बुधवार, 7 मार्च 2012

सूफ़ियों की प्रेमोपासना-1

सूफ़ियों ने विश्व-प्रेम का पाठ पढ़ाया अंक-8

सूफ़ियों की प्रेमोपासना-1

सूफ़ी साधना वास्तव में प्रेम-साधना है। सूफ़ी साधकों का मूल आधार ईश्वर को प्रेम द्वारा पाना है। लक्ष्य ईश्वर है और ज़रिया प्रेम है। मानव-जीवन की आत्मा मूलतः प्रेम है। इसके बिना जीवन नीरस और आनन्द रहित है। ईश्वर के प्रति पाया जाने वाला प्रेम ही सर्वोच्च, सर्वश्रेष्ठ और पवित्रतम होता है। प्रेम का अधिकारी केवल ईश्वर है, शेष जितने भी प्रेम इस जगत में हैं, वे सब उसके अधीन होने चाहिए। सूफ़ी इसी प्रेम के कायल हैं।

हज़रत इमाम ग़ज़ाली रह. के अनुसार प्रेम यह है कि मन उसी में लगा रहे और रसानुभूति करे। जितनी रसानुभूति होगी, प्रेम होगा। ईश-प्रेम की कसौटी रसानुभूति ही है। हजरत सहल तुस्तरी रह. ने कहा कि अल्लाह की सदैव और अनवरत भक्ति और आज्ञापालन और उसके आदेशों की अवज्ञा से सदैव के लिए परहेज़ का नाम प्रेम है। तमाम सूफ़ी इस पर सहमत हैं कि प्रेम प्रियतम के तदनुरूप होने का नाम है और तदनुरूपताओं में सब से बड़ी तदनुरूपता मन की तदनुरूपता है। सामान्य रूप से सूफ़ी प्रेम की चर्चा साधन और साध्य दोनों दृष्टि से करते हैं।

हज़रत इब्ने तैकिया रह. कहते हैं कि अल्लाह की मुहब्बत (ईश-प्रेम) ही धर्म का मूल है। जो जितना ईश-प्रेम करेगा, वह उतना ही धर्म का पालन करेगा और ईश-प्रेम में जितनी कमी होगी, उत्ना ही वह कम धर्म का पालन करेगा। मनुष्य के पैदा किये जाने का मूल उद्देश्य प्रेम है। अपने पालनहार की इबादत (भक्ति और आज्ञापालन) करो. इबादत में प्रेम का पाया जाना अनिवार्य है। प्रेम नहीं तो इबादत नहीं हो सकती, इसलिए कि उत्कृष्ट प्रेम ही प्रियतम को उपास्य बना सकेगा। अतः प्रेम को साध्य होने में संकोच नहीं रह जाता।

हज़रत मुईनुद्दीन चिश्ती रह. का कहना है कि सूफ़ी-साधक अक़्ल की आंख से महबूब के हुस्न को नहीं देखता बल्कि मजनूं की आंख से लैला को देखता है। वह प्रभु को देखता ही प्रेमी (आशिक़) की दृष्टि से है। वह अपनी संपूर्ण चाहत, उस ‘परम प्रिय’ पर उंड़ेलकर उसी का हो जाता है। प्रेम की यही एकनिष्ठा उसके आचरण को अकलुष, पवित्र बना देती है।

हज़रत जुन्नून बिन इब्राहिम रह. तो यहां तक कहते हैं कि सूफ़ी वह है, जिसने सृष्टि में केवल अल्लाह ही को पसंद किया है। फ़क़ीर वह है जो ईश्वर के अतिरिक्त किसी और वस्तु की ओर आकृष्ट न हो।

अबू उस्मान रह. का मानना है कि तसव्वुफ़ का अर्थ संसार-त्याग और वास्तविकताओं का पा लेना है और कौन नहीं जानता कि प्रेम सूफ़ीमत में सबसे बड़ी वास्तविकता है। इन सबसे प्रेम का साध्य होना ही स्पष्ट होता है।

हज़रत अली हिज्वेरी रह. का कहना है कि ईश्वर के प्रति साधक के मन में जो प्रेम उत्पन्न होता है, वह इतना व्यापक हो जाता है कि प्रेमी साधक सांसारिक विषयों की ओर से अनासक्त बन जाता है और केवल प्रेम ही के नियमों का पालन कर ईश्वर से तादातम्य स्थापित करता है।

