मंगलवार, 29 नवम्बर 2011

प्रभावकारी अहिंसक शस्त्र

गांधी और गांधीवाद- 83

प्रभावकारी अहिंसक शस्त्र

images (25) - Copyइन्द्रियां इतनी बलवान हैं कि यदि उन्हें चारों तरफ़ से घेरा जाय तो ही वे अंकुश में रहती हैं। आहार के बिना वे काम नहीं कर सकतीं। इसलिए इन्द्रिय-दमन के लिए स्वेच्छा-पूर्वक किये गए उपवास से इन्द्रिय-दमन में बहुत मदद मिलती है। गांधी जी ब्रह्मचर्य के पालन के लिए उपवास को अनिवार्य मानते थे।

गांधी जी प्रायः सप्ताह में एक दिन मौन धारण किया करते थे और दिन होता था सोमवार। इसके द्वारा वे अपने गले को सुरक्षित रखना चाहते थे और अपने शरीर में साम्य। अपना मौन वे दो ही परिस्थिति में तोड़ सकते थे, एक जब किसी अनिवार्य मसले पर किसी उच्च अधिकारी से बात करनी हो, या दूसरे किसी बीमार आदमी की देखभाल करनी हो।

उपवास के दौरान गांधी जी पानी में चुटकी भर सोडियम बाइकार्बोनेट मिलाकर लेते थे। वे मानते थे कि ग़रीब और निस्सहाय लोगों के लिए उपवास सबसे मज़बूत शस्त्र है। जब भी वे विकट परिस्थित में होते थे, इसका इस्तेमाल करते थे। उनके जीवन में बड़ी-बड़ी सफलताएं इसके प्रयोग से हासिल हुईं। अपने सम्पूर्ण जीवन में उन्होंने सोलह बार उपवास ग्रहण किया। दो बार उनका उपवास 21 दिनों तक चला। उनहोंने स्वीकार किया है कि सार्वजनिक जीवन में खुद पर आरोपित इस तरह की यातना बहुत ही प्रभावकारी अहिंसक शस्त्र सिद्ध हुआ। इसके प्रयोग के वे सारे संसार में सबसे बड़े सिद्धान्तकार कहलाए। लेकिन उनका कहना था कि उपवास का निश्चय कुछ खास परिस्थितियों में लिया जाना चाहिए।

उपवास के दौरान उन्हें किसी चीज़ की ज़रूरत होती या कुछ सूचना देनी होती, तो काग़ज़ के टुकड़े पर लिखकर बताते थे। लेकिन काग़ज़ का यह टुकड़ा भी नया या कोरा नहीं होता था। बापू आए हुए पत्रों के पीछे, जिन पर कुछ लिखा हुआ न हो या लिफ़ाफों को खोलकर उनके अन्दर की ओर के बिना लिखे या बिना छपे वाले हिस्से पर लिखा करते थे। बापू का कहना था, “हमें आवश्यकता से तनिक भी ज़्यादा उपयोग नहीं करना चाहिए। और हर चीज़ का इस्तेमाल किफ़ायत से करना चाहिए।”

रविवार, 27 नवम्बर 2011

कुछ बेतरतीब विचार … अभिव्यक्ति

मुझे लोगों की सहज अभिव्यक्ति बहुत अच्छी लगती है। वे लोग भी सुहाते हैं जो अपनी बात को बिल्कुल सीधे-सीधे रखते हैं। मैं ऐसा ही करता हूँ। ज़िन्दगी में जो भी अनुभव किया वह मेरी रचनाओं में प्रकट होता है। मैं जब लिखता हूँ तो बातें मेरी होती हैं। वे ही बातें जिन्हें मैंने भोगा है, देखा है, पाया है। कोई मुखौटा लगा कर मैं अपनी बात नही रखता। एक साधारण आदमी हूँ, अतः मेरा लिबास बड़ा सीधा-सदा है, कोई फैशन डिज़ाइन किया हुआ नहीं। जो पीड़ाएँ, अभाव, तनाव, दबाव आदि झेला है वही मेरी रचनाओं में व्यक्त हो जाती हैं।

कविता, लघुकथा, लेख, चर्चा आदि के ज़रिए अपने संवाद आप तक पहुँचाने का प्रयास किया। कोई ध्यान खींचने या टी.आर.पी. बढाने वाले न मेरे पास शब्द हैं, न अनुभव और न ही ईरादा। समाज में एक साधारण व्यक्ति के तौर पर रहता हूँ और इसका दायित्वबोध भी है। कोई समाज सुधारक का लिबास ओढ नहीं रखा है, पर यदि इस काम आ सकूँ तो जीवन कृतार्थ हो जाए, ऐसी कामना है। मेरी नैतिकता और ईमानदारी मेरे हथियार हैं, और इन्हीं के भरोसे छोटी-मोटी लड़ाई कुप्रथा, कुव्यवस्था के विरुद्ध लड़ लेता हूँ।

यह ज़रूरी नहीं कि मैं जीत ही जाऊँ, पर पत्थर तबियत से उछलता हूँ, आसमां में सूराख हो-न हो, शायद कोई हलचल हो जाए। चुनौतियाँ अगर हैं तो स्वीकारने में हर्ज़ भी नहीं समझता, अकेला अगर हूँ, तो आगे बढने से हिचकता भी नहीं। कोई साथ न हो तो एकला चलो रे का सिद्धांत क्यूँ छोड़ूँ।

कविताएँ साथ देती हैं। लहरों के थपेरे पर अपने गीत गुन लेता हूँ। कोई सुने या न सुने, सुना देता हूँ, सुन लेता हूँ, औरों की राहों के कांटे चुन लेता हूँ।

किसी की अवमानना से मेरा दिल दुखता है। जिससे दिल दुखे वह मुझे कष्ट देता है। मैं इस तरह का कष्ट न झेल सकता हूँ, न देना चाहता। अनुभव से बल संचित करता हूँ, इसलिये भीड़ का एक हिस्सा हूँ, बने रहना चाहता हूँ। क्या हुआ यदि रगड़ खाए, क्या हुआ यदि किसी ने धक्का दिया, क्या हुआ यदि मैं गिर पड़ा? ! भीड़ का हिस्सा तो हूँ। यही मेरे संतोष का कारक है। यही मेरा बल है।

आलोचना करने वाले करें, मैं उन्हें सिर आंखों पर लेता हूँ। फिर भी मेरे लिये भीड़ ज़्यादा अहम है। मैं वहां हूँ, रहूँगा। ये भीड़ ही मेरी भूमिका तय करती हैं, मेरा निर्णायक बनती है। मैं उनसे सीधे संलाप कर लेता हूँ। हवाई दुनियाँ में न रहता हूँ, न रहने का ख़्वाब संजोता हूँ॥ वहां बौद्धिक सन्निपात से ग्रस्त लोग रहते हैं, रह लेते हैं। वे मेरे सांचे और खांचे में फिट नहीं बैठते। मैं तो वह रचना चाहता हूँ जो भीड़ की, भीड़ के लिये और भीड़ के गले द्वारा निकली बाते हैं। भीड़ यानी आम जन, ख़ास जन नहीं।

ख़ास जन की कुछ बातें तो यूँ चुभती हैं कि शब्दों में बयां करना मुश्किल हो जाता है। कविता ही सहारा बनती है।

मैं तो लिबास सहित

नदी में उतरा था

तुमने मुझे वस्त्र रहित

देख लिया?

कर दिया नज़रों से ही चीर-हरण मेरा!!

*** ***

माना कि मैंने रेत के घरौंदे नहीं बनाए

तो क्या हुआ?

घर तो मेरा भी है

वहीं

जहां तुम्हारा है!

*** ***

शुक्रवार, 25 नवम्बर 2011

ब्रह्मचर्य का विचार

गांधी और गांधीवाद- 82

ब्रह्मचर्य का विचार

Gandhi_0024गांधी जी का जीवन उनका अपना चुना हुआ जीवन था। वे खुद के प्रति ईमानदार थे। वकालत तो वे करते थे, पर उनका यह मानना था कि एक वकील का कर्तव्य सिर्फ़ अपने क्लायण्ट को केस, चाहे सही हो या ग़लत, जिता भर देना नहीं होता। किसी भी केस के ब्रिफ़ को स्वीकार करने के पहले वे खुद को संतुष्ट कर लेना चाहते थे कि उसका केस नैतिक आधार पर खरा ठहरता है या नहीं। अपने मुवक्किल को वो भलि-भांति चेता देते थे कि यदि कार्रवाही के दौरान किसी भी समय उन्हें जानकारी मिली कि उसका केस किसी झूठे तथ्यों पर आधारित है तो वे उस केस को उसी स्तर पर छोड़ देंगे। इस व्यवहार के कारण भले ही उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता हो, फिर भी वे स्तरीय जीवन जी रहे थे। धीरे-धीरे वे एक ऐसी अवस्था में पहुंच रहे थे जहां उनका वकालत का पेशा उतना महत्वपूर्ण नहीं रह गया था। उनके जीवन के और भी कई महत्वपूर्ण उद्देश्य थे।

बेटे का प्रसव खुद कराया

1900 में जब कस्तूरबाई को सबसे छोटे बेटे देवदास, रामदास से तीन साल छोटा, का जन्म होने वाला था तब गांधी जी ने खुद ही नर्स का काम करने का निर्णय लिया। अचानक प्रसव पीड़ा शुरु हुई। डॉक्टर घर पर नहीं थे। दाई वहां दुर्लभ थी। गांधी जी खुद दाई बन गए। सारा काम खुद किया। नाल काटने से लेकर शिशु को नहलाने तक। देवदास के जन्म के बाद उन्होंने ने निश्चय किया कि अब कोई और संतान नहीं होनी चाहिए। किसी गर्भनिरोधक उपाय के वे सख़्त खिलाफ़ थे, उन्हें संयम के द्वारा इस लक्ष्य में सफलता चाहिए था।

ब्रह्मचर्य का विचार

Gandhi_0023गांधी जी के दिल में एकपत्नी व्रत का विचार तो शादी के समय से ही था। पत्नी के प्रति वफ़ादारी उनके सत्यव्रत का अंग था। दक्षिण अफ़्रीका के प्रवास के दौरान उन्हें इस बात का बोध हुआ कि पत्नी के साथ भी ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। गांधी जी को याद नहीं कि ब्रह्मचर्य का विचार उनके मन में किस किताब से आया। उनके इस विचार पर शायद रायचन्द्रभाई का प्रभाव रहा हो। उनसे गांधी जी की मुलाक़ात तब हुई थी जब रायचन्द्रभाई पच्चीस वर्ष के थे। स्वयं गांधी जी की आयु तब तक लगभग उतनी ही रही होगी। वे पेशे से जवाहारात के व्यापारी थे। हीरे-मोती के इस कारोबारी के अध्यात्म-ज्ञान ने गांधी जी को काफ़ी प्रभावित किया था। जब वह धर्म के बारे में चर्चा करते, तो गांधी जी मुग्ध भाव से उन्हें देखते रह जाते थे।

ऐसे ही किसी क्षण में गांधी जी ने रायचन्द्र भाई के सामने दंपति प्रेम पर चर्चा छेड़ दी। गांधी जी रायचन्द्रभाई को ग्लैडस्टन के प्रति मिसेज ग्लैडस्टन के प्रेम की प्रशंसा कर रहे थे। पार्लियामेंट की मीटिंग में भी मिसेज ग्लैडस्टन अपने पति को चाय बनाकर पिलाती थी।

यह सुनकर रायचन्द्रभाई बोले, “इसमें तुम्हें महत्व की कौनसी बात मालूम होती है? मिसेज ग्लैडस्टन का पत्नीत्व या उनका सेवाभाव? यदि वे ग्लैडस्टन की बहन होतीं तो? या उनकी वफ़ादार नौकरानी होतीं और उतने ही प्रेम से चाय देतीं तो? ऐसी बहनों, ऐसी नौकरानियों के दृष्टान्त क्या हमें आज नहीं मिलते? और, नारी-जाति के बदले ऐसा प्रेम यदि तुमने नर-जाति में देखा होता, तो क्या तुम्हें सानन्द आश्चर्य न होता? मेरे इस कथन पर विचार करना।”

Gandhi_0008गांधी जी को यह वचन बहुत कठोर लगा। पर ये बातें उनके दिमाग में उथल-पुथल मचाती रहीं। उन्हें लगा कि पुरुष सेवक की ऐसी स्वामीभक्ति या मूल्य पत्नी की पति-निष्ठा के मूल्य से हजार गुना अधिक है। अगर पति-पत्नी एक हैं तो उनमें परस्पर प्रेम होने में अनोखापन क्या है? अगर प्रेम नहीं है, तो उसे विकसित किया जा सकता है। जैसे मालिक के प्रति कोई वफ़ादार नौकर प्रेम प्रयत्न-पूर्वक विकसित करता है। वैवाहिक प्रेम के बारे में उन्होंने गंभीरता से विचार करना शुरु किया। उन्होंने अपने-आप से पूछा कि उन्हें अपनी पत्नी के साथ कैसा संबंध रखना चाहिए। पत्नी को विषय-भोग का वाहन बनाने में उनके प्रति वफ़ादारी कहां रहती है? उन्होंने सोचा कि जब तक वे विषय-वासना के अधीन रहते हैं, तब तक तो उनकी वफ़ादारी का मूल्य साधारण ही माना जाएगा। गांधी जी बताते हैं कि शारीरिक संसर्ग की इच्छा के रूप में पत्नी की ओर से कभी आक्रमण नहीं हुआ था। यानी ब्रह्मचर्य के लिए इच्छा शक्ति जुटाने की ज़रूरत केवल उन्हें थी। उनकी खुद की आसक्ति ही उन्हें ब्रह्मचर्य का पालन करने से रोक रही थी।

