत्रता की पैंसठवीं जयंती,
मना  रहे  हम    भारतवासी।
सैंतालिस के मध्य निशा की,
क्या हमको है याद ज़रा सी।

ख़ुशियां थी ख़ूब मनाई सबने,
दुख का मौसम दूर किया था।
कुचला  था    एक  सर्प,   दर्प
अंगरेज़ों  का  चूर  किया था।
हो  तो  गए  स्वतंत्र,  हमारी
क्या   मिट   सकी   उदासी।
सैंतालिस के मध्य निशा की,
क्या हमको है याद ज़रा सी।

कैसे - कैसे  बलिदान  किए,
धन्य - धन्य     बलिदानी।
काल - कोठरी अन्धकूप के,
पी    गए        कालापानी।
कितने कितने  आदर्श दिए,
स्वीकारी हंस हंसकर फांसी।
सैंतालिस के मध्य निशा की,
क्या हमको है याद ज़रा सी।

बापू   के   सुन्दर  सपनों का,
हमने ख़ूब किया अभिनंदन।
नाम कलंकित किया देश का,
टीक  भाल  पर  ख़ूनी चंदन।
ज़ार - ज़ार    रोता    वृंदावन,
कलपे गया, अयोध्या, काशी।
सैंतालिस के मध्य निशा की,
क्या हमको है याद ज़रा सी।

पृथ्वी, अग्नि, राकेट, अणुबम,
हमारा  इतना  हुआ   विकास।
फिर   भी   कुछ    भूलों    का,
प्रतिपल   होता   है  एहसास।
स्वाभिमान क्यों बिका हमारा,
अपनी वृत्ति बनी क्यों दासी।
सैंतालिस के मध्य निशा की,
क्या हमको है याद ज़रा सी।

हार्दिक शुभकामनाएं!

शनिवार, 13 अगस्त 2011

डरबन पहुंचते ही संकटों का सामना ...

गांधी और गांधीवाद-61

डरबन पहुंचते ही संकटों का सामना ...

आज दिन भर इस पोस्ट की तैयारियों में व्यस्त रहा। शाम के नौ बजे डॉ. सविता सिंह जी का फोन आया। पिछले दिनों दिल्ली जाना हुआ था। गांधी स्मृति संस्थान भी गया था। यह उसी स्थान पर है, जहां गांधी जी की हत्या कर दी गई थी। इस संस्थान की निदेशक के रूप में सविता सिंह जी ने पांच साल तक काम किया। पिछले साल सेवा निवृत्त हुई हैं। वहां अशोक कुमार जी से भेंट हुई थी। उन्हें अपना कार्ड दे आया था। सत्याग्रह के मंत्र के सौ साल पूरे होने के अवसर पर 2006 में सविता जी ने ‘‘सत्याग्रह” पुस्तक लिखी थी। लगभग आधे घंटे तक उन्होंने बात की और सत्याग्रह के अर्थ, उनके परिवार की गांधी जी से निकटता और अन्य कई बातें शेयर की। कहा कि आज का पावन दिन उन्होंने खास तौर से चुना हमसे बात करने के लिए और फोन रखते वक़्त यह भी कहा कि जितना हो सके लोगों से सत्याग्रह की चर्चा करना और एक शांतिपूर्ण विश्व की स्थापना के लिए प्रयासरत रहना।

gandhi (4)दिसंबर 1896

लापरवाह रिपोर्टिंग से कई बार भारी भ्रम की स्थिति बन जाती है। भारत में जो आंदोलन गांधी जी ने की थी, उसकी सही रिपोर्ट नटाल पहुंच नहीं पाई थी। ‘‘हरी पुस्तिका” में व्यक्त गांधी जी के विचार की तोड़ी-मोड़ी रिपोर्ट के आधार पर 18 सितम्बर 1896 को लंदन स्थित “रायटर” ने तार द्वारा दक्षिण अफ़्रीका के प्रेस को बताया -

