बुधवार, 11 अप्रैल 2012

मिट्टी और पानी के प्रयोग


गांधी और गांधीवाद-108

मिट्टी और पानी के प्रयोग

स्वास्थ्य के नियमों के प्रति गांधी जी के सरोकारों में कटि स्नान और कीचड़ की पुटलियों में उनकी आस्था और दवाओं के प्रति उनकी घृणा शामिल भी थीं। कूने की जलीय उपचार की पैरवी और जस्ट की “प्रकृति की ओर वापसी” ने उनपर भारी प्रभाव डाला था। जब कब्ज की उनकी शिकायत आहार संबंधी प्रयोग से दूर नहीं हुई, तो उन्होंने कूने की प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार कटि स्नान करना शुरू किया। इससे उन्हें थोड़ा आराम हुआ। फिर भी पूरी तरह से राहत नहीं मिली। एक मित्र ने उन्हें एडोल्फ़ जुस्ट (Adolf Just) की “रिटर्न टु नेचर” नामक पुस्तक पढ़ने को दी। मिट्टी के उपचार के बारे में इस पुस्तक से गांधी जी को जानकारी मिली। सूखे और हरे फल खाने के फ़ायदे के बारे में वे जान सके। कब्जियत दूर करने के लिए वे रोज़ सुबह एनो का लवण (Eno’s fruit salts) लिया करते थे। उन दिनों गांधी जी प्याज भी खूब खाया करते थे। मजाक-मजाक में पोलाक ने अमलगमेटेड सोसाइटी ऑफ ओनियन इटर्स नाम से एक संस्था का उद्घाटन कर दिया था जिसके अध्यक्ष गांधी जी थे और खुद को उसका खजांची घोषित कर दिया। कहने की ज़रूरत नहीं है कि इसके केवल वे दोनों हॊ सदस्य थे। मिट्टी के उपचार के प्रयोग उन्होंने तुरत शुरू कर दिया। इसका आश्चर्यजनक परिणाम आया। इस उपचार से गांधी जी का क़ब्ज जाता रहा।

अपनी आत्मकथा में उन्होंने जो उपचार बताए हैं वह इस प्रकार है =
खेत की लाल या काली मिट्टी लेकर उसमें एक खास मात्रा में पानी डालकर साफ, पतले, गीले कपड़े में उसे लपेटा और पेट पर रखकर उस पर पट्टी बांध दी जाती है। यह पुलटिस रात को सोते समय बाधा जाता है और सवेरे जब उठते हैं खोल दिया जाता है।

गांधी जी का प्राकृतिक चिकित्सा के बारे में कहना है, “मनुष्य को दवा लेने की शायद ही आवश्यकता रहती है। पथ्य तथा पानी, मिट्टी इत्यादि के घरेलू उपचारों से एक हजार में से 999 रोगी स्वस्थ हो सकते हैं। क्षण-क्षण में वैद्य, हकीम और डॉक्टर के पास दौड़ने से और शरीर में अनेक प्रकार के पाक और रसायन ठूंसने से मनुष्य न सिर्फ़ अपने जीवन को छोटा कर लेता है, बल्कि अपने मन पर काबू भी खो बौठता है। फलतः वह मनुष्यत्व गंवा बैठता है और शरीर का स्वामी रहने के बदले उसका ग़ुलाम बन जाता है।”

हां गांधी जी यह चेतावनी देना भी नहीं भूलते, “जो जुस्ट की पुस्तक ख़रीदें, वे उसकी हर बात को वेदवाक्य न समझें। सभी रचनाओं में प्रायः लेखक की एकांगी दृष्टि रहती है। जो पुस्तक पढ़ें वे उसे विवेक-पूर्वक पढ़ें और कुछ प्रयोग करने हों तो किसी अनुभवी की सलाह लेकर करें।”

ध्यान देने वाली बात यह है कि गांधी जी के नैतिक और मानसिक दृष्टिकोण पर मूलगामी प्रभाव अधिकतर उनके पश्चिम के संपर्क के कारण पड़ा। हालाकि भारतीयता पर उन्हें गर्व हमेशा रहा, पर जब हम स्वास्थ्य संबंधी प्रयोगों के प्रति उनकी जिज्ञासा और उसके कारणों और परिणामों पर दृष्टि डालते हैं तो हम कह सकते हैं कि  यह मुश्किल से ही उनकी परंपरागत हिंदू पृष्ठभूमि की विरासत थे।

11 टिप्‍पणियां:

  1. प्रकृति के पास हर समस्या का इलाज है ......

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  2. खेत की लाल या काली मिट्टी लेकर उसमें एक खास मात्रा में पानी डालकर साफ, पतले, गीले कपड़े में उसे लपेटा और पेट पर रखकर उस पर पट्टी बांध दी जाती है। यह पुलटिस रात को सोते समय बाधा जाता है और सवेरे जब उठते हैं खोल दिया जाता है।


    गांधी जी की हर बात निराली --

    सतत सीख देती हुई ।

    आभार मनोज जी ।।

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  3. प्रकृति हमारी समस्याओं का समाधान जानती है लेकिन हम उससे अनभिज्ञ रहते हैं ... अच्छी जानकारी देता लेख

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  4. कटि स्नान और नेचुरोपैथी के तरीक़े से उपवास करने वाले इसका मज़ा अल्फ़ाज़ में नहीं बता पाते।
    हमने माथुर साहब को मेहन स्नान बताया तो केवल पानी के प्रयोग मात्र से ही उन्हें बुढ़ापे में जवानी प्राप्त हो गई।

    आपका कलम शानदार है।
    कम ब्लॉगर हैं जो हिंदी ब्लॉगिंग को अच्छे विचार दे पा रहे हैं।
    वर्ना तो ...
    हिंदी ब्लॉगिंग की दुर्दशा के लिए ज़िम्मेदार दिल्ली के ब्लॉगर्स

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  5. behtarin jaankari...mitti ke kai prayog to maine bhee kiye hain..aisi tamam beemariyon ka ilaj mitti se hota hai...par kabj ke bishay me yeh jaankari nootan hai mere liye..sadar pranam ke saht

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  6. गाँधी जी दिखे तो सही
    चाहे थोड़ी देर आके यहीं ।

    अच्छा लेख !

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  7. आपकी पोस्ट चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    http://charchamanch.blogspot.in/2012/04/847.html
    चर्चा - 847:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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  8. पुलटिस कब तक बांधा जाए। खानपान के प्रति सतर्क रहना ही उत्तम।

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