शुक्रवार, 30 सितम्बर 2011

मान-न-मान मैं तेरा महमान



मान-न-मान मैं तेरा महमान

चिठियाना-टिपियाना संवाद : द्वितीय अध्याय

-- मनोज कुमार
ऊ दिन छदामी लाल को घर में रहना किसी रणभूमि के आखाड़े से कम नहीं लग रहा था। ख़ुद्दे से नाराज़ छदामी घरे से निकल लिए मानसिक शांति खोजे ख़ातिर। बहुत देर इम्हर-ओम्हर भटकने के बाद मैदान पहुंचे। हरियर घास के चादर पर पीयर-पीयर फैलल धूप देखकर तो उनका वहीं पर लेटने का मन बन गया। तभिए सामने एक कोने में चिठियाना को लेटे-लेटे कुछ लिखते देखे। छदामी लाल के मन में चिठियाने के प्रति और उस से भी बढ़कर उसके विचारों के प्रति अगाध श्रद्धा है। उन्होंने सोचा चल कर आज आभार प्रकट कर ही दूं। ज्यों ही क़दम बढ़ाये कि आंधी-तूफान की-सी गति से टिपियाना का वहां पदार्पण हुआ।


टिपियाना - लो, तुम यहां बैठे हो, और मैंने तुम्हें कहां कहां नहीं ढ़ूंढ़ा।

चिठियाना – क्यों, क्या ऐसी बात हो गई जो तुम मुझे इतनी बेसब्री से ढ़ूंढ़ रहे थे।
टिपियाना – आज मुझे अपने आप पर बहुत गुस्सा आ रहा है और मैं अपने आप से
बहुत ख़फ़ा हूं।
चिठियाना - क्या हुआ ?
टिपियाना - यार मैं किसी से कुछ कहता हूं तो लोग बात का बतंगड़ निकाल लेते हैं और फिर मेरी फ़ज़ीहत कर डालते हैं।
चिठियाना - किसने की तेरी फ़ज़ीहत ?
टिपियाना - आज तो बात घर की ही है !

चिठियाना - घर की ? .. भाभी जी … !
टिपियाना - हां ..!

चिठियाना - अब तुछ तफसील से बताओगे भी ...!?
टिपियाना - आज लंच में परोसे गए आहार को चख कर मैंने उनके पाकशास्त्र पर अपनी प्रतिक्रिया क्या दे दी, बस वही मेरा यह टिपियाना मेरे लिए दिन भर जी का जंजाल बना रहा। सब्जी में मिर्च की अधिकता से आहत मुंह इतना ही तो बका था – “आज यह क्या बना डाली हो? मिर्ची ही मिर्ची, - सब्जी नहीं आग है।” मेरा यह बोलना था कि उनको ही मिर्ची लग गई। तब से घर का तो यह आलम है कि पूछो ही मत। उसने कहां-कहां नहीं इसकी चर्चा कर डाला है। मैं कहीं मुंह दिखाने के क़ाबिल नहीं रहा।

चिठियाना - तेरे बेवकूफ दिमाग में यह बात क्यों नहीं आई कि उन्हें तेरी यह प्रतिक्रिया नहीं भाएगी। अब इस तरह की खड़ी-खोटी प्रतिक्रिया दोगे तो कौन लाइक करेगा।
टिपियाना - अरे मेरी तो मति ही मारी जाती है जो मैं सब जगह टिपियाते फिरता हूं।
चिठियाना - तो क्या मामला नहीं थमा

टिपियाना - उनकी जुबान से आज अमृत वर्षा थमने का नाम ही नहीं ले रही थी। इसीलिए मैं घर से भागा-भागा फिर रहा हूं और तुम्हें ढ़ूंढ़ रहा था। ताकि कुछ सही सलाह मिल जाए।

चिठियाना - अरे .. रे.. रे... यह तो बहुत ही बुरा हुआ। अब .. अब ...

टिपियाना - अब तो समझो मेरा दाना पानी ही बंद होने वाला है। बोल रही थी मैं अब तुम्हारे इस जगत से आज ही चली जाऊंगी। अब तुम्ही बताओ कि इतनी तीखी सब्जी परोस कर कोई पूछे बताओ कैसी है ? तो मैं क्या कहता ?

चिठियाना - ऐसे संवेदशील मामलों में समझदारी से काम लेनी चाहिए। अरे तुझे तो यह बोलना चाहिए था – वाह मज़ा आ गया। क्या चटपटी सब्जी बनी है। मुंह तो मुंह कानों को भी स्वाद आ गया। इस तरह से बोलने से तेरा क्या जाता ?
टिपियाना - मेरा क्या जाता .. तुम क्या समझोगे हम टिपियानों की ज़ज़्बात .. अरे अगर हम उसी समय और उसी लहजे में नहीं टिपियाते तो हमारा तो रातों की नींद और दिन का चैन छिन जाता।

चिठियाना - अब कयूं अपनी भूल का अहसास हो रहा है ? पूरे स्वाद के साथ उस स्वीट डिश का आनंद लो !

टिपियाना - अरे यार तुम अभी तक मामले की गंभीरता को समझ नहीं रहो हो। उन्होंने जाने का ऐलान कर दिया है। पलायन !! और इस बार न आने की बातें भी कह रही थी।

चिठियाना - तो उनके चले जाने से तुम्हारा क्या जाता है ? वो जा रही है तो जाने दो। जी भर के, स्वीट डिश की प्याली भर-भर के खाना।

टिपियाना - तुम अब भी मेरी मज़बूरी नहीं समझ रहे हो। वो नहीं रहेंगी तो मैं टिपिआऊंगा किसके साथ ? मेरे अस्तित्व की रक्षा के लिए उनका यहां होना बहुत ज़रूरी है।

चिठियाना - तो तुम क्या करना चाहते हो ?
टिपियाना - सीज़फायर ... मैं अपनी तरफ से सीज़फायर ही करना उचित समझता हूं।

चिठियाना - वो तुम कर सकोगे।

टिपियाना - हा। करूंगा। करना ही पड़ेगा।

चिठियाना - देखो यह कोई मामूली बात नहीं है। एक निति है। और इस नीति का दृढ़ता से पालन करना होगा।

टिपियाना - करूंगा।

चिठियाना - मुझे तो नहीं लगता कि बिना कोई ऐसी वैसी प्रतिक्रिया दिए तुम रह पाओगे।

टिपियाना - रह लूंगा यार। अब तो लगता है न टिपियाने में ही समझदारी है।
चिठियाना - तुम तो ज़ज़्बाती हो रहे हो। पर साथ ही तुम्हें दूसरों के ज़ज़्बातों को समझना चाहिए।
टिपियाना - समझता तो हूं।
चिठियाना - तुम कुछ समझते नहीं ।
टिपियाना - तुम ठीक से समझाते नहीं। इतना घुमा फिराकर बात रखते हो कि मेरी समझ में कुछ नहीं आता।

चिठियाना - अच्छा मैं सरल शब्दों में तुम्हें समझाता हूँ – मान लो कि तुम एक श्रेष्ठ चिट्ठाकार हो …..
टिपियाना - ये मान लेने वाली क्या बात … मुझे इससे बड़ी चिढ़ है … मैं हूँ ही …।

चिठियाना - ठीक है … फिर तुमसे भी तो कोई श्रेष्ठ होंगे।
टिपियाना - हां क्यूं नहीं होंगे … डेफिनेटली होंगे।

चिठियाना - तो उनकी श्रेष्ठता का सम्मान करे।
टिपियाना - अच्छा…..
चिठियाना - यदि कोई विद्वान चिट्ठाकार है तो उसकी विद्वता का सम्मान करो।

टिपियाना - अच्छा … ।
चिठियाना - यदि कोई वरिष्ठ चिट्ठाकार है तो उनकी वरिष्ठता का सम्मान करे।
टिपियाना - बहुत खूब... !

चिठियाना - यदि कोई बड़ा चिट्ठाकार है तो उसकी बड़प्पन का सम्मान करो।

टिपियाना - हूँ ..
चिठियाना - यदि कोई बाल चिट्ठाकार है तो उसके बालपन का सम्मान करो।

टिपियाना - कमाल है ..
चिठियाना - यदि कोई महिला चिट्ठाकार है तो उसके मातृत्व का सम्मान करो।

टिपियाना – वाह-वाह। यदि कोई तेरे जैसा मित्र चिट्ठाकार है तो उसकी मित्रता का सम्मान करूं।
चिठियाना - बिलकुल। यही समझाना चाह रहा था मैं तुम्हें कि हमें दूसरों की भावनाओं को समझना चाहिए। उसका सम्मान करना चाहिए।

टिपियाना - बस-बस बहुत हो गया। यदि सबका मैं सम्मान ही करता रहूँ तो – मेरा तो टिपियाना किसी काम का नहीं रहा और हां कान खोल कर सुन लो मिस्टर चिठियाना तुम ऐसा कहके मेरा अपमान कर रहे हो ।

छदामी लाल को इससे ज़्यादा मानसिक शांति की न तो उम्मीद थी न ज़रूरत। वो घर के लिए प्रस्थान कर गए। उनको फिर एक मसाला मिल गया था अपने नए पोस्ट के लिए।
(इतिश्री चिठियाना-टिपियाना मान-न-मान मैं तेरा महमान नामो द्वितीयो अध्यायः !!)

बुधवार, 28 सितम्बर 2011

संत निम्बार्काचार्य, संत माध्वाचार्य और संत रामानुज

मध्यकालीन भारत - धार्मिक सहनशीलता का काल (चार) 
संत निम्बार्काचार्य, संत माध्वाचार्य और संत रामानुज

संत निम्बार्काचार्य एवं संत माध्वाचार्य आचार्य रामानुज के समकालीन थे।

निम्बार्काचार्य का जन्म 1162 ई. माना जाता है। संत निम्बार्क मराठा क्षेत्र में भक्ति आंदोलन के संस्थापक थे। इस सम्प्रदाय का दार्शनिक सिद्धांत ‘भेदाभेदवाद’ या ‘द्वैताद्वैतवाद’ है। जीव अवस्था-भेद से ब्रह्म के साथ भिन्न भी है तथा अभिन्न भी है। जीव ब्रह्म का अंश है, ब्रह्म अंशी है। जीव अणु अल्पज्ञ है। भक्ति ही मुक्ति का साधन है। उन्होंने कृष्ण भक्ति पर बल दिया। उनके विचार काफी क्रंतिकारी थे। वे धार्मिक कर्मकाण्ड (व्रत, उपवास, आदि में विश्‍वास नहीं रखते थे। ब्राह्मणों की सर्वोच्चता को उन्होंने नकारा। वे मानते थे कि सिर्फ भक्ति या श्रद्धापूर्ण निष्ठा से ही मोक्ष संभव है। उन्होंने कहा कि जीवन में दु:ख के बाद सुख एवं सुख के बाद दु:ख का क्रम चलता रहता है अत: आदमी जब सुख में रहे तो उसे भगवान को भूलना नहीं चाहिए तथा दु:ख में उसकी निंदा नहीं करनी चाहिए।

माध्वाचार्य का जन्म 1199 ई. में दक्षिण भारत के बेलिग्राम में हुआ था। उत्तरभारत की यात्रा पर आने पर ये बदरिकाश्रम गये और वहां आठ मंदिरों का निर्माण किया। उन्होंने अद्वैतवाद का घोर विरोध किया। इनका दार्शनिक मत द्वैतवाद है। उन्होंने कहा कि ईश्‍वर एवं आत्मा पृथक हैं। वे लक्ष्मी-नारायण के भक्त थे। उनका मानना था कि गुरु की सहायता से एवं ईश्‍वर के प्रति प्रेम से मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर सकता है।