“A pamphalet published in India declares that the Indians in Natal are robbed and assaulted, and treated like beasts, and are unable to obtain redress. The Timesof India advocates an inquiry into these allegations.’’ (भारत में छपी एक पुस्तिका में कहा गया है कि नटाल में भारतीयों को लूटा जाता है, उनपर हमले किए जाते हैं और उनके साथ जानवरों जैसा बर्ताव होता है, जिसकी कोई दाद-फ़रियाद नहीं। ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने इन आरोपों के प्रति एक सर्वजनिक जांच की मांग की है।)

इस तार के आशय पर जब नटाल के समाचार पत्रों में समाचर छपा तो इसने वहां बवंडर पैदा कर दिया था। वहां के गोरे गांधी जी से बहुत ही नाराज़ थे।

14 सितम्बर को सर वाल्टर पीस, जो लंदन में नटाल का एजेंट जेनरल था, ने एक वक्तव्य ज़ारी किया था। इस तार से उत्तेजित हो डरबन के यूरोपवासियों ने 16 सितम्बर को मारित्ज़बर्ग में योरोपियन प्रोटेक्शन असोसिएशन (European protection association) गठित कर लिया।

‘हरी पुस्तिका’ के विवरण का अध्ययन कर नटाल एडवर्टाइज़र ने लोगों से शान्ति और धैर्य से काम लेने को कहा, पर लोग कुछ भी सुनने के मूड में नहीं थे। बल्कि खतरे की संभावना और बढ़ ही गई। 26 नवम्बर 1896 को डरबन में मेयर की अध्यक्षता में वहां के योरोपवासियों की एक आम सभा हुई। इस सभा में एशियाई आप्रवास की भर्त्सना की गई। गांधी जी का नाम आने पर उपस्थित श्रोताओं ने सी-सी कर फुंफकार भरा। कोलोनियल पैट्रिटिक यूनिन (colonial patriotic union) का गठन हुआ। इन्होंने मांग की कि एशिया से प्रवासियों का आना बंद किया जाए। आरोप लगाया गया कि ‘जिस देश ने उसको आश्रय दिया, गांधी उसे ही बदनाम करने लगा है। नटाल के यूरोपियन को गंदगी में खींचने और उनके चेहरे पर कालिख पोतने का काम कर रहा है।’ इन आंदोलनों से दक्षिण अफ़्रीकी सरकार के उस क़दम को बल मिला जिसके द्वारा वे सदन में अप्रवासी भारतीयों के लिए बिल पेश करने जा रहे थे।

यह तो मात्र संयोग था कि बंबई से दक्षिण अफ़्रीकी बंदरगाह के लिए दो जहाज साथ-साथ निकले। जब यह समाचार डर्बन के गोरों तक पहुंचा कि गांधी जी और उनके परिवार दक्षिण अफ़्रीका के लिए रवाना हो चुके हैं और उनके साथ एक और जहाज भी आ रहा है तो इसने आग में घी का काम किया। उन्होंने इसमें गांधी की कूटनीति और कारस्तानी की गंध पाई। हुआ यह था कि ‘कूरलैंड’ नामक जहाज से गांधी जी और उनका परिवार सफ़र कर रहा था। ठीक उसी समय भारत से एक और जहाज ‘नादेरी’ भी नटाल के लिए चला था। दोनों साथ-साथ पहुंचे थे। दोनों में कुल मिला कर 800 यात्री थे। इस बात को ऐसे फैलाया गया कि गांधी जी प्रवासी भारतवासियों की संख्या बढ़ाने के लिए भारत से अपने समर्थकों के दो जहाज भरकर दक्षिण अफ़्रीका ला रहे हैं। नटाल को भारतीयों से भर देने का षडयंत्र कर रहे हैं। लोगों में काफ़ी अक्रोश भड़काया गया। लोगों ने मांग की कि इन्हें वापस भारत भेज दिया जाना चाहिए। कुर्लैंड और नादरी के आगमन को ‘नेटाल पर चढ़ाई’ का रूप दिया गया। नटाल की सरकार इस भ्रम का निराकरण कर सकती थी किंतु उसे क्या पड़ी थी?