ब्रह्मचर्य साधने का प्रयास

1901 में गांधी जी ने ब्रह्मचर्य साधने का भरसक प्रयास करना शुरु कर दिया था। इस व्रत के पालन में शुरु-शुरु में तो वे विफल रहे। प्रयत्न करते किन्तु गिर पड़ते। हालाकि इस प्रयत्न में उनका उद्देश्य ऊंचा नहीं था। मुख्य उद्देश्य तो था संतानोत्पत्ति को रोकना। कृत्रिम गर्भ निरोधक साधनों में गांधी जी का विश्वास नहीं था। उन्होंने कुछेक लेखको के विचार पढ़ रखे थे। डॉ. एलिन्सन के उपायों का प्रभाव तो दीर्घकालिक न रह सका पर हिल्स के संयम और आन्तरिक साधन के बारे में जो विचार थे उसका प्रभाव गांधी जी पर बहुत पड़ा था। इसलिए संतानोत्पत्ति का ख्याल आते ही गांधी जी ने संयम-पालन का अभ्यास शुरु कर दिया। एक ही कमरे में अलग-अलग खाटें बिछने लग गईं। अपना ज़्यादा समय घर के बाहर ही बिताते। रात में पूरी तरह थक कर ही लौटते और अलग सोने का प्रयत्न करते। उनके इस संयम व्रत में कस्तूरबा कहीं नहीं थीं। इन सब प्रयत्नों का प्रभाव तुरत नहीं दिख सका। अंतिम निश्चय तो वे 1906 में ही ले सके।

ज़ुलू विद्रोह

Gandhi_0004बोअर-युद्ध के बाद नेटाल में ज़ुलू विद्रोह हुआ। उस समय गांधी जी जोहन्सबर्ग में वकालत करते थे। उस समय भी गांधी जी को लगा कि अपनी सेवा नेटाल सरकार को अर्पण करनी चाहिए। उन्होंने आवेदन किया जो स्वीकृत भी हो गया। इस सेवा के सिलसिले में गांधी जी के मन में संयम-पालन का तीव्र विचार उत्पन्न हुआ। उन्होंने साथियों से इसकी चर्चा की। उनका मानना था कि सन्तानोत्पत्ति और सन्तान का लालन-पालन सार्वजनिक सेवा के विरोधी हैं। इस विद्रोह में शामिल होने के लिए गांधी जी को जोहान्सबर्ग से अपनी गृहस्थी उजाड़ देनी पड़ी थी। इस जगह घर बसाए हुए मुश्किल से एक महीना ही हुआ था कि उन्होंने उसका त्याग कर दिया। पत्नी और बच्चों को फीनिक्स में छोड़कर खुद डोली उठानेवालों की टुकड़ी लेकर चल पड़े। कूच करते वक़्त उन्होंने महसूस किया कि लोकसेवा के लिए उन्हें पुत्रैषणा और वित्तैषणा का त्याग कर देना चाहिए और वानप्रस्थ-धर्म का पालन करना चाहिए।

ज़ुलू विद्रोह के दौरान बिताए गए छह हफ़्ते का समय उनके जीवन का अत्यंत मूल्यवान समय था। इस समय उन्होंने संयम-व्रत के महत्व को अधिक से अधिक समझा। उन्हें लगा कि यह व्रत बन्धन नहीं बल्कि स्वतंत्रता का द्वार है। इसके पहले वे इसलिए असफल हुए थे कि वे दृढनिश्चयी नहीं थे। उन्हें अपनी शक्ति पर भरोसा नहीं था। फलस्वरूप उनका मन अनेक तरंगों और अनेक विकारों में उलझा रहता था। उन्हें लगा कि व्रत-वद्ध न रहने पर मनुष्य मोह में पड़ा रहता है। व्रत में बंधना व्यभिचार से छुटकारा पाने के समान था।

ब्रह्मचर्य व्रत के पालन के लिए गांधी जी का मानना था कि स्वादेन्द्रिय पर प्रभुत्व प्राप्त करना ज़रूरी है। यदि स्वाद को जीत लिया जाय, तो ब्रह्मचर्य पालन बहुत सरल हो जाता है। इसलिए उनके आहार संबंधी प्रयोग केवल आहार की दृष्टि से नहीं, बल्कि ब्रह्मचर्य की दृष्टि से होने लगे। उन्होंने प्रयोग करके पाया कि आहार थोड़ा सादा, बिना मिर्च-मसाले का और प्राकृतिक स्थितिवाला होना चाहिए। वनपक्व फल सबसे अच्छा है। जब वे सूखे और हरे वनपक्व फलों पर रहते थे, तो उन्हें निर्विकार अवस्था का अनुभव होता था।

बुधवार, 23 नवम्बर 2011

भक्ति आंदोलन की उपलब्धियाँ

भक्ति आंदोलन की उपलब्धियाँ

मध्यकालीन भारत - धार्मिक सहनशीलता का काल (ग्यारह)

मध्यकालीन भारत के इन उपदेशकों की शिक्षा के प्रभाव का हम आकलन करें तो पाते हैं कि, ऐसे आंदोलन पूर्वकाल में भी हुए थे पर मध्य काल में हुए भक्ति आंदोलन द्वारा हिन्दू धर्म एवं समाज सुधार पर विशेष बल दिया गया। खासकर जातिप्रथा के विरुद्ध तो एक ज़ोरदार आवाज़ उठी। साथ ही इस आंदोलन के द्वारा हिन्दू मुस्लिम एकता की वकालत भी की गई। इस काल में भक्ति आंदोलन का वैष्णव पंथ काफी लोकप्रिय हुआ। इस सम्प्रदाय का अंग न होते हुए भी गुरु नानक देवजी आदि संत भी इसके उपदेशों और विचारों से प्रभावित हुए। हालाकि इस काल के उपदेशक अलग-अलग सीख दे रहे थे, फिर भी उन सब में कई बातें सामान्य थीं, जैसे इष्ट देव का होना, मोक्ष की प्राप्ति, जाति प्रथा का विरोध, निचले तबके के लोगों एवं स्त्रियों के उत्थान के प्रति सजगता।

अत: हम यह कह सकते हैं कि उन दिनों एक क्रान्तिकारी विचारधारा प्रवाहित हो रही थी जिसमें न सिर्फ़ कमज़ोर तबके के लोगों को समाहित किया गया बल्कि उसमें स्त्रियाँ भी शामिल थीं। उत्तर भारत में परिवर्तन की बयार चतुर्दिक् बह रही थी। पंजाब में गुरु नानक देवजी, रास्थान में भक्त मीराबाई, महाराष्ट्र में संत तुकाराम, बंगाल में चैतन्य महाप्रभू, उत्तर प्रदेश और बिहार में संत रामानंद उल्लेखनीय हैं। इसके परिणामस्वरूप हिन्दू समाज में एक नई जागरूकता का आविर्भाव हुआ। किन्तु भौगोलिक रूप से (दुर्भाग्यवश) यह आंदोलन अखिल भारतीय रूप न ले सका। ऐसा प्रतीत होता है कि भक्त संतों के प्रयास क्षेत्रीयता में ही सिमटकर / संगठित होकर रह गए।

एक तो सामाजिक एकता का अभाव था, समाज जाति एवं वर्ग में विभाजित था, जिसका प्रभाव सम्प्रदायों पर भी पड़ता रहा। दूसरे किसी भी भक्त संत को शासक वर्ग का संरक्षण नहीं मिला। इस काल में न तो कोई खारवेल था और न ही कोई चंद्रगुप्त, न तो कोई अशोक था और न ही कोई कनिष्क, जो इस काल के भक्त संतों और उनके आंदोलन को संरक्षण प्रदान करता। आम तौर पर सुल्तान अपनी हिन्दू प्रजा के धार्मिक क्रिया-कलापों में दख़लअंदाजी न देने की तटस्थ नीति अपनाते थे।

इसके अलावा, संत रामानुज के बाद ब्रह्मणों ने इस आंदोलन को नेतृत्व प्रदान नहीं किया। समाज के निम्न वर्ग के लोग न तो अच्छी तरह से संगठित थे न ही उनके पास पर्याप्त संसाधन था, सिवाय सिखों के पंथ के, कि वे अपने पंथ को एक संगठनात्मक ढ़ाँचा प्रदान कर पाते। एक बार ये संत जब दृश्य से हट गए तो उनका प्रभाव क्षीण होता गया।

एक अन्य कारण यह था कि इनमें से कई संतों ने हिन्दू धर्म के समानान्तर पंथ चलाने का प्रयास लक्षित नहीं किया। उन्होंने ब्रह्मणवादी कुछ मूल-भूत धारणाओं पर प्रहार ज़रूर किया पर पूरे के पूरे ढ़ांचे को बदलने की इच्छा ज़ाहिर नहीं की। जिन कुप्रथाओं को बदलने का प्रयास वे कर रहे थे वे हमारी संस्कृति में काफी गहरी जड़ें जमा चुकी थीं, जिन्हें उखाड़ना आसान नहीं था। अत: रूढ़िवादी समाज में एक बड़ी सफलता प्राप्त करना आसान नहीं था। मध्यकालीन यूरोप के सुधारकों की तरह ये सुधारक कुप्रथाओं के विरुद्ध जनता के बीच अपनी आवाज़ बुलन्द करने के लिए शस्त्र लेकर उठ खड़े नहीं हुए थे।

हिन्दू धर्म में प्रचलित मान्यता रही है कि जो भी हो रहा है वह ईश्‍वर की मर्ज़ी से हो रहा है। नियतत्ववाद और यतित्ववाद के कारण भी इस आंदोलन का व्यापक प्रसार नहीं हो पाया। सांसारिक एवं आर्थिक परिप्रेक्ष्य के अभाव में यह आंदोलन आंशिक रूप से ही सफल हुआ एवं समाज में अधिक दिनों तक व्यापक रूप से बना नहीं रह सका। फिर भी यह पृथक् एवं छोटी इकाई के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराता रहा। ये सभी कारक सम्मिलित रूप से इस आंदोलन के अखिल भारतीय रूप न ले पाने की व्याख्या करते हैं और अंत में यह कहना होगा कि इस आंदोलन के नेताओं के बीच शायद ही कोई तालमेल था।

किन्तु इसका मतलब यह नहीं कि य‍ह आंदोलन बेअसर रहा। यह सही है कि जाति प्रथा की समाप्ति नहीं हुई, फिर भी इसने जाति प्रथा के सिद्धांत को चुनौती तो अवश्य ही दी। अन्तरजातीय भोजन एवं अन्तरजातीय विवाह की दृढ़ता में निश्चित रूप से कमी आई। तत्कालीन परिस्थितियों पर ध्यान दें तो हम पाते हैं कि उन्होंने सार्थक प्रयास किये और उनकी छोटी सफलता भी काफी बड़ी एवं प्रशंसनीय है। सीमाओं के बावज़ूद इस आंदोलन की उपलब्धियाँ विलक्षण थीं। उन संतों के उपदेश समाज में शांतिपूर्वक वातावरण का आधार तैयार क‍र रहे थे। पूजा एवं धर्म का सरलीकरण हो रहा था। जाति व्यवस्था की रूढ़िवादिता में शिथिलता आ रही थी।

इन संतों क्षेत्रीय भाषाओं के विकास में महत्वपूर्ण येगदान दिया। इन लोगों ने अपने उपदेश आम लोगों की बोलचाल की भाषा में दिये। गुरु नानक देवजी ने पंजाबी में, चैतन्य महाप्रभू ने बांग्ला में, मीराबाई ने राजस्थानी में, संत तुकाराम ने मराठी में, विद्यापति ने मैथिली में, चंडीदास ने बांग्ला में, एकनाथ स्वामी ने मराठी में, शंकर देव ने असम की ब्रह्मपुत्र घाटी में असमी भाषा में, अपने-अपने उपदेश दिए एवं इन भाषाओं को लोक प्रिययता दिलाई। बिहार एवं उत्तर प्रदेश के संतों ने ब्रजभाषा एवं अवधी का प्रयोग किया। इन संतों के प्रयासों से इन भाषाओं को एक अलग पहचान मिली।

इन लोगों के प्रयासों के कारण हिन्दू-मुसलमानों के बीच एक बेहतर सौहार्द्रपूर्ण वातावरण का निर्माण हुआ। मध्यकालीन भारत में जब मुहम्मद बिन तुग़लक़ ने धार्मिक सहनशीलता की नीति का प्रयोग किया तो इस्लामी रूढ़िवादिता के कारण असफल रहा किन्तु उसके दो शताब्दियों के बाद इसी तरह के प्रयोग में अकबर को असाधारण सफलता मिली। बीच की ये दो शताब्दियां धार्मिक आंदोलन का काल थीं। इन संतों ने सहनशीलता व उदारता का एक वातावरण तैयार कर दिया था जिसकी पृष्ठभूमि में मुग़ल पूरे देश पर राज कर सके जिसमें दोनों वर्गों के बीच एक बेहतर आपसी समझ-बूझ का माहौल था।

सोमवार, 21 नवम्बर 2011

भारतीयों की दशा में कोई सुधार न हुआ

गांधी और गांधीवाद- 81

बोअर-युद्ध-7

भारतीयों की दशा में कोई सुधार न हुआ

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प्रिटोरिया पर यूनियन जैक फहराया

13 मार्च 1900 को ब्रिटिश कमाण्डर-इन-चीफ़ ने फ़्री स्टेट की राजधानी ब्लोएमफ़ोटेंन में प्रवेश किया। दो सप्ताह बाद 28 मार्च को पिट जोबर्ट मारा गया। स्मट्स की सलाह पर क्रूगर ने लुई बोथा को उसका उताराधिकारी नियुक्त किया। 17 मई तक ब्रिटिश फ़ौज़ ने मेफ़किंग को छुड़ा लिया। 24 मई को महारानी का जन्म दिन था। इस दिन ब्रिटिश सेना ने ऑरेंज फ़्री स्टेट पर क़ब्ज़ा जमा लिया। 28 मई तक रोबर्ट की सेना जोहान्सबर्ग के निकट थी। 31 मई को रिट्ज़ के साथ क्रूगर अपने अधिकारियों के साथ सत्ता के केन्द्र से एक सौ मील दूर शरण ली, और वहीं सत्ता का केन्द्र स्थापित किया। स्मट्स प्रिटोरिया में ही था। बोथा के साथ मिलकर स्मट्स ने सोने की खान को डायनामाइट से उड़ा देने का प्लान बनाया पर जोहान्सबर्ग के कमाडेंट के प्रयास से ऐसा हो न सका और 4 जून को ब्रिटिश सेना ने राजधानी पर हल्ला बोल दिया। कुछ घंटों की ही लड़ाई में हारकर स्मट्स जल्दी-जल्दी में खजाने से रुपए-पैसे लेकर भाग खड़ा हुआ। 5 जून को प्रिटोरिया पर यूनियन जैक फहरा रहा था।

