सूफ़ियों ने विश्व-प्रेम का पाठ पढ़ाया अंक-12
सूफ़ी रहस्यवाद-1
बसरा में दसवीं सदी में कुछ तेजस्वी लोगों का एक दल था, जिसे इख़्वानुस्सफ़ा (पवित्र बिरादरी) कहा जाता था। एक आदर्श मनुष्य की चर्चा करते हुए इस बिरादरी ने लिखा है, “एक आदर्श आदमी वह है, जिसमें इस तरह की उत्तम बुद्धि और विवेक हो जैसे कि वह ईरानी मूल का हो, अरब आस्था का हो, धर्म में सीधी राह की ओर प्रेरित हनफ़ी (इस्लामी धर्मशास्त्र की सबसे तार्किक और उदार शाखा के मानने वाले) हो, शिष्टाचार में इराक़ी हो, परम्परा में यहूदी हो, सदाचार में ईसाई हो, समर्पण में सीरियाई हो, ज्ञान में यूनानी हो, दृष्टि में भारतीय हो, ज़िन्दगी जीने के ढंग में रहस्यवादी (सूफ़ी) हो।”
यह वक्तव्य इस्लामी संस्कृति को स्पष्ट करता है। उसके उदार प्रवृत्ति को उजागर करता है। विविधता में एकता की कल्पना को साकार करता है। दुनिया भर की अच्छी-अच्छी विचार-धाराओं को अपनाकर सूफ़ियों ने विश्व-प्रेम का पाठ पढ़ाया। सूफ़ीमत जिसका उदय पैगम्बर मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ माना जाता है, उसके विकास में इस उदार मानसिक माहौल का बहुत बड़ा योगदान था। निश्चित रूप से सूफ़ी मत का स्रोत पैगम्बर मुहम्मद स. हैं। उनकी प्रकाशना के दो स्तर हैं, एक क़ुरआन, जिसे इल्मे सफ़ीना (किताबी ज्ञान) कहा गया है, और यह सबके लिए है। दूसरा इल्मे सीना (गुह्य ज्ञान) जो सूफ़ियों के लिए है।
जहां तक रहस्यवाद का सवाल है, आरबेरी (Arberry) के शब्दों में “यह वह भावना है जो हमेशा से प्रकृति के रहस्यों को जानने के लिए मानव को प्रेरित करती रही है।” ज्ञान के क्षेत्र का अद्वैतवाद भावना के क्षेत्र में आकर रहस्यवाद कहलाता है। रहस्यवाद वह सिद्धान्त है जिसके अनुसार अव्यक्त अथवा अज्ञात को विषय बनाकर उसके प्रति प्रणय, विरह आदि के भाव व्यक्त करते हैं। रहस्यवाद कोई विचार या चिंतन नहीं, यह एक प्रवृत्ति है, एक भावना है। रहस्यवादी भावना आध्यात्मिक रहस्यों को जानने के लिए इन्सान को प्रेरित करती है। इसके द्वारा व्यक्ति अलौकिक शक्ति से अपना संबंध कायम करना चाहता है। यह संबंध इतना प्रगाढ़ हो जाता है कि जीव की अनुभूतियां उस महाशक्ति के साथ जुड़ जाती हैं। अपने अस्तित्व को भूल जीव हर वक़्त अपने प्रिय का स्मरण करता रहता है तथा उसी में लीन हो जाता है। अतः हम कह सकते हैं कि रहस्यवाद आत्मा की परमात्मा को प्राप्ति की प्रवृत्ति है।
रहस्यवाद अपनी प्रकृति से दो प्रकार का होता है -- एक साधनात्मक रहस्यवाद और दूसरा भावनात्मक रहस्यवाद। हमारे यहां का योगमार्ग साधनात्मक रहस्यवाद है। यह अनेक अप्राकृतिक और जटिल अभ्यासों द्वारा मन को अव्यक्त तथ्यों का साक्षात्कार कराने तथा साधक को अनेक अलौकिक सिद्धियां प्राप्त कराने की आशा देता है। तन्त्र भी साधनात्मक रहस्यवाद है।