संत रामानुज के अनुयायियों में सबसे महत्वपूर्ण नाम है संत रामानंद। उनका जन्म 14वीं शताब्दी में इलाहाबाद के निकट एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। भक्ति आंदोलन को उत्तरी भारत में लाने का श्रेय उन्हीं को जाता है। यह कहना कदापि ग़लत नहीं होगा कि उत्तरी भारत के भक्ति आंदोलन के वे अगुआ थे। भगवान विष्णु के एक दूसरे अवतार राम उनके आराध्य देव थे एवं उन्होंने राम पंथ को प्रतिपादित किया। उस काल के विचारकों में वे पहले थे जिन्होंने स्पष्ट रूप से और ज़ोरदार ढ़ंग से जातिप्रथा के विरुद्ध एवं स्त्रियों की समानता के लिए आवाज़ उठाई। उन्होंने अपने निकटतम शिष्यों में निम्न जाति के कई लोगों को स्वीकार कया। जिसका सुखद परिणाम यह हुआ कि उनके बाद भी हमें कई धार्मोपदेशक निम्न जाति के भी देखने को मिलते हैं। यह स्थापित प्रथा में एक क्रांतिकारी बदलाव था। संत रामानंद के विचारों ने लोगों के दिमाग में जागृति की लहर पैदा की। उन्होंने लिखा जाति पांति पूछे नहीं कोई। हरि के भजे सो हरि के होई।।

संत रामानंद विचार से कट्टरपंथी थे, किन्तु आचार से दयालु और उदार। उनकी मृत्यु के बाद उनके अनुयायी दो दलों में बंट गए। एक दल में संत नाभा दास और तुलसी दास जैसे वर्णाश्रम धर्म में विश्‍वास रखने वाले संत थे तो दूसरे दल में कबीर दास जैसे संत थे जो आडम्बरपूर्ण धार्मिक प्रथाओं का विरोध करते थे। नान्हा, पीपा, धन्ना, साईं दास, रैदास, गुरु नानक आदि उनके अन्य प्रसिद्ध शिष्य हैं। ये सभी रामानंद परंपरा के उदारवादी संत थे।

स्वामी रामानंद संस्कृत के पंडित थे। ‘वैष्णव मताब्द-भास्कर’ और ‘श्रीरामार्जुन-पद्धति’ इसके सुप्रसिद्ध ग्रंथ हैं। रामानंद के हिन्दी में रचित कुछ पद सुप्रसिद्ध हैं। हनुमान की स्तुति का पद –

आरति कीजै हनुमान लला की, दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।

जाके बल भरते महि कांपै, रोग सोग जाकी सिया न ज्यांपै॥

अंजनिसुत महाबलदायक, साधु सन्त पर सदा सहायक।

गाढ़ परै कवि सुमरौं तोहीं, होउ दयाल देहु जस मोहीं॥

सोमवार, 26 सितम्बर 2011

बा से कलह

गांधी और गांधीवाद- 70

बा से कलह

1897 :

गांधी जी का जीवन सादगी भरा था। बाहरी ताम-झाम और तड़क-भड़क से उन्हें कोई मतलब नहीं था। तड़के उठने की तो उन्हें आदत थी ही। उन्होंने घर के पिछवाड़े में एक छोटा-सा व्यायामशाला बना लिया था। सुबह उठकर वे वहां के होराइजोन्टल बार पर हल्का व्यायाम कर लिया करते थे। स्नान, ध्यान, और नाश्ते के बाद वे पौने नौ बजे तक अपने काम पर चल देते थे। शाम को लौटकर स्नानादि के बाद थोड़ी देर अखबार पढ़ते और फिर बा के साथ टहलने निकल जाते। बच्चे भी किसी देखभाल करने वाले के साथ घूम-फिर आते। इन दिनों गांधी जी अच्छी चीज़ें, शाकाहारी ही, खाने में विश्वास रखते थे और एक गुजराती हिन्दू रसोइया भी रखा हुआ था जो भोजन बनाता था। खाना पश्चिमी तौर-तरीक़े से टेबुल पर परोसा जाता, हालाकि कस्तूरबाई अलग ही भोजन करतीं।

बीच ग्रोव विला के पांच बेडरूम वाले मकान में कस्तूरबाई अपने बच्चों और पति के साथ काफ़ी ख़ुश थीं। धीरे-धीरे हालात सामान्य होते गये। बा भी इस नए माहौल में रमने लगी थीं। उन्हें लगा जैसे भगवान ने उनकी अरज़ सुन ली। लेकिन जल्दी ही यह दिवास्वप्न टूटने वाला वाला था।

कस्तूरबाई के लिए आराम का जीवन तो था, पर कोई गोपनीयता या खुशनुमा पारिवारिक महौल का अभाव था। गांधी जी डरबन में वकालत करते थे। वक़ालत भी उत्कर्ष पर थी। पांच से छह हजार पौंड सालाना वकालत से कमाई उनकी होने लगी थी। उन दिनों के लिहाज से यह एक बहुत बड़ी राशि है। इसके साथ ही वे दक्षिण अफ़्रीका में नए अनुभवों से गुज़र रहे थे। गांधी जी और कस्तूरबाई बहुत ही मिलनसार प्रवृत्ति के थे, इसलिए लोगों का आना-जाना लगा रहता था। अनेक गोरे भी मित्र बन गये थे और उनके भी आने-जाने का सिलसिला लगा रहता था। घर में भी परिवार के सदस्यों के अलावे दस-बारह लोग रोज़ भोजन करते थे। व्यवस्था उत्तम थी। स्वादिष्ट भोजन बनता था। दफ़्तर के सभी लोग गांधी जी के घर में परिवार के समान रहते थे और खाते-पीते थे।

घर में जो उनके मुहर्रिर उनके साथ ही रहते थे, उसमें सभी तरह के लोग थे। कुछ हिन्दू थे तो कुछ ईसाई, कुछ गुजराती थे तो कुछ मद्रासी। उनके घर में किसी के प्रति भेदभाव का सवाल ही नहीं था। वे सबको अपना कुटुम्ब मानते थे। इनमें शेख महताब, जिसने बचपन में उन्हें मांस खिलाया था भी शामिल था। हालाकि कुछ वर्षों पूर्व गांधी जी उसे दक्षिण अफ़्रीका लाये थे, किन्तु उसके ग़लत आचरण के कारण उसे घर से निकाल दिया था। किन्तु अब वह बदल गया था। उसने शादी भी कर ली थी। गांधी जी की प्रशंसा में उसने कई कविताएं भी लिखी थी। विन्सेन्ट लौरेन्स, कन्फ़िडेन्शियल कलर्क था। जोसेफ़ रॉयपेन्न भारतीय नटाल कान्ग्रेस का काम देखा करता था। मनसुखलाल नाज़र उनका सहयोगी था। आर.के. ख़ान नटाल बार में वकालत करता था। हरबर्ट किचिन, भारी पियक्कड़ था और ये सारे उसी घर में रहते थे। गांधी जी जैसे उदार हृदय के स्वामी के लिए किसी को मना करना कठिन था। और कस्तूरबा को सबकी देखभाल करनी होती थी। आदर्श भारतीय नारी की तरह पति का हर आदेश सिरोधार्य कर वह इस काम में जुटी रहतीं। थोड़ी सी भी चूक कलह का कारण बनती।

गांधी जी और बा घर में अपना सारा काम खुद ही करते थे। उन दिनों घरों में स्नानागार पास नहीं होते थे। फ़्लश-युक्त टॉयलेट की भी व्यवस्था नहीं थी। एक मात्र बाथरूम निचले तले पर था, इसलिए रात को लघुशंका के लिए हर सोने वाले कमरे में पॉट (पेशाब का बरतन) रहता था। उन्हें उठाने का काम किसी नौकर के जिम्मे नहीं था, बल्कि गांधी जी और बा खुद करते थे। घर के सभी सदस्य अपना-अपना पॉट खुद ही साफ़ करते पर कोई नया मेहमान आ जाने पर यह काम बा को करना पड़ता। बा को यह काम करते थोड़ी हिचक रहती थी। परम वैष्णवी बा को लगता वे ऐसे कामों के लिए नहीं हैं। गांधी जी को हर चीज़ की ज़िद चढ जाती थी। उस पर से उनका गुस्सा उग्र था। उनका आग्रह था कि काम कैसा भी हो, करना ही चाहिए और ख़ुशी-ख़ुशी करना चाहिए।

एक दिन बरतन को उठाने को लेकर दोनों में ठन गई। इनका एक मुंशी, जो ईसाई था, उनके घर पर नया-नया रहने आया था। उसके साथ घर के सदस्यों सा व्यवहार किया जाता था। पानी की व्यवस्था समुचित नहीं थी इसलिए मल-पात्र को बाहर ले जाकर साफ़ किया जाता था। परिवार के सभी सदस्य ऐसा ही करते थे, पर वह मुंशी ऐसा करने को तैयार नहीं था। वह पंचम कुल में उत्पन्न मुहर्रिर था। गांधी जी चाहते थे कि यह काम बा करे। गांधी जी ने कहा, “तू उसका ‘कमोड’ साफ़ कर दे।” बा ने कहा, “क्यों वह ख़ुद नहीं कर सकता?” गांधी जी का तर्क था, “कर तो सकता है, पर उसने नहीं किया। इसलिए तू कर दे।” बा अड़ गई और उसके शौच के बरतन को उठाने से मना कर दिया। इससे दोनों के बीच ठन गई। कलह हुआ। आखों से आसुओं की बरसात हो रही थी, लेकिन बा ने हाथ में बरतन उठाया और लाल-लाल आंखों से बापू को उलाहने देती सीढियां उतर गईं, “हां-हां कर देती हूं। जब भाग्य में यही लिखा है तो करना ही पड़ेगा।”

पर गांधी जी को इससे संतोष न हुआ। उनको तो संतोष तब होता जब बा हंसते हुए यह काम करतीं। बोले, “देख, इस तरह से रो-झींककर करने की ज़रूरत नहीं है।”

गांधी जी ने फिर उन्हें बुरा-भला कहा। बा की आंखों से आंसू निकल आए। गांधी जी बा से दिए गए कामों को बिना किसी ना-नुकुर के पूरा करने की आशा रखते थे। कस्तूरबा में इतना साहस था कि वे लड़े बिना हार नहीं मानती थीं। बा को जो नहीं जंचता उसे करने से इंकार कर देतीं। गांधी जी ने ऊंची आवाज़ में कहा, “यह मेरे घर में नहीं चलेगा।”

गांधी जी के इस तरह कहने से बात बा के दिल में तीर की तरह चुभ गई। वो भड़क उठीं, बोलीं, “रखो अपना घर द्वार अपने पास और मुझे जाने दो।”

उस समय बापू भगवान को भूल गये। उनमें दया का अंश भी नहीं रहा। उन्होंने बा की बांह पकड़ कर और धक्का देकर, लगभग घर से बाहर कर ही दिया था कि वे झुक गईं। बा की आंखों में आंसू भर आए। गांधी जी उन्हें खींचते हुए सीढ़ियों के सामने बाहर निकलने के दरवाज़े तक ले गए। दरवाजा आधा खोले। बा रोती रहीं। बा ने कहा, “क्या तुम में शर्म-हया नहीं है? अपना आपा खो बैठना क्या ज़रूरी है? मैं कहां जाऊं? यहां मुझे शरण देने वाले मां-बाप या कोई और सगे-संबंधी नहीं हैं। तुम्हारी पत्नी हूं तो तुम समझते हो कि मैं तुम्हारी लात-घूंसा सहती रहूं।”

फिर थोड़ा संयत होते हुए बोलीं, “भगवान के लिए अपने-आपे में रहो और गेट बंद कर दो। तुम्हें तो शर्म नहीं है। लेकिन मुझे है। ज़रा तो शरमाओ। मैं बाहर निकल कर कहां जाऊंगी बताओ ज़रा? यहां मेरे मां-बाप नहीं हैं कि उनके घर चली जाऊं। मैं तुम्हारी पत्नी हूं, इसलिए मुझे तुम्हारी डांट-फटकार सहनी होगी। अब शरमाओ और दरवाजा बंद करो। कोई देखेगा, तो दो में से एक की भी लाज नहीं बचेगी।”

