बुधवार, 29 फरवरी 2012

अपशकुन

अपशकुन

(स्थल - अस्पताल के प्रसुति गृह के सामने का बरामदा।)

दृश्य-1

मिसेज खन्ना – (मिसेज सलूजा के उतरे हुए चेहरे को देख कर) क्या हुआ बहन जी? कुछ उदास दिख रही हैं।

मिसेज सलूजा - पोते की आस लगाये थी। बहू ने बेटी पैदा किया है।

मिसेज खन्ना – अरे! तो क्या हुआ? दिल छोटा न करो बहना। लड़का-लड़की सब भगवान की देन है। लक्ष्मी घर आई है, सुख सौभाग्य समृद्धि का प्रतीक है। वैसे भी आजकल लड़कियां किसी दौड़ में लड़कों से पीछे नहीं है।ख़ुशी मनाइए। मिठाइयां बांटिए।

मिसेज सलूजा - ठीक कहती हो बहना।

दृश्य 2

मिसेज खन्ना – (मिस्टर खन्ना को आते देख कर) क्या हुआ जी?

मिस्टर खन्ना – … पोती हुई है।

मिसेज खन्ना – हाए भगवान! मैं तो पहले ही कहती थी बहू के लक्षण अच्छे नहीं हैं। अब क्या करूं, मेरे तो करम ही फूट गये। नासपीटी ने पैदा भी की तो लड़की। कब से पोते का मुंह देखने को तरस रही हूँ। इस करमजली ने हमारे सारे अरमानों पर पानी फेर दिया।

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सोमवार, 27 फरवरी 2012

उत्साह पर पानी फिर गया

गांधी और गांधीवाद- 100

उत्साह पर पानी फिर गया

मुश्किल से तीन-चार महीने मुम्बई में गुज़रे थे कि दक्षिण अफ़्रीका से तार आया, “स्थिति गंभीर है। मि. चेम्बरलेन जल्दी ही आ रहे हैं। आपकी उपस्थिति आवश्यक है।” तार से पूरी बात समझ में नहीं आई। गांधी जी ने अनुमान लगाया कि संकट ट्रांसवाल में ही होगा। चार-छह महीने में वहां की समस्या निबटा कर वे वापस आ जाएंगे इसलिए बाल-बच्चों को साथ लिए बिना ही वे दक्षिण अफ़्रीका के लिए रवाना हुए। गांधी जी की दक्षिण अफ़्रीका की यह तीसरी यात्रा थी। रास्ते भर गांधी जी सोचते रहे कि बोअर युद्ध में भारतीयों द्वारा दी गई सेवाओं के चलते उन्हें लाभ हुआ होगा, फिर ये कौन सा संकट आ पड़ा !

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1902 का डरबन

25 दिसम्बर 1902 को जब गांधी जी डरबन पहुंचे। लोगों ने खुशी और उत्साह के साथ उनका स्वागत किया। जब लोगों से बातचीत हुई, तो उनको वहां की वास्तविक स्थिति का पता चला। उन्होंने तो यह सोच रखा था कि युद्ध के बाद अफ़्रीका में भारतवासियों की स्थिति में सुधार हुआ होगा। ट्रांसवाल और फ़्री स्टेट में तो किसी विषम परिस्थिति की उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी, क्योंकि लॉर्ड लेंसडाउन और लॉर्ड सेलबर्न जैसे बड़े अधिकारियों ने आश्वासन दिया था कि बोअर राज्यों में भारतीयों की खराब हालत का होना भी युद्ध के कई कारणों में से एक कारण है, और युद्ध के बाद इस पर ग़ौर किया जाएगा। प्रिटोरिया में रहने वाले ब्रिटिश राजदूत ने भी गांधी जी को आश्वासन दिया था कि ट्रांसवाल जब ब्रिटिश उपनिवेश हो जाएगा तो सारे भारतीयों के सभी कष्ट दूर हो जाएंगे। राज्य-व्यवस्था बदल जाने पर ट्रांसवाल के भारतीय विरोधी क़ानून भारतीयों पर लागू नहीं हो सकेंगे।

इस घोषणा के चलते गोरों ने, ज़मीन की नीलामी में जिन भारतीयों ने बोली लगाई थी, उसे मंज़ूर कर लिया, क्योंकि अधिकारियों को यह आभास था कि नई सरकार के आते ही भारत विरोधी क़ानून समाप्त हो जाएंगे। लेकिन जब प्रवासी भारतीयवे ज़मीन की रजिस्ट्री के लिए गए तो उन्हें 1885 क़ानून का हवाला देकर ज़मीन की रजिस्ट्री उनके नाम करने से मना कर दिया गया। डरबन में पहुंचते ही गांधी जी को मालूम हुआ कि बोअर युद्ध में प्रवासी भारतीयों ने अंगरेज़ सरकार की जो सहायता की थी, वह उसे भूल चुकी है और उन पर कई नए कर और पाबंदी लाद दिए गए हैं। उनकी हालत बद से बदतर हो गई है।