क्रूगर निराश होकर यूरोप की तरफ़ भाग खड़ा हुआ। स्मट्स और बोथा काफ़ी दिनों तक गोरिल्ला युद्ध लड़ते रहे। अंततोगत्वा 31 मई 1902 को, हालाकि बोअरों ने बिना शर्त समर्पण करने से मना कर दिया, फिर एक शान्ति संधि हुई। मिलनर ने दक्षिण अफ़्रीका के शासन की कमान अपने हाथों में ले ली। इस युद्ध में बोअर की तरफ़ से 4,000 लोग मारे गए, और 20,000 घायल हुए जबकि ब्रिटिश की तरफ़ के 5,774 लोग मारे गए और 22,829 जख़्मी हुए। महामारी के फैलने और बमबारी में क़रीब 20,000 असैनिक लोग मारे गए। क़रीब 25 करोड़ पौंड का खर्च आया इस युद्ध में। 1904 में 80 वर्षीय क्रूगर देशनिष्कासन की अवस्था में मर गया।

बोअर युद्ध से सबक

बोअर युद्ध से कुछ बातें काफ़ी उभर कर सामने आईं। इसमें प्रयुक्त समर-कौशल और राजनैतिक लड़ाई ध्यान देने योग्य हैं। बोअर युद्ध से पता चला है कि लोकप्रिय प्रतिरोध किया जा सकता है और यदि लोगों में विरोध करने की इच्छा-शक्ति शेष न हो, तो सैन्य विजय के लाभ निरर्थक ही समझा जाना चाहिए। हमने देखा कि जब शर्त-रहित समर्पण की बात चली तो बोअरों ने विजेताओं के साथ सहयोग करने से इंकार कर दिया। बोअर युद्ध के परिणामों ने गांधी जी को सोचने पर विवश कर दिया। उन्होंने ब्रिटिश के युद्ध करने के तरीक़ों को निकट से देखा। साथ ही यह भी देखा कि पराजित पक्ष के साथ उनका व्यवहार कैसा होता है? उन्होंने इस युद्ध के दौरान देखा कि ब्रिटिश अपने दुश्मनों को घुटने टेकने पर मज़बूर करने के लिए किसी हद तक जा सकते हैं। दुश्मनों को धूल चटने में वे अपनी सारी शक्ति झोंक देते हैं, किसी भी साज़िश को अंजाम दे सकते हैं। लेकिन यदि शत्रु हानिरहित हुआ तो उसे पहचानने से भी कतरा जाएंगे, दोस्ती का हाथ भी उस तरफ़ नहीं बढ़ाएंगे। सबसे प्रमुख सबक उन्होंने इस युद्ध से यह लिया कि ब्रिटिश से शत्रुता मत लो, यदि ले ही लिया, तो उनसे अपने पूरे दम-खम से लड़ो। यदि शत्रु पक्ष कमज़ोर हुआ तो वे उनका निरादर करते हैं, और यदि वह दम-खम वाला है, तो चाहे पराजित ही क्यों न हो गया हो, वे उसे पूरा सम्मन देते हैं।

‘हार्ड टास्क मास्टर’

एम्बुलेंस के काम के अलावे गांधी जी प्रोविजनिंग विभाग के भी इन्चार्ज थे। स्ट्रेचर ढोने वालों को वे उनका मेहनताना भी वितरित करते थे। खर्चों का हिसाब-किताब भी रखा करते थे। अपनी टुकड़ी के सभी सदस्यों की उचित देखभाल भी किया करते थे। कर्तव्य के निर्वहन में कोई कोताही भी नहीं बरतते थे। कहा जा सकता है कि वे ‘हार्ड टास्क मास्टर’ थे। अनुशासनहीनता उन्हें बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं थी। इस तरह से विभिन्न दायित्वों का निर्वाह वे पूरी तन्मयता से करते रहे। रात-दिन कि इन व्यस्तत्म क्षणों में कई बार ऐसा भी हुआ कि वे बिना भोजन किए चौबीस घंटों तक काम करते रहे।

कुछ भी सुपरिणाम न हुआ

गांधी जी द्वारा उन अल्पसंख्यकों की एम्बुलेंस टुकड़ी का संगठन बड़ा ही प्रशंसनीय था, लेकिन इसका कुछ भी सुपरिणाम न हुआ। इस युद्ध में उन्होंने ब्रिटिश की तरफ़ से भाग लिया था। किन्तु जिस साहस और एकता से बोअरों ने लड़ाई लड़ी उससे भी गांधी जी प्रभावित हुए बिना नहीं रहे। इस युद्ध ने उन्हें एकता, शक्ति, संगठन, साहस, नियम बद्धता, समय का अनुपालन, आदि की शिक्षा दी, जो एक लड़ने वाले व्यक्ति के लिए बहुत ही ज़रूरी है। आखिर यह सबक उन्हें भविष्य में काम आने वाला था।

बोअर युद्ध का अन्त होने पर भी भारतीयों की दशा में कोई सुधार न हुआ। उनकी शिकायतें ज्यों की त्यों बनी रही। इसके विपरीत, भूतपूर्व बोअर-उपनिवेशों में उनके लिए नई जंजीरें गढ़ी गईं। 1997 के इमिग्रेशन एक्ट को नए रूप में फिर से लागू किया गया, जिससे भारत से आनेवाले लोगों को नेटाल में प्रवेश सहज न हो। गांधी जी ने जब नेटाल की सरकार से इस एक्ट में ढिलाई बरतने का निवेदन किया, तो उनकी मांग नहीं मानी गई। गांधी जी ने दादाभाई नौरोजी को पत्र लिखकर वहां की हालात का जयाजा देते हुए कहा कि पुरानी स्थिति बरकरार है। लोगों के मन में यह आशा जग गई थी कि युद्ध के बाद दक्षिण अफ़्रीका में भारतीयों की स्थिति में सुधार आएगा। कम-से-कम ट्रांसवाल और फ़्री स्टेट में कोई कठिनाई नहीं होगी। ब्रिटिश अधिकारियों ने आश्वासन दिया था। प्रिटोरिया में रहने वाले ब्रिटिश राजदूत ने तो यहां तक कह रखा था कि ट्रांसवाल यदि ब्रिटिश उपनिवेश हो जाए तो सारे भारतीयों के सभी संकट फौरन दूर हो जाएंगे। यह मानना स्वाभाविक था कि राज्य-व्यवस्था बदल जाने पर ट्रांसवाल के पुराने कानून भारतीयों पर लागू न हो सकेंगे। पर सब कुछ उल्टा ही हुआ।

तरह-तरह के प्रतिबंध

युद्ध के बाद नेटाल में जो क़ानून युद्ध के पहले बने थे उनमें तुरंत हेर-फेर किया गया। लड़ाई के पहले चाहे जो भारतीय चाहे जब ट्रांसवाल में दाखिल हो सकता था। युद्ध के बाद स्थिति वैसी नहीं रही। हालाकि जो रुकावटें लागू की गईं वे गोरे और भारतीय दोनों पर समान रूप से लागू होती थीं।, लेकिन गोरे को तो परवाना मांगते ही मिल जाता था, पर भारतीयों के लिए तो एक एशियाटिक विभाग ही स्थापित कर दिया गया, और तरह-तरह के प्रतिबंध लगाए गए। इस अलग स्थापित किए गए महकमे के अफ़सर के पास अर्जी भेजनी होती थी। महज भारतीयों को परेशान करने के लिए इस महकमा को कायम किया गया था। ट्रांसवाल की पुरानी बोअर सरकार ने जैसे कड़े क़ानून बनाए थे वैसे कड़ाई से उन पर अमल नहीं होता था। पर अब वह स्थिति नहीं रह गई थी। ब्रिटिश राज्य के स्थापित होते ही भारतीयों से संबंधित सभी क़ानूनों पर अधिक से अधिक कड़ाई से अमल होने लगा। इन क़ानूनों को कैसे रद्द कराया जाए, अगर वह न हो सके तो इनकी कठोरता में नरमी कैसे लाई जाए यह प्रमुख प्रश्न अब गांधी जी के सामने था।

जहां एक तरफ़ यह प्रश्न था, वहीं दूसरी तरफ़ ट्रांसवाल और औरेंज फ़्री स्टेट में ब्रिटिश पताका फहराते ही लॉर्ड मिलनर ने एक कमेटी नियुक्त कर भारत विरोधी राज्य के सभी पुराने क़ानूनों की एक पुस्तिका तौयार कराकर सभी अधिकारियों में वितरित कर दी, ताकि उन्हें इसके अनुपालन में आसानी हो। अधिकरियों को उन पर सख्ती से अमल करने की हिदायत दी गई। सारे क़ानून जहर भरे थे। एशियावासी चुनाव में मतदान नहीं दे सकते थे। सरकार ने जो महल्ले ठहरा दिए थे उनके बाहर न ज़मीन ख़रीद सकते थे, न रख सकते थे। ये सारे क़ानून एशियाटिक महकमे में आ गए। इस तरह से स्थिति यह बनी कि ब्रिटिश शासनाधिकारी यह चाहते थे कि ट्रांसवाल में नए आने वाले भारतीय को रोका जाए और जो पुराने बाशिंदे हैं उनकी स्थिति ऐसी कर दें कि वे ऊबकर ट्रांसवाल छोड़कर भाग जाएं और न भी छोड़े तो स्थिति ऐसी रहे कि वे मज़दूर बनकर ही रह सकें। जो लोग युद्ध के समय ट्रांसवाल छोड़कर बाहर चले आए थे, अब वापस लौटना चाह रहे थे, लेकिन उनके लिए वापस लौटना आसान नहीं रह गया था। उन्हें नया परवाना चाहिए था। यह सब रिफ़्यूजियों को ट्रांसवाल लौटने से रोकने के लिए किया गया था। जो परवाने निकाले गए थे, उनमें भारतीयों के हस्ताक्षर या अंगूठे के निशान लिए जाते थे। पुराने परवाने जमा कर नया परवाना लेना था। गांधी जी ने इन कठिनाइयों को दूर करने के लिए अधिकारियों से बातचीत की, पर कोई विशेष फ़ायदा न हुआ।

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रविवार, 20 नवम्बर 2011

अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस

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ऐसा नहीं है कि हम महिलाओं की स्थिति के प्रति असंवेदनशील हैं। इस पुरुष सत्तात्मक समाज में महिलाओं की स्थिति अच्छी नहीं है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। यह भी उतना ही सच है कि सारी दुनिया की सामाजिक मान्यताएं पुरुष की बनाईं हुईं हैं। हम यह मानते हैं कि पुरुषों ने सदियों से उन्हें प्रताड़ित किया, उन्हें अनेक बंदिशों में रखा, उन पर तरह-तरह के हिंसा किए, उनका तरह-तरह से शोषण किया, पर अगर ग़ौर से देखें तो पुरुषों की हालत भी चिंता का विषय बनी हुई है। इसी को ध्यान में रखकर सन 1999 से दुनिया के 60 देशों में 19 नवम्बर को अन्तरराष्ट्रीय पुरुष दिवस मनाया जाता है।

हां मित्रों, कल अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस मनाया जाना था, मना या नहीं, पता नहीं। वैसे भी पुरुष को एक शोषक माना जाता है। इसलिए उनके लिए एक दिन होकर भी कुछ न किया गया हो, तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। फिर भी दस्तूर के तौर पर तो 19 नवम्बर को अन्तरराष्ट्रीय पुरुष दिवस के रूप में याद किया जाता है। विदेशों में यह 1999 से मनाया जा रहा है, जबकि भारत में 2007 से। पहली बार त्रिनिदाद और टोबैगो में 1999 में 19 नवंबर को अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस के रूप में मनाया गया। इस दिन पुरुष चाहें तो खुलकर अपना दर्द कह सकते हैं। आखिर पुरुष भी कम पीड़ित नहीं है। लगता है पुरुषों ने अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए जो मान्यताएं बनाईं, वही उनके लिए समस्या बन गयीं। जो जाल उन्होंने फैलाया उसमें वे खुद ही फंस गए हैं। आज पुरूषों की स्थिति काफ़ी दयनीय है। महिलाओं के पीडि़त पुरुषों की संख्या बढ़ती ही जा रही है।

  • · पिछले 12 वर्षों में 1.70 लाख विवाहित पुरूष घरेलू हिंसा के कारण आत्‍महत्‍या कर चुके हैं।
  • · 93% अपराध के मामले पुरूष के खिलाफ दर्ज़ होते हैं।
  • · दहेज प्रताड़ना अधिनियम की धारा 498-ए के दुरुपयोग के अनेकों मामले सामने आए हैं। वर्ष 2005-07 के आंकड़ों के मुताबिक दहेज उत्पीडऩ मामले में कानून की धारा 498-ए, के तहत 1,39,058 मामले दर्ज हुए।
  • · महिला अत्‍याचार के चलते हजारों पुरुषों को रोजगार से हाथ धोना पड़ा है। श्रम और रोजगार मंत्रालय के वर्ष 2001-05 के जारी आंकड़ों के मुताबिक निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों से करीब 14 लाख लोगों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा।
  • · 2010 में 61,453 विवाहित पुरुषों ने आत्महत्या कर ली।

    वर्ष

    विवाहित पुरुष

    विवाहित महिला

    2010

    61453

    31754

    2009

    57639

    30224

    2008

    58192

    31300

    2007

    57593

    30064

  • · 223 पुरूष हर दिन कर रहे हैं आत्‍महत्‍या।
  • · NCRB- National Crime Research Bureau के अनुसार हर वर्ष विवाहित महिलाओं की तुलना में अधिक विवाहित पुरुष आत्‍महत्‍या करते हैं। खुदकुशी करने वाले पुरुष-स्त्री अनुपात 64:36 है।
  • · करदाता 82% पुरूष हैं, पर पुरूषों के कल्याण पर सरकार द्वारा कोई खर्च नहीं किया जाता, जबकि महिलाओं के लिए अलग से विभाग है।

वैसे समाज को अलग बांटकर उस पर विचार हमारा करना ध्येय नहीं है। वैसे भी यह पश्चिम की विचारधारा है। हमारे यहां तो हम नदियों को भी मां कहते हैं। भगवान का नाम भी लेते हैं तो पहले उनकी भार्या को स्थान देते हैं, सीता-राम, राधे-श्याम, उमा-माहेश्वर। पर जब और सब जगह पश्चिमी विचारधारा ने जगह बना ही ली है, तो ‘पुरुष दिवस’ पर कम से कम यह तो सोचना ही चाहिए कि अपना साम्राज्य कायम करने के लिए जो प्रयास विद्वान पुरुषों ने किये, उसका परिणाम अच्छा नहीं रहा। माना जाता है कि पुरुष सक्षम है, पर आज स्थिति यह है कि वे बेचारे कितने सक्षम हैं, उस पर विचार करने का वक़्त आ गया है।

उन पर विचार करने का कल वक्त था, वह भी निकल गया। अगले साल देखेंगे।

शनिवार, 19 नवम्बर 2011

मन तरसे इक आंगन को

कविता

मन तरसे इक आंगन को

हुआ असह्य

अब ये एकाकी

यांत्रिक जीवन

आपाधापी

मिले जो कोई मनभावन को,

मन तरसे इक आंगन को !