गांधी जी का चेहरा तो क्रोध से लाल था ही, पर वे शर्मिन्दा भी हुए। दरवाज़ा उन्होंने बन्द कर दिया। एक आम दम्पति की तरह वे भी आपस में लड़ते थे, पर हर बार बा अपनी अद्भुत सहनशक्ति से विजय प्राप्त कर जातीं। यह वह समय था जब गांधी जी यह मान कर चलते थे कि पत्नी विषय-भोग का भाजन है, और पति की कैसी भी आज्ञा क्यों न हो, उसका पालन करने के लिए वह सिरजी गयी है।

बाद में गांधी जी इस घटना पर पश्चाताप करते हुए ‘आत्मकथा’ में लिखते हैं,

“यदि पत्नी मुझे छोड़कर नहीं जा सकती थी, तो मैं भी उसे छोड़कर कहां जा सकता था? हमारे बीच झगड़े तो बहुत हुए हैं, पर परिणाम सदा शुभ जी रहा है।”

शनिवार, 24 सितम्बर 2011

जिम्मेदारी

लघुकथा
जिम्मेदारी

-- मनोज कुमार

बॉस ने कल शाम ही कहा था ‘सुबह, .. शार्प एट टेन थर्टी तुम प्रजेंटेशन मुझे दिखाओगे।’ देर रात तक जागकर उसने अपने लैप टॉप पर प्रजेंटेशन के स्लाइड्स तैयार किए थे और इतना खुश था कि बॉस इसे देखेंगे तो उसका कैश अवार्ड तो पक्का ! उसी रोज़ दोपहर बाद मंत्रालय के अधिकारियों के समक्ष वार्षिक प्रगति रिपोर्ट की समीक्षा पेश करनी थी। बॉस उसके पहले स्वयं उस प्रस्तुति की समीक्षा कर लेना चाह रहे थे। कोई चूक न रह जाए। रह-रह कर धीरज के कानों में बॉस का वह वाक्य गूंज रहा था – शार्प, ऐट टेन थर्टी... ... !! उस दिन धीरज सुबह जल्दी ही उठ गया। उसे जल्दी से तैयार हो कर दफ्तर जाना था।

तैयार होकर जब अपने दस मंजिले फ्लैट के नीचे आया तो पाया कि कार के टायर की हवा निकली हुई है ‘शायद पंक्चर हो। अब इसे ठीक कराने जाऊँ तो आधा घंटा तो गया।’ वह टैक्सी के लिए आगे बढ़ गया। जिस दिन जल्दी हो उस दिन टैक्सी भी देर से ही मिलती है। वही हुआ दस मिनट बाद एक खाली टैक्सी मिली। धर्मतल्ला तक सड़क पर भीड़-भाड़ नहीं थी, टैक्सी तेजी से पहुंच गई। पर धर्मतल्ला पहुंचते ही आगे अधिक ट्रैफिक होने के कारण टैक्सी को रुकना पड़ा। तभी एक वृद्ध महिला, लगभग पचहत्तर-अस्सी बरस की, हांफते परेशान-हाल कंधे पर झोलानुमा बैग लटकाए टैक्सी ड्राइवर से पूछी “बावू पी.जी. कोथाय, कोतो दूर। कोन दिक दिए जाबो ?” टैक्सी ड्राइवर ने बताया पीछे की तरफ चली जाओ। दूर तो काफी है। पांच किलोमीटर तो होगा ही। बस ले लो। वृद्धा बोली “टाका नई – जा किछु छिलो निए-निये छे ....... मेये (लड़की) पी.जी. ते भर्ती आछे देखते जावो।”

वृद्धा ने जो बताया उसका सार ये था कि उसकी पुत्री का कल ऑपरेशन हुआ था। बर्दवान से वह उसे देखने आ रही थी। लोकल ट्रेन की भीड़ में बैग से उसके तीन सौ पैसंठ रूपये किसी ने उड़ा लिया था। अब उसके पास कुछ भी नहीं बचा था। कोलकाता वह पहली बार अकेले आई है, .. और उसके पहचान का कोई है भी नहीं यहां। हावड़ा स्टेशन से पूछते-पाछते यहां तक तो पहुंच ही गई है। पी.जी. अस्पताल भी चली जाएगी।

धीरज जो अब तक पिछली सीट पर बैठा उनकी बातें सुन रहा था, ड्राइवर से बोला “इनको बिठा लो , और पी.जी. की तरफ गाड़ी मोड़ दो।” वृद्धा बोली “ना .. .. ना बाबू आपनी जान आपनार अशुबिधा होबे ।”

धीरज बोला “अम्मा किछु होबे ना, आपनी बोशुन छेड़े दिच्ची। ” और उसने उस वृद्धा को पी.जी. अस्पताल के प्रवेश द्वार पर ड्रॉप कर दिया। जाने के पहले अपने मनीबैग के सारे रुपये निकाल कर उसके हाथ में थमाता धीरज बोला – “अम्मा मेयेर जोन्ये सेब निए नेबे आर फेरार समय एई खान थेके हावड़ा पर्जन्तो टैक्सी कोरे नेबे।” वृद्धा की आंख से गंगा-जमुना बह पड़ी, उसके बोल न फूटे, धीरज ने भी अपनी नम होती आंखें वृद्धा से बचाते हुए ड्राइवर से कहा .. “चलो।” पिछली सीट पर अपना सिर टिका कर उसने अपनी आंखे बंद कर ली।

लैपटॉप संभाले जब वह बॉस की केबिन में पहुंचा साढ़े बारह बज चुके थे। बॉस आग-बबूला थे। धीरज को देखते ही उस पर बरस पड़े। न जाने क्या-क्या बोलते रहे। पर धीरज के चेहरे पर स्थिर प्रसन्नता के भाव थे और वह मुस्कुरा रहा था। उसे केवल बॉस का यह अंतिम वाक्य ही सुनाई दिया – “गैर जिम्मेदारी की भी हद होती है ..और-और ये क्या ........ मैं तुम्हें डांटे जा रहा हूँ और तुम मुस्कुरा रहे हो ......? ”

धीरज बोला “सर आज मैंने जो जिम्मेदारी निभाई है वह आप नहीं समझ सकते ............ और जिस मानसिक शांति को इस पल मैं जी रहा हूँ उसमें आपके शब्द मुझे विचलित नहीं कर सकते !!!”

बृहस्पतिवार, 22 सितम्बर 2011

अस्पताल में नर्स का काम

गांधी और गांधीवाद- 69

अस्पताल में नर्स का काम

1897

MahatmagandhiCentenaryofSatyagraha2007दक्षिण अफ़्रीका में गांधी जी का वकालत का काम चल पड़ा। उनकी प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा भी बढ़ती गई। किन्तु उससे उन्हें सन्तोष नहीं हो रहा था। उदरपूर्ति में तो सच्ची सेवा हो ही नहीं सकती थी। वे सोचने लगे कि मानवता की सेवा के लिए कुछ करना चाहिए। इसके लिए वे सादा जीवन जीना चाहते थे। कुछ शारीरिक सेवा का काम करना चाहते थे। समय ने उन्हें यह अवसर भी प्रदान कर दिया।

उनके मन में यह ख़्याल आया कि जनसेवा के काम के लिए स्वयं को अनुशासित करना होगा। उन्होंने सादा जीवन बिताने का निश्चय किया। एक दिन उन्होंने स्वयं अपने कपड़ों में कलफ़ लगाया और उन पर इस्तरी भी की। कपड़े पर बहुत ज़्यादा ही कलफ़ लग गया था। इसके कारण कमीज़ का कालर कड़ा होकर ऊपर उठ गया। उसी कपड़े में वे कचहरी पहुंचे। उनके साथी वकील ने जब उनकी वेश-भूषा देखी तो उनकी हंसी उड़ाने लगे। गांधी जी भी उनके साथ हंसने लगे और उन्हें बताया कि वे अपना सारा काम खुद करने लगे हैं।

एक दिन वे बाल कटवाने गये। नाई गोरा था। उसने गांधी जी को टका सा जवाब दिया, “हम भारतीयों के बाल नहीं काटते।” गांधी जी ने तुरंत एक बाल काटने वाली कैंची और कतरनी खरीदी और घर चले आए। शीशे के सामने खड़े होकर अपने बाल काटने लगे। बच्चे और कस्तूरबाई यह सब देख कर हंस रहे थे। पर गांधी जी पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा। दूसरे दिन जब वे अदालत पहुंचे तो एक वकील ने उनकी खिंचाई शुरु कर दी, “गांधी! तुम्हारे बालों को क्या हुआ है?”

गांधी जी ने सादगी से जवाब दिआ, “भाई बात यह है, कि मैं अपना नाई ख़ुद बन गया हूं।” हंसने वाले तो हंसते रहे। पर गांधी जी सादगी में विश्वास करते रहे। अपने काम की सहायता के लिए कोई सहायक नहीं रखा। उन्होंने बाएं हाथ से भी लिखने की आदत डाली। जब कभी उनका दाहिना हाथ थक जाता तो वह बाएं हाथ से लिखने लगते। घर के ख़र्च में कमी लाने के लिए अपने व्यक्तिगत ख़र्च में कटौती करनी शुरु कर दी। पैदल ही दफ़्तर जाने लगे। बच्चों को साथ ले जाते और रास्ते में उनसे बात करते-करते उन्हें पढ़ाते भी जाते।

संयोगवश एक दिन एक कोढ़ से पीड़ित  अपंग व्यक्ति उनके घर पहुंचा। उसके अंग इस महारोग से गल रहे थे। उसने भोजन की मांग की। सिर्फ़ उसे भोजन देकर विदा करने को उनका मन नहीं मान रहा था। गांधी जी ने उस व्यक्ति को घर के भीतर बुलाया और एक कमरे में उसे ठहाराया। उसके घाव को साफ़ किया, दवा लगाई। उसकी मरहम-पट्टी और सेवा-टहल की। पर यह अधिक दिन तक नहीं चल सका। उस समय न तो उसे घर में रखने की सुविधा उनके पास थी और न ही उतनी हिम्मत। इसलिए उसे वे गिरमिटियों के लिए चलनेवाले सरकारी अस्पताल में उसे भेज दिया।

उनके मन में कहीं न कहीं इस बात का अफ़सोस भी था कि उसकी पूरी तरह सेवा न कर पाए। उनके मन में यह विचार घर कर गया कि वे सेवा-शुश्रूषा का काम करते रहें।

डॉक्टर बूथ सेण्ट एडम्स मिशन के मुखिया थे। दीन-दुखियों के प्रति उनके मन में अपार दया और करुणा थी। वे उनके पास आने वाले मरीज़ों को मुफ़्त में दवा आदि दिया करते थे। वे बहुत ही अच्छे इंसान और दयालु प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। पारसी रुस्तमजी की मदद से डॉ. बूथ की देखरेख में एक छोटा सा अस्पताल खोला गया। गांधी भी कहां चूकने वाले थे। उनकी इच्छा तो थी ही कि वे मरीज़ों की सेवा करें।

गांधी जी ने उस अस्पताल में नर्स का काम करना स्वीकार किया। उस अस्पताल में दवा देने के लिए एक-दो घंटे का काम रहता था। गांधी जी ने यह काम एक स्वयंसेवक की हैसियत से अपने जिम्मे ली। वकालत का उनका काम तो दफ़्तर में बैठकर सलाह देने का, दस्तावेज़ तैयार करने का या झगडों का फैसला कराने का होता था। इन कामों में मि. खान उनकी मदद करने लगे। और इससे बचे हुए समय में गांधी जी अस्पताल में नियमित काम करने लगे।