बोअर युद्ध समाप्त होने के बाद ब्रिटिश सरकार ने वहां के नियम-क़ानून की जांच-पड़ताल के लिए एक कमेटी गठित की थी। उसका मुख्य काम था उन नियम-क़ानूनों की पहचान करना जो ब्रिटिश विधान से मेल न खाते हों और महारानी विक्टोरिया की प्रजा के नागरिक अधिकारों में जो क़ानून बाधक हों और उन्हें रद्द कर देना। हालाकि महारानी विक्टोरिया की प्रजा’ में भारतीय प्रजा भी शामिल थी लेकिन समिति ने इसका अर्थ केवल गोरी प्रजा से ही लिया। जो भी सुधार हुए उनमें भारतीयों का कहीं ज़िक्र भी नहीं था। उलटे बोअरों के राज्य में जितने भी भारतीय विरोधी क़ानून थे उन सबको नए सिरे से एक अलग नियम संहिता में समेट कर प्रभावशाली ढंग से लागू कर दिया। जो लोग “जोहानसबर्ग एशियाटिक लोकेशन” में रह रहे थे उन्हें देश छोड़ने का नोटिस दे दिया गया।

गांधी जी जब भारत में थे, तब नवम्बर 1901 में नेटाल की सरकार ने एक अधिनियम पारित किया। इसके तहत यह प्रावधान रखा गया कि कोई भी व्यक्ति जो स्थाई मताधिकार की योग्यता से वंचित कर दिया जाता है उसे सरकारी महकमें नौकरी पाने योग्य न समझा जाएगा। इससे साफ़ था कि प्रवासी भारतीयों के लिए रोज़गार के अवसर कम हो रहे थे। यह गांधी जी की जानकारी में नहीं लाया गया था। वहां पर उन दिनों प्रवासी भारतीयों की स्थिति काफ़िरों, ज़ुलू और मलायी लोगों की तरह ही बहुत ही दयनीय थी और गांधी जी के सामने चुनौती थी कि कैसे उन्हें उनका अधिकार दिलाया जाए।

जब गांधी जी डरबन पहुंचे तो उन्हें कहा गया कि उन्हें ट्रांसवाल भी जाना होगा। गांधी जी के वहा पहुंचने के साथ-साथ ही चेम्बरलेन भी वहां पहुंच चुके थे। उन्होंने सोचा कि नेटाल की स्थिति से चेम्बरलेन को वाकिफ़ करा कर वे उनके पीछे-पीछे ही ट्रांसवाल जाएंगे। तैयारी पूरी कर ली गई थी और चेम्बरलेन के पास शिष्टमंडल के जाने की तारीख भी निश्चित हो चुकी थी। मतलब गांधी जी के पहुंचते ही उनके लिए वहां काम तैयार था। सबसे पहले तो उन्हें चेम्बरलेन के सामने पढ़ा जाने वाला प्रार्थना-पत्र तैयार करना था। वे अपने काम में जुट गए। हिंद कौम की तरफ़ से एक अर्ज़ी तैयार की।

जोसेफ़ चेम्बरलेन (Joseph Chamberlain) को भारतीयों का हमदर्द समझा जाता था। उन्होंने पहले मदद भी की थी। उन्ही के सहयोग से मताधिकार संशोधन बिल को महारानी की स्वीकृति नहीं मिल पाई थी। लेकिन तब से अब तक में फ़र्क़ आ गया था। गोरे समाज ने चेम्बरलेन के उस कृत्य को बदसलूकी के रूप में लिया और उसे माफ़ नहीं किया था। इसलिए जब 28 दिसम्बर 1902 को गांधी जी ने नेटाल चेम्बरलेन के समक्ष भारतीय कांग्रेस के प्रतिनिधि मंडल के साथ भारतीयों की समस्याओं से सम्बन्धित ज्ञापन प्रस्तुत किया, तो उसका रुख बदला हुआ पाया। पहले तो चेम्बरलेन ने सारी बातें बड़े ग़ौर से सुनी। उन्होंने नेटाल के मंत्रीमंडल से बात करने का आश्वासन भी दिया। चेम्बरलेन बड़ी मधुरता दिखाते हुए मिला, लेकिन गोल-गोल बातें करते हुए असली मुद्दे को टाल गया। यह मुलाक़ात निरर्थक रही। उसने भारतीय लोगों की मांगों को कोई महत्व ही नहीं दिया।

चेम्बरलेन के दक्षिण अफ़्रीकी दौरे के दो मुख्य मकसद थे। एक तो वह वहां से साढ़े तीन करोड़ पौण्ड लेने गया था, जो उसे गोरों से ही मिलते। यह वह राशि थी जो अफ़्रीका के गोरों को ब्रिटिश सरकार को बोअर युद्ध के हरजाने के रूप में देनी थी। इसलिए वह गोरी सरकार के ख़िलाफ़ कुछ कहना-सुनना नहीं चाहता था। बल्कि उसका ध्यान गोरों और उसकी समस्याओं पर ही केन्द्रित था। दूसरे वहां स्थित अंगरेज़ों और बोअरों का मन भी उसे जीतना था। बोअर युद्ध के बाद बोअरों और अंगरेज़ों के बीच की दूरियां काफ़ी बढ़ गई थीं। इस दूरी को जहां तक हो सके उसे मिटाना था। इन उद्देश्यों के सामने भारतीयों का प्रतिनिधिमंडल कहां ठहरता। शिष्टमंडल को उसकी ओर से तो उन्हे चैम्बरलेन का यह उपदेश मिला,