 

ओसारे पर की बैठक

बहुओं की चुहलबाजियां

ननदों की शरारतें

देवरों की मस्तियां !

 

सासों के ताने

ससुर का खांसना

पुत्रबधुओं का घूंघट से

शर्माकर झांकना

 

देना इशारे छुप-छुप कर

सजनी का साजन को।

मन तरसे इक आंगन को !

 

शहर के फ्लैटों में

अपनों वाला आंगन नहीं

अपरिचित से चेहरे

बालकनी से झांकते कहीं-कहीं

 

कॉरीडोर की खुसर-पुसर

लिफ्ट का एकाकीपन

कंक्रीट के इस शहर में

ढ़ूंढ़ता मन

 

सर्द, शोख, चंचल, हवाएं

जो छूकर जाए दामन को !

मन तरसे इक आंगन को !

 

अपने-अपने मन का संत्रास

दिल की व्यथाएं

ड्राइंग रूम की साजिशों में

दबती चौपाल की कथाएं

 

आंगन का तुलसी चौरा

सिमटकर गमले में बंद

सुमनों की सुरभि की जगह

इत्र की शीशी का मकरंद

 

आग उगलती यहां की धरती

जाने क्या हो गया है सावन को?

मन तरसे इक आंगन को !

 

वहां

छप्परों पर फैली कद्दुओं की लत्तियां

यहां

दो-चार मनीप्लांट की हरी-हरी पत्तियां

 

वहां

होली में गांव भर की भौजाइयों का

आकर रंगों से सराबोर कर जाना

यहां

पड़ोस के शर्माजी का, माथे पर

गुलाल का छोटा-सा टीका लगाना

 

औपचारिकता के बीच खोजूं

मानवता के आनन को !

मन तरसे इक आंगन को !

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बृहस्पतिवार, 17 नवम्बर 2011

“कैसर-ए-हिन्द” की उपाधि

गांधी और गांधीवाद- 80

बोअर-युद्ध-6

कैसर-ए-हिन्दकी उपाधिindian-hero-mahatma-gandhi

फरवरी 1900

असिस्टैंट सुपरिन्टेन्डेन्ट

बोअर युद्ध के दौरान जनरल बुलर ने उन्हें “असिस्टैंट सुपरिन्टेन्डेन्ट” कहना शुरु कर दिया था। प्रिटोरिया न्यूज के सम्पादक विअर स्टेंट ने रणक्षेत्र में सेवा-कार्य में लगे गांधीजी का यह स्फूर्तिदायक शब्दचित्र अपने अखबार में छापा था,

सारी रात की कड़ी मेहनत के बाद, जिसने तगड़े जवानों को भी ढीला कर दिया था, बड़े सवेरे मेरी भेंट श्री गांधी से हुई। वह सड़क के किनारे बैठे हुए फौजी राशन में दिए गए बिस्कुट का कलेवा कर रहे थे। उस दिन जनरल बुलर की फौज का हर आदमी थका-मांदा, सुस्त और उदास था और सारी दुनिया को कोस रहा था। अकेले गांधीजी ही प्रस़न्न, अविचलित और संतुलित थे। उनकी वाणी में आत्मविश्वास की झलक और नेत्रों में करुणा की ज्योति जगमगा रही थी।

अंततोगत्वा 28 फरवरी 1900 को जनरल बुलर की फ़ौज़ चार महीने की घेराबन्दी तोड़ लेडी स्मिथ में प्रवेश पाने में सफल हुई। शहर में चारों तरफ़ गन्दगी फैली थी। महामारी का खतरा उत्पन्न हो गया था। उसकी तुरत साफ़-सफ़ाई की ज़रूरत थी। गांधी जी से 200 लोगों की सहायता की मांग की गई। इस काम को भी भारतीय दस्ते ने पूरी दक्षता से अंजाम दिया। छह सप्ताह के बाद गांधी जी की टुकड़ी वापस लौट आई। गोरों के दस्ते को भी घर जाने की इजाज़त दे दी गई थी। लाड़ाई तो इसके बाद भी बहुत दिनों तक चलती रही, पर दस्ते के विघटन के आदेश दे दिए गए। साथ ही यह भी कहा गया कि अगर फिर ऐसी जबर्दस्त जंगी कार्रवाई करनी पड़ी तो सरकार आपकी सेवा का उपयोग अवश्य करेगी।

चतुर्दिक प्रशंसा

DSCN1346गांधी जी और उनके दस्ते के इस प्रयास की चतुर्दिक प्रशंसा हुई। इस काम से भारत की प्रतिष्ठा भी बढ़ी। जनरल बुलर ने भी गांधी जी के काम की काफ़ी तारीफ़ की। उनकी सेवाओं से प्रभावित होकर सरकार ने उन्हें “कैसर-ए-हिन्द” की उपाधि से सम्मानित किया। जनरल बुलर ने इस टुकड़ी के सैंतीस “मुखियों” को तमगे दिए। गोरे अखबारों ने भारतीयों की प्रशंसा करते हुए उन्हें “साम्राज्य सुपुत्र” तक कहा। उन भारतीयों की स्मृति में, जिन्होंने युद्ध के दौरान अपने प्राण गंवाए थे, जोहन्सबर्ग में एक भव्य स्मारक बनवाया गया। इस पर अंग्रेज़ी, उर्दू और हिंदी में लिखा है –

“Sacred to the memory of British Officers, Waaraant Officers, Native N.C.O’s and Men, Veterinary Assistants, Nalbands and Followers of the Indian Army, who died in South Africa. 1899-1902.’’

क़ुर्बानी में भी किसी से पीछे नहीं

सबसे बड़ी बात यह सिद्ध हुई कि गोरी सरकार को स्वीकार करना पड़ा कि भारतीय लोग क़ुर्बानी में भी किसी से पीछे नहीं हैं। इस प्रयास का एक और फ़ायदा यह हुआ कि भारतीय अब अधिक संगठित हुए। भारतीय अनुशासन और एकता के सूत्र में बंध गए। उनमें आत्मविश्वास पैदा हुआ। उनकी प्रतिष्ठा और गोरों के साथ मैत्री भी बढ़ी। गांधी जी स्वयं गिरमिटिया आन्दोलनकारियों के काफ़ी निकट सम्पर्क में आए। उनमें अधिक जागृति आई। सबने माना कि भारतीयों का दुख दूर होना चाहिए। गोरों से भी मित्रता बढ़ी। वे भी भारतीयों के साथ मित्रता का व्यवहार करने लगे। दुख के समय सब एक दूसरे का प्यार और मैत्री से साथ दे रहे थे। इन स्वयं-सेवकों के प्रभाव से गोरे सैनिकों के दिल से रंगभेद और काले लोगों के प्रति घृणाभाव मिट-सा गया। गोरे सैनिकों ने देखा कि डरपोक कहे जाने वाले भारतीयों ने अपनी जान का खतरा उठा कर भी सैनिकों की जान बचाई। वे गांधी जी के प्रति उपकृत थे। लड़ाई के मैदान में सब लोगों का साथ-साथ खाना-पीना, उठना-बैठना बिना भेदभाव के बढ़ने लगा था।

एक बार धूप-ताप में कूच करते-करते गोरे सिपाही और भारतीय टुकड़े के सदस्य दोनों समान रूप से प्यासे थे। रास्ते में एक छोटा-सा झरना दिखाई दिया। गोरो ने कहा, पहले भारतीय लोग पानी पिएंगे और भारतीय आग्रह करते थे कि पहले गोरे अपनी प्यास बुझाएंगे। सेवा और सहयोग से परस्पर शंका और वैमन्स्य रखने वालों के बीच भी प्रीति पैदा हो जाती है।

गांधी जी पर गहरा असर

युद्ध का मुख्य भाग 1900 में पूरा हो गया। इंगलैण्ड से प्रशिक्षित यूनिट पहुंच गई। ब्रिटिश की क़िस्मत चमक गई। लेडीस्मिथ, किंबरली और मेफ़ेकिंग का छुटकारा हो गया। जनरल क्रोजे हार चुके थे। बोअरों ने ब्रिटिश उपनिवेशों का जितना भाग जीत लिया था वह सब ब्रिटिश सल्तनत को वापस मिल चुका था। लार्ड किचनर ने ट्रांसवाल और ऑरेंज फ़्री स्टेट को भी जीत लिया था अब कुछ बाक़ी था तो केवल गोरीला युद्ध!

बन्दूकें, हिंसा, माराकाटी, जख़्मों से बहते ख़ून, ख़ाली मैदान, आकाश और वहां चमकते सितारे, हर चीज़ ने गांधी जी पर गहरा असर डाला। हजारों विचार उनके दिमाग को मथने लगे। कई बार उन्हें लगता कि ‘सत्य’ के ऊपर जो आवरण-सा पड़ा था, यह सब देखकर कुछ कुछ हटने लगा था। उन्होंने देखा कि ज़िन्दगी और मौत का अटूट साथ है। ‘मौत’ नए जीवन की शुरुआत है। युद्ध का असली कारण मनुष्य की लालसा है। यदि मनुष्य की आत्मा को मुक्ति दिलानी है तो इस लालसा पर विजय प्राप्त करनी होगी। उन्होंने यह विचार करना शुरु किया कि वे अपने स्वयं की लालसा से कैसे मुक्ति पाएं जिससे वे निर्द्वन्द्व होकर मानव सेवा कर सकें।

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मंगलवार, 15 नवम्बर 2011

संत चैतन्य महाप्रभू

मध्यकालीन भारत - धार्मिक सहनशीलता का काल (दस)

संत चैतन्य महाप्रभू

गौड़ीय अथवा चैतन्य-मत के प्रवर्तक संत चैतन्य महाप्रभू (1486-1533) ने पूर्वांचल में कृष्णभक्ति का प्रचार किया। उनका जन्म बंगाल के नवद्वीप नामक स्थान पर हुआ था। उनके बचपन का नाम विश्वंभर था। घर में निमाई के नाम से भी उन्हें पुकारा जाता था। दिखने में काफ़ी सुन्दर रहे होंगे इसलिए उन्हें ‘गौर’ या ‘गौरांग’ भी कहा जाता थ। उन्होंने न्याय, वेदांत, व्याकरण और साहित्यशास्त्र का अध्ययन किया। उन्हें लगा कि गृहस्थाश्रम का जीवन जीते हुए वे भक्ति का उपदेश नहीं दे पाएंगे इसलिए चौबीस वर्ष की उम्र में उन्होंने 1510 में संन्यास की दीक्षा ली। उनके दीक्षा गुरु केशवभारती ने उनका नाम बदल कर कृष्ण चैतन्य रखा।

उनकी कृष्णभक्ति भावना का आधार प्रेम, ममता और भावुकता था। हालाकि उन्होंने किसी पंथ या सम्प्रदाय का प्रवर्तन नहीं किया लेकिन उनका आभामंडल इतना विशाल था कि उनके चारों ओर संप्रदाय जैसी गरिमा इकट्ठी होती गई और अनजाने ही चैतन्यमत का उदय हो गया। इस मत का दार्शनिक सिद्धांत ‘अचिन्त्य भेदाभेद’ कहलाता है। ‘भगवत्संदर्भ’ में इस मत की व्याख्या की गई है। इस ग्रंथ के रचैता जीवगोस्वामी के अनुसार भगवान में स्वरूपा आदि शक्तियों के अभिन्न होने के कारण विचार करना शक्य न होने से भेद (प्रतीत होता) है और भिन्न होने से विचार करना शक्य न होने से अभेद प्रतीत होता है, इसलिए इनमें भेदाभेद स्वीकार है। और दोनों अचिन्त्य हैं।

‘गोविन्दभाष्य’ में कहा गया है कि ईश्वर जगत का निमित्त और उपादान कारण है। वह स्वरूप से अविकृत रहता है। ईश्वर विमुख होने से जीव बंधन में पड़ता है। ईश्वरकृपा से ही उसकी मुक्ति होती है। मुक्ति से ईश्वर के समान आनंद प्राप्त होता है। मुक्ति का मुख्य साधन है – भक्ति, जिसके पांच भेद हैं : शांत, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर।

उन्होंने अपने षट्गोस्वामियों – रूप गोस्वामी, सनातन गोस्वामी आदि को वृन्दावन भेजा। इस प्रकार पूर्वांचल ब्रजभूमि से जुड़ा। उनके सिद्धांत में राधा की उल्लेखनीय उपस्थिति है। उन्हें राधाभाव, महाभाव आदि के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इससे प्रेमभक्ति को प्रमुखता मिली। उनके सम्प्रदाय ने दृढ़ अनुशासन के द्वारा नैतिकता का स्तर बनाए रखा। वे सरल, आडम्बर रहित भक्ति में विश्‍वास रखते थे। उनका यह भी मानना था कि ईश्‍वर के प्रति प्रेम, भक्ति, भजन, कीर्तन और नृत्य द्वारा परम आनंद की एक ऐसी स्थिति उत्पन्न होगी जिसमें ईश्‍वर का साक्षात्कार होगा।

उनका कहना था कि भगवान श्रीकृष्ण की उपासना एवं गुरु की सेवा से कोई भी व्यक्ति ईश्‍वर से एकीकृत हो सकता है। आध्यात्मिक उत्साह के कारण इस सम्प्रदाय में संकीर्तन का विकास हुआ। कीर्तन-भाव के लिए चण्डीदास का स्मरण विशेष रूप से किया जाता है।