अस्पताल के काम से गांधी जी को मानसिक शांति मिलती थी। इसके परिणामस्वरूप वे दुखी और पीड़ित भारतीयों के काफ़ी करीब से सम्पर्क में आये। मरीज़ों में अधिकांश तो तमिल, तेलुगु या उत्तर भारतीय गिरमिटिया ही होते थे। गांधी जी बड़ी लगन से उन पीड़ितों की सेवा-शुश्रुषा करते थे। उन ग़रीबों के तन और मन से कष्ट दूर करने का उनका हर संभव प्रयास होता था। इससे उन्हें काफ़ी संतोष मिलता था। न सिर्फ़ ग़रीब देशवासियों के वे एक अनन्य मित्र बन गये बल्कि उनकी सेवा-कार्य का यह अनुभव भविष्य में बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ। वहां काम करने से उन्हें रोगी का इलाज करना, मरहम-पट्टी लगाना, किस रोग में कौन-सी और कितनी दवाई देनी है, आदि का अनुभव हो गया। बोअर युद्ध के समय घायलों की सेवा-शुश्रुषा के काम में और दूसरे बीमारों की परिचर्या में उन्हें यह अनुभव बड़ा काम आया।

यह अनुभव घर में भी काम आया। इसकी चर्चा हम अगले अंक में करेंगे।

मंगलवार, 20 सितम्बर 2011

मध्यकालीन भारत - धार्मिक सहनशीलता का काल (तीन) आचार्य रामानुज

मध्यकालीन भारत - धार्मिक सहनशीलता का काल (तीन)
आचार्य रामानुज

भारत में दर्शन सदैव ही धर्म के साथ-साथ चलता रहा है। धर्म की गूढ़ता सामान्य लोगों की समझ से अकसर बाहर रहती है। ऐसी स्थिति में रहस्य और भक्ति की भावना द्वारा उसका व्यावहारिक रूप सामने आता है और पनपता है। आलवारों की भक्ति रामानुज के यहां दार्शनिक आधार पाकर नए युग की चुनौतियों का मुक़ाबला करने में सक्षम हुई। दक्षिण भारत का भक्ति आंदोलन धीरे-धीरे अपना उन्मुक्त और समतावादी चरित्र खोने लगा। संतों द्वारा जातिगत प्रतिबंध की उपेक्षा करने के बावज़ूद जाति व्यवस्था और ब्राह्मणों की श्रेष्ठता को चुनौती नहीं दी गई। न सिर्फ़ मंदिरों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई बल्कि कर्मकांड की अधिकता भी होने लगी।

ग्यारहवीं शताब्दी में श्री शंकराचार्य के अद्वैतवाद एवं दक्षिण भारतीय भक्तिवाद के विचारों को वैष्णव संत रामानुज ने संयुक्त कर प्रस्तुत किया। उनके इस सफल प्रयास के कारण उन्हें मध्यकालीन भारत के भक्ति आंदोलन का संस्थापक कहा जाता है। उनका जन्म जन्म 1017 ई॰ में मद्रास के समीप पेरंबदूर में हुआ था। भक्ति आंदोलन के प्रमुख संतों में आचार्य रामानुज का नाम सर्वोपरि है। वे सगुण ईश्‍वर के उपासक थे। उन्होंने आलवारों की भक्ति को दार्शनिक आधार प्रदान किया। उनके मत को विशिष्ट अद्वैतवाद के नाम से जाना जाता है। सन 1137 ई में 120  वर्ष की आयु में वे ब्रह्मलीन हो गए।

उनका मानना था कि कर्म का रास्ता लोगों को माया में उलझा देता है। इसलिए उसकी मुक्ति संभव नहीं है। इसी तरह ज्ञान का मार्ग उसे इच्छाओं और सम्पत्ति की कामना से मुक्ति दिलाएगा, और यह मुक्ति भी अधूरी है। अत: उनके अनुसार सिर्फ भक्ति के द्वारा ही मोक्ष संभव है। जहां एक ओर वे श्री शंकराचार्य के अद्वैतवाद में विश्‍वास रखते थे वहीं दूसरी ओर इस मत को ग्रहण करने के लिए व्यक्ति में किसी खास प्रकार की योग्यता होना आवश्यक नहीं मानते थे। संत रामानुज का मानना था कि सर्वोच्च सत्ता की विशेषता उसकी दया में है। उनका कहना था कि मोक्ष परमात्मा की दया से संभव है। उनकी दया प्राप्ति के लिए हमें उनके (ईश्‍वर के) प्रति अनन्य भक्ति भाव से निष्ठावान होना चाहिए। इस मत के अनुसार ईश्वर ही सर्वशक्तिमान है। वही सृष्टि की रचना करने वाले हैं, पालक हैं और संहारकर्ता हैं। जीवात्मा और जड़ जगत ईश्वर के ही भाग हैं। तीनों ही एक हैं। यह सत्य होते हुए भी उस्से अलग है। जीवात्मा ईश्वर भक्ति के द्वारा ही मोक्ष पा सकती है।

आलवार और नयनार संत पुस्तकीय ज्ञान की उपेक्षा करते थे, जबकि रामानुज ने भक्ति को वेदों की परंपरा के साथ जोड़ने का प्रयास किया। उनके मत में भक्ति का मार्ग सबके लिए खुला था। संत रामानुज के भक्ति आंदोलन के सिद्धांत धार्मिक सुधार तक ही सीमित थे, इसमें समाज सुधार के प्रति रुचि नगण्य थी। बल्कि उनका सिद्धांत वर्ग के बीच अंतर का अनुमोदन करता था। इन दो अलग-अलग वर्ग के व्यक्तियों के लिए मोक्ष प्राप्ति के लिए उन्होंने अलग-अलग मार्ग बताए : भक्ति :- उच्च कुल में जन्मे व्यक्ति के लिए श्रद्धा या निष्ठा के द्वारा मोक्ष प्राप्ति तथा प्रपत्ति :- निम्न कुल में जन्मे व्यक्ति को, उनके अनुसार आत्म समर्पण के द्वारा ही मोक्ष संभव था। हालाकि उच्च जातियों के अधिकारों को उन्होंने क़ायम रखा और निम्न वर्ग के साथ खान-पान का निषेध बना रहा, फिर भी हम यह मान सकते हैं कि उन्होंने निचले तबके के लोगों के लिए मोक्ष का मार्ग प्रशस्त किया, चाहे वह भेद-भाव मूलक आत्म समर्पण द्वारा ही क्यों न बताया गया हो।

आलवारों की भक्ति रामानुज के यहां दार्शनिक आधार पाकर नए युग की चुनौतियों का मुक़ाबला करने में सक्षम हुई। उस युग में सामाजिक समानता की दिशा में उठाया गया यह पहला महत्वपूर्ण क़दम था। आचार्य रामानुज ने उच्च जातियों के अधिकारों को क़ायम रखते हुए सीमित रूप में निम्न वर्गों की आशा को भी निराशा में नहीं बदलने दिया। उनके सम्प्रदाय ने लाखों शूद्रों और अछूतों को अपना अनुयायी बनाया। आचार्य रामानुज मानव कल्याण की भावना से ओत-प्रोत, प्रेम और उदारता की महान मूर्ति थे। आचार्य रामानुज ही ऐसे संत थे जिन्होंने छुआछूत की भावनाओं को अलग रखकर निम्न वर्ग के व्यक्ति के लिए ईश्वर भक्ति के निषेध को अनुचित माना। यहां तक कि उन्होंने दलितों को ईश्वर भक्ति के लिए मंदिर में प्रवेश को भी सही ठहराया। इतना होने पर भी वैषणवों का भक्ति मार्ग व्यावहारिक रूप में तत्कालीन सामाजिक तथा धार्मिक असमानताओं को दूर नहीं कर सका।

शनिवार, 17 सितम्बर 2011

गांधी जी का खोया हुआ धन

गांधी और गांधीवाद- 68

गांधी जी का खोया हुआ धन

IMG_1661गांधी जी के बड़े पुत्र हरिलाल गांधी जी की बड़ी पुत्री रामी बहन की पुत्री नीलम पारीख ने एक पुस्तक लिखी है, “गांधी जी का खोया हुआ धन हरिलाल गांधी”। सच में, हरिलाल गांधी जी का खोया हुआ धन ही थे।

पिछले अध्याय (बच्चों की पढ़ाई) को थोड़ा और आगे बढ़ाया जाय। कुछ लोगों ने बच्चों की शिक्षा के प्रति गांधी जी के विचार की अलोचना करते हुए लिखा कि ‘वह गांधी जी का मूर्च्छाकाल था’, ‘उनके विचार मोहजन्य थे’, ‘यह उनके अभिमान और अज्ञान की निशानी था’, ‘यदि लड़के बैरिस्टर आदि की पदवी पाते तो क्या बुरा होता’, ‘उन्हें बच्चों के पंख काट देने का क्या अधिकार था’, ‘उन्होंने बच्चों को ऐसी स्थिति में रखा कि वे उपाधियां प्राप्त करके मनचाहा जीवन-मार्ग नहीं चुन सके’, आदि-आदि।

गांधी जी स्वयं अपनी ‘आत्मकथा’ में लिखते हैं, “यद्यपि मैं उन्हें जितना चाहता था उतना अक्षर-ज्ञान नहीं दे सका, तो भी अपने पिछले वर्षों का विचार करते समय मेरे मन में यह ख़्याल नहीं उठता कि उनके प्रति मैंने अपने धर्म का यथाशक्ति पालन नहीं किया और न मुझे उसके लिए पश्चाताप होता है। इसके विपरीत, अपने बड़े लड़के के बारे में मैं जो दुखद परिणाम देखता हूं, वह मेरे अधकचरे पूर्वकाल की प्रतिध्वनि है, ऐसा मुझे सदा लगा है।”

आगे बढ़ने के पहले ‘आत्मकथा’ में वर्णित उनके इस विचार को भी सामने रखना आवश्यक प्रतीत होता है, “... सत्य का पुजारी इस प्रयोग से यह देख सके कि सत्य की आराधना उसे कहां तक ले जाती है और स्वतंत्रता देवी का उपासक देख सके कि वह देवी कैसा बलिदान चाहती है।”

IMG_1665गांधी जी की इन बातों से यह तो ज़ाहिर होता ही है कि पिता और पुत्र के बीच में तनाव था। हरिलाल का जन्म जून 1888 में हुआ था। नौ साल की उम्र में पिता के साथ दक्षिण अफ़्रीका 1896 में आए। 1902 में जब गांधी जी भारत से पुनः दक्षिण अफ़्रीका गये तो हरिलाल को भारत में ही छोड़ गए क्योंकि वे बम्बई के एक बोर्डिंग स्कूल, एस्प्लेनेड हाई स्कूल, की पांचवीं कक्षा में पढ़ रहे थे।

हरिदास वखतचंद वोरा की तीन पुत्रियां थीं, बड़ी बलि बहन (जीवी बहन), मंझली गुलाब बहन और छोटी कुमुद बहन। गुलाब बहन को पुत्री की तरह गांधी जी ने गोद में खिलाया था। हरिदास भाई के साथ, हरिलाल से गुलाब के ब्याह की बात भी गांधी जी ने की थी। जब गांधी जी दक्षिण अफ़्रीका में थे तो उनके बड़े भाई लक्ष्मी दास ने गुलाब बहन के साथ शादी पक्की कर दी। बा, मणिलाल, रामदास और देवदास दक्षिण अफ़्रीका में थे, बापू के साथ। गांधी जी कम उम्र में शादी के ख़िलाफ़ थे। बा से भी सलाह नहीं ही ली गई थी। एक रूढ़िग्रस्त परिवार में पुत्रवधू से पूछने की ज़रूरत भी नहीं समझी गई। 2 मई 1906 को हरिलाल की शादी हो गई। तीन महीने बाद ही हरिलाल दक्षिण अफ़्रीका चले गये। चाचा खुशालचंद से 10 पौंड की राशि उधार लेकर जोहानिसबर्ग का टिकट कटाया गया।

IMG_1667वहां पहुंचने के बाद हरिलाल गांधी जी के साथ काम में जुट गए। बाद में वे फीनिक्स आश्रम से भी जुड़े और वहां ‘इंडियन ओपिनियन’ अखबार के दाफ़्तर में काम करने लगे।