“आप तो जानते हैं कि उत्तरदायी उपनिवेशों पर साम्राज्य-सरकार का अंकुश नाम मात्र का ही है। आपकी शिकायतें तो सच्ची जान पड़ती हैं। मुझसे जो हो सकेगा, मैं करूंगा। मैं नेटाल सरकार से बात करूंगा, लेकिन मैं नहीं समझता कि जो क़ानून एक बार बन चुका है और लागू हो चुका है उसे इतनी जल्दी बदलना उनके लिए संभव होगा। आप जानते हैं कि ब्रिटिश सरकार एक इंसाफ़पसंद सरकार है। पर हम उपनिवेशों के मामलों में ज़्यादा दखलंदाज़ी नहीं करते। इसलिए यदि आप लोगों को दक्षिण अफ़्रीका में रहना है, तो जिस तरह भी बने, यहां के गोरों से ही समझौता करके रहना चाहिए। ... आखिर आपको उन्हीं के बीच तो रहना है।”

गोरों से ही समझौता कर रहना चाहिए’ इससे यह स्पष्ट था कि ब्रिटिश विदेश सचिव, उपनिवेशों का दौरा भारतीयों की शिकायतें सुनने के लिए नहीं बल्कि यूरोपीयों को ख़ुश करने के लिए कर रहा था। यह जवाब सुनकर सारे प्रतिनिधियों का जोश ठंडा पड़ गया, मानों उनके उत्साह पर पानी फिर गया हो। शुरू में तो गांधी जी भी निराश हुए ... ब्रिटिश सरकार इतनी जल्दी प्रवासी भारतीयों की सेवा और बलिदान को कैसे भूल गई, ... लेकिन वे इतनी आसानी से हार मानने वालों में से नहीं थे। उन्होंने मन ही मन सोचा, “जब जागे तभी सवेरा। फिर से श्रीगणेश करना होगा।” उन्होंने साथियों को भी यह बात समझाई। सब लोग चिंतित हो गए। उनके सामने अंधकार था … मुख्य प्रश्न था, अब हमारी कौन सुनेगा? .. अब हम क्या करें?

इस प्रकरण पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए गांधी जी लिखते हैं,

“हां चेम्बरलेन अपने हिसाब से ठीक ही था। गोलमोल बात कहने के बदले उसने साफ बात कह दी। जिसकी लाठी उसकी भैंस का क़ानून उसने मीठे शब्दों में समझा दिया था। पर हमारे पास लाठी थी ही कहां? हमारे पास तो प्रहार झेलने लायक शरीर भी मुश्किल से थे।”

***

रविवार, 26 फरवरी 2012

कैसे करूं आभार प्रकट!

जिनके लिए यह कविता लिखी उन्हें जब इसे सुनाया तो उनके चेहरे पर मुस्कान थी और मुंह से निकला, “आज कल क्या आलतू-फ़ालतू कविता लिखने लगे हो!”

मेरे मुंह से अनायास निकला, “आपके इस कंप्लीमेंट के लिए समझ नहीं आ रहा कैसे करूं आभार प्रकट!”

वैसे हमें जो न मिला होता है, उसके लिए तो ढेरों कविताएं, गीत, ग़ज़लें, नज़्म लिख डालते हैं, पर जो है, उसके लिए कम से कम मैंने, … सोचा ही नहीं कभी लिखने को, खास कर कविता। जेठ-वैशाख की फुहार की तरह फाल्गुन माह में 24 साल पहले हमारी ज़िन्दगी में उनका सुखद पदार्पण हुआ था। उन्होंने अपने प्रेम की स्वर्णिम ज्योति से मेरी धड़कनों के हर कोने-अंतरे को प्रकाशित किया। अपनी कड़क-मुलायम हथेलियों से हमारे अन्तरमन के आंगन को संवारा, सजाया।

इस शुष्क दुनिया में जी पाने के लिए प्रेम का सहारा बहुत ज़रूरी है। लेकिन प्रेम की निरंतरता बनी रहे, वह फलता-फूलता रहे, इसके लिए ज़रूरत होती है एक उत्तम सोच-समझ रखने वाले जीवन साथी की। अपने ऐसे  जीवन साथी के लिए, कविता लिखना, एक कवि के लिए उन असंख्य कोणों को याद करना है, जिसे उसने (जीवन संगिनी ने) बिना कुछ कहे,  दिखाए, सुनाए, पूरी तरह केवल महसूस ही नहीं कराया,  बल्कि धीरे-धीरे उन्होंने अपने जीवन के प्रेम की अनुभूति हममें रूपांतरित किया और वह भी बिना कुछ बताए। इसके लिए मैं आकंठ उनकी कृतज्ञता में डूबा हूं । --- यह महज भावुकता नहीं, बल्कि एक जीता-जागता यथार्थ है …..