संत चैतन्य ने भी ब्राह्मण धर्म के कर्मकाण्डी स्वरूप तथा जाति प्रथा की निन्दा की एवं अपने पंथ में निम्न वर्ग यहां तक कि मुसलमानों को भी सम्मिलित किया। संत चैतन्य ने न सिर्फ़ भक्ति आंदोलन में सुधार किया बल्कि बंगाल की सामाजिक व्यवस्था में भी सुधार के प्रयास किए।

रविवार, 13 नवम्बर 2011

युद्ध-स्थल में सेवा कार्य

गांधी और गांधीवाद- 79

बोअर-युद्ध- 5 :

युद्ध-स्थल में सेवा कार्य

जनवरी-फरवरी, 1900

दूसरा बुलावा

कोलेन्सो की विजय से उत्साहित हो बोअर ने एक ऊंची पहाड़ी पर क़ब्ज़ा जमा लिया। यहां से लेडी स्मिथ को पूरी तरह से घेरे में रखा जा सकता था। बुलर के लिए अब लेडी स्मिथ को छुड़ाने की आशाएं धूमिल लगने लगी। उसमें ‘वार डिस्पैच’ में लन्दन को सारी बातें बताई। उसे निर्देश मिला कि वह पूरी कोशिश से लेडी स्मिथ को छुड़ाए या फिर नेटाल कमांड छोड़ कर देश वापस आ जाए। जनरल बुलर ने महाभियान की तैयारी शुरु कर दी। लॉर्ड रोबर्ट्स को दक्षिण कफ़्रीका की कमान सौंपी गई और किचनर को चीफ ऑफ स्टॉफ नियुक्त किया गया।

इस महाभियान में होने वाले ख़ून-ख़राबे के ध्यान में रखकर भारतीय एम्बूलेन्स कॉर्प्स को एक महीने के भीतर ही जनवरी 1900 में दूसरा बुलावा आया। गांधी जी 500 स्ट्रेचर ढोने वाले स्वयं सेवकों के साथ एस्कॉट रवाना हुए। जब वे फ़ुरसत में थे तो अस्पताल में डॉक्टरों से प्रशिक्षण लिया करते थे, ताकि वे घायलों की सेवा, मरहम पट्टी आदि कर सकें। उनके दस्ते को स्पियांकोप की लड़ाई में भेजा गया था। इस बार स्थिति काफ़ी कठिन थी। स्पियांकोप के युद्ध के बाद हालत बदल गये थे। जनरल बुलर ने मेजर बाप्टे के द्वारा संदेशा भिजवाया कि हालाकि भारतीय दस्ता रणक्षेत्र में जाने को बाध्य नहीं हैं, फिर भी यदि वे जोखिम उठाकर घायल सैनिकों को रणक्षेत्रों से उठाकर लायें तो यह सरकार पर उपकार होगा। गांधी जी तो जोखिम उठाने के तैयार बैठे ही थे। खतरे से बाहर रहना उन्हें कभी पसंद नहीं आया था।

IMG_1943युद्ध-स्थल में इस टुकड़ी ने तीन सप्ताह तक काम किया। इस दौरान कई बार इन्हें गोलियों की बौछारों के बीच काम करना पड़ा। वे स्ट्रेचर पर घायलों को लाद कर लाते थे। शुरू में अंग्रेज़ों की हार-पर-हार होती गई। स्पियांकोप और वालक्रान्ज की हार के दौरान ज़ख़्मियों की तादाद काफ़ी बढ़ गई। बड़ा ही घमासान युद्ध हो रहा था। उन्हें लगातार गोलियों की बौछारों के बीच में से घायलों को निकालकर सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाना पड़ता था। यह बड़ा ही दुष्कर कार्य था। गोलियों की बौछार के बीच गांधी जी और उनके साथियों ने अपनी जान पर खेलकर गोरे सैनिकों की जान बचाई। चारो तरफ़ घायलों और शवों का ढ़ेर लग गया था। एक अनुमान के मुताबिक डेढ़ सौ से अधिक की मौत हो चुकी थी। सात सौ बीस लोग घायल थे। भारतीयों को काम दिया गया था कि रणक्षेत्र से घायलों को डोली में उठाकर अस्पताल तक लाएं। कई बार तो दिन में बीस-पचीस मील की दूरी भी उन्हें तय करनी होती थी। घायलों को डोली में डाल कर उन्हें इतनी दूरी तय कर लाना कोई आसान काम नहीं था।

गांधी जी भी एक टुकड़ी के इंचार्ज थे। युद्ध में गांधी जी ने घायल सैनिकों की सेवा की तथा सैनिकों के श्वेत व अश्वेत होने का कोई भेद भाव नहीं किया। जनरल वुडगेट जब घायल हुआ तो उसकी देखरेख का दायित्व गांधी जी को ही मिला था। गांधी जी को उसे फ़िल्ड अस्पताल से बेस अस्पताल तक ले जाना था। उसकी स्थिति बहुत नाज़ुक थी। वह दर्द से कराह रहा था। गांधी जी धूल और गर्मी की परवाह किए बगैर उसे जल्द से जल्द बेस अस्पताल पहुंचा देना चाह रहे थे ताकि उसकी प्राण रहते सेवा हो सके।

प्रभु सिंह की बहादुरी

नदी के किनारे हो रहे युद्ध के इस घमासान के बीच, लोग एक के बाद एक घायल हो रहे थे, मर रहे थे। स्पियांकोप और फ़्रेयर के बाद वालक्रांत्ज़ पर भी आक्रमण शुरु हो गया था। लेडी स्मिथ में घिरे हुए लोगों में अंग्रेज़ों के साथ-साथ वहां बसनेवाले कुछेक भारतीय भी थे, जिनमें कुछ व्यापारी और बाक़ी गिरमिटिया थे। ये गोरों कि ख़िदमत किया करते थे। एक मज़दूर था प्रभु सिंह। उसके अफ़सर ने उसे एक बड़ा ही जोखिमवाला किन्तु काफ़ी महत्वपूर्ण काम सौंपा।

लेडी स्मिथ के पास की पहाड़ी पर बोअर की एक ‘पोम-पोम’ तोप थी। इसके गोलों से बहुत से मकान धराशायी हुए थे, कई जाने गई थीं। तोप का गोला दगने और उसका निशाने तक पहुंचने में एक-दो मिनट लग जाता था। इस समयावधि में अगर घिरे लोगों को चेतावनी मिल जाए तो वे किसी-न-किसी आड़ में छिप जाते। इस प्रकार उनकी जान बच जाती। प्रभु सिंह को यह काम सौंपा गया कि वह एक पेड़ के नीचे छिप कर बैठ जाए और जब तोप का गोला दगे, और उसकी आग भड़कती दिखे, तो वह घंटा बजा दे। प्रभु सिंह ने अपना यह काम बड़ी निष्ठा से किया। जब से तोपें दगने लगीं और जब तक दगती रहीं तब तक वह वहां बैठे तोपवाली पहाड़ी की ओर आंख गड़ाए रहा और गोले दगने की भड़की आग देखते ही घंटा बजा दिया करता। ख़ुद हमेशा खतरे में रहने के बावज़ूद भी एक बार भी वह घंटा बजाने से नहीं चूका।

जब यह बात लॉर्ड कर्जन, भारत के तत्कालीन वाइसराय के कानों में पड़ी, तो उन्होंने प्रभु सिंह को भेंट करने के लिए एक काश्मीरी जामा भेजा और नेटाल की सरकार को लिखा कि प्रभु सिंह को यह उपहार समारोहपूर्वक प्रदान किया जाए। डरबन के टाउनहॉल में सार्वजनिक सभा करके प्रभु सिंह को वह उपहार दिया गया।

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शुक्रवार, 11 नवम्बर 2011

बंटवारा

लघुकथा
बंटवारा

बंटवारा तो जैसे कुदरत का नियम ही है। आर्थिक रूप से पिछड़े समाज में, पिता के गुज़रते ही पुत्रों में संपत्ति (चल-अचल ) का बंटवारा तो एकदम तय है। पर जीवन बाबू की जिंदगी में ऐसी नौबत ही नहीं आई। रेलवे में पूछताछ लिपिक की नौकरी से जो धनराशि वेतन के रूप में मिलती थी वह चार बच्‍चों के लालन-पालन में ही शेष हो जाता था। पैतृक ज़मीन भी बेटियों के ब्याह में एक-एक कर बिक गई। जीवन बाबू की पत्नी बच्‍चों के लालन-पालन की चक्‍की में ऐसी पिसी कि अपने शरीर का ख़्याल रखना ही भूल गईं बेचारी का शरीर तमाम बीमारियों का घर हो गया।

images (65)एक दिन जीवन बाबू सुबह-सुबह सैर कर रहे थे। ना जाने कौन सी हवा लगी, उन्होंने बिस्तर धर लिया। स्थानीय उपचार से उनका रोग ठीक नहीं हो पाया। जीवन बाबू ने पहले बिस्‍तर पकड़ा फिर लगभग मति-शून्‍य अवस्‍था में आ गए। उनकी पत्‍नी तो पहले ही बिस्‍तर का बोझ बन चुकी थी। जीवन बाबू को नौकरी से मेडिकली बोर्ड आउट कर दिया गया। पेंशन के नाम पर घर की आय आधी हो गई। ऑफिस के ही सहकर्मियों ने उन्‍हें सरकारी आवास से गांव के पैतृक आवास तक पहुँचा दिया।

समस्‍या तो अब थी। पेंशन की आयवाले इस दंपति की देख भाल कौन करे? दोनों बेटों की शाम में बैठकी हुई। स्थिति पर विचार किया गया। उनमें जो छोटा था उसने बड़े को प्रस्‍ताव दिया, "देखो तुम तो थोड़ा बहुत कमा भी लेते हो पर मैं तो कुछ भी नहीं कमाता। अतः मां को तुम रख लो और उनकी देख-भाल, दबा-दारू करवाओ। पिताजी को मैं रख लेता हूँ। उनके पेंशन से मैं उनकी देखभाल दवा दारू करवा दूँगा।" यह बात मान्‍य थी, दोनों को। इस तरह उस घर की चल-अचल संपत्ति का भी बंटवारा हो गया।

बुधवार, 9 नवम्बर 2011

घायलों की मरहम-पट्टी

गांधी और गांधीवाद- 78

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बोअर-युद्ध- 4 :

घायलों की मरहम-पट्टीDSCN1345

IMG_1935दक्षिण अफ़्रीका में बोअर और ब्रिटिश के बीच सर्वोच्चता की लड़ाई अधिराज्य के इर्द-गिर्द ठहरी हुई थी। प्रिटोरिया कन्वेशन के आधार पर ब्रिटिश इस गणराज्य पर अपना अधिराज्य का दावा करता रहा और बोअर उन दावों का खण्डन करते रहे। इन दावों –प्रतिदावों के बीच दोनों ही पक्ष प्रवासी भारतीयों की स्थिति का इस्तेमाल करते रहे। वस्तुस्थिति यह थी कि गणराज्य द्वारा स्वीकार किए अधिकारों के अलावे उन्हें कोई अधिकार नहीं प्राप्त था। शक्ति प्रदर्शन की राजनीति में बिछे कूटनीति के बिसात पर भारतीयों की स्थिति एक मामूली प्यादे के समान थी।

IMG_1935अन्य वादों (ism) की तरह विक्टोरिया युग की साम्राज्यवाद के प्रति अपनी धारणाएं थीं। चैम्बरलेन ने ख़ुद को साम्राज्य का प्रचारक घोषित रखा था। मिलनर ने साम्राज्यवाद को मानव विचारधारा का महान आन्दोलन कहा था। गंभीर, शांत, स्पष्ट, मज़बूत और अक्खड़ स्वभाव का मिलनर जौन रस्कीन की विचारधारा से प्रभावित शासक था। साम्राज्यवाद की वेदी पर वह अपनी जान तक न्यौछावर करने को तैयार था। सड़सठ साल की उम्र में उसने शादी की, अपनी मौत के चार साल पहले, ताकि उसके साम्राज्यवाद के काम में वैवाहिक जीवन बाधा न बन सके।

11 अक्तूबर 1899 को युद्ध का औपचारिक ऐलान हो चुका था। बोअर की तरफ़ से 40,000 सैन्य बल मैदान में मोर्चा चंभाल चुका था। बोअर की सेना का नेतृत्व पिट जोबर्ट कर रहा था। वह काफ़ी बहादुर और चालाक सिपाही था। ब्रिटिश सेना का कमान जनरल सर आर. हेनरी बुलर के हाथों में था। 31 अक्तूबर को वह केप टाउन पहुंचा। जिस जहाज से वह उतर रहा था, उसी से एक नौजवान भी उतर रहा था। उसका नाम था विन्सटन चर्चिल!