उत्तेजना के इस माहौल में नटाल सरकार को गड़बड़ी फैलने की आशंका होने लगी। 18 दिसम्बर 1896 को दोनों जहाजों ने लंगर डाला। दोनों जहाजों को सलाह दी गई कि वे भारत वापस चले जाएं। जहाज का बम्बई छोड़ते वक़्त वहां प्लेग फैलने का समाचार तो था ही। 19 दिसम्बर 1896 को इस बाबत अधिसूचना ज़ारी कर दी गई कि चूंकि बम्बई में उन दिनों प्लेग फैला हुआ था इसलिए बिना स्वास्थ्य-परीक्षण के उन्हें वहां उतरने नहीं दिया जाएगा। और जहाज को क्वारेंटाइन के लिए रखा जाएगा। बाहरी बन्दर में लंगर डालने के बाद पीला झण्डा फहरा दिया गया। डॉक्टरी जांच और उनकी हरी झंडी के बाद ही यह पीला झंडा उतरने वाला था। उसके बाद ही यात्रियों के रिश्तेदारों आदि को स्टीमर पर जाने दिया जाता।

स्वास्थ्य निरीक्षक डॉ. सदरलैंड ने ‘कुरलैंड’ और ‘नादरी’ के यात्रियों की स्वास्थ्य परीक्षा की। उसने लोगों में रोग का कोई लक्षण नहीं पाया। उसने देखा कि इस रोग के कीटाणु का उद्भव काल (Incubation period) 23 दिनों का होता है। 18 दिनों की यात्रा में ये यात्री बम्बई से बाहर ही थे। इसलिए उन्होंने यात्रियों को उतरने के पहले पांच दिन और जहाज पर काट लेने को कहा। सरकार इस अल्पावधि से नाखुश थी। दूसरी तरफ़ जहाज के मालिकों ने अधिवक्ताओं की शरण ली। उनका तर्क था कि क्वारेंटाइन की शर्तें तब लागू होतीं जब सरकारी अधिसूचना ज़ारी होने के बाद रोग-ग्रसित बंदरगाह से जहाज ने अपनी यात्रा शुरु की हो। यहां तो जहाज के डरबन पहुंचने पर अधिसूचना ज़ारी की गई थी।

जहाज पर बड़े दिन का त्योहार मनाया गया। 25 दिसम्बर, क्रिसमस के दिन एस.एस. कुरलैण्ड के कप्तान ने गांधी जी और उनके परिवार, बच्चों के साथ रात्रि-भोज रखा। भोजनोपरांत गांधी जी ने दार्शनिक अंदाज़ में सहयात्रियों को संबोधित किया। उन्होंने पाश्चात्य सभ्यता पर भाषण देते हुए कहा कि आज की परिस्थिति में उनके इरादे जग-ज़ाहिर हो गए हैं। गांधी जी ने पश्चिम की सभ्यता को हिंसक और पूर्व की सभ्यता को अहिंसक बताया।

बात-चीत के क्रम में एक यात्री ने पूछा, “गोरे जैसी धमकी दे रहे हैं, अगर वे अपनी धमकी में क़ामयाब हो गए, और आगर आपको चोट पहुंचायें, तो आप किस प्रकार अपनी अहिंसा के सिद्धांत पर क़ायम रहेंगे?” गांधी जी ने उत्तर देते हुए कहा, “मुझे आशा है कि उन्हें माफ़ कर देने की और उन पर मुक़दमा न चलाने की हिम्मत और बुद्धि ईश्वर मुझे देगा। मुझे उनके ख़िलाफ़ कोई क्रोध नहीं है। उनके अज्ञान और उनकी नासमझी के लिए दुख है।”

प्रश्न करने वाला फींकी हंसी हंसकर रह गया। पर ऐसा लगता था कि आगे जो होने वाला है उसका गांधी जी को आभास हो रहा था। वे आने वाली हर परिस्थिति के लिए ख़ुद को तैयार कर रहे थे। किंतु एक बात जो निकलकर आई वह यह कि पहली बार वे लियो टॉल्सटॉय के अहिंसा के अर्थ को आजमाने जा रहे थे। बाद के दिनों में यही सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा का रूप लेने वाला था।