कैसे करूं आभार प्रकट!
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एकाकीपन के
भीषण तप्त अहसास में
नम, हसीन, बारिश की बूंदों-सा
हुआ पदार्पण तेरा
मेरे जीवन में !
सृजन की
सुंदरतम रचना तुम
इस अंतरतम में
करती वास
खजाना ख़ुशियों का
लुटाती रही हो
मेरे हाथ !

 

जीवन उदधि की
अतल गहराई में
प्रगाढ़-प्रेम,
सुख-शांति के
रंग भरे तुमने,
दो-दशक से भी अधिक
इस अंतराल में
उसे सजाया,
संवारा
और
संभालकर रखा
तुमने।

 

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जिसे भेद न सकीं,
न कर सकीं आहत
क्रोध और अविश्वास की
छिछली सतह पर
शैवाल-सी बहुतेरी उलझनें
मन की,
बोझ-सी लगती
ज़िन्दगी की हलचल।

 

ऐसा नहीं कि
आँधियाँ नहीं आईं,
ज्वार नहीं उठे
पर, उनसे बचाना
इस पावन रिश्ते को
लक्ष्य रहा तेरा।
अपनी अच्छाइयों से
गहराई दी
सात फेरों,
सात-वचनों और
सौ जन्मों के
इस अटूट बंधन को।
 
मधुर मुस्कान,
खिला मन
ज्यों सवेरा क्वार का
तुम बिन जीवन अधूरा
कहाँ से लाऊँ
वह शब्दावलि
जो दे सके आभार
तुम्हारा !
--

मंगलवार, 21 फरवरी 2012

सूफ़ी दर्शन-2

सूफ़ियों ने विश्व-प्रेम का पाठ पढ़ाया अंक-7

सूफ़ी दर्शन-2

अंक-1 : सूफ़ी शब्द का अर्थ अंक-2 सूफ़ीमत का उदय अंक-3 : सूफ़ीमत की प्रारंभिक अवस्था अंक-4. सूफ़ीमत का विकास-1 अंक-5 सूफ़ीमत का विकास-2 अंक-6 : सूफ़ी दर्शन-1

वाजिबुल वुजूद

अल्लाह अजन्मा और अनश्वर है। उसके अलावा जो कुछ है सब परिवर्तनशील और नश्वर है। वह रचयिता है और सभी जीव उसी की एक रचना है। उसने उसे रूप देकर इस सृष्टि में पैदा किया। जीव का शरीर और आत्मा है। जिसके कारण भेद पैदा हो गया है। तमाम स्रोतों का मूल वाजिबुल वुजूद (जिसका अस्तित्व किसी दूसरे अस्तित्व का मुहताज न हो) से संबद्ध है। बिलकुल ऐसे ही जैसे सूर्य और उसका प्रकाश एक है लेकिन शरीरों पर पड़ कर उसके अनेकता का आभास होने लगता है। मूल की दृष्टि से “सूरतों” में अनेकता नहीं है, लेकिन शरीरों की भारी संख्या की दृष्टि से वे अनेक दिखाई देती हैं। साथ ही सूर्य का प्रकाश एक होने के बावज़ूद वह अनेक शरीरों पर पड़ता है, तो उनकी क्षमताओं की दृष्टि से उसके प्रतिबिम्बित होने की विभिन्न श्रेणियां हो जाती हैं। सूक्ष्म शरीर जैसे वायु, इसमें सूर्य की किरणें बिलकुल प्रतिबिम्बित नहीं होतीं, किन्तु कलईदार शरीर जैसे दर्पण में किरणें अधिक प्रतिबिम्बित होती हैं। यही हाल आत्मा का है। आत्मा पर अल्लाह का “फ़ैज़ान” (कृपा, दया) होता है। जिस आत्मा में जितनी क्षमता होती है, वह उसी हिसाब से परमात्मा की ज्योति से ज्योतिर्मय होती है।

प्रसिद्ध सूफ़ी साधकों के अनुसार आत्मा में ऐसी शक्ति है कि वह भौतिक जगत से परे होकर परमात्मा से साक्षात्कार कर सकता है, उसके साथ एकैक हो सकता है। इस भौतिक जगत से अध्यात्मिक जगत में पहुंच जाना सच्चे साधक के लिए बहुत सहज है। उस पर परमात्मा की बराबर दया बनी रहती है और उसी के सहारे बिना किसी अभ्यास के इस स्थूल जगत के बंधनों को छिन्न-भिन्न कर वह उस जगत में पहुंच जाता है। विभिन्न उपायों से साधक इस शक्ति को प्राप्त करता है, क्रमशः वह अग्रसर होता है और उसके सामने के पर्दे धीरे-धीरे हटते जाते हैं और वह परमात्मा की विभूतियों के दर्शन कर पाता है। साधक का लक्ष्य इससे भी आगे बढ़ने का होता है। वह उस अवस्था को प्राप्त करना चाहता है, जिसमें वह परमात्मा के साथ “एकैक” हो सके। यह एक ऐसी कैफ़ियत है जिसका बयान शब्दों के द्वारा संभव नहीं है। अतएव आत्मा के रहस्यों को जानना और उस पर नियंत्रण करना सूफ़ी साधना का महत्वपूर्ण अंग है।