10 अप्रैल 1908 को गुलाब बहन ने पुत्री को जन्म दिया। रामनवमी का दिन था। बच्ची का नाम रामी बहन रखा गया। हरिलाल का विवाहित जीवन सुखद था। बाद में नौजवान दम्पती दक्षिण अफ़्रीका में फीनिक्स आश्रम में बाक़ी परिवार के साथ रहने लगे। उनमें एक सामान्य युवक की आशाएं और आकांक्षाएं भी थीं। व्यवसायिक जीवन उनका असफल रहा था। 1918 में उनका बेटा और पत्नी महामारी में चल बसे। उन्हें गहरा मानसिक आघात लगा। वे सावरमती आश्रम के आश्रम जीवन धारण नहीं कर सकते थे। उनके भाव और आचरण दुनियावी थे। उनकी तीन संताने थीं, रामी बहन, मनु बहन और कान्ति भाई।

IMG_1669हरिलाल और पिता के बीच का मतभेद दक्षिण अफ़्रीका में उपजा और कभी नहीं मिट पाया। एक घटना का वर्णन करते चलें। 1909 में गांधी जी के मित्र प्राण जीवन मेहता ने एक बेटे को वजीफ़ा देने का प्रस्ताव किया। वजीफ़ा पाने वाला लंदन जाकर शिक्षा ग्रहण करता। वह ‘ग़रीबी का व्रत’ लेता और शिक्षा पूरी करने के बाद फीनिक्स में सेवा करता। श्री मेहता ने कहा था, “हरिलाल अब बड़ा हो गया है। उसे मेरे पास लंदन भेज दीजिए।” किन्तु, इस सम्मान के लिए छगनलाल गांधी (गांधी जी के काका जीवण चंद्र के पुत्र खुशाल चंद के पुत्र) को चुना गया। वे बीमार पड़ गये और शिक्षा पूरी किए बगैर लौट आए। इस वजीफ़े के लिए अगले विद्यार्थी के तौर पर सोराबजी शापुरजी अडाजानिया को चुना गया। हरिलाल को इस बार भी छोड़ दिया गया। यही उनकी कटुता का कारण बना। यह कटुता ता-उम्र बनी रही। हरिलाल को शिक्षा की लालसा और उससे उन्हें वंचित कर दिया जाना जीवन भर सालता रहा। हरिलाल ने प्रतिक्रिया में दक्षिण अफ़्रीका छोड़ दिया। घटना से विचलित होकर बा ने कहा, “क्या वह अपने बेटों को अशिक्षित रखना चाहते हैं? क्या वह चाहते हैं कि वे लंगोटी पहन कर ज़िंदगी गुज़ारें?”

IMG_1671बुद्धिमान, संवेदनशील और होनहार हरिलाल ने व्यस्क जीवन एक सत्याग्रही के रूप में आरंभ किया। गांधी जी द्वारा चलाए जा रहे आन्दोलन में भी हरिलाल ने ज़ोर-शोर से भाग लिया। वहा उन्हें सब ‘नाना गांधी’ या ‘छोटे गांधी’ के रूप में पहचानते थे। नवंबर 1908 में उनकी गिरफ़्तारी भी हुई। छह महीने जेल में रहे। 1908 से 1910 के बीच छह बार दक्षिण अफ़्रीका में जेल गए और एक बार भारत में जेल गये। गांधी जी की पहली जेलयात्रा 10 जनवरी 1908 को ‘काला क़ानून’ भंग करने के जुर्म में हुई थी। हरिलाल 27 जुलाई 1908 को जेल गये। गांधी जी ने उन्हें आदर्श सत्याग्रही कहा था। उनके अनासक्त रहने की प्रशंसा भी की थी। फिर भी दोनों में मतभेद था। हरिलाल कहते हैं, “हमारे वर्षों के इस मतभेद का मुख्य कारण हमारे शिक्षा संबंधी विचार हैं।”

“गांधी जी हरिलाल और अपने अन्य तीनों पुत्रों की परवरिश सामान्य पिता की तरह कर सकते थे। लेकिन प्रश्न है कि वे क्या ‘हिन्द स्वराज’, ‘सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा’ और ‘अनासक्तियोग’ गांधी हो सकते थे? क्या वे हमारे ‘राष्ट्रपिता’ हो सकते थे? सार्वजनिक और व्यक्तिगत जीवन और हितों के बीच एक अपरिहार्य अंतर्विरोध है।” (डॉ. योगेन्द्र पाल आनन्द, निदेशक, राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय)

IMG_1672गांधी जी चाहते थे कि हरिलाल उनकी विरासत संभालें। हरिलाल के विकास के लिए उन्होंने काफ़ी कोशिशें की। वे चाहते थे कि हरिलाल उनके सेक्रेटरी बनें। लेकिन प्रारब्ध के आगे सारी कोशिशें बेकार हो जाती हैं। हरिलाल की नतनी नीलम पारीख लिखती हैं, “लेकिन ईश्वर का दिया धन (हरिलाल) गांधी जी ने एक हाथ से खो दिया तो उसी ईश्वर ने दूसरे हाथ में अनेक युवकों को पुत्रों को दे दिया।”

हरिलाल के मन में असंतोष था। जब शादी हुई तो गांधी जी ने कोई उत्साह नहीं दिखाया। दक्षिण अफ़्रीका में पढ़ाई के लिए उदासीनता दिखाई। गुलाब बहन जब भारत जातीं तो पहुंचाने के लिए साथ जाना चाहते थे। गांधी जी आर्थिक दृष्टि से स्वीकार नहीं कर पाते। तंग आकर पिता का घर छोड़कर चले जाने का निश्चय किया। पर मूल कारण तो पढ़ाई की उत्कंठा ही थी। 10 फरवरी 1911 को भारत में पुत्र कान्तिभाई का जन्म हुआ। वे भारत जाने को उत्सुक हो गये थे। 8 मई 1911 को कुछ चीज़ें बटोरकर, जिसमें गांधी जी की एक तस्वीर भी थी, चुपके से बिना किसी को बताए जोहानिसबर्ग से निकल गये। 17 मई को रेलवे स्टेशन पर विदा देते हुए गांधी जी ने कहा, “बाप ने तुम्हारा कुछ बिगाड़ा हो, ऐसा लगे तो उसे माफ़ करना।”

वातावरण ग़मगीन था। गाड़ी चल पड़ी थी। बोझिल मन से पिता-पुत्र अलग हुए थे। 1911 में इस भावना के अधीन कि गांधी जी उनकी पढ़ाई और भविष्य का ध्यान नहीं कर रहे, हरिलाल भारत चले आए।

साबरमती आश्रम के दिनों में हरिलाल ने स्वीकार किया था कि उनसे ग़लतियां हुईं। भविष्य में वे अपने पिता की इच्छा के अनुसार व्यवहार करेंगे। उन्होंने एक गांव में रहकर शेष जीवन उनकी सेवा में बिता देने का संकल्प लिया। गांधी जी यह जानकर काफ़ी ख़ुश हुए और बोले, “तब तो मैं तुम्हारी गोद में दम तोड़ूंगा।” लेकिन ऐसी स्थिति ज़्यादा दिनों तक नहीं बनी रही। (यह किस्सा फिर कभी)

उस दिन को याद करती नीलम पारीख लिखती हैं,

“देश सेवा की तपश्चर्या के अंश के रूप में गांधी जी ने पुत्र की आहुति दी!”

***

शुक्रवार, 16 सितम्बर 2011

मां, मातृभाषा और मातृभूमि

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एक मित्र ने मेल में ये भेजे थे। मैं उनका ऋणी हूं। आज सोचा इसे इस ब्लॉग के माध्यम से शेयर कर लूं।

 

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बुधवार, 14 सितम्बर 2011

हिन्दी दिवस- कुछ तू-तू मैं-मैं, कुछ मन की बातें … !

हिन्दी दिवस- कुछ तू-तू मैं-मैं, कुछ मन की बातें … !

जिसकी   आँखों   में    लाचार    सपने,
जिसकी वाणी में अमृत-कलश है !
उसको देखा, तो   फिर   याद   आया,
देश    में    आज   हिंदी   दिवस   है !!

आज हिंदी दिवस है। लोग हिंदी दिवस पर अंगरेजी को गाली देकर अपना धर्म निर्वाह कर लेते हैं! अख़बार उलटाओ तो .. हिन्दी दिवस के अवसर पर लिखा हुआ बहुत कुछ पढने, देखने और सुनने को मिल जाता है।

कुछ अखबारों के शीर्षक देखिए ..

“हिंदी अपने घर में प्रवासिनी”,  “हाशिए पर हिंदी”, “हिदी को राष्‍ट्रभाषा बनाने में राजभाषा विभाग का टालू रवैया”,  “हिंदी के प्रति कब खत्‍म होगी लापरवाही”, आदि, आदि।

इस दिन जब ये सब पढता हूं तो एक शे’र बरबस आ जाता है ज़ुबान पर

कोई हद    ही नहीं शायद   मुहब्बत   के फसाने की

सुनाता जा रहा है जिसको जितना याद आता है।

इन दिनों मैंने अखबार पढना ही बंद कर दिया है, क्योंकि

है पता हमको वहां पर कुछ नया होगा नहीं

हाथ   में   हर   चीज़   होगी   आइना होगा नहीं।

अखबारों और अन्य कई जगह इन सूर्ख़ियों को देख लगता है जब हम घर से बाहर निकलते हैं तो हमारे हाथ में भाला बरछी, लाठी सोंटा सब होता है, पर आइना नहीं होता। प्रसंगवश यह भी बताता चलूं कि मुझे यह गाना बहुत अच्छा लगता है,

ये न पूछें मिला क्‍या है हमको

हम ये पूछें किया क्‍या है अर्पण

हर कोई दुनिया को बदलना चाहता है, लेकिन खुद को बदलने के बारे में कोई नहीं सोचता। सरकारी कार्यालयों में जो प्रयोग होता है वह राजभाषा है। और १४ सितंबर को जो मनाया जाता है वह राजभाषा हिंदी दिवस है, साहित्य भाषा हिंदी दिवस नहीं। राजभाषा नीति, प्रेरणा, प्रोत्‍साहन और सद्भावना पर आधारित है। यह माना जाता है कि जब तक एक भी हिंदीतर भाषी राज्‍य असहमत होगा तब तक हिंदी राष्‍ट्रभाषा नहीं बन सकती। अशोक चक्रधर के शब्दों में कहें तो हिंदी तो जगन्नाथी रथ है, इसे हम सब मिलकर खीचें।

पूरा सितम्बर माह इसी बहस में निकल जाता है कि हिंदी हाशिये पर जा रही और अंग्रेजी स्थापित हो रही है। . हिंदी पर सभी बात करना चाहते हैं, दिमाग उनका पहले हिंदी ही सोचता है लेकिन स्वीकारोक्ति में असहज हैं।  यह देश अंधभक्ति वाला देश है, इसमें शायद किसी को दो राय नहीं होगी। लोग अपनी जिम्मेदारी भी भूल जाते हैं, जीवन के सभी आयामों में उत्तरदायित्व का बोध समाप्त प्राय है, तो भाषा कैसे अछूती रहेगी! जो चिंता हिंदी के साथ है वही चिंता सभी भारतीय भाषाओँ के साथ है, लेकिन हम इस पर विचार नहीं करते। ए़क साथ नहीं आते ए़क मंच पर भारतीय भाषाओँ की बात नहीं करते।

इक्‍कीसवीं सदी की व्‍यावसायिकता जब हिन्‍दी को केवल शास्‍त्रीय भाषा कह कर इसकी उपयोगिता पर प्रश्‍नचिह्न लगाने लगी तब इस समर्थ भाषा ने न केवल अपने अस्तित्‍व की रक्षा की, वरण इस घोर व्‍यावसायिक युग में संचार की तमाम प्रतिस्‍पर्धाओं को लाँघ अपनी गरिमामयी उपस्थिति भी दर्ज कराई। जनसंचार के सबसे सशक्त माध्यम सिनेमा और टेलीविजन ने हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में वैश्‍विक क्रांति दी है। आज हर कोई हिंदी बोल समझ लेता है, लिख पढ़ भले न पाए।