कस्तूरबाई को समझ में नहीं आ रहा था कि क्यों गोरे उनसे इतने खफ़ा हैं? हालाकि गांधी जी जहाज में सभी यात्रियों को समझा रहे थे कि वे भयभीत न हों। उनका दक्षिण अफ़्रीका में रहने का पूरा अधिकार है। लेकिन कस्तूरबाई को सात्वना नहीं हो रही थी। जिस तरह का माहौल तैयार हो रहा था इससे वे बहुत आशंकित थीं। उन्हें इतना तो समझ में आ रहा था कि यह सब गांधी जी के ही विरुद्ध है। लेकिन उन्हें यह नहीं समझ में आ रहा था कि गांधी जी ने ऐसा क्या कर दिया था कि इतने लोग उनसे क्रुद्ध हैं। अपने लिए तो उन्हें कोई चिन्ता नहीं थी लेकिन बच्चों और खास कर गांधी जी के लिए उन्हें काफ़ी चिन्ता थी। उन्होंने गांधी जी से पूछ ही लिया, “आपने ऐसा क्या कर दिया है लोग आप से इतने ख़फ़ा हैं?”

गांधी जी ने कहा, “मैंने कोई ग़लत काम नहीं किया है। जो भी तथ्य मैंने ज़ारी किए हैं, सब सही हैं। जो मांगें हमने मांगी हैं, सारी जायज़ हैं। वही मांग मैं नटाल में पिछले दो साल से मांगता रहा हूं। अवसर मिला तो मैं उन्हें उन्हें विस्तार से समझा दूंगा …”

कस्तूर ने कहा, “पर वे आपकी सुनेंगे नहीं। वे तो काफ़ी गुस्से में हैं … इस तरह के आग-बबूले हुए लोगों को आप कैसे समझा पाएंगे ..?”

यही प्रश्न तो गांधी खुद से भी कर रहे थे। उन्होंने कस्तूर को जवाब दिया, “ईश्वर पर भरोसा रखो … वही हमें इस संकट से मुक्ति दिलाएगा …।”