रहा प्रेम का साधन होना, तो इसमें कोई संदेह नहीं कि सूफ़ियों के लिए प्रेम ही वह सीढ़ी है जो उसे ईश्वर तक पहुंचा सकता है। प्रेम ही वह माध्यम है, जो उसे प्रियतम की प्रसन्नता प्राप्त करने पर उभरता है। प्रेम ही वह रास्ता है जो प्रभु से निकलता है। प्रेम ही वह पथ है जो उसके जीवन को प्रियतम के कहे अनुसार चलने पर उभरता है। इस प्रकार वह प्रियतम का हो जाता है और प्रियतम उसका। हज़रत राबिया बसरी मानती हैं कि अल्लाह के प्रेमी की चाह को उस समय तक चैन नहीं, जब तक वह अपने प्रियतम के पास न पहुंच जाए। हज़रत अबू अब्दुल्लाह अल-क़ुरैशीरह. फ़रमाते हैं कि प्रेम की वास्तविकता यह है कि तुम अपने प्रियतम पर अपनी हर चीज़ क़ुरबान कर दो और तुम्हारे पास कोई चीज़ बाक़ी न रहे।

प्रेम-पथ की यात्रा और सात घाटियां

सूफ़ी कवि हज़रत फ़रीदुद्दीन अत्तर रह. ने प्रेम-पथ की यात्रा के लिए सात घाटियों को पार करना आवश्यक माना है।

1. पहली घाटी खोज घाटी है। यह लंबी तथा श्रम-साध्य है। यहा साधक को सभी सांसारिक वस्तुओं का परित्याग कर देना होता है। इस घाटी में साधक को तभी तक ठहरना चाहिए जब तक उसके मन को परम ज्योति अपनी रश्मियों में लपेट न ले।

2. परम ज्योति का स्पर्श पाकर साधक प्रेम की अनंत घाटी में प्रवेश करता है। यहां से उसका रहस्यवादी साधक का जीवन शुरु होता है।

3. तीसरी अवस्था में वह मारिफ़त की घाटी में प्रवेश करता है। इस घाटी में यात्री को सत्य का रहस्य ज्ञात हो जाता है।

4. चौथी घाटी अनासक्ति की घाटी है, इसमें ईश्वरीय प्रेम से अभिभूत होना पड़ता है।

5. पांचवीं घाटी एकत्व की है। यह आनंद की घाटी है। इसमें सौंदर्य की अंतर्दृष्टि प्राप्त होती है।

6. छठी घाटी कौतूहल तथा चकाचौंध की घाटी है। यहां सूफ़ी साधक की अंतर्दृष्टि का पुनः लोप हो जाता है और वह अंधकार में फंसता प्रतीत होने लगता है।

7. सातवीं घाटी ‘हक़ीक़त’ की घाटी है। इसमें आत्मा का प्रेम के महासागर में विलयन हो जाता है।

सूफ़ी साधक की इस यात्रा को सूफ़ी-साधना में शरीअत, तरीक़त, मारिफ़त और हक़ीक़त नाम से भी समझाया गया है। इसी साधना के द्वारा साधकइश्क़े मज़ाज़ी से इश्क़े हक़ीक़ी को प्राप्त होता है।

इश्क़े हक़ीक़ी

सूफ़ियों के लिए ईश-प्रेम ही मूल धर्म है। इसे सूफ़ी इश्क़े हक़ीक़ी (वास्तविक प्रेम/आध्यात्मिक प्रेम) का नाम देते हैं। इसकी पहचान यह है कि प्रियतम ईश्वर का प्रेम प्रेमी में हर उस गुण के लिए लगाव पैदा कर देता है, जो प्रियतम को प्रिय हो, अतएव ऐसा प्रेम प्रेमी में विनम्रता पैदा करता है और वह हर उस वस्तु से भी प्रेम करना सीखता है जिसमें वास्तविक प्रियतम प्रतिबिम्बित होता है। सूफ़ी लोग ऐसे प्रेम को मजाज़ी कहते हैं।