विज्ञापन की दुनियां में हिंदी का बोलबाला है। विज्ञापन की दुनियां का हिंदी के बगैर काम नहीं चलता। विज्ञापन गुरु यह जान और मान चुके हैं कि माल अगर बेचना है तो उन्हें हिंदी में ही बाज़ार में उतरना पड़ेगा। हां ये जो हिंदी परोसी जा रही है, यह सर्वग्राह्य हिंदी है।

आज बाज़ारबाद शबाब पर है। उत्‍पादक तरह-तरह से उपभोक्‍ताओं को लुभाने का प्रयास करते हैं। ऐसे में विज्ञापन की भूमिका महत्‍वपूर्ण हो जाती है। दिवा-रात्री समाचार चैनल, एफ.एम. रेडियो और विज्ञापन एजेंसियों की बाढ़ में बिना लाग लपेट बेवाक और संक्षिप्‍त शब्‍दों में पूरी रचनात्‍मकता वाली हिन्दी का ही बाज़ार है। इंटरनेट पर भी हिंदी का अभूतपूर्व विकास हो रहा है। इंटरनेट पर हिंदी की कई वेबसाइटें हैं। हिंदी के कई अख़बार नेट पर उपलब्ध हैं। कई साहित्यिक पत्रिकाएं नेट पर पढ़ी जा सकती हैं। हिंदी में ब्लॉग लेखक आज अच्छी रचनाएं दे रहें हैं। भारत में इलेक्ट्रॉनिक जनसंचार माध्यमों का प्रयोग दिनोंदिन बढ़ रहा है। यह देश की संपर्क भाषा के रूप में हिंदी के विकास का स्पष्ट संकेत देता है।

यह भी कहा जाता है कि बाज़ारवाद के असर में हिंदी भाषा के बदलते रूप से लोग आतंकित हैं। कुछ यह कहते मिल जाएंगे कि “हमें बाज़ार की हिंदी से नहीं बाज़ारू हिंदी से परहेज़ है।”  जिस बाज़ारू भाषा को बाज़ारवाद से ज़्यादा परहेज़ की चीज़ कहा जा रहा है वह वास्तव में कोई भाषा रूप ही नहीं है। कम से कम आज के मास कल्चर और मास मीडिया के जमाने में। आज अभिजात्य वर्ग की भाषा और आम आदमी और बाज़ारू भाषा का अंतर मिटा है। क्योंकि आम आदमी की गाली-गलौज वाली भाषा भी उसके अंतरतम की अभिव्यक्ति करने वाली यथार्थ भाषा मानी जाती है। उसके लिए साहित्य और मीडिया दोनों में जगह है, ब्लॉग पर भी। आज सुसंस्कृत होने की पहचान जनजीवन में आम इंसान के रूप में होने से मिलती है। दबे-कुचलों की जुबान बनने से मिलती है, गंवारू और बाज़ारू होने से मिलती है। यह हिन्दी उनकी ही भाषा में पान-ठेले वालों की भी बात करती है, और यह पान-ठेले वालों से भी बात करती है, और उनके दुख-दर्द को समझती और समझाती भी है। साथ ही उनमें नवचेतना जागृत करने का सतत प्रयास करती है। अत: यह आम आदमी की हिंदी है, बाज़ारू है तो क्या हुआ। बाज़ार में जो चलता है वही बिकता है और जो बिकता है वही चलता भी है।

प्रचलित और सबकी समझ में आने वाली व्यवहार-कुशल हिंदी ही संपर्कभाषा का रूप ले सकती है। साहित्यिक और व्याकरण सम्मत हिंदी का आग्रह रख हम इसका विकास नहीं कर सकेंगे। सामान्य बोलचाल में प्रचलित अंग्रेज़ी, पुर्तगाली, अरबी, फ़ारसी, उर्दू से लेकर देश की तमाम बोलियों और प्रादेशिक भाषाओं के शब्दों के हिंदी में प्रयोग से सही अर्थों में यह जनभाषा बन सकेगी और तभी हिंदी और हिंदीतर भाषाईयों के बीच की दूरी पट सकेगी। हिन्दी की विकास यात्रा में इसे और अधिक प्रयोजनमूलक यानी फंक्शनल बनाया जाए। प्रयोजनमूलक हिन्दी जीवन और समाज की ज़रूरतों से जुड़ी एक जीवन्त, सशक्त और विकासशील हिन्दी भाषा है। आज ऐसी ही प्रयोजनमूलक हिंदी के ज़रिए हमारा प्रयास भारत के सभी प्रांतों, अंचलों और जनपदों को सौहार्द्र, सौमनस्य व परस्पर स्नेह से एक सूत्र में बांधने का होना चाहिए।

हिंदी लाहे लाहे पूरे देश में पसर रही है । कह कर न मैं हिंदी को कमजोर कर रहा हूँ न उसका दायरा सीमित । अगर ट्रेन लेट है कहकर बात बनती है तो उसे विलम्‍ब क्यों कर दूँ । अगर ट्रेन स्‍टेशन में ढुक रही है से बात ज्‍यादा समझ में आए तो आगमन के इंतजार में क्‍यों बैठूँ ।

हिन्दी को इतने क्लिष्ट शब्दों से न लाद दो कि वह जन जन से दूर होती जाये । परन्तु तथाकथित विद्वान इसको मँच से नीचे सामान्य आदमी के स्तर तक उतरने ही नहीं देना चाहते, जिससे कि वह इसे सरलता से स्वीकार कर सकें ।

मंगलवार, 13 सितम्बर 2011

जीने के लिए

जीने के लिए

दुर्वासा न बनो

मुझे नहीं मरना

किसी बहेलिए के हाथों

तुम्‍हारी जुदाई ही काफी है

मुझे हरपल मारने के लिए।

 

पीपल !
उग आना तुम
मेरी समाधि पर
हवा से कांपते
तुम्हारे पत्ते
दिलाते रहेंगे
एहसास मुझे
कि उसकी सांसे
तिर रही है
यहीं कहीं

इतना ही काफ़ी है
मेरे जीने के लिए ..

सोमवार, 12 सितम्बर 2011

बच्चों की पढ़ाई

गांधी और गांधीवाद- 67

बच्चों की पढ़ाई

DSCN1313गांधी जी, कस्तूरबाई, उनके साथ दस साल के उनके भांजे गोकुलदास, नौ साल के उनके बड़े बेटे हरिदास और पांच साल के दूसरे बेटे मणिदास सब बीच ग्रोव विला में रहने आ गये थे। यह मकान शहर से बाहर अच्छे मध्यवर्गीय लोगों के मोहल्ले में था। दोमंज़िला घर था, जिसमें कुल आठ कमरे थे। सामने लोहे का गेट था। एक छोटा सा बगीचा भी था। एक बड़ा सा बरामदा था और बालकोनी का रुख समुद्र की तरफ़ था। ऊपर से नीचे जाने के लिए यूरोपीय पद्धति की सीढ़ी थी। कालीन लगे मेहमान कक्ष में सोफ़े लगे हुए थे। बड़ी-सी आराम कुर्सी भी थी। पुस्तक रखने की आलमारी में तरह-तरह की पुस्तकें थीं। टॉल्स्टॉय, बाइबल, क़ुरान, शाकाहार की पुस्तकें और न जाने क्या-क्या? भोजन कक्ष में आयताकार टेबुल था जिसके चारों ओर आठ कुर्सियां लगी थीं। लेकिन राजकोट की तरह आंगन नहीं था। तुलसी का पेड़ नहीं था। रसोई घर में बैठकर खाना बनाने की सुविधा नहीं थी। खड़े-खड़े खाना बनाने में कस्तूरबाई को काफ़ी दिक़्कतों का सामना करना पड़ता था। महीनों से बन्द कमरों में धूल गर्द भर गये थे। उन्हें ठीक करने में बा की तो जान ही निकल गई। कोई पूजा घर नहीं था। उन्होंने उसका भी इंतज़ाम किया। सब कुछ कर लेने के बाद भी एक कमी तो सताती ही थी। आराम के सामय राजकोट की तरह गप-शप करने के लिए लोग नहीं थे।

DSCN1314जब व्यवस्थित हुए तो सबसे बड़ी समस्या थी कि बच्चों को कहां पाढ़ाया जाय। उन दिनों डरबन में हिंदी बच्चों के लिए शिक्षण की कोई व्यवस्था नहीं थी। वे बच्चों को गोरों के लिए चलाये जा रहे स्कूल में भेज तो सकते थे, पर यह मेहरबानी होती, जो उन्हें पसंद नहीं थी। वहां तो कोई भारतीय बालक पढ़ सकते नहीं थे। कौम के आम बच्चे जिस सुविधा से वंचित रहे, वहां अपने बाच्चों के लिए विशेष व्यवस्था का उपयोग करना गांधी जी को अनुचित लगा। भारतीय बालकों के लिए ईसाई मिशन के स्कूल थे। पर उन्हें वहां भेजने को गांधी जी तैयार नहीं थे। वहां दी जाने वाली शिक्षा गांधी जी को पसंद नहीं थी। उनका दृढ़ विश्वास था कि ईसाई मिशनरी स्कूलों में पढ़े बच्चों में राष्ट्र-प्रेम या समाज-सेवा की भावना की कमी होती है। गुजराती माध्यम से पढ़ाई तो वहां मिलने से रही। माध्यम तो अंगरेज़ी ही थी। गांधी जी ने अपने बच्चों को यूरोपीय स्कूल में नहीं पढ़ाया। वे खुद ही बच्चों को पढ़ाने की कोशिश करते। बच्चों को अपने साथ दफ़्तर ले जाते और रास्ते में उनसे बातें करते और शिक्षा देते जाते। उनके विचार में बच्चों के लिए यही अच्छी शिक्षा थी। लेकिन अपनी अन्य व्यस्तताओं के चलते वह भी नियमित रूप से न हो पाता।

images (29)इससे तो काम चलने वाला नहीं था। गांधी जी ने एक अंगरेज़ी शिक्षक का विज्ञापन दिया। एक अंग्रेज़ महिला मिली। 7 पौण्ड प्रति माह पर उसने पढ़ाना शुरु किया। गांधी जी स्वयं बच्चों से गुजराती में ही बातचीत किया करते थे। आसपास अंग्रेज़ी का माहौल था, अतः बच्चे खेल-कूद में ही अंग्रेज़ी सीख गये। गांधी जी का मानना था कि छोटे बच्चों को मां-बाप के साथ ही रहना चाहिए, इसलिए उन्हें भारत भेजने का तो सवाल ही नहीं था। बाद के दिनों में हरिदास व्यस्क होने पर, अपनी इच्छा से अहमदाबाद के हाई स्कूल में पढ़ने के लिए दक्षिण अफ़्रीका छोड़कर भारत चले आए। गोकुलदास की शिक्षा वहीं हुई और इससे गांधी जी काफ़ी संतुष्ट थे। दुर्भाग्यवश, भरी जवानी में कुछ ही दिनों की बीमारी के बाद, उनका देहान्त हो गया। गांधी जी के बाक़ी के तीन बच्चे कभी स्कूल में नहीं गये। सत्याग्रह के दिनों में उन्होंने एक स्कूल खोला था। इन बच्चों ने इसी में थोड़ी-बहुत नियमित शिक्षा प्राप्त की।