संकट अगले ढाई सप्ताह ज़ारी रहा।

नोट : पिछले पोस्टों के लिंक और संदर्भ के लिए इस लिंक पर देखें।

शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

अब पहले की तरह प्रवासी पक्षी नहीं आते

पक्षियों का प्रवास - 16
अब पहले की तरह प्रवासी पक्षी नहीं आते
Glossy Ibisसमापन किस्त
नीड़ का निर्माण
जान पर खेलकर पहुंचे ये पक्षी जिस तरह से अपना आशियां बनाते हैं, उसकी प्रक्रिया देखकर समझा जा सकता है कि नीड़ का निर्माण कितनी जटिल प्रक्रिया है और उसे कितनी सरलता से पक्षियों द्वारा पूरा किया जाता है। इनकी बस्ती में प्रकृति और पक्षियों का परस्पर सामंजस्य विलक्षण सौंदर्य की अनुभूति है। कौए जैसा काला स्याह आरमोरेन्ट, इग्रीट और स्पूनबिल जैसे झक्क सफेद पक्षी बिना किसी रंगभेद के एक ही वृक्ष की भिन्न-भिन्न शाखाओं पर अपने-अपने घोंसले बनाते हैं, प्रजनन व पालन करते हैं। अपने प्रवास के दौरान ये पक्षी मात्र प्रजनन क्रिया ही संपन्न नहीं करते। वे इस दौरान यहां अपने पुराने पंखों का परित्याग भी करते हैं। फिर धीरे-धीरे दो से तीन माह के दौरान ये अपने नये पंखों को हासिल भी कर लेते हैं। हां, इस दौरान ये उड़ नहीं पाते। इस कारण इनके शिकारियों के जाल में फंसने का खतरा बना रहता है।
निश्चित पथ पर
Cardinaalप्रवासी पक्षी एक निश्चित पथ पर ही अपनी यात्रा तय करते हैं। हज़ारों किलोमीटर की दूरी तय कर आने वाले ये पक्षी पुन: उसी रास्ते वापस लौट जाते हैं। ये अपना रास्ता नहीं भूलते। प्राणी विशेषज्ञों का कहना है कि ये एकाधिक समुद्र पार कर आते हैं। प्रजनन की क्रिया संपन्न कर ठीक उसी रास्ते वापस चले जाते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि इंसान से भी अधिक इनकी स्मरण शक्ति होती है। हां इस पथ में परिवर्तन कुछ खास कारणों से हो सकता है। साधारणतया भौगोलिक आकृतियां जैसे नदी, घाटी, पहाड़, समुद्री तट, आदि इनका मार्ग दर्शन करते हैं। कुछ पक्षी तो अपनी पिछली यात्रा के अनुभव के आधार पर अपने दूसरे साथियों का पथ प्रदर्शन एवं मार्ग दर्शन करते हैं। पर उनका अनुभव शायद ही बड़े काम का होता होगा। क्योंकि पक्षियों की अधिकांश प्रजातियां तो टोली में यात्रा करने से कतराते हैं। वे तो अलग-अलग ही चलते हैं। हां आकाशीय पिंड उनकी इस मराथन यात्रा में उनका पथ-प्रदर्शक होते हैं। पक्षियों के अंदर एक आंतरिक घड़ी भी होती है जो उनके गंतव्य तक पहुंचाने में सहायता प्रदान करती है।
वे अब भारत से मुंह मोड़ने लगे हैं
Goshawkअब पहले की तरह प्रवासी पक्षी नहीं आते। इनकी तादाद लगातार घटती जा रही है। जानकारों का मानना है कि इसके पीछे प्रमुख कारण ग्लोबल वार्मिंग है। मौसम मे परिवर्तन प्रवासी पक्षियों को रास नहीं आता इस कारण वे अब भारत से मुंह मोड़ने लगे हैं जलवायु परिवर्तन से पक्षियों का प्रवास बहुत प्रभावित हुआ है। पहले पूर्वी साइबेरिया क्षेत्र के दुर्लभ पक्षी मुख्यतः साइबेरियन सारस भारत में आते थे। जलस्रोतों के सूखने से उनके प्रवास की क्रिया समाप्त प्राय हो गई है। ये सुदूर प्रदेशों से अपना जीवन बचाने और फलने फूलने के लिए आते रहे हैं। पर हाल के वर्षों में इनके जाल में फांस कर शिकार की संख्या बढ़ी है। कई बार तो शिकारी तालाब या झील में ज़हर डाल कर इनकी हत्या करते हैं। माना जाता हा कि उनका मांस बहुत स्वादिष्ट होता है तथा उच्च वर्ग में इसका काफ़ी मांग हाती है। अब वे चीन की तरफ जा रहे हैं। हम एक अमूल्य धरोहर खो रहे हैं। पक्षियों के प्रति लोगों में पर्यावरण जागरूकता को बढ़ावा देना चाहिए। पक्षी विहार से लाखों लोगों को रोजगार मिलता है। इसके अलावा काफी बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षियों को दखने पर्यटक आते हैं।
प्रवासीय यात्रा की शुरुआत
humming_birdइस प्रवासीय यात्रा की शुरुआत क्यों हुई यह भी रोचक है। एक साधारण सी कहावत है कि “बाप जैसा करता है, वैसा ही करो” – शायद इसी रास्ते पर इसकी शुरुआत मानी जा सकती है। पर यह कोई वैज्ञानिक व्याख्या नहीं कही जी सकती। हां इतना तो माना जा सकता है कि बदलते वातावरण के कारण कुछ विपरीत परिस्थितियां पैदा हो गई होंगी, जिसके कारण पक्षियों के गृह स्थल पर भोजन एवं प्रजनन की सुविधाओं का अभाव हो गया होगा। इस सुविधा की प्राप्ति के लिए पक्षी अपने स्थान बदलने को विवश हो गए होंगे। समय बीतने के साथ यह साहसिक अभियान उनकी आदत में शुमार हो गया होगा। पक्षियों के जीवन यापन, शत्रुओं से सुरक्षा, भोजन एवं प्रजनन की सुविधा में यह प्रवास निश्चित रूप से उनके लिए लाभकारी साबित हुआ।
वतन लौटने की तैयारी
Scarlet_Tanager-1प्रवासी पक्षी अपने वतन लौटने की तैयारी लगभग दो सप्ताह पूर्व ही आरंभ कर देते हैं। सप्ताह पूर्व से अपना वजन घटाने हेतु सजग हो जाते हैं। यहाँ आए, ठहरे, प्रजनन में व्यस्त रहे, मौसम का लाभ लिया, शिशु के पंख खुलने लगे, उडने योग्य हुए और आबोदाना उठना शुरू। पक्षीविद् के अनुसार शुक्ल पक्ष की दूधिया चाँदनी में उडान के समय रोशनी में वे अपना निश्चित मार्ग सुगमता से देख सकते हैं। दिन में दिशाभ्रम, तेज धूप, असहनीय गर्मी तथा शत्रु भय के कारण शुक्ल पक्ष उनकी वापसी उडान का शुभ मुहूर्त होता है। इसलिये भी कि यात्रा के प्रत्येक चरण में रोशनी मिलती रहे। अपने वतन तक पहुँचने में अंतिम पडाव तक अथक निरन्तर सक्रिय व गतिशील बने रहें, इस उद्देश्य से विदाई पूर्व वजन घटाते हैं।
प्रवासियों के गन्तव्य पर लौट चलने की तैयारी में जुटे प्रवासी जोरदार विशेष ध्वनि में अपने सभी सहयोगी मित्रों से ऊँची आवाज में लौट चलने हेतु आमंत्रित करती है। तिनकों से सजे वीरान आशियाने तथा प्रजनन के वक्त बचे अण्डों की खोलें इनके गुजरे वक्त के चश्मदीद गवाह होते हैं। जाते-जाते ये बेजुबान मेहमान हमें ढेरों संदेश दे जाते हैं।
Ospreyचल उड़ जा रे पंछी के अब ये देश हुआ बेगाना ….