वहदतुश्-शुहूद

वहदतुश्-शुहूद का मतलब है कि देखी जाने वाली चीज़ का एक होना यानी वाह्याकृति/अविर्भाव का एकत्व। हालाकि ईश्वर और उसकी कृति (मनुष्य) पृथक हैं फिर भी कभी-कभी वे सदृश्य लगते हैं। यह एक रहस्यवादी विवेचना है कि यह स्थिति एक ईश्वर से सम्मिलन की स्थिति है। समस्त वास्तविकता एक है, अर्थात्‌ हमें पृथ्वी पर जो भी दिखाई देता है वह एक सत्ता का विकास है। सभी वस्तुओं का उद्गम एक है और उसी तत्व में उनका लौटना भी निश्चित है।

सूफ़ियों के अनुसार ईश्वर एक व्यापक शक्ति है और यह शक्ति सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त है। बाक़ी धर्म के आधार पर भेद-भाव व्यर्थ है। प्रेम ही ईश्वर का सच्चा रूप है। हज़रत शेख़ करीमे जीली रह. ने वहदतुश्‌-शुहूद का प्रतिपादन करते हुए कहा कि परमात्मा का स्वरूप इतना महान है कि इसके सामने सृष्टि के अन्य पदार्थ नहीं के बराबर हैं। वह स्वरूप ही दृश्यमान है और गुण बराबर अव्यक्त रहता है, जैसे उपकारी में छिपे हुए अपकार नाम के गुण को कोई देख नहीं सकता और उपकारी ही प्रकट रहता है। उनके अनुसार परमार्थ और अपरमार्थ दो सत्ता है – एक परमात्मा की सत्ता है, दूसरा जीव की, परन्तु जीव की सत्ता शून्य जैसी है, उसे अपने अस्तित्व के लिए परमार्थ सत्ता की अपेक्षा है। जब गुण अभिव्यक्त होते हैं, तब उनको नाम दिए जाते हैं, अतएव ये मात्र दर्पण के सदृश हैं जो परम सत्ता के सभी रहस्यों को प्रकट करते हैं।

अगर वहदतुल वुजूद के अनुसार साधक ईश्वर के अस्तित्व के अलावा सृष्टि की अन्य रचनाओं को नास्ति सदृश समझता है तो वहदतुशुहूद के अनुसार साधक ईश्वर के अलावा किसी और वस्तु का अवलोकन ही नहीं कर पाता। इस प्रकार सूफ़ियों ने बताया कि ईश्वर ही एक मात्र सत्ता है जो भक्ति और उपासना का अधिकारी है। चूंकि सृष्टि की एक-एक वस्तु उसकी उपासना में लगी हुई है, उसकी प्रसन्नता ही सबकी मंजिल है, इसलिए मनुष्य का दिल उसी में रमना चाहिए, मनुष्य का हृदय उसी में अटका रहना चाहिए। ईश्वर ही है जो प्रेम का पात्र है, ईश्वर ही इसका अधिकारी है।

सूफ़ी, मज़हबी दस्तूर को भी अपनी व्यापक मानवीय दृष्टि के साथ ही स्वीकारते हैं। वे विधि मार्ग विरोधी न थे। क़ुरआन के साथ साथ उन्हें वेद वचन में भी सार नज़र आया:

राघव पूज जाखिनी, दुइज देखाएसि सांझ।

वेदपंथ जे नहिं चलहिं, ते भुलहि बन मांझ।

झूठ बोल थिर रहै न रांचा। पंडित सोइ वेदमत सांचा।

 

मनुष्य के विभाग

सूफ़ियों ने मनुष्य के चार विभाग स्वीकार किए हैं :

1. नफ़्स

2. रूह

3. क़ल्ब

4. अक्ल

नफ़्स यानी विषयभोग वृत्ति या इंद्रिय या जड़ तत्व। मनुष्य के शरीर में समाहित यह तत्व उसका जड़ अंश बनाते हैं। अतः साधक का प्रथम लक्ष्य नफ़्स के साथ युद्ध होना चाहिए। रूह यानी आत्मा और क़ल्ब यानी हृदय द्वारा ही साधक अपनी साधना करता है। अक्ल या बुद्धि मनुष्य का चौथा विभाग है।

नफ़्स या जड़ आत्मा उसे कार्य में बाधा पहुंचाता है और उसे पाप की ओर ले जाने की चेष्टा करता है। किन्तु रूह या अजड़ आत्मा की ईश्वरीय शक्ति उसके कल्ब या हृदय के स्वच्छ दर्पण में परमेश्वर को प्रतिबिम्बित कर देती है और उसका अपने प्रियतम के साथ मिलन हो जाता है।