बड़ी ही विकट स्थिति थी। बच्चों को जो शिक्षा गांधी जी देना चाहते थे, दे नहीं पाए। इस कारण से बच्चों की हमेशा उनसे शिकायत रही। व्यवस्थित शिक्षण के अभाव का क्षोभ चारों बच्चों के मन में जीवन भर बना रहा। फिर भी गांधी जी और कस्तूरबाई के सान्निध्य में उन्हें काफ़ी अनुभव-ज्ञान प्राप्त होता रहा। उन्होंने सेवाभाव सीखा। सदगी सीखी। स्वतंत्रता के पाठ पढ़े। देशकार्य सीखा। मनुष्यता सीखी। हो सकता है गांधी जी उन्हें अपने से दूर रखकर अक्षर-ज्ञान दे सकते थे, किन्तु उस दशा में स्वतंत्रता और स्वाभिमान को जो पाठ उन्होंने सीखा वह न सीख पाते। मां-बाप के सादगीपूर्ण जीवन से ये चारों बच्चे भी मेहनती, देश-प्रेमी और सेवाभावी बन गये। बच्चे संस्कारी, नम्र और समझदार बने। गांधी जी तो न्यायनीति के उपासक थे, उन्हें सत्य की साधना करनी थी, न कि बच्चों को ऐश्वर्यशाली बनाना था। बच्चों ने कोई डिग्री भले ही न पाई हो, किन्तु उनका आभिजात्य और निर्भयता, सदाचार, सेवाभाव और सच्चरित्र उच्चकोटि का था। वे स्वावलंबी, स्वाभिमानी और न्यायप्रिय थे। कभी किसी हस्ती से नहीं डरे। अन्याय का प्रतिकार करने में उन्होंने कोई कमी नहीं की।

शनिवार, 10 सितम्बर 2011

मध्यकालीन भारत - धार्मिक सहनशीलता का काल (दो) आलवार और नयनार संत

लिंक मध्यकालीन भारत - धार्मिक सहनशीलता का काल (एक)
मध्यकालीन भारत - धार्मिक सहनशीलता का काल (दो)

आलवार और नयनार संत

छठी सदी के उत्तरार्द्ध से लेकर दसवीं सदी तक दक्षिण भारत में अनेक संतों ने भक्ति आंदोलन का विस्तार किया। इन संतों की भक्ति विशुद्ध प्रेम पर आधारित थी। वैष्णव संत आलवार और शैव संत नयनार ने मोक्ष प्राप्ति के लिए भक्ति का रास्ता लोगों को दिखाया। इन लोगों ने मुक्ति के लिए इष्ट देवता के प्रति निष्ठा की शिक्षा दी। उन्होंने व्यक्तिगत भक्ति को मोक्ष का सर्वश्रेष्ठ साधन माना। इन संतों में ब्राह्मण के साथ-साथ निम्न जातियों के भी कई संत थे। उनमें अंदाल नामक एक महिला संत भी थी जिन्होंने कहा कि ईश्वर के साथ भक्त का संबंध पति के साथ स्नेहिल पत्नी के संबंध जैसा होता है। संतों के विस्तृत आधार वाले चरित्र के कारण प्रेमपूर्ण भक्ति का उनका संदेश किसी एक वर्ग के लिए नहीं था। सभी लोग इस भक्ति को ग्रहण कर सकते थे, भले ही उनकी जाति, परिवार या लिंग जो भी हो।

आलवारों और नयनारों का प्रमुख लक्ष्य था बौद्ध और जैन धर्म के विस्तार को रोकना। उन दिनों दक्षिण भारत में बौद्ध धर्म और जैन धर्म अधिक प्रभावशाली थे। आलवार और नयनार संतों ने जैनियों और बौद्धों के अपरिग्रह को अस्वीकार कर ईश्वर के प्रति व्यक्तिगत भक्ति को ही मुक्ति का मार्ग बताया। आम जनता को अपने साथ लाने में इन्हें सफलता मिली।

आलवार और नयनार संतों ने स्थानीय मिथकों और गाथाओं का सहारा लिया। उन्होंने अपने विचार आम लोगों की भाषा तमिल और तेलुगू में कविताओं एवं छंदों के माध्यम से लोगों के सामने रखे। इसलिए इनके विचार सर्वसाधारण की समझ में आते थे। शिव और विष्णु के प्रति समर्पित इनके छंद “तिरूमुरई’ और “नलयिराप्रबंधम” में संकलित हैं।

उन्होंने एक सहज और सरल धर्म का प्रचार-प्रसार किया। ये लोग आम लोगों पर भावनात्मक प्रभाव डालने में सफल हुए। इस आन्दोलन को कई स्थानीय शासकों का भी समर्थन प्राप्त हुआ। सातवें आलवार केरल के चेरवंशी राजा कुलशेखर अन्यन्य रामभक्त थे। एक बार रामकथा के अंतर्गत सीताहरण का प्रसंग सुनते ही भावावेश में इन्होंने तुरंत लंका पर चढ़ाई करने की आज्ञा दे दी। ‘प्रेरु माल तिरुभोवि’ में इनके रामभक्ति विषयक गीत संकलित हैं।

रामभक्ति सर्वप्रथम दक्षिण के आलवार संतों के माध्यम से ही फूटी। आलवार संख्या में बारह थे। इनकी रचना ‘तिरुवायमोलि’ में अनन्य रामभक्ति का वर्णन मिलता है। इनकी अन्य तीन प्रसिद्ध कृतियां हैं – ‘तिरुवितम’, ‘तिरुवर्गशरियेम’, और ‘पेरिय तिरुवन्दादि’। लोगों के विश्वास और स्थानीय शासकों के समर्थन से यह आन्दोलन पूरे दक्षिण भारत में फैलता गया।

मंगलवार, 6 सितम्बर 2011

प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा बढ़ी

गांधी और गांधीवाद- 66

प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा बढ़ी

1897

DSCN1501तीन दिनों तक गांधी जी थाने में ही रहे। जिस दिन वे जहाज से उतरे थे उसी दिन ‘नटाल एडवर्टाज़र’ का प्रतिनिधि उनसे मिला था। उसने कई प्रश्न किए थे और गांधी जी ने सभी आरोपों का जवाब दिया था। सर फिरोजशाह मेहता के सुझाव के अन्नुरूप उन्होंने भारत में कोई भी भाषण बिना लिखे नहीं दिया था, और सबकी कॉपी उन्होंने संभालकर रखा था। अपनी बात को साबित करने के लिए कि उन्होंने भारत में ऐसी कोई बात नहीं कही थी जो दक्षिण अफ़्रीका में नहीं कही हो, गांधी जी ने भारत में दिए गए भाषणों की सब प्रतियां उस प्रतिनिधि को दिया। उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि ‘कुरलैण्ड’ और ‘नादरी’ से जो यात्री आए थे उन्हें लाने में उनका हाथ बिल्कुल नहीं था। उनमें से अधिकांश तो पुराने ही थे और बहुत से नटाल में रहने वाले नहीं थे, बल्कि ट्रांसवाल जाने वाले थे। उन दिनों नटाल की अपेक्षा ट्रांसवाल में अधिक कमाई होती थी, इसलिए अधिकतर भारतीय वहीं जाना पसन्द करते थे।

एक तो इस खुलासे का असर और दूसरे हमलावरों पर मुकदमा नहीं दायर करने के गांधी जी के निर्णय ने चमत्कारिक असर दिखाया और गोरे अपने कृत्यों के लिए काफ़ी शर्मिन्दा हुए। समाचार पत्रों ने गांधी जी को निर्दोष करार दिया। उन्होंने स्वजातीय गोरे उपद्रवकारियों की भर्त्सना और निन्दा की और विजातीय गांधी जी सराहना की। इससे न सिर्फ़ गांधी जी को लाभ हुआ बल्कि भारतीय समाज की भी प्रतिष्ठा बढ़ी। गांधी जी की वकालत भी बढ़ गई। दूसरी तरफ़ प्रवासी भारतवासियों और उनके नेता की बढ़ती हुई प्रतिष्ठा का एक उल्टा परिणाम यह हुआ कि मन ही मन गोरों का उनके प्रति द्वेष भी बढ़ा। उन्हें यह लगने लगा कि भारतीयों में मज़बूती से लड़ने की क्षमता है। जिससे उनका डर भी बढ़ गया।

28 जनवरी को जहाज से उतरने के बाद हुई घटना की जानकारी दादा भाई नौरोजी को

दी गई। इसके अलावा सर मंचेरजी भावनगरी और सर विलियम हंटर को भी इसकी सूचना भेजी गई। सर मंचेरजी भावनगरी उन दिनों पार्लियामेंट के सदस्य थे। सर विलियम हंटर ‘टाइम्स’ के भारतीय विभाग के संपादक थे। ये दोनों ही दक्षिण अफ़्रीका का सच्चा रूप ब्रिटिश जनता के सामने रखने लगे।

नटाल की संसद में तीन क़ानून पास किए गए। इनसे भरतीयों की समस्या बढ़ गई। एक क़ानून, ‘डीलर्स लाइसेसिंग एक्ट’, से भारतीय व्यापारियों के धंधे को नुकसान पहुंचा। जो किसी भी योरोपीय भाषा में निर्धारित आवेदन पत्र नहीं भर सकता था वह वहां प्रवेश नहीं पा सकता था। दूसरे क़ानून ‘इमिग्रेशन रेस्ट्रिक्शन एक्ट’ से भारतीयों के आने जाने पर अंकुश लगा। अपने निर्धारित समय से एक महीने पहले ही एक विधेयक लाया गया और इसे पास कराने में कोई विरोध नहीं हुआ। यह था ‘क्वारेन्टाइन अमेन्डमेंट एक्ट’। चूंकि क़ानूनी अड़चनों के कारण ही जहाज से आने वाले यात्री को वापस भारत न भेजा जा सका था, इसलिए यह संशोधन लाया गया था। हालाकि भाषा ऐसी थी कि लगता था यह क़ानून सब पर लागू होता है, लेकिन उसका मूल उद्देश्य तो भारतीयों पर दवाब डालना ही था। इससे भारतीय अधिक विचलित नहीं हुए बल्कि उनकी जागृति और बढ़ी। गांधी जी ने भारतीयों को इस क़ानून की बारिकियों को बहुत ही खूबी के साथ समझाया। इस क़ानून बर ब्रिटेन की मंज़ूरी भी मिल गई।

गांधी जी का अधिकांश समय सार्वजनिक काम में ही बीतता था। जैसे-जैसे गांधी जी की प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा बढ़ती जा रही थी उनका कार्यक्षेत्र भी विस्तृत होता चला जा रहा था। उनके सत्य और अहिंसा ने दक्षिण अफ़्रीका के गोरों का जोश और उत्तेजना काफ़ी हद तक ठंडा कर दिया था। भारत वासियों में साहस और हिम्मत पैदा हो गई थी। उनका खोया हुआ आत्मसम्मान लौट आया था। वे अपने अधिकारों के प्रति रक्षा के लिए एक जुट हो गये थे। गांधी जी की वकालत अच्छी चलने लगी थी।

मनसुखलाल नाजर उनके साथ ही थे। वे गांधी जी के इस काम में हाथ बंटाते थे। इससे गांधी जी काम कुछ हलका ज़रूर हुआ। गांधी जी अनुपस्थिति में सेठ आदमजी मियांखान ने कांग्रेस का काम बखूबी आगे बढ़ाया। इसके कोष में फण्ड का इज़ाफ़ा हुआ। गांधी जी चाहते थे कि कांग्रेस का अपना स्थाई कोष हो जाए। उन्होंने अपने विचार साथियों के सामने रखे। सभी ने इसका स्वागत किया। मकान खरीदे गए और उसे भाड़े पर उठा दिया गया। उसके किराए से कांग्रेस का मासिक खर्च आसानी से चलने लगा। सम्पत्ति का ट्रस्ट बना दिया गया। किन्तु उनका यह अनुभव अच्छा नहीं रहा। गांधी जी के दक्षिण अफ़्रीका छोड़ देने के बाद वह स्थायी कोष आपसी कलह का कारण बना। इसके बाद गांधी जी के विचार में बदलाव आया। उनका मानना था कि किसी भी सार्वजनिक संस्था को स्थायी कोष पर निभने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए। इसमें उनकी नैतिक अधोगति का बीज छिपा रहता है। ऐसी संस्था लोकमत से स्वतंत्र हो जाती है। इनका हिसाब किताब का कोई ठिकाना नहीं रहता। उनके ट्रस्टी ही उनके मालिक बन बैठते हैं। वे किसी के प्रति उत्तरदायी भी नहीं होते।

शनिवार, 3 सितम्बर 2011

चिठियाना-टिपियाना संवाद

चिठियाना-टिपियाना संवाद

नोट : यह एक पुरानी पोस्ट है। जनवरी 2010 में ‘मनोज’ ब्लॉग पर किसी खास सन्दर्भ में  प्रकाशित किया था। तब के सन्दर्भ अलग थे। आज ब्लॉगजगत में बहुत कुछ बदल गया है। फिर भी … शायद आपको रुचिकर लगे, इसी उद्देश्य से ….