बुधवार, 10 अगस्त 2011

फिर दक्षिण अफ़्रीका की ओर

गांधी और गांधीवाद-60

फिर दक्षिण अफ़्रीका की ओरgandhi (10)

नवम्बर 1896

दादा अब्दुल्ला की फर्म ने एक ‘एस.एस. कुरलैण्ड’ नाम का स्टीमर ख़रीद लिया था। दादा अब्दुला के अनेक साहसों में नेटाल और पोरबंदर के बीच जहाज चलाने का यह पहला साहस था। उन्होंने गांधी जी से इसी से दक्षिण अफ़्रीका जाने का आग्रह किया। गांधी जी ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। 30 नवम्बर 1896 को एस.एस. कुरलैंड से गांधी जी एक बार फिर दक्षिण अफ़्रीका के लिए प्रस्थान किए। नवम्बर 1896 के अंतिम दिनों में गांधीजी को नटाल से संदेश मिला कि वे शीघ्र नटाल आ जाएं। वहां कुछ ऐसी घटनाएं हो रही थी कि उनका वहां होना ज़रूरी था। अतः गांधीजी को एक बार पुनः दक्षिण अफ्रीका की यात्रा करनी पड़ी। इस बार उनके साथ कस्तूरबाई, उनके दो पुत्र (नौ साल के हरिलाल और पांच साल के मणिलाल) एवं उनकी विधवा बहन गोर्की (तलयार बेन) का एकमात्र दस साल का पुत्र गोकुलदास भी था।40

रास्ते के लिए शाकाहारी भोजन, ढेर सारे फल और भारतीय मिठाइयां भी रख ली गईं। जिस समय ‘कुरलैण्ड’ रवाना हुआ था ठीक उसी समय पर्शियन नेविगेशन कंपनी का स्टीमर, ‘एस.एस. नादरी’ नेटाल के लिए रवाना हुआ था।39 (हालाकि जोसेफ जे. डोक ने लिखा है कि ‘कुरलैण्ड’ 28 को चला था जबकि ‘नादरी’ दो दिन बाद, यानी 30 को)41 दादा अब्दुल्ला इस स्टीमर के एजेण्ट थे। दोनों स्टीमरों पर कुल मिला कर लगभग 800 यात्री थे, जो ट्रान्सवाल जाने वाले थे।

