गांधी और गांधीवाद- 98
गांधी जी आसानी से हार मानने वालों में से नहीं थे। बाधा और संकट की घड़ी में वे दुगने उत्साह से काम करने में जुट जाते थे। गिरगांव वाला मकान काफ़ी सीलन भरा था। पर्याप्त उजाला भी नहीं था, धूप बिलकुल नहीं आती थी। इस वातावरण में रहना बड़ा कठिन था। बच्चे की तबियत इसी अस्वस्थकर वातावरण के कारण बिगड़ी थी। मणिलाल के ठीक होने के बाद गांधी जी ने इस मकान को छोड़ने का निर्णय लिया।
मकान की खोज में रोज़ चक्कर लगाने लगे। वे चाहते थे बांद्रा या सांताक्रूज में मकान मिल जाए। बांद्रा में जो मकान मिल रहा था वह एक कसाईख़ाने के बगल में था। घर जाते-निकलते वक़्त टंगे बकरों पर नज़र पड़ती। हिंसा के इस प्रदर्शन को वे देख नहीं सकते थे। समुद्र से दूर रहना उन्हें पसंद नहीं था। आखिर प्राणजीवन मेहता के भाई रेवशंकर जगजीवन की मदद से सांताक्रूज़ में समुद्र के पास बड़ा-सा बंगला किराए पर लिया गया। यह एक अच्छा मकान था। भरपूर हवा-पानी इस घर में आता था। तुरंत सपरिवार इस बंगले में आ गए।
यहीं से रोज़ लोकल ट्रेन से हाईकोर्ट जाने लगे। सांताक्रूज से चर्चगेट जाने के लिए फ़र्स्ट क्लास की टिकट ली। इसमें भीड़ कम होती थी। क़ानून की किताब उनके पास तो पहले से थी ही, फिर भी वे विधि पुस्तकालय के सदस्य बने। वे रोज़ लाइब्रेरी में बैठते और क़ानून की किताबों का अध्ययन करते। जब अपना कोई केस नहीं होता तो अन्य वकीलों की बहस सुनते। वकालत भी अपेक्षा से अधिक बढ़िया चल निकली थी। उनके चचेरे भाई का लड़का, जिसे वे बेटे की तरह मानते थे, छगनलाल उनके साथ आकर रहने लगा। उससे गांधी जी को काफ़ी मदद मिल जाती थी। उन्हें और परिवार के सदस्यों को लगने लगा कि अब कुछ शांत और व्यवस्थित जीवनयापन होगा। हर रविवार को स्वादिष्ट व्यंजन बनते और सारे लोग मिलजुल कर उस सुस्वादु भोजन का आनंद लेते।
एक दिन वे सर फीरोजशाह मेहता का आशीर्वाद लेने गए। उनसे उन्हें एक चेतावनी मिली। “तुम नेटाल से कमाए अपने पैसे यहां मत बर्बाद करो।” गांधी जी ने बिना हतोत्साहित हुए उनकी बातों को सकारात्मक ढंग से लिया। गांधी जी के दक्षिण अफ़्रीकी क्लायंटों ने अपने बम्बई के मुकदमे गांधी जी को लड़ने को कहा। यह उनकी रोज़ी-रोटी के लिए पर्याप्त था। इसबीच वे उच्च न्यायालय में भी अपने कदम जमाने का प्रयास कर रहे थे। कमाई चल निकली थी। घर-परिवार का खर्च आराम से चल रहा था। उन्होंने परिवार-बच्चों के भविष्य की सुरक्षा के लिए दस हजार रुपए का एक जीवन बीमा भी करवाया।
गोखले जी से उनका सम्पर्क बना हुआ था। गोखले जी गांधी जी के मुम्बई आ जाने से काफ़ी ख़ुश थे। वे उनके चैम्बर में भी आ जाया करते थे। उस समय के देश के शीर्ष लोगों में शुमार गोखले जी का उनके चैम्बर में आना गांधी जी के लिए बहुत ही गर्व की बात थी। गोखले जी खास लोगों से भी गांधी जी का परिचय कराया करते थे। समय-समय पर देश की राजनीति और विभिन्न समस्याओं से भी गांधी जी को अवगत कराते रहते थे।
गांधी जी को भारतीय रजनीति में लाने का यह उनका अपना तरीक़ा था।
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ये उम्दा पोस्ट पढ़कर बहुत सुखद लगा!
प्रत्युत्तर देंहटाएंप्रेम दिवस की बधाई हो!
प्रेरक प्रसंग ...
प्रत्युत्तर देंहटाएंआभार ..!!
अच्छी प्रस्तुति!!
प्रत्युत्तर देंहटाएंगांधी जी वाकई हर कदम अनुकरणीय हैं...
प्रत्युत्तर देंहटाएंसादर..
सार्थक जानकारी...
प्रत्युत्तर देंहटाएंvery inspiring..
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