बुधवार, 2 मई 2012

सांख्य दर्शन

सांख्य दर्शन


पिछली पोस्टों में हमने गंगा सागर यात्रा और कपिल मुनि के बारे में चर्चा की। भागवत के अनुसार कपिल मुनि विष्णु के 24 अवतारों में से एक हैं। उनके पिता का नाम कर्दम ऋषि और माता का नाम देवहूति बताया गया है। सांख्य दर्शन के रचयिता कपिल मुनि माने जाते हैं। भारतीय दर्शन के छह प्रकारों सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, व वेदान्त (उत्तर मीमांसा), में से एक है सांख्य। 'सांख्य' का शाब्दिक अर्थ है - 'संख्या सम्बन्धी'।

मनुष्य को तीन प्रकार के दुख घेरते हैं। पहला धिभौतिक - यह मनुष्य को होने वाली शारीरिक दु:ख है जैसे बीमारी, आदि होना। दूसरा धिदैविक - यह देवी प्रकोपों द्वारा होने वाले दु:ख है जैसे बाढ़, आंधी, तूफान, भूकंप आदि का प्रकोप। तीसरा आध्यात्मिक - यह दु:ख सीधे मनुष्य की आत्मा या मन से संबंधित दुख होता है। सांख्य का उद्देश्य तीनो प्रकार के दु:खों की निवारण करना है।

इन दुखों का कारण क्या है? उनका निवारण कैसे हो? कपिल मुनि ने इन तीनों दुःखों से मुक्ति का उपाय बतलाया है। इस दर्शन में जगत को दो भागों में बांटकर देखा जाता है -पुरुष और प्रकृति। पुरुष मनुष्य का चेतन तत्व है और प्रकृति शेष जगत है। दुख का कारण अज्ञानतावश पुरुष और प्रकृति में भेद नहीं कर पाना है। इस दर्शन के मानने वालों के अनुसार सांख्य का अर्थ होता है ज्ञान। इस भेद को समझने में यह दर्शन या ज्ञान हमारी सहायता करता है।

कपिल मुनि के दर्शन का सबसे पुराना उपलब्ध ग्रंथ ईश्वरकृष्ण कृत “सांख्यकारिका” है। “सांख्य सूत्र” के नाम से दो और ग्रंथ है। दर्शन-दिग्दर्शन में राहुल सांकृत्यायन जी ने कहा है – ‘कपिल मुनि उपनिषद्‌ के दर्शन की भांति ब्रह्म या आत्मा को ही सर्वेसर्वा नहीं मानते। वे आत्मा से इंकार नहीं करते, बल्कि उन्होंने अकर्ता या नित्य आदि विशेषणों को स्वीकार किया है। नित्य का मतलब है निष्क्रियता, इसलिए कपिल मुनि ने आत्मा के निष्क्रिय होने पर ज़ोर दिया है। निष्क्रिय अवस्था में चूंकि सृष्टिकर्ता, या अन्तर्यामी ब्रह्म की ज़रूरत नहीं थी, इसलिए कपिल मुनि ने अपने दर्शन में परमात्मा या ब्रह्म को स्थान नहीं दिया है। असंख्य जीवों या पुरुषों को उन्होंने प्रकृति के साथ एक स्वतंत्र तत्त्व माना है।’