नए परिधान में

स्टीमर पर गांधी जी ने कस्तूरबाई और बच्चों को निर्देश दिया कि सुबह सोकर उठने के बाद से लेकर रात को सोने जाने वक़्त तक नए परिधान और जूते-मोज़े पहने रहना होगा। किसी ने भी पहले जूते नहीं पहने थे। उन्हें काफ़ी दर्द हो रहा था। पैरों की उंगलियां दर्द करने लगीं। जुराबों से पसीना दुर्गंध मारने लगा। यह सब असहनीय हो गया। पतलून में उन्हें चलने में कठिनाई होती। इन नए वेश-भूषा से उन्हें सहजता हो जाए इस उद्देश्य से गांधी जी उन्हें लेकर स्टीमर पर घंटों इधर-उधर घूमा करते थे और अन्य लोगों से भी मिलते रहते थे। गांधी जी बहुत ही गहनता से कस्तूरबाई के चलने आदि के ढंग का निरीक्षण भी करते रहते थे। वे उन्हें कहा करते, “सीधी तरह चलो और सिर को सामने ताने रहो।” कई दिनों तक कस्तूर को लगता कि वो चलते वक़्त गिर ही पड़ेंगीं। वे रात का इंतज़ार करतीं और जूते मोज़े फेंक कर अपने दुखते पैर को आराम देतीं। राजकोट में यह सब झमेला नहीं था, जो जी में आया पहन लिए, जहां मन किया बैठ गए, लेट गए।

टेबुल मैनर्स

अब तो और भी संकट थे। राजकोट में घर के सारे सदस्य जमीन पर बैठ कर पीतल के प्लेट में भोजन ग्रहण करते थे। अब तो कस्तूर और बच्चों को टेबुल-कुर्सी पर बैठ कर भोजन करना पड़ता था, वह भी पैर को नीचे झूलते हुए रखकर। चाइना प्लेट छोटा था, और हाथ से नहीं कांटे-छुरी से खाने की आदत उन्हें डालनी थी। इन सब के बीच गांधी जी की गिद्ध दृष्टि उन पर जमीं रहती थी। छुरी-कांटे ठीक ढंग से नहीं पकड़ने पर गांधी जी की डांट-फटकार चलती रहती थी। सख़्त निर्देश होता, “भोजन करते वक़्त तुम्हारा मुंह बन्द रहना चाहिए और कोई आवाज़ नहीं निकलनी चाहिए।” कस्तूर के लिए तो यह लगभग असंभव ही था। बिना मुंह खोले खाना और वह भी इस तरह से कि खाने की आवाज़ बाहर नहीं आनी चाहिए ऐसा कैसे हो सकता है! उस पर सारे खाने का स्वाद भी अलग तरह का, लगभग बे-स्वाद। उबली सब्जियां और ब्रेड! उफ़्फ़! ऐसा न कभी देखा था, न चखा था। कब यह यात्रा खत्म हो और कब अपने मन का बनाकर खाने का अवसर मिले। वे दिन गिनती रहतीं।

इस सब के बावज़ूद पत्नी और बच्चों के साथ गांधी जी को यात्रा करने में बड़ा आनंद आ रहा था। यात्रा में गांधी जी आपने परिवार के जितने निकट थे, उतने वे कभी नहीं रह पाए थे। वे उन्हें प्रायः डेक पर ले जाते और कहानियां सुनाते। वे सब भी समुद्र यात्रा का खूब आनंद उठा रहे थे। सहयात्रियों में उनके कुछ रिश्तेदार और परिचित भी थे। चूंकि स्टीमर गांधी जी के मुवक्किल और मित्र का था, इसलिए घर का-सा लगता था और वे हर जगह आज़ादी से घूम-फिर सकते थे। जहाज पर घर जैसा माहौल था और सब कुछ सहज चल रहा था।