इश्क़े मजाज़ी

इश्क़े मजाज़ी वह सांसारिक प्रेम है जो प्रियतम तक पहुंचने का साधन बनता है। सूफ़ी मानवीय प्रेम को आध्यात्मिक प्रेम तक पहुंचने की सीढ़ी मानते हैं। जबतक मनुष्य सांसारिक प्रेम को नहीं जान पाता, उनके लिए आदर्श प्रेम तक पहुंचना संभव नहीं। साधक सांसारिक सौंदर्य का आनन्द तो उठाता अवश्य है, लेकिन वहीं तक नहीं रह जाता, उसे इश्क़े हक़ीक़ी तक आगे बढ़ना पड़ता है। सूफ़ी अनन्त सौंदर्य का दर्शन करता है। अनन्त सौंदर्य तो परमात्मा की ही एक मात्र सत्ता है। वह परम सत्य और परम मंगल है। उसी के प्रतिछवि के रूप में समस्त जगत और उसके प्राणी अभिव्यक्त हो रहे हैं, इसलिए सांसारिक सौंदर्य दर्शन उसी परम सत्ता के गुणों के सौंदर्य का दर्शन है।

अभी ज़ारी है ....

11 टिप्‍पणियां:

  1. सूफी मत के बारे में विस्तृत जानकारी मिली .... आभार

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  2. इश्क़े हक़ीक़ी

    सूफ़ियों के लिए ईश-प्रेम ही मूल धर्म है। इसे सूफ़ी इश्क़े हक़ीक़ी (वास्तविक प्रेम/आध्यात्मिक प्रेम) का नाम देते हैं। इसकी पहचान यह है कि प्रियतम ईश्वर का प्रेम प्रेमी में हर उस गुण के लिए लगाव पैदा कर देता है, जो प्रियतम को प्रिय हो, अतएव ऐसा प्रेम प्रेमी में विनम्रता पैदा करता है और वह हर उस वस्तु से भी प्रेम करना सीखता है जिसमें वास्तविक प्रियतम प्रतिबिम्बित होता है। सूफ़ी लोग ऐसे प्रेम को मजाज़ी कहते हैं।

    इश्क़े मजाज़ी

    इश्क़े मजाज़ी वह सांसारिक प्रेम है जो प्रियतम तक पहुंचने का साधन बनता है। सूफ़ी मानवीय प्रेम को आध्यात्मिक प्रेम तक पहुंचने की सीढ़ी मानते हैं। जबतक मनुष्य सांसारिक प्रेम को नहीं जान पाता, उनके लिए आदर्श प्रेम तक पहुंचना संभव नहीं। साधक सांसारिक सौंदर्य का आनन्द तो उठाता अवश्य है, लेकिन वहीं तक नहीं रह जाता, उसे इश्क़े हक़ीक़ी तक आगे बढ़ना पड़ता है। सूफ़ी अनन्त सौंदर्य का दर्शन करता है। अनन्त सौंदर्य तो परमात्मा की ही एक मात्र सत्ता है। वह परम सत्य और परम मंगल है। उसी के प्रतिछवि के रूप में समस्त जगत और उसके प्राणी अभिव्यक्त हो रहे हैं, इसलिए सांसारिक सौंदर्य दर्शन उसी परम सत्ता के गुणों के सौंदर्य का दर्शन है।
    सार्थक सन्देश देती रचना .दिखावे पर प्रहार करती .होली मुबारक . आसमान तक पहुँचने के लिए पहले पैरों के नीचे ज़मीन चाहिए शरीर का अतिक्रमण ही अध्यात्म की पहली सीढ़ी बन सकता है .

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  3. सूफी मत पर ...विस्तृत ,ज्ञानवर्धक आलेख ...!!संग्रहणीय पोस्ट|
    आभार

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  4. बहुत अच्छी प्रस्तुति| होली की आपको हार्दिक शुभकामनाएँ|

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  5. अनन्त सौंदर्य तो परमात्मा की ही एक मात्र सत्ता है। वह परम सत्य और परम मंगल है। उसी के प्रतिछवि के रूप में समस्त जगत और उसके प्राणी अभिव्यक्त हो रहे हैं, इसलिए सांसारिक सौंदर्य दर्शन उसी परम सत्ता के गुणों के सौंदर्य का दर्शन है।


    बहुत बहुत आभार इस ज्ञानवर्धक श्रंखला के लिये..