सांख्‍य के अनुसार मूल तत्‍व 25 हैं। ये हैं --
1. प्रकृति, 2. महत् 3. अंहकार, 4. 11 इन्द्रियां, 5. पांच तन्मात्राएं, 6. पांच महाभूत और 7. पुरूष।
1. प्रकृति : (एक)
चेतन पुरुष के अलावे जड़ प्रकृति कपिल मुनि के मत में मुख्य तत्त्व है। सत्व, रजः, तमः – इन तीन गुणों की साम्यावस्था को प्रकृति कहा जाता है। इस अवस्था में प्रकृति निष्क्रिय रहती है। इन तीनों गुणों में जब कभी कमी आती है या बढोत्तरी होती है, तब उस विषमता से प्रकृति का संतुलन बिगड़ता है। उसमें विकृति आती है। प्रकृति की विकृति से ही जीव और जगत की सृष्टि होती है। अर्थात्‌ प्रकृति नित्य है, जगत्‌ की सारी वस्तुएं उसी के विकार हैं।
जीव और जगत अव्यक्त रूप में प्रकृति में विद्यमान रहते हैं। इसी कारण से प्रकृति का एक और नाम अव्यक्त है। सृष्टि की आदि क्रिया में प्रकृति ही प्रधान है। वह प्रकृत रूप में काम करती है। प्रकृति बना है ‘प्र’ और ‘कृति’ के संयोग से। ‘प्र’ का अर्थ है ‘प्रकर्ष’ और ‘कृति’ का अर्थ है ‘निर्माण करना’। जिन मूल तत्वों से मिलकर बाकी सब कुछ बनता है, उसे प्रकृति कहते हैं। इसी कारण से “प्रकृति” नाम पड़ा -- “प्रकरोरीति प्रकृतिः।”
२. महत :  (दो)
प्रकृति का प्रथम परिणाम महत्तत्व या बुद्धितत्व है।
३. अहंकार : (तीन)
महत्तव की विकृति अहंकारतत्व है।
४. ग्‍यारह इन्द्रियां : (चार से चौदह)
अंहकार तत्‍व के परिणाम हैं इन्द्रिय --- विषय।
इन्द्रियां दो प्रकार की है –
(क) बाह्य इन्द्रियां – दो प्रकार की होती है –
(अ) ज्ञानेन्‍द्रियां 1 चक्षु 2 कर्ण 3 नासिका 4 जिह्वा 5 त्‍वक्
(आ) कर्मेन्द्रियां 6 वाक् 7 पाणि 8 पाद 9 पायु 10 उपस्‍थ
(ख) अन्‍तरेन्द्रिय 11 मन
(5) पंच मात्राएं (पंद्रह से उन्नीस)
पंत्रतम्‍मात्रा अहंकारतत्‍व का एक परिणाम है।
पांच तम्‍मात्राएं हैं --1 रूप 2 रस 3 गन्‍ध 4 स्‍पर्श और 5 शब्‍द
(6) पंच महाभूत (बीस से चौबीस)
उपर्युक्‍त वर्णित पंचतम्मात्राओं से ही पांच स्‍थूल त‍त्‍वों की उत्‍पति होती है। ये हैं –
1 क्षिति,
2 अप् (जल)
3 तेज (पावक)
4 व्‍योम (गगन , आकाश ) और
5 मरूत् (समीर)
(7) पुरूष (पच्चीस)
आत्मा (पुरुष) : पुरूष का अर्थ व्यक्ति-आत्मा है।