जबर्दस्त तूफ़ान

जहाज किसी दूसरे बन्दरगाह पर ठहरे बिना सीधा नेटाल पहुंचनेवाला था। केवल अठारह दिन की यात्रा थी। पहुंचने में अभी तीन-चार दिन बाक़ी थे। अचानक समुद्र में जबर्दस्त तूफ़ान आया, मानों वह गांधी जी को दक्षिण अफ़्रीका पहुंचने पर आने वाले तूफ़ान की चेतावनी दे रहा हो। दक्षिणी गोलार्ध के उस प्रदेश में दिसम्बर का महीना गरमी और वर्षा का होता है। इसलिए छोटे-मोटे ज्वार उठना स्वाभाविक बात थी। उस पर से यह उच्च ज्वार का समय था। बादल आ घिरे, सूरज बादलों के पीछे छुप गया। जहाज कोई छोटी-मोटी नौका तो थी नहीं कि डगमगाता। लेकिन समुद्र की लहरों का रूप इतना विकराल था कि विशाल और ऊंचा जहाज भी लहरों के थपेड़ों में डांवाडोल होने लगा। स्टीमर बड़ी ज़ोर से ऊपर-नीचे करने लगा और सुरक्षित बच पाना असंभव लगने लगा। लग रहा था कि जहाज अब उल्टा कि तब। यह काफ़ी देर तक चला।

बच्चे डरकर कस्तूरबाई से लिपट गए। कस्तूरबाई और बच्चों समेत कई यात्रियों की तबियत खराब हो गई। संकट के ऐसे पल भी आए जब लगा कि जहाज डूब जाएगा। सारे यात्री घबरा उठे। जहाज के यात्रियों ने धर्म, सम्प्रदाय आदि के भेदभाव भूला कर ईश्वर से दया के लिए प्रार्थना करना शुरु कर दिया। कुछ लोगों ने मनौतियां भी मानीं। दुख में सब एक हो गए थे। जहाज के कप्तान ने आकर सबको आश्वासन दिया, ‘760 टन का यह बहुत मज़बूत जहाज है। हमने बड़े-बड़े तूफान झेले हैं। इस तरह के मौसम से इसको कोई खतरा नहीं है’। पर इससे लोगों को तसल्ली नहीं हुई। ऐसी-ऐसी आवाज़ हो रही थी कि लग रहा था स्टीमर में छेद हो जाएगा। हिचकोले इतने जबर्दस्त थे कि ऐसा लग रहा था मानों जहाज अभी डूब जाएगा।

सिर्फ़ एक ऐसा व्यक्ति था तो जो इस काल की घड़ी में भी अविचलित था मोहनदास! गांधी जी को समुद्री यात्रा के दौरान कोई बीमारी नहीं होती थी। उन्होंने कई लंबी समुद्री यात्राएं कर रखी थी। इसलिए वे तूफान से भयभीत नहीं थे। परिवार के सभी सदस्यों को केबिन में पहुंचाकर उन्होंने उन्हें ढाढ़स बंधाया। कस्तूरबाई भी बच्चों को हौसला बढ़ाती रहीं। काल का समय कट नहीं रहा था। वे केबिन में लेटी रहीं। जब भी जहाज उछलता, उन्हें लगता बस यह डूबने ही वाला है। मन को तसल्ली देतीं कि जो भी हो सब साथ में हैं, अगर डूबा भी तो सब साथ ही रहेंगे। मन ही मन उन्होंने क़सम खाई कि अगर बच गए तो दुबारा जहाज से यात्रा नहीं करेंगी।

इधर संकट की घड़ी में गांधी जी ने जहाज पर घूम-घूम कर सबको धैर्य बंधाया और उन्हें खुश रखने की कोशिश की। चिन्ता में चौबीस घंटे बीते। अंततोगत्वा जब आसमान साफ़ हुआ तो लोगों ने चैन की सांस ली। सूर्यनारायण के दर्शन हुए। कप्तान ने आकर घोषणा की, “तूफान चला गया है।’ लोगों के चेहरे से चिन्ता दूर हुई। तब तक तो गांधी जी स्टीमर में काफ़ी प्रसिद्ध हो गए थे और सहयात्रियों का उनपर विश्वास भी बढ़ चुका था।

लेकिन एक अलग ही तूफ़ान डरबन में उनका इंतज़ार कर रहा था।

 

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