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  6. प्रेमा भाव की भक्ति है सूफीवाद आजकल बड़े हलके dhng से कह दिया जाता है मियाँ बिलकुल सूफी हो गए आप तो पीना पिलाना सब बंद .सूफी होना ताप है संयम है समर्पण है पूर्ण उस बहुरिया के प्रति

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  7. @सूफ़ी मानवीय प्रेम को आध्यात्मिक प्रेम तक पहुंचने की सीढ़ी मानते हैं। जबतक मनुष्य सांसारिक प्रेम को नहीं जान पाता, उनके लिए आदर्श प्रेम तक पहुंचना संभव नहीं।

    सूफ़ीमत पर केन्द्रित यह शृंखला बहुत ही ज्ञानवर्धक है।

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  8. आपने सूफ़ी सिद्धांतों को बहुत ख़ूबरसूरती से पेश किया है।
    आपने इश्क़े मजाज़ी और इश्क़े हक़ीक़ी पर जो उम्दा कलाम पेश किया है। उसे पढ़कर हमें इस धरती पर पहला प्रेम याद हो आया। यही प्रेम तो था जो आदम ने सबसे पहले अपने रब से किया जिसे इश्क़े हक़ीक़ी कहा गया और फिर आदम ने अपनी पत्नी हव्वा से प्रेम करके भी दिखा दिया कि हमरी पत्नी का प्रेम हमें रब तक पहुंचाता है, उससे दूर नहीं करता।
    यह नर नारी का पहला जोड़ा था, जो स्वर्ग में बना था। इसीलिए कहा जाता है कि जोड़े तो स्वर्ग में बनते हैं।
    अथर्ववेद के 11वें कांड के 8वें सूक्त में स्वयंभू मनु के जन्म का बहुत सुंदर वर्णन आया है। यहां उन्हें मन्यु कहा गया है और उनकी पत्नी को ‘आद्या‘ कहा गया है आद्या का अर्थ है पहली। आद्या शब्द ‘आद्य‘ से बना है और आद्य कहते हैं पहले को और ‘आद्य‘ धातु से ही आदिम् शब्द बना है और यही शब्द अरबी में पहुंचकर आदम बन गया है।
    दरअस्ल जो इलाक़ा आज भारत कहलाता है और जो इलाक़ा आज अरब कहलाता है, यह सारा इलाक़ा हमारे शोध के अनुसार एक साथ ही आबाद हुआ था।
    हदीस के अनुसार आदम और हव्वा इस धरती पर पैदा नहीं हुए थे बल्कि वह दूसरी जगह से यहां अवतरित हुए थे।
    अथर्ववेद 11,8,7 में भी यही बताया गया है कि मन्यु और आद्या का विवाह वर्तमान पृथ्वी पर नहीं हुआ था बल्कि विगत पृथ्वी पर हुआ था।
    पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब स. की हदीसों में यह बयान मिलता है कि परमेश्वर ने आदम और हव्वा की रचना स्वर्ग में की और फिर आदम को हिंद में और हव्वा को जददा में उतारा। इसके बाद हव्वा को ढूंढते हुए आदम जददा पहुंचे और फिर वे पृथ्वी की नाभि पर यानि काबा की जगह पहुंचे जहां आदम ने परमेश्वर की भक्ति-उपासना के लिए एक घर बनाया।
    इसके बाद भी आदम अलैहिस्सलाम हिंद आ गये और उन्होंने हिंदुस्तान से पैदल चलकर 40 बार हज किया। इस तरह वर्तमान भारत से लेकर वर्तमान मक्का तक जो तीर्थ यात्रा आदम अलैहिस्सलाम अर्थात स्वयंभू मनु ने की, उसकी वजह से यह पूरा मार्ग आबाद होता चला गया। उनके बाद भी उनकी संतान मक्का की तीर्थ यात्रा करती रही और इस मार्ग के आस पास उनकी औलाद के आबाद होने से यह मार्ग आबाद होता चला गया। फिर यहां से लोग विभिन्न कारणों से धरती के दूसरे हिस्सों में भी फैलते चले गए।
    लोग यह जान लें कि हम सब एक ही माता पिता की संतान हैं तो हमारे बीच में स्वाभाविक रूप से ही प्रेम उत्पन्न हो जाता है और इससे यह भी पता चलता है कि वास्तव में वसुधैव कुटुंबकम् क्यों कहा गया है ?
    सभ्यता के शुरू में सारी मानव जाति एक ही परिवार थी।