1. नफ़्स ए अम्मारा - यह इंसान को बुराई की प्रेरणा देता है।
2. नफ़्स ए लव्वामा - यह इंसान को बुराई करने पर कचोटता है।
3. नफ़्स ए मुतमइन्ना - साधना के बाद जब इंसान का नफ़्स मुतमइन हो जाता है। तब वह अपने रब के हरेक हुक्म पर मुतमइन हो जाता है। अपने नफ़्स को इस कैफ़ियत में लाने के लिए ही सूफ़ी लोग साधना करते हैं। रूहानी तरक्क़ी को वे अपने नफ़्स की कैफ़ियत से ही परखते हैं।

नफ़्स ए अम्मारा इंसान की साधना में बाधा पहुंचाता है और उसे पाप की ओर ले जाने की चेष्टा करता है। किन्तु रूह या आत्मा की ईश्वरीय शक्ति उसके कल्ब और हृदय के स्वच्छ दर्पण में परमेश्वर को प्रतिबिम्बित कर देती है और उसका अपने प्रियतम के साथ मिलन हो जाता है।

सूफ़ी के अनुसार जगत

सूफ़ी चार जगत मानते हैं :

1. आलमे नासूत – भौतिक जगत

2. आलमे मलकूत – चित्त जगत या आत्म जगत

3. आलमे जबरूत – आनंदमय जगत जिसमें सुख-दुख आदि द्वन्द्व नहीं है।

4. आलमे लाहत – सत्य या ब्रह्म।

कल्ब (हृदय) और रूह (आत्मा) रूपात्मक जगत के बीच का एक साधन रूप पदार्थ है।

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अभी जारी है ....

शनिवार, 18 फरवरी 2012

दक्षिण अफ़्रीका के लिए प्रस्थान

गांधी और गांधीवाद- 99

दक्षिण अफ़्रीका के लिए प्रस्थान

clip_image001थोड़े दिनों में ही गांधी जी ने काफ़ी अच्छी वकालत जमा ली। यह सब देखकर गोखले जी बहुत ख़ुश हुए। उस समय प्रतिभाशाली और निष्ठावान देशसेवकों की बड़ी कमी थी। गांधी जी जैसे सुयोग्य, उत्साही और लगनशील कार्यकर्ता को पाकर कौन ख़ुश न होता। लेकिन गांधी जी और गोखले जी की सारी योजनाएं धरी रह गईं।

अभी थोड़ी स्थिरता हुई थी, बम्बई में उनका वकालत का काम जम चुका था। पेशे से उनको संतोष का अनुभव होना शुरू हुआ था। लेकिन नियति में कुछ और ही होना लिखा था। दक्षिण अफ़्रीका के संकट से घिरे प्रवासी भारतीयों को उनकी ज़रूरत थी। वकालत शुरू किए हुए पांच महीने भी पूरे नहीं हुए होंगे कि नवम्बर 1902 ई. में एक दिन जब गांधी जी दफ़्तर में बैठे हुए तो उनको दक्षिण अफ्रीका से बुलाहट का एक तार मिला। “जोसेफ़ चेम्बरलेन इंगलैण्ड से दक्षिण अफ़्रीका आ रहे हैं, आपको तत्काल यहां आना चाहिए।”

“बोअर रिपब्लिक” पर अंग्रेज़ों का क़ब्ज़ा हो गया था। भारतीयों को लग रहा था कि उस परिवर्तन से उनकी सामाजिक स्थिति कुछ ऊंची हो जाएगी, लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। उल्टे उनकी हालत और ख़राब हो गई। नई ब्रिटिश पार्लियामेंट में बेहद कड़े भारत विरोधी बिल आने वाले थे। अभी तक के “अफ़्रीकानेर” के दोस्ताना व्यवहार की जगह ब्रिटिश क़ायदे-क़ानूनों ने ले ली। इसकी वजह से ट्रांसवाल में भारतीयों का घुसना भी मुश्किल हो गया। जो भारतीय युद्ध के दिनों में अपना घर धन्धा छोड़कर बाहर चले गए थे उनके साथ भी ग़ैर-क़ानूनी प्रवासियों की तरह व्यवहार किया जा रहा था।

डरबन से आते समय उन्होंने दक्षिण अफ़्रीका के प्रवासी भारतीयों को वचन दिया था, वहां के लोगों को एक साल के भीतर जब भी उनकी ज़रूरत होगी, वे चले आएंगे। वहां के लोगों ने उनसे वादानुसार वापस दक्षिण अफ़्रीका आने का अनुनय किया था। अब कोई चारा न था। जोसेफ चैम्बरलेन, उपनिवेश सचिव, लंदन से नटाल एवं ट्रांसवाल के दौरे पर आ रहे थे। वहां के प्रवासी भारतीय उन्हें अपनी नई-पुरानी शिकायतें सुनाना चाहते थे। नटाल कांग्रेस चाहती थी कि उनका केस गांधीजी प्रस्तुत करें। इसीलिए गांधी जी को तत्काल बुलाया गया था। गांधीजी ने अपना वादा रखा। गांधी जी को अपने वचन याद थे। उन्होंने तार दिया, “मेरा ख़र्च भेजिए, मैं आने को तैयार हूं।”