विन्सटन चर्चिल वहां “मॉर्निन्ग पोस्ट” के युद्ध संवाददाता के रूप में गए थे। 14 अक्तूबर 1899 को अस्त्र-शस्त्र से भरी एक रेल गाड़ी युद्ध-स्थल की ओर जा रही थी। इसी गाड़ी में चर्चिल भी जा रहे थे। किन्तु बीच रास्ते में ही बोअरों ने इस ट्रेन पर लूट-पाट मचाई और इस अचनाक हुए हमले से ट्रेन पटरी से उतर गई। चर्चिल को जनरल बोथा ने बंदी बना लिया। वहां से उन्हें प्रिटोरिया भेजा गया। किसी तरह चर्चिल बच-बचाकर वहां से निकल भागे।

IMG_1933ब्रिटिश सेना पर संकट के बादल गहराते जा रहे थे। शत्रु एस्टकोर्ट के नज़दीक पहुंच गई थी। स्ट्रोमबर्ग की लड़ाई वे हार चुके थे। कई अन्य मोर्चों पर भी उनकी हालत खास्ता थी। अब उनकी सारी आशाएं जनरल बुलर पर टिकी थी। लेडी स्मिथ में घिरे हुए जनरल व्हाइट को छुड़ाने के लिए जनरल बूलर महाप्रयास करने के उद्देश्य से अपनी सारी फ़ौज को लेकर कोलेन्सो के निकट टुगेला नदी पार करने के इरादे से आगे बढ़ रहा था। भयंकर युद्ध की संभावना को देखते हुए ब्रिटिश को सबकी मदद की आवश्यकता थी।

IMG_1935राष्ट्रपति क्रूगर के बोअरों का बल बढ़ता ही जा रहा था। वे उफनती नदी की बाढ़ के पानी की तरह बढ़ते जा रहे थे। उनका नेटाल की राजधानी तक पहुंच जाने का खतरा दिखाई दे रहा था। ऐसी स्थिति में गांधी जी की मांग “एम्ब्युलेंस कोर” के रूप में स्वीकार कर ली गई। इस वक्त तो सरकार को जितने आदमी मिल सकें उतने की ज़ारूरत थी। जिस भयंकर युद्ध की संभावना थी उसमें इतने आदमियों के घायल होने का डर था कि स्थाई सेवादल उन्हें सम्भाल नहीं सकता था। लड़ाई ऐसे प्रदेश में हो रही थी जहां युद्धक्षेत्र और केन्द्र के बीच पक्की सड़क भी नहीं थी। इसलिए घोड़ा-गाड़ी आदि सवारियों से घायलों को ले जाना भी संभव नहीं था।

DSCN1352गांधी जी ने 1899 के बोअर युद्ध में अंग्रेज़ों की सहायता के लिए भारतीय एम्बुलेंस कोर्प्स की स्थापना की। उनकी इस टुकड़ी में लगभग ग्यारह सौ आदमी थे। उनमें चालीस मुखिया थे। इसके अलावे तीन सौ स्वतंत्र भारतीय भी रंगरूटों में भरती हुए। अन्य 800 गिरमिटिया थे। डॉ. बूथ तो मेडिकल सुपरिन्टेन्डेन्ट की भूमिका में साथ में थे ही। खाकी यूनिफॉर्म में हैट के साथ सर्जेण्ट मेजर गांधी जी तो थे ही। उनकी बांह पर रेड क्रॉस की पट्टी बंधी थी। डॉ. बूथ ने स्वयं सेवकों को प्रशिक्षण दिया था। नेताओं में बैरिस्टर, क्लर्क, मुनीम आदि थे। बाक़ी के लोगों में कारीगर, राज, बढ़ई और मामूली मज़दूर वगैरह थे। इनमें हिन्दू, मुसलमान, मद्रासी, उत्तर भारत वाले आदि सभी वर्गों के लोग थे। यह विशाल दस्ता डरबन से रवाना हुआ।

दस्ते को फौजी भत्ता मिलता था। नेताओं ने तो बिना किसी राशि के ग्रहण किए सेवादल में काम किया। अन्य स्वयं सेवकों को एक पाउंड प्रति सप्ताह का भत्ते के साथ राशन मिलता था। हालाकि उनमें से अधिकांश ऐसे थे जो अपने-अपने व्यवसाय में चार पाउंड प्रति सप्ताह कमाते थे। उसके अलावे अन्य दूसरी ज़रूरतों को पूरा करने का भार व्यापारी वर्ग ने अपने सिर पर लिया। घायलों के लिए भी मिठाई, बीड़ी-सिगरेट आदि देने में भी उन्होंने मदद की। इस दस्ते को हिन्दुस्तानी दस्ता कहा गया। यूरोपियनों का भी दस्ता था। दोनों एक ही जगह काम करते थे। हिन्दुस्तानी दस्ते के लिए कहा गया कि उन्हें बंदूकों की मार की हद में जाकर काम नहीं करना होगा।

भारतीय व्यापारियों ने रसद और यूनिफॉर्म की आपूर्ति की। 13 दिसम्बर 1899 को कोलेंसो, टुगेला नदी के तट पर बसे एक छोटे से गांव के पास, जो लेडी स्मिथ से सोलह मील की दूरी पर था, की लड़ाई छिड़ गई थी। जनरल बुलर बीस हजार की सैन्य बल के साथ लेडी स्मिथ को मुक्त कराने के उद्देश्य से बढ़ रहा था कि अचानक जनरल लुई बोथा के नेतृत्व में बोअरों ने धावा बोल दिया था। पहली बार इस टुकड़ी को कौलेंसो के मोर्चे पर मैदान में भेजा गया। वहां इस टुकड़ी ने कड़ी मेहनत की। उन्होंने युद्ध में घायलों की मरहम-पट्टी करना आरंभ किया। घायलों को 7-8 मील ले जाना पड़ता था। कई बार तो उन्हें पचीस-पचीस मील ले जाना पड़ता था। रास्ते में उन्हें दवा भी देनी पड़ती थी। कूच सवेरे आठ बजे शुरू होता और शाम के पांच बजे छावनी के अस्पताल पर पहुंचते।

एक दिन गांधी जी का दल चीवली छावनी की तरफ़ जा रहा था। दोपहर का समय था। लेफ़्टिनेंट रॉबर्ट्स घायल पड़ा था। उसके शरीर से लहू बह रहा था। वह तड़प रहा था। गांधी जी चार-छह स्वयंसेवकों के साथ उस तरफ़ बढ़े। शत्रुपक्ष ने आक्रमण तेज़ कर दिया था। रॉबर्ट्स लॉर्ड रॉबर्ट का बेटा था। गांधी जी ने टुकड़ी के लोगों की सहायता से उसे उठाकर डोली में रखा। चार लोग डोली उठाकर आगे बढ़े। उसे उठाकर युद्धक्षेत्र से बाहर ले आए। एक सुरक्षित स्थान पर डोली रुकवाकर गांधी जी ने उसकी मरहम-पट्टी की। फिर उसकी नब्ज टटोली। गांधी जी तड़प उठे। लेफ़्टिनेंट रॉबर्ट्स के प्राण पखेरू उड़ चुके थे। वह दिन 16 अक्तूबर 1899 का था।

एक सप्ताह के बाद 19 दिसम्बर को आदेश पारित कर टुकड़ी अस्थाई रूप से भंग कर दी गई। यह कहा गया कि जब आवश्यकता होगी उन्हें फिर बुलाया जाएगा। गांधी जी के साथ दल डरबन वापस आ गया। युद्ध क्षेत्र से लौटने के बाद गांधी जी ने अपना सामान्य काम संभाल लिया। दिसम्बर 1899 के एक दिन जब गांधी जी 14, मरकरी लेन के अपने कार्यालय में प्रवेश कर रहे थे कि हैरी एस्कोम्ब गली पार कर गांधी जी से बात करने के लिए उनकी तरफ़ बढ़ रहा था। उसने गांधी जी से कहा, वह 1897 के गांधी जी पर हुए हमले के लिए बहुत ही शर्मिंदा है। उसने यह भी कहा कि उसे यकीन नहीं था कि भारतीयों के दिल में इतनी उदारता और सेवा भावना भरी हुई है। गांधी जी ने अपनी चिर परिचित मुस्कान के साथ कहा, जो बीत गई सो बात गई। उन्होंने यह भी कहा कि हमें कई ऐसे मैक़े मिलेंगे जब हम एक दूसरे के साथ मिलकर काम करेंगे। इस सुखद वार्तालाप के बाद दोनों ने अपने-अपने घर की राह पकड़ी। तीन घंटे के बाद जब गांधी जी अपने घर पहुंचे थे, तो एस्कौम्ब के घर का एक नौकर दौड़ता हुआ आया। उसने बताया कि अभी-अभी एस्कौम्ब की मृत्यु हो गई! उसे दिल का दौड़ा पड़ा था।

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सोमवार, 7 नवम्बर 2011

संत वल्लभाचार्य

मध्यकालीन भारत - धार्मिक सहनशीलता का काल (नौ)

श्रीनिम्बार्काचार्य

कृष्ण भक्तिकाव्य का एक लंबा इतिहास है। महाभारत के सूत्रधार कृष्ण, मध्यकाल आते-आते अवतारी रूप धारण कर लेते हैं। आचार्य निम्बार्क देव कृष्ण को सर्वोपरि पर ब्रह्म मानते हैं। इनके सिद्धांत को ‘भेदाभेदवाद’ या ‘द्वैताद्वैतवाद’ कहा जाता है। जीव अवस्था – भेद से ब्रह्म के साथ भिन्न भी है और अभिन्न भी है। जीव ब्रह्म का अंश है, ब्रह्म अंशी है। भक्ति ही उसकी मुक्ति का साधन है। श्रीकृष्ण ही उपास्य हैं।

इनके सम्प्रदाय में हालाकि प्रपत्ति या शरणागति का भाव है लेकिन यहां आग्रह प्रेमभाव पर है। इस संप्रदाय में राधा विशिष्ट स्थान है। कृष्ण सर्वेश्वर और राधा सर्वेश्वरी हैं। दोनों की समान स्थिति है। राधा-कृष्ण की युगलोपासना का विधान इस संप्रदाय में है।

संत वल्लभाचार्य

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कृष्ण पंथ के अगुआ थे संत वल्लभाचार्य (1479-1530) और पूर्वी भारत में संत चैतन्य महाप्रभू (1485-1533)। दोनों का भक्ति मार्ग में विश्‍वास था। दोनों ने ही श्रीकृष्ण एवं राधा के बीच प्रेम को ईश्‍वर के प्रति निष्ठा के मॉडल के रूप में अपनाया।

संत वल्लभाचार्य का जन्म 1479 ई. में वैशाख कृष्ण 11 को चम्पारण्य छत्तीसगढ़ प्रदेश में हुआ। महाप्रभु वल्लभाचार्य के साथ यहाँ चम्पेश्वर महादेव का मन्दिर होने की वजह से यह छत्तीसगढ़ का बहुत ही पवित्र और सुन्दर तीर्थस्थल/दर्शनीयस्थल है। इनके माता-पिता दक्षिणात्य तैलंग ब्राह्मण थे। ये स्थायी रूप से प्रयाग के निकट अरैल नामक स्थान रहते थे और वहीं से दूर-दूर की यात्राएं करते थे। वे तेजस्वी, प्रतिभासम्पन्न महात्मा थे। वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। सम्राट अकबर भी इनकी विद्वता से प्रभावित थे।

श्रीवल्लभाचार्य भारत के बहुत से भागों में पर्यटन और बहुत से विद्वानों से शास्त्रार्थ करके अपने मत का प्रचार किया। अंत में सन्‌ 1492 में वे अपने उपास्य श्रीकृष्ण की जन्मभूमि पधारे और यहीं अपनी गद्दी स्थापित की। अंबाले के उनके एक सम्पन्न शिष्य पूरनमल खत्री ने गोवर्धन पर्वत पर श्रीनाथ जी के एक विशाल मंदिर का निर्माण कराया जिसमें सन्‌ 1509 में मूर्ति की प्रतिष्ठा हुई। श्री वल्लभाचार्य ने ब्रज में अपनी गद्दी स्थापित की और एक मत चलाया जो “वल्लभ सम्प्रदाय” के नाम से प्रसिद्ध है। 1510 में उन्होंने सूरदास जी को प्रभावित कर उन्हें अपने मत में दीक्षित किया।

संत वल्लभाचार्य का दार्शनिक सिद्धांत ‘शुद्धाद्वैत’ है जो शंकर के मायावाद का खंडन करता है। बच्चन सिंह मानते हैं,

“भक्ति के अन्य आचार्यों की भांति शंकराचार्य के मायावाद या विवर्तवाद का विरोध उन्हें भी करना पड़ा, क्योंकि जनता से उसका कोई सम्बन्ध न था। .. वे भक्ति को जाति-पांति से मुक्त करके सामान्य जनता तक पहुंचाना ही नहीं चाहते थे, बल्कि समूहबद्ध भी करना चाहते थे।”

उन्होंने माया को ब्रह्म की शक्ति के रूप में निरूपित किया, पर यह भी प्रतिपादित किया कि ब्रह्म उसके आश्रित नहीं हैं। ब्रह्म माया से सर्वथा अलिप्त अर्थात्‌ शुद्ध है। उनका मानना था कि ब्रह्म और आत्मा में कोई भेद नहीं है। आत्मा भक्ति के माध्यम से अपने बंधनों से छुटकारा पा सकती है। भक्त को वसुदेव के चरणों में स्वयं को अर्पित कर देना चाहिए, क्योंकि वही मनुष्य को पापों से छुटकारा दिला सकता है। भगवत्‌ प्राप्ति का साधन भक्ति है।

उन्होंने कृष्ण को अपना आराध्य देव बनाया। उनके लिए कृष्ण ही परब्रह्म हैं जो परमानन्द रूप हैं – परम आनन्द के दाता। कल्पना की गई कि ब्रह्म कृष्ण का जो अविकृत रूप है, वह हर स्थिति में बना रहता है, वह शुद्ध अद्वैत है। रमण की इच्छा से, वे नर रूप ग्रहण करते हैं, जहां मुख्य आशय जीव के सुख और कल्याण है। इस व्यापार में केवल भगवान की इच्छा ही कारण है, माया का इससे किसी प्रकार का संबंध नहीं है। उनका भक्ति चिंतन ईश्वर और जीव के बीच एक घनिष्ठ संबंध स्थापित करता है, जहां ब्रह्म लीला भूमि में संचरित होकर भी शुद्ध है, और जीव उनसे तदाकार होकर आनन्द की उपलब्धि करता है।

प्रेमसाधना में श्री वल्लभाचार्य ने लोकमर्यादा और वेदमर्यादा दोनों का त्याग विधेय ठहराया। साधना में शुद्धाद्वैत को पुष्टिमार्ग कहा जाता है।

“पुष्टि किं मे? पोषणम्‌। पोषणं किम्‌। तद्‌ अनुग्रहः। भगत्कृपा।”

‘पुष्टि’ का मतलब है ईश्वर का अनुग्रह, उनकी कृपा से पुष्ट होने वाली भक्ति। भगवान के पोषण (अनुग्रह) को ही भक्ति का संबल मानना चाहिए। यहां ईश्वर की कृपा ही प्राप्य है। वही परम सुख और परम आनन्द है। इसके लिए वे नृत्य-गान और भक्ति के द्वारा भगवान को रिझाने का प्रयास करने लगे। कृष्ण के प्रति निश्छल भाव से संपूर्ण समर्पण पुष्टि मार्ग का आग्रह है। उन्होंने विशेष रूप से भगवान की प्रतिमा पूजा पर बल दिया।

उनका गोलोकवास आषाढ़ शुक्ल 3 को 1530 में हुआ। उनके बाद आचार्य जी के ज्येष्ठ पुत्र गोपीनाथ (1510-1538) आठ वर्ष गद्दी पर बैठे। 28 वर्ष की अल्पायु में ही उनकी मृत्यु हो गई।