सांख्य दर्शन
संसार में प्राणी दु:ख से निज़ात पाना चाहता है। दु:ख क्यों होता है, इसे किस तरह हमेशा के लिए दूर किया जा सकता है - ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जो सदा से हमारे लिए महत्वपूर्ण रहे हैं। इन प्रश्नों का उत्तर ढूँढ़ना ही ज्ञान प्राप्त करना है। सांख्य दर्शन में संसार के दुखों और सुखों का विश्लेषण चौबीस तत्वों और पुरुष के संयोग के आधार पर किया जाता है। सांख्‍य मत के अनुसार इन 25 तत्‍वों का सम्‍यक ज्ञान ही पुरूषार्थ है। सांख्य दर्शन विश्व को प्रकृति-पुरुष-मूलक मानता है। जगत् में पाए जाने वाले जड़ एवं चेतन, दोनों ही रूपों के मूल रूप से जड़ प्रकृति, एवं चेतन पुरुष इन दो तत्वों की सत्ता को मानना ही इस दर्शन की सबसे बड़ी विशेषता है। सांख्य दर्शन में सृष्टि की उत्पत्ति 'भगवान' के द्वारा नहीं मानी गयी है बल्कि इसे एक विकासात्मक प्रक्रिया के रूप में समझा गया है और माना गया है कि सृष्टि अनेक परिवर्तनों से गुजरने के बाद अपने वर्तमान स्वरूप को प्राप्त हुई है।
  • सांख्‍य मत में, जीव और जगत की सृष्टि में ईश्‍वर को प्रमाणरूप में नहीं माना जाता। यह ईश्वर की सत्ता को नहीं मानता है।
  • जगत के दो भाग हैं -पुरुष और प्रकृति।
  • पुरूष और प्रकृति के अविभक्‍त संयोग से सृष्टि की क्रिया निष्‍पन्‍न होती है, अर्थात्‌ संसार की हर वस्तु का उद्गम पुरूष और प्रकृति से हुआ है।
  • पुरूष और प्रकृति दोनों ही अनादि है।
  • पुरूष चेतन है, प्रकृति जड़।
  • पुरुष मनुष्य का चेतन तत्व है।
  • प्रकृति शेष जगत है।
  • पुरूष निष्क्रिय है, प्रकृति क्रियाशील।
  • पुरूष में स्वयं आत्मा का भाव है जबकि प्रकृति पदार्थ और सृजनात्मक शक्ति की जननी है। सांख्य मत के अनुसार सारा विश्व त्रिगुणात्मक प्रकृति, सत्व, रजः, तमः – इन तीन गुणों की साम्यावस्था का वास्तविक परिणाम है।
  • प्रकृति की अविकसित अवस्था में यह गुण निष्क्रिय होते है पर परमात्मा के तेज सृष्टि के उदय की प्रक्रिया प्रारम्भ होते ही प्रकृति के तीन गुणो के बीच का संतुलन टूट जाता है। साम्यावस्था भंग होने पर तीन अहंकार, पाँच तन्मात्राएँ, १० इन्द्रियाँ और पाँच महाभूत बनते हैं।
  • चेतन पुरूष के सान्निध्‍य से प्रकृति भी चैतन्‍यमयी लगती है। पुरुष की समीपता मात्र से और उसके लिए प्रकृति में क्रिया उत्पन्न होती है, जिससे विश्व की वस्तुओं का उत्पाद और विनाश होता है।
  • सांख्य दर्शन में पुरुष को अकर्ता, निर्गुण, अविकारी माना गया है। पुरूष केवल भोक्‍ता है, कर्ता नहीं।
  • पुरुष का यह भोग औपचारिक है।
  • पुरूष सर्वदा ही दुख वर्जित है, प्रकृति के विकारों से निर्लिप्त।
  • दुःख तो बुद्धि का विकार है।
  • दुख का कारण अज्ञानतावश पुरुष और प्रकृति में भेद नहीं कर पाना है। अज्ञानतावश वह गुण कर्तृत्व को स्वयं के कर्तृत्व के रूप में देखने लगता है। और देह संसर्ग से किए हुए पुण्य पापादि कर्मों के दोष से विभिन्न योनियों में जन्म लेता हुआ संसार में रहता हैं।
  • दुःख बुद्धि पुरूष में प्रतिबिम्‍बित मात्र होती है।
  • शरीर के भेद में आत्‍मा और पुरूष बहु है। पुरूष और प्रकृति 24 तत्‍व से स्‍वतन्‍त्र है।
  • संसार के दुखों और सुखों का विश्लेषण इन्हीं चौबीस तत्वों और पुरुष के संयोग के आधार पर किया जाता है।