सूफ़ी सन्त महान विचारक और चिन्तक भी थे। वे सांसारिक भोग-विलास से दूर रहते थे और पवित्र एवं सदाचारी जीवन व्यतीत करने का उपदेश देते थे। उन लोगों ने न सिर्फ़ इस्लामी रहस्यवाद अपनाया बल्कि इस्लाम की सही जानकारी न रखने वालों के कट्टरपंथी एवं कर्मकांडी विचारधाराओं का विरोध भी किया। ज़कारिया इसहाक़ ने “साइंस और सूफ़िज़्म” शीर्षक आलेख के ज़रिए बताया है कि – आध्यात्मिकता की जो शराब सूफ़ी मत में मिल रही थी, वो परम्परागत मुस्लिम समाज में उपलब्ध नहीं थी, क्योंकि जड़मूलवादियों ने क़ुरआन के शाब्दिक अर्थ को ही महत्व दिया और भीतरी अर्थ को न सिर्फ़ नज़रअंदाज़ किया बल्कि नकार दिया।
सूफ़ियों के यहां रहस्यात्मक माधुर्य भाव व्यापक स्तर पर दिखाई देता है। वे ईश्वर अथवा अल्लाह को सर्वव्यापी और सर्वगुण संपन्न मानते थे। हज़रत अबू-सैय्यद अबुल ख़ैर रह. के अनुसार ईश्वर की इच्छा का पूर्ण पालन अनिवार्य है। परिस्थितियों की अनुकूलता या प्रतिकूलता के संबंध में ऊहापोह, शंका या परीक्षा सूफ़ी मत के विरुद्ध है। सूफ़ीमत के अनुसार ईश्वर कभी कोई इच्छा पूरी नहीं करता। अगर कभी कुछ करता है तो यह उसकी रहमत है। इसलिए सबसे अच्छा उपाय समर्पण है। पूर्ण समर्पण। इसका मतलब यह है कि जो है उसी में राज़ी हो जाना चाहिए। सूफ़ी आनन्द और शांति की खोज में रहते हैं। इसलिए समर्पण अन्तः-प्रेरणा से हो।
सूफ़ियों के अनुसार ईश्वर सर्वव्यापी है। ईश्वर का वास मस्जिदों व मंदिरों में नहीं बल्कि मनुष्य के दिल में होता है और आत्मा ईश्वर का ही एक अंश है। हज़रत इमाम ग़ज़ाली रह. ने “कीमिया-ए-सादात” में कहा है, मानव हृदय एक सरोवर की तरह है। हमारी पांचों ज्ञानेन्द्रियां पांच नहरों की तरह हैं, जिनसे इस सरोवर में पानी आता है। लेकिन यदि इस सरोवर के तल से सोता को फूटना है तो पहले इसमें भरे पानी को उलीचना होगा। फिर इसमें जल भरने वाली नहरों को भी मूंद देना होगा। ताकि बाहर से आने वाला पानी रुक जाए। फिर इस सरोवर के तल की खुदाई करनी होगी जिससे स्वच्छ जल का सोता फूटे और सरोवर को भर दे। जब तक बाहरी पानी रहेगा इसका जल स्वच्छ हो ही नहीं सकता। कहने का तात्पर्य यह है कि जब तक हृदय के अंतस्तल में आत्म-ज्ञान नहीं उपजेगा हम बाहरी ज्ञान (इंद्रिय-जनित ज्ञान) से मुक्ति नहीं पा सकते।
इबादत की हक़ीक़त को महत्व दिए बिना कर्मकांड व्यर्थ है। हमें अपना हृदय पवित्र रखना चाहिए क्योंकि ईश्वर शुद्ध हृदय में ही निवास करता है। ईश्वर को प्राप्त करने के लिए अहंकार का नाश ज़रूरी है। हमें ईश्वर की भक्ति में पूरी तरह लीन हो जाना चाहिए। इसके लिए साधक को चार स्थितियों से गुज़रना होता है – शरीयत, तरीक़त, हक़ीक़त और मारिफ़त।
अभी ज़ारी है ....
मेरे नए पोस्ट :
सूफीवाद वास्तव में ही अद्वितिय है
प्रत्युत्तर देंहटाएंज्ञानवर्धक ,सार्थक आलेख के लिए आभार .
प्रत्युत्तर देंहटाएंसूफी मत के ऊपर बहुत ही बेहतरीन जानकारी दे रहे हैं आप....