उनकी प्रसिद्ध पुस्तकें हैं “अणुभाष्य”, “सुबोधिनी टीका”, “तत्त्वदीपनिबंध”, “श्रृंगारसमंडन” एवं “सिद्धान्त रहस्य”। संत वल्लभचार्य की मृत्यु के पश्‍चात् दुर्भाग्यवश उनके पंथ में कुछ अवांछनीय प्रथा का प्रवेश हो गया। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल कहते हैं,

“वल्लभ सम्प्रदाय में जो उपासना पद्धति या सेवा पद्धति ग्रहण की गई उससे भोग, राग तथा विलास की प्रभूत सामग्री के प्रदर्शन की प्रधानता रही। मंदिरों की प्रशंसा “केसर की चक्कियां चलै है” कहकर होने लगी। भोगविलास के इस आकर्षण का प्रभाव सेवक-सेविकाओं पर कहां तक अच्छा पड़ सकता था।”

फिर भी हमें यह तो मानना ही पड़ेगा कि श्रीवल्लभाचार्य के प्रयासों, जैसे सामूहिक प्रार्थनाओं, नृत्यों और कीर्तनों द्वारा जनता को एक सर्जनात्मक प्रेरणा मिली। सामंतवादी युग व्याप्त जड़ता को तोड़कर जनता में एक हलचल, स्फूर्ति, क्रियात्मकता और स्वातंत्र्य का भाव जगा।

शनिवार, 5 नवम्बर 2011

एम्बुलेंस कॉर्प्स बनाने की इज़ाज़त मिली

गांधी और गांधीवाद- 77

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एम्बुलेंस कॉर्प्स बनाने की इज़ाज़त मिली

DSCN1492दक्षिण अफ़्रीका पर नायकत्व के लिए अंग्रेज़ और बोअर दोनों गोरी जाति वाले एक-दूसरे का खून बहा रहे थे। यह देख भारतीयों को कोई दुख नहीं हुआ। भारतीयों को तो दोनों ही सताते थे। अंग्रेज़ कुछ कम, बोअर कुछ ज़्यादा। ऐसे में यह तय कर पाना कि कौन सा पक्ष न्याय पर है, संभव नहीं था। नेटाल के भारतीयों को तो मामूली से भी अधिकार प्राप्त नहीं था। गांधी जी को युद्ध से घृणा थी। वे मानते थे कि युद्ध का अर्थ हिंसा है।

पर युद्ध छिड़ चुका था। गांधी जी ने भारतीय व्यापारियों से युद्ध सहायता-कोष के लिए चंदा एकत्रित किया और सरकार को पहुंचाया। इस समय तक गांधी जी अंग्रेज़ सरकार और अंग्रेज़ जाति के प्रशंसक थे, उन्हें अंग्रेज़ों की सफ़ाई, सलीक़ा और प्रजातंत्र पसंद था। अंग्रेज़ों की क़ानूनबद्धता और न्याय नीति भी आकर्षक थी। गांधी जी चाहते थे कि साम्राज्य की विपत्ति और संकट के दिनों में भारतीय कौम को भी सरकार की सक्रिय सहायता करनी चाहिए। गांधी जी का मानना था कि अधिकारों की मांग करनेवालों के भी कुछ कर्तव्य और दायित्व होते हैं।

रंगभेद नीति के बावजूद भी गांधीजी दक्षिण अफ्रीका में ब्रिटिश शासन के प्रति निष्ठावान थे। ब्रिटिश राज्य के प्रति उनकी यही वफ़ादारी उन्हें उस युद्ध में शामिल होने के लिए जबरदस्ती घसीट ले गई। ब्रिटिश लोगों की मदद के लिए गांधी जी ने स्वयं सेवक जुटाने शुरु कर दिए। उनके इस क़दम की चारों ओर आलोचना हुई। लोगों ने सवाल किया कि ब्रिटिश जब डच लोगों का दमन कर रहे थे तो उनकी मदद करने का क्या नैतिक कारण था? अपने विचार समझाने के लिए गांधी जी ने एक मीटिंग बुलाई। एक घण्टे के अन्दर करीब सौ भारतीय वहां इकट्ठे हो गए। उनकी दलील यह भी थी कि अंग्रेजी उपनिवेशों में बसने वाले भारतीय यदि नागरिकता के सभी अधिकारों और सुविधाओं की मांग करते हैं, तो साथ ही उन्हें नागरिक के नाते अपने सभी कर्तव्यों को स्वीकार करना चाहिए और इन कर्तव्यों में, अपनाये गये नये देश की रक्षा में भी हाथ बंटाना भी उनका धर्म है। उस समय उनका मानना था,

“भारत को पूर्ण मुक्ति ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन रहकर ही विकास से मिल सकती है। इसलिए हमें उनकी सहायता करनी चाहिए।”

बिना किसी शर्त के वहां उपस्थित लोगों ने अपनी सेवाएं अर्पित की। चिकित्सा सेवा में गांधीजी की रुचि थी। उन्होंने युद्ध में घायल सैनिकों की सेवा का बीड़ा उठाया। अक्तूबर 1899 में बोअर-युद्ध छिड़ जाने पर गांधीजी ने ग्यारह सौ भारतीयों की ऐम्बुलेंस टुकड़ी संगठित की। उनमें चालीस दल-नेता थे।

उन दिनों आम तौर पर गोरे यह समझते थे को भारतीय लोग डरपोक, स्वार्थी और पैसे के लालची होते हैं। वहां के अंग्रेज़ों की तब यह आम धारणा थी कि उपनिवेश पर संकट के समय भारतीय भाग खड़े होते हैं। उन्हें स्वार्थ के अलावे और कुछ नहीं सूझता। गंधी जी के इस प्रयास को भी इसी दृष्टि से देखा गया और जब गांधी जी ने इसकी सूचना अपने अंग्रेज़ मित्रों को दी, तो उन्होंने उन्हें निराश करने वाले जवाब ही दिए कि उन्हें भारतीयों से सहायता लेने की ज़रूरत नहीं है। आर. जेमसन जो नेटाल विधान सभा का सदस्य था, ने तो यहां तक कह दिया कि तुम भारतीय को युद्ध के बारे में क्या जानकारी है? फ़ौज के लिए तुमलोग खासा सिर दर्द हो जाओगे। युद्ध के समय तुम लोग मदद तो कुछ कर नहीं पाओगे, उलटे हमीं को तुम लोगों की हिफ़ाज़त की फ़िक्र करनी होगी।

हां डॉ. बूथ ने उन्हें काफ़ी प्रोत्साहित किया। पहले भी उन्होंने गांधी जी को घायलों की सेवा और देखभाल करने का प्रशिक्षण दिया था। इस योग्यता से सम्बंधित प्रमाण-पत्र भी गांधी जी ने हासिल कर लिया था। लाटन और एस्कम्ब ने भी गांधी जी के इस काम को पसन्द किया था। इस सबसे उत्साहित होकर जब गांधी जी ने सरकार से युद्ध में अपनी सेवा प्रदान करने का निवेदन किया, “हमें हथियार चलाना नहीं आता। इसमें हमारी ग़लती नहीं है। ये हमारा दुर्भाग्य है कि ये कला हमें नहीं आती। लेकिन लड़ाई के मैदान में और भी कई महत्वपूर्ण काम होंगे जो हम कर सकते हैं, और यदि हमें वह करने का मौक़ा मिलेगा तो ये हमारा सौभाग्य होगा। हमें किसी भी समय इस काम के लिए बुलाया जाएगा, हम आने के लिए तैयार हैं। अगर और कहीं नहीं तो कम से कम हम लड़ाई के मैदान में जख़्मी लोगों की सेवा और अस्पतालों में काम तो कर ही सकते हैं।”

अंग्रेज़ों ने इस काम में प्रवासी भारतीयों को दूर ही रखना चाहा। सरकार ने दो टूक जवाब दे दिया कि हमें आपकी सेवा की ज़रूरत नहीं है।

गांधी जी ‘ना’ से हार मान कर बैठ जाने वालों में से नहीं थे। वे इंडियन एंग्लिकन मिशन के डॉ. बूथ के साथ नेटाल के बिशप बेयन्स से मिले। गांधी जी की टुकड़ी में बहुत से भारतीय ईसाई भी थे। बिशप को गांधी जी का प्रस्ताव पसन्द आया। उन्होंने गांधी जी की सहायता करने का भरोसा दिया।

इस बीच परिस्थितियां भी तेज़ी से करवट ले रही थी। बोअरों ने युद्ध की जबरदस्त तैयारी कर रखी थी। उनकी दृढ़ता और वीरता आदि अंग्रेज़ों की अपेक्षा से अधिक तेजस्वी सिद्ध हुई। डटकर लड़ने वाले वीर बोअर लोगों ने अंग्रेज़ों के दांत खट्टे कर दिए। गार्डेन कोलोनी पर नायकत्व के लिए बोअरों और अंग्रेज़ों का पारस्परिक संघर्ष अपने चरम पर पहुंच गया। दोनों के बीच घमासान छिड़ा हुआ था। 30 अक्तूबर को जौर्ज व्हाइट को लेडी स्मिथ तक धकेल दिया गया। 2 नवम्बर को शहर की संचार व्यवस्था ठप्प कर दी गई। 3 नवम्बर को रेल यातायात काट दिया गया। 10 नवम्बर तक बोअर वासियों ने कोलेन्सो और टुगेला नदी तक क़ब्ज़ा जमा लिया। 18 नवम्बर तक शत्रु एस्टकोर्ट तक पहुंच चुका था। 21 नवम्बर को वे मुई नदी तक पहुंच गये और 23 नवम्बर को हिल्डयार्ड ने विल्लो ग्रैन्ज पर हमला बोल दिया।

टुगेला नदी के किनारे जनरल बुलर की फ़ौजें बुरी तरह पिटने लगी। अंग्रेज़ सैनिकों के हौसले बुरी तरह से पस्त थे। इसके बाद जनरल बुलर इस प्रयास में अपनी सारी सैन्य शक्ति लगा देना चाह रहा था कि नदी को पार कर किसी तरह लेडी स्मिथ को दुश्मन के क़ब्ज़े से छुड़ाया जाए। इसके लिए सरकार को बहुत से रंगरूटों की ज़रूरत महसूस हुई। जो भी सीमा पर जाना चाहता था उससे उनकी रज़ामन्दी पूछी गई। इस अभियान में जान माल की हानि भी हो सकती थी। इसका मतलब यह था कि उन्हें अस्पताल और एम्बुलेंस की आवश्यकता थी। जितने भी गोरे डॉक्टर, नर्स और एम्बुलेंस कॉर्प्स थे उन्हें सीमा पर भेज दिया गया। टुगेला के तट पर दिन ब दिन घमासान तेज़ होता जा रहा था। ऐसी परिस्थिति में गांधी जी की विनती स्वीकृत हो गई और उन्हें इंडियन एम्बुलेंस कॉर्प्स बनाने की इज़ाज़त मिल गई।

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शुक्रवार, 4 नवम्बर 2011

आज अक्षय नवमी है!

आज अक्षय नवमी है!अक्षय नवमी

हमारी सांस्कृतिक परंपरा में विभिन्न वृक्षों को पूजने का एक अनोखा रिवाज़ है। कुछ खास अवसरों पर हम वृक्षों को पूज कर उसकी रक्षा का वचन देते हैं साथ ही प्रकृति के प्रति अपने दायित्वबोध का परिचय भी देते हैं। अक्षय नवमी का पर्व भी इसी तरह का एक पर्व है जिसमें हम वृक्ष की पूजा करते हैं।

कथा इस प्रकार है कि एक बार देवी महालक्ष्मी तीर्थाटन पर निकली तो रास्ते में उनकी इच्छा हुई कि भगवान विष्णु और शिव की पूजा की जाए। देवी सोचने लगीं कि ऐसी कौन सी चीज़ है जो भगवान विष्णु और शिव दोनों पसंद करते हों। और उसी चीज़ को प्रतीक मानकर दोनों की आराधना एक साथ की जाए। विचार करने पर देवी को ध्यान आया कि धात्री ही एकमात्र ऐसी है जिसमें विष्णु जी के प्रिय तुलसी और शिव जी के प्रिय बिल्ब के गुण मौज़ूद हैं। महालक्ष्मी ने तब धात्री के वृक्ष की पूजा की और उसी वृक्ष के नीचे प्रसाद ग्रहण किया। तब से ही धात्री के वृक्ष की पूजा का प्रचलन हुआ।

कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी को यह पर्व मनाया जाता है। ऋग वेद में वर्णित है कि इसी दिन सतयुग आरम्भ हुआ था। कुछ मान्यताओं के अनुसार अक्षयनवमी के दिन ही द्वापर युग का प्रारम्भ माना जाता है। अतः इस दिन व्रत, पूजा, तर्पण और दान का विशेष महत्व है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन का किया हुआ पूजा-पाठ और दान-पुण्य अक्षय हो जाता है। इसीलिए इसका नाम अक्षय नवमी है। इस दिन देव पूजा के साथ किया गया दान अक्षय पुण्य के साथ ऐश्वर्य, धन, सौभाग्य, निरोगी जीवन देता है। वहीं जाने-अनजाने हुए पापों का भी नाश कर देता है। इस दिन सुबह-सुबह नहा-धो कर धात्रीवृक्ष (आंवला) के नीचे पूरब की ओर मुंह करके आंवला के व़ृक्ष की पूजा और फिर उसी के नीचे भोजन करने की परंपरा भी है। चरक संहिता में कहा गया है कि कार्तिक शुक्ल नवमी अर्थात अक्षय नवमी के दिन ही महर्षि च्यवन को आंवला के सेवन से पुनर्नवा होने का वरदान मिला था। स्वास्थ्य वर्धन के लिए भी आंवला के वृक्ष और इस तिथि का बहुत अधिक महत्व है। आंवला त्योहारों पर खाये गरिष्ठ भोजन को पचाने और पति-पत्नी के मधुर सबंध बनाने वाली औषधि है।

इस दिन का पूजा विधान इस प्रकार है. आंवले के वृक्ष के सामने पूर्व दिशा की ओर मुंह करके बैठें. धातृ के वृद्ध की पंचोपचार सहित पूजा करें फिर वृक्ष की जड़ को दूध से सिंचन करें। कच्चे सूत को लेकर धात्री के तने में लपेटें अंत में घी और कर्पूर से आरती और परिक्रमा करें।

अक्षय नवमी के दिन आंवले के पेड़ के नीचे भोजन बनाकर लोगों को खाना खिलाने से बहुत ही पुण्य मिलता है। ऐसी मान्यता है कि भोजन करते समय थाली में आंवले का पत्ता गिरे तो बहुत ही शुभ माना जाता है साथ ही यह संकेत होता है कि आप वर्ष भर स्वस्थ रहेंगे।

एक अन्य मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान श्री कृष्ण ने कंस-वध से पहले तीन वन की परिक्रमा करके क्रान्ति का शंखनाद किया था। श्री कृष्ण ने ग्वाल बाल और ब्रजवासियों को एक सूत्र में पिरोने के लिए अक्षय नवमी तिथि को तीन वन की परिक्रमा कर क्रांति का अलख जगाया। इसी परम्परा का निर्वहन करते हुए लोग आज भी अक्षय नवमी पर असत्य के विरुद्ध सत्य की जीत के लिए मथुरा वृन्दावन की परिक्रमा करते हैं।

जो भी मान्यता हो पर्यावरण संरक्षण संदेश के साथ यह पर्व भक्तों के मंगल के लिए संदेश देता है।

बृहस्पतिवार, 3 नवम्बर 2011

सामा-चकेवा – भाई बहन के अटूट स्नेह का पर्व!