ऊ साल जाते-जाते अउर ई साल आते-आते छदामी लाल को तीन ऐइसन पोस्ट मिल गया पढ़ने के लिए कि उनका त मने तृप्त हो गया। एकठो पुरुष चिट्ठाकार का अउर दोसर एकठो महिला चिट्ठाकार का और बीच में तेसर एक ठो मंच की चर्चा। तीन्नो पढ़के छदामी एतना तृप्त हो गये कि घर से निकल लिये – मटरगस्ती करने। कलकत्ता में तो दुइगो ऐसन जगह है जहां तृप्त भाव से मटरगस्ती किया जा सकता है, एकठो पारक इसटरीट और दोसर चौरंगी। चौरंगी पहुंच के छदामी इम्हर-ओम्हर घुमिये रहे थे कि देखे चिठियाना और टिपियाना आमने सामने खड़े हैं। छदामी त उनको कन्नी काट के निकलिए जाते कि उनको उन दुन्नो का बात कान में पड़ा। उनको लगा ई दुन्नू कोनो गंभीर समस्या पर बतिया रहें हैं। त छदामी आचार संहिता का उल्लंघन करते हुए हुनकर बात छुप्पे-छुप्पे सुनने लगे।

चिठियाना – देखो मैं बिलकुल गंभीर हूं, और तुमको भी पूरी गंभीरता से मेरी बात समझनी होगी।

टिपियाना - लो मैंने कब कहा कि मैं गंभीर नहीं हूं।

चिठियाना - मुझे तो ऐसा ही लगता है कि तुम मेरी बातों के सीरियसली लेते ही नहीं हो।

टिपियाना – नहीं-नहीं, ऐसा नहीं है। कभी-कभी लेता हूं।

चिठियाना - देखो तुम फिर मसखरी पर उतर आये। मैं एक बहुत ही इमपोरटेंट बात तुमको समझाना चाह रहा हूं।

टिपियाना - देखे मुझे इम्पोटेन्ट लोगों में, मेरा मतलब है बातों में कोई इंटरेस्ट नहीं है।

चिठियाना - यही तो मुश्किल है तुममें। बात को न पूरी तरह सुनते हो, न पढ़ते हो, न समझते हो, और लगते हो टिपियाने। अरे मैं बोल रहा था इमपोरटेंट, महत्वपूर्ण। खास .. हम दोनों से ताल्लुक़ात रखती बात। समझे कि नहीं समझे।

टिपियाना - हां, समझ गया। पर अब बकोगे भी कि तुम मुझे क्या समझाना चाह रहे थे ?

चिठियाना - यही समझाना चाह रहा था कि चिट्ठाजगत में जो हालात बन रहें हैं वह चिट्ठाजगत के लिए बहुत ही हानिकारक साबित हो सकता है।

टिपियाना - ठीक है, तुम्हारी बात मान भी लूं तो बता सकते हो किस तरह से...?

चिठियाना - हां। तुमको समझाता हूं। मान लो कि मैं एक पुरुष चिट्ठाकार हूं और तुम एक महिला चिट्ठाकार।

टिपियाना - क्यों मान लूं .. वह जो मैं हूं ही नहीं ? मैं एक पुरुष चिट्ठाकार हूं।

चिठियाना - नहीं, बस ऐसे ही मान लो ...

टिपियाना - नहीं-नहीं मैं एक पुरुष चिट्ठाकार हूं ... पुरुष।

चिठियाना – ऱे भाई उदाहरण के तौर पर कह रहा हूं। उदाहरण के तौर पर मान लो।

टिपियाना - वाह, ये कोई बात हुई, उदाहण के तौर पर भी क्यूं मानूं ? मैं नहीं मानता।

चिठियाना - अच्छा तो मैं ही एक महिला चिट्ठाकार हूं और तुम पुरुष चिट्ठाकार ... अब तो ठीक है, ख़ुश।

टिपियाना - नहीं अब भी ठीक नहीं है। कैसे मान लूं ? तुम भी तो पुरुष चिट्ठाकार ही हो।

चिठियाना - अरे भाई उदाहरण के तौर पर ...

टिपियाना – फिर वही उदाहरण के तौर पर ... ये कैसा उदाहरण है जो लिंग ही बदल दे।

चिठियाना - अरे मेरे भाई यह उदाहरण मैं इसलिए कह रहा हूं ताकि अपनी बात समझा सकूं।

टिपियाना – मेरे दोस्त यह बात तो मुझे सिरे से ही ग़लत आधार पर टिकी लग रही है। और जो बात ग़लत आधार पर टिकी हो उसे तुम मुझे मानने के लिये कह रहे हो। ऐसा कदापि नहीं हो सकता।

चिठियाना - अच्छा तो मैं ही हालात से समझौता कर लेता हूं। मैं भी पुरुष चिट्ठाकार और तुम भी पुरुष चिट्ठाकार ... अब तो ठीक।

टिपियाना - हां जो बात ठीक है उसे मैं ग़लत क्यूं कहूं ?

चिठियाना – ठीक है, अब सोचो हम दोनों के बीच कोई महिला चिट्ठाकार आ जाये ...

टिपियाना - .. तो .. तो पुरुष चिट्ठाकार- पुरुष चिट्ठाकार भाई-भाई। और दो भाइयों के बीच एक महिला चिट्ठाकार कैसे आ सकती है।

चिठियाना - उफ ओह ! .. ठीक है बीच में नहीं ... सामने आ जाती है .. तो ...

टिपियाना - हां अब ठीक है। आगे बोलो।

चिठियाना - तो हम उसे भी ये बात समझाएंगे .. एक बार ... कि चिट्ठाजगत में जो हालात बन रहें हैं वह चिट्ठाजगत के लिए बहुत ही हानिकारक साबित हो सकता है।

टिपियाना - एक बार में वह नहीं समझे तो ...

चिठियाना - तो दो बार समझाएंगे ...

टिपियाना - न .. बिलकुल नहीं मेरा पर्सनल एक्सपीरिएंस है, दो बार में भी नहीं समझेगी।

चिठियाना - तो तीसरी बार समझाएंगे। चौथी बार समझाएंगे। बार-बार समझाएंगे।

टिपियाना - इतना इंतज़ार किससे हो सकता है भला। पहली ही बार में ही निबटा (टिपिया) देंगे उसे।

चिठियाना - लेकिन इस तरह से तो माहौल जो बिगड़ रहा है वह शांत नहीं होगा।

टिपियाना - नहीं जी, इसी तरह से एक-एक को शांत करके यहां शांति बहाल होगी।

चिठियाना - तुम मेरी बात ठीक तरह से अब भी नहीं समझ पा रहे हो। अच्छा मान लो ...

टिपियाना - फिर मान लो ...

चिठियाना - थोड़ा तो सब्र करो मुझे बात को पूरी तरह रखने तो दो। मान लो एक नहीं वो दस या बीस महिला चिट्ठाकार सामने आ जाएं ...

टिपियाना - अरे वाह भाई वाह .. बहुत ही अच्छी स्थिति है .. .. इतने सारे एक साथ ... तब तो ही उन्हें ज़रूर ही समझाना चाहिए।

चिठियाना - क्या ?

टिपियाना - यही कि चिट्ठाजगत में जो हालात बन रहें हैं वह चिट्ठाजगत के लिए बहुत ही हानिकारक साबित हो सकता है।

चिठियाना - बहुत ख़ूब। अब मान लो कि वो फिर भी नहीं समझ पाईं तो ...

टिपियाना - तो .. तो ... हम ही समझ जाएंगे।

चिठियाना - क्या समझ जाएंगे ?

टिपियाना – यही कि ... अरे वही … जो तुम इतनी देर से समझाने का प्रयास कर रहे हो ... कि चिट्ठाजगत में जो हालात बन रहें हैं वह चिट्ठाजगत के लिए बहुत ही हानिकारक साबित हो सकता है।

चिठियाना - हूं .. अच्छा। बहुत अच्छा। अब मान लो कि ऐसी हालात में जब एक तरफ दस-बीस महिला चिट्ठाकार हैं दूसरी तरफ से दस-बीस पुरुष चिट्ठाकार भी सामने आ जाएं तो ...

टिपियाना – तो फिर क्या ? .. तब ही तो असली मज़ा आएगा। भड़काऊ बातें होंगी, मूंछे उमेठी जाएंगी, शब्दों के तीर चलेंगे, श्लील-अश्लीलता पर बहस होगी, एक दल दूसरे दल को नीचा दिखाने की कोशिश में एक से बढ़कर एक वीर रस की पंक्तियां दुहराएगा, मेरा टिपियाना भला उसके टिपियाने से कम वजन वाला कैसे हो सकता है, वाह क्या अप्रतिम दृश्य होगा, मुझे वह दृश्य ठीक से देखने दो, मेरे और उस दृश्य के बीच से तुम हट जाओ वर्ना ...

चिठियाना - र्ना .. ये वर्ना क्या है ..?

टिपियाना - बच नहीं पाओगे तुम मिस्टर चिठियाना मुझसे। बिना टिपियाना के एक दिन भी नहीं रह सकते मिस्टर चिठियाना । एक ही बार में सारी हेंकड़ी गुम हो जाएगी तुम्हारी। ये जो तुमहारा खटराग है चिट्ठाजगत के लिए हानिकारक-वानिकारक वाला ये सब चिल्लाना बंद हो जाएगा।

चिठियाना - लेकिन ...

टिपियाना - लेकिन-वेकिन कुछ मत बोलो, बल्कि तुम तो अब मुंह ही मत खोलो। तुम जैसै लोग ही इस चिठ्ठाजगत की शांति और तरक़्की की राह में अड़ंगे डालने चले आते हो।

चिठियाना - अड़ंगा और मैं ... क्या कह रहे हो तुम ?

टिपियाना - हां जी हां, मैं बिलकुल वही कह रहा हूं.. जो तुम सुन रहे हो। तुम न हो तो हम दो दिन में इस माहौल को ठीक कर दें। ऐसे-ऐसे खेल खेलेंगे कि उनका चिट्ठा एक-एक करके बंद हो जाएगा, और तब सिर्फ और सिर्फ हमारे जैसों का, मतलब सिर्फ चिठियाना और टिपियाना .. रहेंगे, तो काहे का बवाल।

चिठियाना - उसके बाद ?

टिपियाना - फिर हम दूसरी चाल चलेंगे।

चिठियाना - क्या ?

टिपियाना - मान लो हम पूरब के चिट्ठाकार हैं और तुम पश्चिम के ...

चिठियाना - क्यों मान लूं ? मैं भी पूरब का ही हूं।

टिपियाना - नहीं, बस ऐसे ही मान लो, .. बात को समझने के लिए।

चिठियाना - नहीं मानता। क्यों मानूं ? मैं पूरब का हूं, तो हूं।

टिपियाना - अरे बस उदाहरण के तौर पर मान लो।

चिठियाना - ऐसा कैसा उदाहरण जो मेरी क्षेत्रीयता ही बदल दे ..! हूं.हः !!

(इतिश्री ब्लॉगर-खंडे चिठियाना-टिपियाना संवाद नामो प्रथमोध्यायः)

अब इससे ज़्यादा देखना सुनना छदामी लाल के बस का नहीं था। अउर आगे का होना था इ त ऊ बुझिये रहे थे, सो चुप्पे से वहां से सरक लिये घर को। कंम्प्यूटर पर एगो नया चिट्ठा लिखने का मसाला त मिलिये गया था