गांधी और गांधीवाद-105
धार्मिक जिज्ञासा
गांधी जी की जहां एक ओर आत्मा के आंतरिक जीवन के प्रति उत्सुकता बनी रहती थी, वहीं दूसरी ओर वे शारीर की उचित देखभाल के प्रति भी काफ़ी जिज्ञासु थे। जब हम थोड़ा गहरे जाकर उनको समझने का प्रयत्न करते हैं तो पाते हैं कि उनकी चाहे जो भी व्यावसायिक और राजनीतिक प्रतिबद्धताएं रही हों, नैतिक नियमों के अनुरूप कर्म करना और स्वास्थ्य या प्रकृति के नियमों के अनुसार जीवन जीने के उनके विचार को सत्य की खोज के अंगों के रूप में ही देखा जा सकता है।
थियॉसोफी के वातावरण के संसर्ग में
अपनी इन्ही जिज्ञासाओं के कारण न सिर्फ़ लंदन में बल्कि दक्षिण अफ़्रीका की पहली यात्रा में ही गांधी जी ईसाई वातावरण के संपर्क में आए थे। इस बार वे थियॉसोफी वातावरण के संसर्ग में भी आए। जोहान्सबर्ग में उनकी वकालत काफ़ी बढ़ गई थी। अब अकेले काम संभालना मुश्किल हो रहा था। गांधी जी ने दो अंगरेज़ों को मदद के लिए अपने साथ आर्टिकिल क्लर्क के रूप में रख लिया। उनमें से एक लुइस वाल्टर रीच (Louis Walter Ritch) थे। वे एक सफल व्यापारी थी, जिनका विवाह एक बड़े परिवार में हुआ था। गांधी जी के सुझाव पर उन्होंने अपना व्यापार बंद कर दिया और गांधी जी के क़ानूनी व्यवसाय में आर्टिकल क्लर्क के रूप में मदद करने लगे। वे दो साल तक गांधी जी के साथ रहे, फिर इंगलैंड चले गए जहां उन्होंने अपना क़ानूनी अध्ययन ज़ारी रखा।
गांधी जी के पास आने के पहले मि. रिच एक वाणिज्यिक कम्पनी के व्यवस्थापक थे। वे थियॉसोफिस्ट थे। उन्होंने गांधी जी का परिचय जोहान्सबर्ग की थियॉसोफी सोसायटी से कराया। कुछ बुनियादी मतभेद के कारण गांधी जी उन लोगों की सोसाइटी के सदस्य तो नहीं बने लेकिन बराबर उस सोसायटी के संपर्क में रहे। उसके सदस्यों के साथ गांधी जी की धर्म-चर्चा होती रहती थी। उनकी पुस्तकें पढ़ते रहते थे। उनकी सभा में उन्हें बोलने का जब भी अवसर मिलता, तो वे सदस्यों के सिद्धांत और आचरण में भेद की आलोचना करने से नहीं चूकते। पर इस आलोचना के कारण उन्होंने आत्म-निरीक्षण करना सीखा।
गीता की गहराई में
थियॉसोफिस्ट उन्हें न सिर्फ़ अपनी मंडली में शामिल करना चाहते थे, बल्कि वे गांधी जी से हिंदू धर्म के बारे में भी कुछ जानना और सीखना भी चाहते थे। थियॉसोफी की पुस्तकों पर हिंदू धर्म का काफ़ी प्रभाव गांधी जी ने पाया था। चूंकि थियॉसोफिस्ट संस्कार और पुनर्जन्म को मानते थे इसलिए उन्हें लगा कि गांधी जी उनकी सहायता कर सकेंगे। पर गांधी जी की संस्कृत की जानकारी बहुत कम थी। प्राचीन धर्म ग्रंथ संस्कृत में थे। अनुवादों के द्वारा भी उनका अध्ययन न के बराबर ही था।
उन्नीस वर्ष की अवस्था में जब गांधी जी लंदन पहुंचे थे, तो उन दिनों अपने थियॉसोफिस्ट मित्रों के आग्रह पर सर एड्विन ऑर्नाल्ड द्वारा रचित भगवद्गीता का अंगरेज़ी अनुवाद “दिव्य संगीत” पढ़ा था। सर एड्विन की एक और किताब “एशिया की ज्योति” उन्होंने पढ़ी थी, जो गौतम बुद्ध की जीवन कथा थी। दक्षिण अफ़्रीका में अपने थियॉसोफिस्ट मित्र की मदद के लिए गांधी जी ने स्वामी विवेकानंद का “राजयोग” पढ़ा। “राजयोग” गीता पर स्वामी जी द्वारा की गई टीका थी। उन्होंने “पातंजल-योगदर्शन” का भी अध्ययन किया। लेकिन उनके जीवन को सबसे अधिक प्रभावित किया “भगवद्गीता” ने। विभिन्न टिकाओं के साथ उन्होंने गीता का अभ्यास भी शुरू किया। इसके बाद “जिज्ञासु-मंडल” के नाम से एक छोटा-सा मंडल भी स्थापित किया। इस प्रकार उनका नियमित अभ्यास होने लगा। वे गीता की गहराई में उतरने लगे। अनुवाद की पुस्तक से मूल संस्कृत को समझने लगे। श्लोकों को कण्ठस्थ करने लगे।
गीता के श्लोकों को याद करने के लिए
गीता के श्लोकों को याद करने के लिए वे दातून और स्नान के समय का सदुपयोग करते। दातून में उन्हें पन्द्रह और स्नान में बीस मिनट लगता था। दातुन वे खड़े-खड़े किया करते थे। सामने की दीवार पर गीता के श्लोक लिखकर चिपका देते और उसे देखते और याद करते जाते। स्नान करते समय इसे दुहराते जाते। इस तरह वे पूरी गीता कण्ठस्थ कर गए। गीता ने उनके आचरण पर काफ़ी प्रभाव डाला। आचार-संबंधी कठिनाइयों का समाधान वे गीता में ढूंढ़ा करते। गांधी जी कहते थे, “जब मुझे प्रकाश की एक किरण भी कहीं दिखाई नहीं देती, मैं उसे भगवद्गीता में खोजता हूं और उसके किसी श्लोक में निहित आशा का संदेश मेरे भारी-से-भारी दुख को चुटकियां बजाते दूर कर देता है। अनंत दुख, कष्ट और आपदाओं से भरे अपने इस जीवन में जो स्थिर और अविचलित रह सका हूं उसका सारा श्रेय भगवद्गीता को ही है।”