    प्रेम ऐच्छिक और वैकल्पिक नहीं है कि कोई चाहे तो कर ले और न चाहे तो न करे और न ही ऐसा है कि किसी को यह होता है और किसी को यह नहीं होता।
    प्रेम मनुष्य का स्वभाव है। मनुष्य बिना नफ़रत किए रह सकता है लेकिन बिना प्रेम किए वह नहीं रह सकता।
    जो आदमी प्रेम नहीं कर पा रहा है, वह अपने स्वभाव से हट चुका है।
    वास्तव में प्रेम एक ही है, इसका विषय हक़ीक़ी यानि कि सत्यस्वरूप परमेश्वर तो यह इश्क़े हक़ीक़ी है और अगर इसका विषय उसके अलावा हो तो वह इश्क़े मजाज़ी है, यह इश्क़ चाहे अपनी पत्नी से हो या अपने गुरू से या अपने खेत और अपने देश से।

    इश्क़ कैसे और किससे होता है ?
    जब भी आप की नज़र किसी के कमाल पर उसे गुणों पर जाएगी तो आप उससे प्रभावित हुए बिना न रहेंगे और जब आप उस पर विचार करेंगे तो यह प्रभाव गहरा होता चला जाएगा और जब आपको उसके गुणों से लाभ भी मिलने लगे तो आपको महसूस होगा कि इसके बिना तो मेरा जीवन ही संभव नहीं है। अब आप उसे पाने की कोशिश करेंगे और जब आप उसे पा लेंगे तो उसकी ख़ुशी को अपने जीवन का एकमात्र मक़सद समझेंगे।
    यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है।
    अगर आपको अपनी पत्नी या अपने पति से प्रेम नहीं है तो अभी आपने यह महसूस ही नहीं किया है उसने आपको लाभ पहुंचाने के लिए अपना सारा जीवन खपा दिया है।
    अगर आपको ईश्वर से प्रेम नहीं है तो अभी आपने यह जाना ही नहीं है कि सृष्टि के अणु से लेकर सूर्य तक हर चीज़ को उसने आपकी सेवा में लगा दिया है।
    आपकी पत्नी को, आपके पति को तो आपसे प्रेम है लेकिन आपने जाना ही नहीं और न ही उसका प्रतिउत्तर ही दिया जैसा कि उसका हक़ है।
    आपके ईश्वर को तो आपसे प्रेम है लेकिन आपने जाना ही नहीं और न ही उसके प्रेम का जवाब आपने कभी दिया है।
    ऐसा उन लोगों के साथ होता है जो विचार नहीं करते।
    कुछ दम्पत्तियों में कलह है।
    उसका कारण यही है कि वे विचार नहीं करते।
    कलह वहीं होती है जहां प्रेम का प्रवाह अवरूद्ध हो जाए,
    विचार इस अवरोध को दूर कर देता है।
    सूफ़ियों के मुराक़बे यही काम करते हैं।
    जिन्हें यह सब समझ नहीं आता, उन्हें यह सब रहस्यवाद लगता है और जो जानते हैं उनके लिए यह ज्ञान है।
    जानने का नाम ज्ञान है और जिसे नहीं जानते वह रहस्य कहलाता है।
    अच्छा है कि हम रहस्य को ज्ञान में परिवर्तित कर लें।

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  9. ‘ब्लॉग की ख़बरें‘ पर आपकी पोस्ट सबके हिंदी पाठकों के लिए उपलब्ध हैः
    http://blogkikhabren.blogspot.com/2012/03/manoj-kumar.html

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  10. हमें डॉ. अनवर जमाल जी की बातों से पूरा इत्तेफ़ाक है। बहुत ही सुन्दर और ग्यान वर्द्धक प्रस्तुति। आभार!

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