प्रत्युत्तर देंहटाएंलोगों की दिलचस्पी जीवन के ज़्यादा से ज़्यादा साधन जमा कर लेने में है।
प्रत्युत्तर देंहटाएंइन्हीं साधनों को मांगने के लिए वे ईश्वर से प्रार्थनाएं करते हैं।
यह आम आस्तिकों का दर्जा है।
सूफ़ी वह है जो ख़ुदा को देने की कोशिश करता है।
ख़ुदा बंदे से उसका प्रेम चाहता है बिला शिरकते ग़ैरे।
जब बंदा ख़ुदा को प्यार का यह नज़राना देने की कोशिश करता है तो वह सूफ़ी बन जाता है और दूसरे गुण उसमें अपने आप विकसित हो जाते हैं।
पीर मुर्शिद यही सिखाते हैं।
किताबों में जो बातें भारी लगती हैं, वे उनकी तालीम की बरकत से आसानी से अमल में आ जाती हैं।
ख़ुदा की मुहब्बत का झरना जब बंदे के दिल में बहने लगता है और वह अपने रब की मर्ज़ी में अपनी मर्ज़ी फ़ना कर देता है तो वह दुख और भय से आज़ाद हो जाता है।
कोई दुख न तो उसे हार्ट अटैक कर पाएगा और न ही किसी डर से वह आत्महत्या करेगा।
लौकिक जीवन भी ढंग से वही जी पाता है जो अपने रब से प्यार करता है।
रब से प्यार न हो तो फिर इबादत महज़ एक ऐसा शरीर है जिसमें कि आत्मा ही नहीं है।
प्यार ज़िंदगी है।
See
http://sufidarwesh.blogspot.com/2012/04/blog-post.html
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत शोध परक लेख ... सूफी मत के बारे में काफी जानकारी मिल रही है
प्रत्युत्तर देंहटाएंसूफीवाद मूलतः वह है जो हर धर्म की सार बातेँ हैं,ये एक ऐसी मस्ती है जिसमे भक्त को सब तरफ भगवान ही दिखाई पड़ते हैँ। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी लिखा है उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध । निज प्रभुमय देखहिँ जगत केहि सन करहिँ बिरोध । बहुत अच्छी श्रृंखला मनोज जी,अभिनंदन व आभार ।
प्रत्युत्तर देंहटाएंइबादत की हक़ीक़त को महत्व दिए बिना कर्मकांड व्यर्थ है। हमें अपना हृदय पवित्र रखना चाहिए क्योंकि ईश्वर शुद्ध हृदय में ही निवास करता है। ईश्वर को प्राप्त करने के लिए अहंकार का नाश ज़रूरी है। हमें ईश्वर की भक्ति में पूरी तरह लीन हो जाना चाहिए। इसके लिए साधक को चार स्थितियों से गुज़रना होता है – शरीयत, तरीक़त, हक़ीक़त और मारिफ़त।
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत सुन्दर अनुकरणीय विचार सरणी सूफियों की .
सरल शब्दों में गूढ़ ज्ञान !
प्रत्युत्तर देंहटाएंआभार !
मानव हृदय एक सरोवर की तरह है। हमारी पांचों ज्ञानेन्द्रियां पांच नहरों की तरह हैं, जिनसे इस सरोवर में पानी आता है। लेकिन यदि इस सरोवर के तल से सोता को फूटना है तो पहले इसमें भरे पानी को उलीचना होगा। फिर इसमें जल भरने वाली नहरों को भी मूंद देना होगा। ताकि बाहर से आने वाला पानी रुक जाए। फिर इस सरोवर के तल की खुदाई करनी होगी जिससे स्वच्छ जल का सोता फूटे और सरोवर को भर दे। जब तक बाहरी पानी रहेगा इसका जल स्वच्छ हो ही नहीं सकता।
प्रत्युत्तर देंहटाएंवाह ! कितना सुंदर ज्ञान...आभार!
अध्यात्म एक रहस्य है। इसलिए,धर्मग्रंथों में भी बातें सूत्ररूप में ही कही गई हैं। जो धार्मिक होगा,निश्चित रूप से कुछ रहस्यात्मकता लिए रहेगा।
प्रत्युत्तर देंहटाएंसूफीवाद इंसानियत को समग्रता में सौहार्द सिखाता है...वैसे इस अद्वितीय लेख के लिए धन्यवाद्....
प्रत्युत्तर देंहटाएंचरफर चर्चा चल रही, मचता मंच धमाल |
प्रत्युत्तर देंहटाएंबढ़िया प्रस्तुति आपकी, करती यहाँ कमाल ||
बुधवारीय चर्चा-मंच
charchamanch.blogspot.com
जितना गहन यह विषय है और जितने रहस्य से भरा यह वाद है, आपने उतनी ही सहजता से समझाया है.. एक आध्यात्मिक और पारलौकिक अनुभव!!
प्रत्युत्तर देंहटाएंज्ञानवर्धन हेतु,शुक्रिया!!
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत महत्वपूर्ण है यह श्रृंखला...
प्रत्युत्तर देंहटाएंसूफी मत के बारे में बहुत सुन्दर और गहन जानकारी...आभार
प्रत्युत्तर देंहटाएंसूफी मत के बहाने आपने कितनी और बातों का खुलासा किया है -बड़ी ही ज्ञानवर्धक श्रृंखला
प्रत्युत्तर देंहटाएंसुन्दर
प्रत्युत्तर देंहटाएं