अपरिग्रह और समभाव
गीता के गहन अध्ययन के बाद उनका हृदय गीतामय हो गया। जीवन की हर समस्या का समाधान वे गीता में ही खोजने लगे। गीता को जीवन का आदर्श मानकर उन्होंने अपने जीवन को उसी प्रकार ढालने का प्रयास करने लगे। गीता के अपरिग्रह और समभाव शब्द तो उनके दिल में बस गए। “अपरिग्रह” का अर्थ है आत्मा के लिए भार स्वरूप सभी भौतिक वस्तुओं का परित्याग। इसमें धन, संपत्ति और विषयेषणा से छुटकारा भी निहित है। और जिसे छोड़ा न जा सके स्वयं को उसका ट्रस्टी समझकर आचरण करना, न कि मालिक बन बैठना। गीता के अध्ययन के फलस्वरूप उन्हें ट्रस्टी शब्द का अर्थ स्पष्ट हुआ। क़ानून-शास्त्र के प्रति उनका आदर बढ़ा।
“समभाव” का अर्थ है सुख और दुख में, विजय और पराजय में, मन की एक सी वृत्ति। जीत की आशा और हार की आशंका से परे होकर अपना काम करते जाना। “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन्”। समभाव के बल पर ही गांधी जी चाहे वह अंगरेज़ अधिकारी हों या अपने सहकर्मी, चाहे निर्धन, लाचार देशवासी हों या पूंजीपति, सबके साथ एक जैसा व्यवहार कर सके।
***
गांधीवाद का गहन जीवन दर्शन ...!!
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुमूल्य आलेख ...बहुत आभार .
अनमोल प्रेरक प्रस्तुति....
प्रत्युत्तर देंहटाएंसादर आभार।
गांधी जी ने जीवन के सिद्धांत स्वयं निर्मित किये, उनका पालन किया!! पर उपदेश नहीं..!
प्रत्युत्तर देंहटाएंबढ़िया जानकारी ।
प्रत्युत्तर देंहटाएंआभार ।
उनका जीवन दर्शन हर तरह से प्रेरक है..... सुंदर पोस्ट
प्रत्युत्तर देंहटाएं“समभाव” का अर्थ है सुख और दुख में, विजय और पराजय में, मन की एक सी वृत्ति। जीत की आशा और हार की आशंका से परे होकर अपना काम करते जाना।
प्रत्युत्तर देंहटाएंइस स्थिति तक आना बहुत कठिन है ... समय की कीमत अच्छी पहचानते थे बापू
“अपरिग्रह” का अर्थ है आत्मा के लिए भार स्वरूप सभी भौतिक वस्तुओं का परित्याग। इसमें धन, संपत्ति और विषयेषणा से छुटकारा भी निहित है।
प्रत्युत्तर देंहटाएंसार्थक परिभाषा
आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति भी है,
प्रत्युत्तर देंहटाएंआज चर्चा मंच पर ||
शुक्रवारीय चर्चा मंच ||
charchamanch.blogspot.com
गांधी जी कहते थे, “जब मुझे प्रकाश की एक किरण भी कहीं दिखाई नहीं देती, मैं उसे भगवद्गीता में खोजता हूं और उसके किसी श्लोक में निहित आशा का संदेश मेरे भारी-से-भारी दुख को चुटकियां बजाते दूर कर देता है। अनंत दुख, कष्ट और आपदाओं से भरे अपने इस जीवन में जो स्थिर और अविचलित रह सका हूं उसका सारा श्रेय भगवद्गीता को ही है।”
प्रत्युत्तर देंहटाएं"अपरिग्रह" एवं ""समभाव" जैसे शब्द ही गांधी जी को महान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किए हैं। काश ! ये दो शब्द हम सबको भी प्रभावित कर पाते । इस ज्ञानपरक एवं संग्रहणीय प्रस्तुति के साथ-साथ गांधी जी के प्रति आपके समर्पित अनुराग के बारे में कुछ लिखने के लिए मेरे पास कोई समीचीन विशेषण नही है । धन्यवाद।
सर बहुत ही उम्दा और ज्ञानवर्धक जानकारी |
प्रत्युत्तर देंहटाएं“समभाव” का अर्थ है सुख और दुख में, विजय और पराजय में, मन की एक सी वृत्ति। जीत की आशा और हार की आशंका से परे होकर अपना काम करते जाना। “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन्”। समभाव के बल पर ही गांधी जी चाहे वह अंगरेज़ अधिकारी हों या अपने सहकर्मी, चाहे निर्धन, लाचार देशवासी हों या पूंजीपति, सबके साथ एक जैसा व्यवहार कर सके।
प्रत्युत्तर देंहटाएंसुन्दर विवेचना .
पुस्तक समझ पैदा करने के लिए ही होती है। उस पर,यदि पुस्तक गीता जैसी और पाठक गांधी जैसा हो,तो फिर कहने ही क्या!
प्रत्युत्तर देंहटाएं