  • सांख्य दर्शन मनुष्य के सभी दुखों का कारण पुरुष को प्रकृति के ज्ञान का अभाव ही मानता है। अज्ञानतावश, न जानने के कारण ही जीव को बन्‍धन में बंधना पड़ता है। अर्थात दुख और संसार में आवागमन के चक्र में फंसना पड़ता है।
  • प्रकृति पुरूष को अपने हाव-भाव छल-कौशल द्वारा बांधकर रखती है। प्रकृति मानों नाटक की नर्तकी है।
  • इसके कारण ही वह भोग की वस्तुओं को ही अपना लक्ष्य मान लेता है और काम, क्रोध, मद, मोह आदि में ही आनंद प्राप्त करता है। यही दुख का कारण है।
  • इसी भेद को ठीक-ठीक नहीं समझ पाने के कारण पुरुष अपने को प्रकृति ही समझ लेता है। यही मिथ्या ज्ञान है।
  • आत्मा किसी न किसी रूप में प्रकृति से संबंधित हो जाती है और उसकी मुक्ति इसी में होती है कि प्रकृति से अपने विभेद का अनुभव करे।
  • मनमोहिनी के इस हाव-भाव, नाच-नृत्‍य, छल कौशल को पुरूष जिस दिन पकड़ लेता है, उसी दिन वह मुक्‍त हो जाता है, अर्थात सारे बंधन तोड़ देता है।
  • पुरुष निरंतर अपने बारे में चेतना प्राप्त करता है और इसी क्रम में अपने और प्रकृति के अस्तित्व के भेद का ज्ञान प्राप्त करता है।
  • प्रकृति से पुरूष की स्‍वतंत्रता या मुक्ति के विवेक को ज्ञान कहा जाता है।
  • ज्ञानामुक्ति - अर्थात ज्ञान ही मुक्ति है।
  • कठोर साधना द्वारा प्रकृति पुरूष के भोग्‍या-भोक्‍ता भाव का उच्‍छेद ही पुरूषार्थ या आत्‍यन्तिक दुखनिवृत्ति है।
  • अर्थात् प्रकृति को तलाक देकर ही पुरूष के जीवन में मुक्ति की प्राप्ति होती है। इस प्रकार से प्रकृति से सम्‍पूर्ण रूप से स्‍वतन्त्र होने का नाम ही पुरूष का कैवल्‍य है।
  • कैवल्य की अवस्था जब पुरुष इस चैतन्य को प्राप्त कर ले और अपने आप को शुद्ध पुरुष के रूप में समझ ले, तो इस अवस्था को कैवल्य कहते हैं। कैवल्य की अवस्था में मनुष्य सुख और दुख से ऊपर उठ जाता है।
  • चेतना के स्तर पर पहुंच जाने से दुखों की निवृत्ति हो जाती है और इसे ही “मोक्ष” कहते हैं। इसलिए मोक्ष का उपाय है पुरुष को अपनी स्वतंत्र सत्ता के बारे में चेतना प्राप्त करना, अर्थात कैवल्य प्राप्त करना।
  • मुक्‍त पुरूष को प्रकृति अपने छल बल से रिझाने नहीं आती। जिस प्रकार सभा समाप्‍त हो जाने के पश्‍चात नर्तकी पुर्णतः निढ़ाल हो जाती है और नाचने के लिए नहीं उठती, उसी प्रकार की स्थिति यह है।
  • सांख्य के अनुसार मोक्ष की प्राप्ति का उपाय पूजा-पाठ या किसी ईश्वर की उपासना नहीं है, बल्कि अपनी चेतना के असली स्वरूप को समझ लेना ही है।
  • सांख्‍यकारों ने इसके लिए ध्‍यान, धारणा, अभ्‍यास, वैराग्‍य तपश्‍चरण आदि का पालन करने का उपदेश दिया है। सांख्‍य के साथ योग का घनिष्‍ठ संबंध है। योग, तर्क आदि उपायों से इन संबंधों के बारे में साक्षी भाव विकसित करना आवश्यक है, ताकि पुरुष अपनी स्वतंत्र सत्ता के विषय में संशय मुक्त हो सके।

5 टिप्‍पणियां:

  1. यह तो बहुत गहन चिंतन वाला लेख है .... एक बार में तो समझ भी नहीं आया ... फिर पढ़ूँगी ... आभार

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  2. अनुपम ज्ञान की अविचल धारा बहा दी है आपने...बहुत बहुत आभार !

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  3. bhartiya swarup ka chitran bade hi sundar se kiya hai. dhyanyavad kai patra

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