सामा-चकेवा – भाई बहन के अटूट स्नेह का पर्व!सामा-चकेवा

छठ के भोरका अरग खतम होते ही गांव की सड़कों पर लोकगीत ‘सामा खेलबई हे ...’ के महिलाओं द्वारा स्वर सुनाई पड़ने के साथ मिथिलांचल क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान के एक अनोखे पर्व का आगाज़ हो जाता है। भले ही पाश्चात्य संस्कृति के आक्रमण से देश-गांव अछूता नहीं है, फिर भी लोक-आस्था और लोकाचार की प्राचीन परंपरा से जुड़े भाई-बहनों के बीच स्नेह का लोकपर्व सामा-चकेवा मिथिलांचल में आज भी काफ़ी हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है।

सामा-चकेवा के पौराणिक गीतों के बोल सामूहिक रूप से मिथिलांचल की परंपरा को जीवंत बनाते हैं। सप्तमी को छठ गीत के थमते ही, शाम होते ही गांव की फ़िज़ां सामा-चकेवा के गीतों से गुलज़ार हो जाती है। चूल्हा-चौका के बाद गांव की लड़कियां रात में चौराहे पर जुटकर सामा-चकेवा के गीत .... “सामचक-सामचक अइया हे .... ” ... गाना शुरु कर देती हैं। साथ ही शुरु होता है विवाहित महिलाओं द्वारा जट-जटिन का खेल। बहनें अपनी पारंपरिक वेशभूषा में लालटेन के प्रकाश में गाती दिखती हैं। कितना मनोरम दृष्य होता है! जहां एक ओर भाई-बहन के स्नेह की अटूट डोर है, वहीं दूसरी तरफ़ ननद-भौजाई की हंसी-ठिठोली भी कम नहीं।

सामा खेले गईली हम भईया अंगनवा हे,

कनिया भौजी लेलन लुलुआए हे ...

sama chakewaकार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की तिथि सप्तमी से पूर्णिमा तक चलने वाले इस नौ दिवसीय लोकपर्व सामा-चकेवा में भाई-बहन के सात्विक स्नेह की की गंगा निरंतर प्रवाहित होती रहती है। शाम में महिलाएं दो टोली में बंटकर नृत्य करती हैं। बड़ी रोचक परंपरा है इस पर्व की। इस पर्व के दौरान भाई-बहन के बीच दूरी पैदा करने वाले चुगला-चुगली को सामा खेलने के दौरान जलाने की परंपरा है। इसका मकसद बड़ा ही प्यारा है। चुगला-चुगली तो प्रतीक हैं – उद्देश्य तो है सामाजिक बुराइयों का नाश।

इस पर्व के दौरान बहन अपने भाई के दीर्घ जीवन एवं सम्पन्नता की मंगल कामना करती है। सामा, चकेवा के अलावा डिहुली, चुगला, भरिया खड़लिस, मिठाई वाली, खंजन चिरैया, भभरा वनततीर झाकी कुत्ता ढोलकिया तथा वृन्दावन आदि की मिट्टी की मूर्ति का प्रयोग होता है।

पौराणिकता और लौकिकता के आधार पर यह लोक पर्व न तो किसी जाति विशेष का पर्व है और न ही मिथिला के क्षेत्र विशेष का ही। यह पर्व हिमालय की तलहट्टी से लेकर गंगातट तक और चंपारण से लेकर पश्चिम बंगाल के मालदा-दीनाजपुर तक मनाया जाता है। दिनाजपुर मालदाह में बंगला भाषी महिलाएं भी सामा-चकेवा के मैथिली गीत ही गाती हैं। जबकि चंपारण में भोजपुरी मिश्रित मैथिली गीत गाए जाते हैं।

कथा इस प्रकार है --

भगवान श्री कृष्ण की पुत्री श्यामा (सामा) और पुत्र शाम्भ के बीच स्नेह पर आधारित यह पर्व आज भी खासकर मिथिलांचल में पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है। श्यामा ऋषि कुमार चारू दत्त से ब्याही गई थी। श्यामा को घूमने में मन लगता था। श्यामा रात में अपनी दासी डिहुली के साथ वृन्दावन में भ्रमण करने के लिए और ऋषि मुनियों की सेवा करने उनके आश्रम में जाया करती थी। इस बात की जानकारी डिहुली के द्वारा भगवान श्री कृष्ण के दुष्ट स्वभाव के मंत्री चुड़क को लग गई। उसे यह नहीं भाता था। उसने राजा को श्यामा के ख़िलाफ़ कान भरना शुरु कर दिया। क्रोधित होकर भगवान श्री कृष्ण ने श्यामा को वन में विचरण करने वाली पक्षी बन जाने का शाप दे दिया। श्यामा को पंछी रूप में देख कर उसका पति चारूदत्त ने भी भगवान महादेव की पूजा-अर्चना कर उन्हें प्रसन्न कर स्वयं भी पक्षी का रूप प्राप्त कर लिया।

श्यामा के भाई और भगवान श्री कृष्ण के पुत्र शाम्भ अपने बहन-बहनोई की इस दशा से मर्माहत हुआ। बहन-बहनोई के उद्धार के लिए उसने अपने ही पिता श्री कृष्ण की आराधना शुरू की। उसकी आराधना से प्रसन्न हुए भगवान श्री कृष्ण। उन्होंने शाम्भ से वरदान मांगने को कहा। तब पुत्र शाम्भ ने अपनी बहन-बहनोई को मानव रूप में वापस लाने का वरदान मांगा। तब जाकर भगवान श्री कृष्ण को पूरी सच्चाई का पता लगा। उन्होंने श्यामा के शाप-मुक्ति का उपाय बताते हुए कहा कि श्यामा रूपी सामा एवं चारूदत्त रूपी चकेवा की मूर्ति बनाकर उनके गीत गाए जाएं और चुड़क की मूर्ति बनाकर चुड़क की कारगुजारीयों को उजागर किया जाए, तो दोनों पुनः अपने पुराने स्वरूप को प्राप्त कर सकेंगे। और साथ ही श्री कृष्ण ने प्रसन्न होकर नौ दिनों के लिए बहन को उसके पास आने का वरदान दिया।

जनश्रुति के अनुसार सामा-चकेवा पक्षी की जोड़ीयां मिथिला में प्रवास करने पहुंच गई थीं। भाई शाम्भ भी उसे खोजते हुए मिथिला पहुंचे और वहां की महिलाओं से अपने बहन-बहनोई को शाप से मुक्त करने के लिए सामा-चकेवा का खेल खेलने का आग्रह किया। उनके आग्रह को मिथिला की महिलाओं ने माना और इस प्रकार शाम्भ ने बहन-बहनोई का उद्धार किया। सामा ने उसी दिन से अपने भाई की दीर्घ आयु की कामना लेकर बहनों को पूजा करने का आशीर्वाद दिया। ऐसा माना जाता है कि द्वापर युग से आज तक इस खेल का आयोजन होता आ रहा है।

रक्षा बंधन, भाई-दूज, यम दुतिया, भाई-फोटा, भर दुतिया, आदि की तरह के भाई-बहन के अटूट प्रेम पर आधारित इस पर्व में सामा-चकेवा के खेल से बहनें भाई की सुख-समृद्धि और दीर्घायु होने की कामना करती हैं।

राम भइया चलले अहेरिया बेला, बहिनी देलन असीस हे ...

इसके बाद खड़ से बने वृन्दावन में आग लगाया और बुझाया जाता है। साथ ही यह गीत भी गाया जाता है,

वृन्दावन में आगि लागल क्‌यो न बुझाबै हे ....,

हमरो से बड़का भइया दौड़ल चली आबए हे ....,

हाथ सुवर्ण लोटा वृन्दावन मुझावै हे ....

इसके बाद महिलाएं संठी से बने हुए चुगला को गालियां देती हुई और उसकी दाढी में आग लगाते हुए गाती हैं

चुगला करे चुगलपन बिल्लाई करे म्याऊं ...

धला चुगला के पांसी दींउ

सामा-चकेवा का विशेष श्रृंगार किया जाता है। उसे खाने के लिए हरे-हरे धान की बालियां दी जाती है। सामा-चकेवा को रात में युवतियों द्वारा खुले आसमान के नीचे ओस पीने के लिए छोड़ दिया जाता है।

भाई-बहन के अटूट प्रेम का यह पर्व कार्तिक मास की पूर्णिमा के रोज़ परवान चढता है। इस दिन भाई केला के वीर का पालकी बनाता है, जिसे फूल-पात्तियों एवं अन्य चीज़ों से सजाकर आकर्षक रूप दिया जाता है। सब लोग पूरी निष्ठा, विधि-विधान और भरी आंखों से सामा की विदाई करते हैं। दृष्य बड़ा ही मार्मिक होता है। बिल्कुल बेटी की विदाई की तरह।

ss(1)_thumb[2]समापन से पूर्व भाइयों द्वारा सामा-चकेवा की मूर्तियों को घुटने से तोड़ा जाता है। आकर्षक रूप से सजे झिझरीदार मंदिरनुमा बेर में रखकर उसे नदी, तालाब, पोखर या खुले खेतों में परम्परागत लोकगीत के साथ विसर्जन कर दिया जाता है।

महिलाएं अपने भाइयों को उसके धोती या गमछा से बने फार में मुढी और बतासा खाने के लिए देती हैं। यह अनूठी परंपरा अन्यत्र नहीं मिलती। भाई-बहन के स्नेह की झलक से परिपूरित इस त्योहार में भाई भी बहन के हाथों भरे गए मिष्टान्न समेत अन्य सामानों के फार का हिस्सा बहन को भेंट कर उसकी लंबी उम्र की कामना करता है।

विसर्जन के दौरान महिलाएं सामा-चकेवा से फिर अगले वर्ष आने का आग्रह करती हैं और गाती हैं

साम-चक हो साम चक हो अबिह हे

जोतला खेत में बैसिह हे

सब रंग के पटिया ओछबिइह हे

भैया के आशीष दिह हे

विसर्जन के बाद ये महिलाएं चुगलखोर प्रकृति वाले लोगों को शाप भी देती हैं।

भौतिकता, आधुनिकता, आज की भाग-दौड़ भरी ज़िन्दगी का असर भले ही गांवों पर दिख रहा हो इस लोकसंस्कृति के पारंपरिक खेल के लिए बहनें ससुराल से नैहर आती हैं और सामा, चकेवा, सतभइया, खरलिस, चुगला, वृन्दावन, चौकीदार, झाझीकुकुर, साम्भ, आदि की प्रतीमा एवं उपकरण मिट्टी एवं खड़ से बनाती हैं और उसे डाला (बांस की बनी टोकरी) में लेकर शाम होते ही शहर एवं गांव के चौक चौराहा और जुते हुए खेतों में जुटतीं हैं। सामा-चकेवा से संबंधित पारंपरिक गीत गाते हुए कहती हैं

‘सामा खेले चललि, भैया के अंगनवा।’

इस खेल के माध्यम से बहनें अपनी भौजाई की कटुता भी उजागर करती है। ननद-भौजाई में ताने-बाने, छेड़-छाड़ चलते रहते हैं। इस पर्व में खेल-खेल में उन बहनों की पीड़ा भी उभरती है, जिनकी भौजाई हमेशा उन्हें प्रताड़ित करती हैं। बहन कहती हैं

भौजी जबतक रहतई माई-बाप के राज तबतक सामा खेलब हे ....

मतलब भौजाई ननद को लाख फटकार लगाती है पर बहन का मृदुल स्वभाव भाई के लिए हमेशा साथ रहता है। खरलिस बहन का रूप है जो हमेशा भाई की सुख-समृद्धि और दीर्घायु होने की कामना करती है। चुगला बनाकर उसके मुंह को आग से झड़काती हैं। कहती हैं, “चुगला की कोई छाया मेरे भाई पर नहीं पड़नी चाहिए”।

बहनें होती ही हैं ऐसी – कि सारे दुख-दर्द ख़ुद सह ले, पर भाई को कोई कष्ट नहीं आए। रक्षा बंधन पर राखी बांधती हैं। भैया दूज पर शाप देती हैं और पछतावा कर जीभ में रेगनी के कांटे भी चुभोती हैं। भर दुतिया पर भाई को न्योतती हैं और कहती हैं, ‘जमुना न्योतलक जमराज के हम न्योतई छी अपन भाई के, ज्यों-ज्यों जमुना के पानी बढे, हमर भाई के उमर बढे’। और सामा-चकेवा पर दउरी नचा-नचा कर भाई के लिए सुख-समृद्धि और अन्न का भंडार मांगती हैं। बहनें कहती हैं, ‘मिट्टी के बने चकवा को चराना पड़ता है। इसके लिए खेतों में जई या गेंहूं होना चाहिए। अभी खेतों में फसल नहीं है, इसलिए दिक्क़्त हो रही है।’