तुरत रुपए भी भेज दिए गए। गांधी जी ने अपना दफ़्तर समेटना शुरू कर दिया। 14 नवम्बर को उन्होंने गोखले जी को 20 नवम्बर को दक्षिण अफ़्रीका जाने की सूचना दी। गोखले जी को इस निर्णय से निराशा हुई, लेकिन वे दक्षिण अफ़्रीका की समस्या से अवगत थे। फिरोजशाह मेहता ने कहा, “तुम दक्षिण अफ़्रीका मत जाओ। वहां तुम कोई खास काम नहीं कर पाओगे।” बड़े भाई लक्ष्मीदास गांधी की चिंता गांधी जी को रहती थी ही। उनकी उम्र भी काफ़ी हो गई थी। सारे घर को वे ही संभाल कर रखे हुए थे। किंतु उनको गांधी जी के जाने से विशेष कष्ट नहीं था। जब तक उनके ऐश-आराम की व्यवस्था मोहन कर रहे थे, तब तक वे तटस्थ थे।

पत्नी से ऐसे मामलों में मशविरा करने की प्रथा उन दिनों नहीं थी। कस्तूरबाई को तो लगा मानों तूफ़ान ने उनका बना बनाया आशियाना उजाड़ दिया हो। पर वे कुछ बोल न सकीं। मन ही मन सारे दुख पी गईं। गांधी जी ने सोचा चार-छह महीनों में काम पूरा कर लौट आएंगे। इसलिए उन्होंने सांताक्रूज के बंगले को रहने दिया और बाल-बच्चों को वहीं रखना उचित समझा। हां उन्होंने चैम्बर ज़रूर छोड़ दिया। घर की देखरेख बाइस वर्षीय छगनलाल गांधी (खुशालचंद गांधी के पुत्र) और उनकी पत्नी काशी के हाथों सौंपी गई। यह वही छगनलाल था, जिसने ग्रीन पम्फलेट बनाने में गांधी जी की मदद की थी।

तैंतीस वर्षीय गांधी जी 20 नवम्बर 1902 को तीसरी बार दक्षिण अफ़्रीका के लिए प्रस्थान किए। अपने साथ चार-पांच नौजवानों को भी लेते गए। यह गांधी परिवार की पुरानी परिपाटी थी। कबा गांधी भी कुटुंब-मोहल्ले के लड़कों को नौकरियां दिलवाते रहते थे। गांधी जी ने भी रिश्तेदारों को आत्मनिर्भर बनने में सहायता करने की बात सोची। उस समय गांधी जी यह मानते थे कि जो नौजवान कोई काम-धाम न करता हो, और साहसी हो, उसे कमाने के लिए परदेश चला जाना चाहिए। गांधी जी चाहते थे कि उनके मुहल्ले के लड़के काम पर लगें। आत्मनिर्भर हों। नई दुनिया देखें। इस बार उनके साथ एक चचेरा भाई मगनलाल गांधी, छगनलाल का छोटा भाई, भी था, जो अब गांधी जी के शुरु होने वाले महान संघर्ष में काफी उपयोगी सिद्ध होने वाला था।

कस्तूर, हरिलाल, मणिदास, रामदास, देवदास, सबके चेहरे पर उदासी छाई हुई थी। पहली बार गांधी जी को बाल-बच्चों के वियोग का अहसास हो रहा था, बच्चों और पत्नी की ममता ने उन्हें घेरा। बसाये हुए घर को तोड़ना, निश्चित स्थिति से अनिश्चित स्थिति में प्रवेश करना – यह सब गांधी जी को अखरा तो ज़रूर, पर उन्हें तो इसकी आदत पड़ चुकी थी। उन्होंने सोचा जो विधाता करता है, सही ही करता है। लिखते हैं, “इस संसार में, जहां ईश्वर अर्थात्‌ सत्य के सिवा कुछ भी निश्चित नहीं है, निश्चितता का विचार करना ही दोषमय प्रतीत होता है। यह सब जो हमारे आसपास दीखता है और होता है, सो अनिश्चित है, क्षणिक है।”

1893 में गांधी जी एक साल के लिए दक्षिण अफ़्रीका आए थे और आठ बरस रहकर गए, 1902 में वे छह महीने के लिए आए और लौटकर जाने में बारह बरस लग गए! गांधी जी आत्मकथा में लिखते हैं, “ईश्वर ने अपने लिए बनाई हुई मेरी किसी योजना को कभी टिकने नहीं दिया है। निर्णय सदा हरि के हाथ रहा है।”

***

बृहस्पतिवार, 16 फरवरी 2012

बड़ सुख सार पाओल......... गंगा की गोद में !

बड़ सुख सार पाओल .... गंगा की गोद में !

बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे ! बात तब की है जब मैं कुंभ के अवसर पर हरिद्वार गंगास्नान करने गया था।

हम भी कुंभ नहा आए! हरिद्वार के हर की पौड़ी में डुबकी लगाना जीवन का सबसे अहम अनुभव था। आप इसे मेरी धर्मांधता कहें या अस्था का पगलपन - पर हरिद्वार में गंगा तटपर उमड़ी लाखों की भीड़ आपके सभी तर्कों को खोखला साबित कर देगी।

जब मैं गंगा के निर्मल जल में डुबकी लगा रहा था तो मेरे मन में मैथिल कवि विद्यापतिकी पन्क्तियां अनवरत गूंज रही थी ...

बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे !

छारैते निकट नयनन बह नीरे !!

एक अपराध छेमब मोर जानी !

परसल माय पाय तुअ पानी !!

कि करब जप-तप-जोग-ध्याने !

जनम कृतारथ एकही स्नाने !!

कर जोरि विनमओ विमल तरंगे !

पुनि दर्शन कब पुनमति गंगे !!

बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे !

छारैते निकट नयनन बह नीरे !!

हमारे प्राचीन ग्रंथों में कुंभ स्नान का महत्व का विस्तार से वर्णन किया गया है। भागवत के अनुसार अमृत दुर्वासा मुनि के शाप के कारण समुद्र के बीच मे घड़े मे़ सुरक्षित रह्ते हुए समा गया था। स्कंद पुराण के अनुसार एक बार रक्षसों और देवताओं में युद्ध छिड़ा। इस युद्ध में असुर पक्ष की विजय हुई। सारे देवता गण भगवान विष्णु के पास पहुंचे। उन्होंने भगवान विष्णु से अपने छीने हुए राज्य के वापसी की प्रर्थना की। विष्णु भगवान ने देवताओं को समुद्र मंथन की सलाह दी। उनकी सलाह पर अमल हुआ। समुन्द्र मंथन हुआ। इस मंथन में मंदराचल पर्वत मथानी के रूप में तथा नागराजा वासुकि रस्सी के रूप में प्रयुक्त किए गए। उसी घड़े को हाथ मे़ लिए समुद्र मंथन के समय धन्वन्तरि (विष्णु) प्रकट हुए थे।

मंथन से अमृत कलश निकला। उस अमृत कलश को पाने के लिए छीना-झपटी शुरु हुई। इन्द्र के पुत्र जयंत इस अमृत कुंभ को लेकर भागे। भागते वक़्त उनके कलश से अमृत चार स्थानों पर छलक कर गिरा। ये स्थान हैं हरिद्वार, नासिक, उज्जैन और प्रयाग। इसी कारण से कुंभ पर्व मनाया जाता है।

कुंभ के अवसर पर हरिद्वार शहर आध्यात्मिक गुरुओं, साधु-संतों की भीड़, होर्डिंग्स, पोस्टर, बैनर आदि से अटा पड़ा रहता है। प्रवचन, व्याख्यान की होड़ रहती है। और हो भी क्यों नहीं! वर्षों से चली आ रही इस परंपरा (कुंभ) में मान्यता है कि तैंतिस करोड़ देवी-देवता और अट्ठासी लाख ऋषि मुनि उपस्थित होते हैं। पुण्य नक्षत्र की घड़ी में वे पावन गंगा में डुबकी लगाते हैं। अब ऐसे माहौल में कोई डुबकी लगाए तो उसके पापों का क्षय भी तो होगा ही।

हरिद्वार में गंगा की कलकल ध्वनि के साथ जुटी भीड़ के कोलाहल से अद्भुत समां बंधता है। कुछ लोग पर्यावरण और प्रदूषण को लेकर चिंतित नज़र आते हैं। कुंभ सेवा समिति भी है। इस बात की उद्घोषणा निरंतर होती रहती है कि आप प्लस्टिक के सामान लेकर गंगा तटपर न जाएं। साबुन-तेल आदि से स्नान न करें।

और वह भी उपाय भी है जिसके द्वारा प्लास्टिक को छान कर अलग कर लिया जाता है जिससे गंगा के प्रदूषण कम हो सके। उसकी तस्वीर भी उठा लाया।

गंगा के तट पर शाम को होने वाली आरती अद्भुत और रोमांचक है। एक साथ बजते घंटे और घड़ियाल और मनोरम दृश्य देख-सुन कर हम तो धन्य हो गए।

गंगा के तट पर पूजा-पाठ, हवन, पिंडदान, दीपदान, आदि हमारे आस्था और परंपरा के प्रतीक हैं। इन्हें कर्मकांड कहकर हम अपनी आधुनिकता की विद्वता का परिचय तो दे सकते हैं पर क्या आपको लगता नहीं कि हम पश्‍चिम के अंधानुकरण में बहुत कुछ खोते जा रहे हैं--और इसके एवज़ में पाया क्या है?

मंगलवार, 14 फरवरी 2012

मुम्बई में वकालत

गांधी और गांधीवाद- 98

मुम्बई में वकालतgandhi (10)

clip_image001 गांधी जी आसानी से हार मानने वालों में से नहीं थे। बाधा और संकट की घड़ी में वे दुगने उत्साह से काम करने में जुट जाते थे। गिरगांव वाला मकान काफ़ी सीलन भरा था। पर्याप्त उजाला भी नहीं था, धूप बिलकुल नहीं आती थी। इस वातावरण में रहना बड़ा कठिन था। बच्चे की तबियत इसी अस्वस्थकर वातावरण के कारण बिगड़ी थी। मणिलाल के ठीक होने के बाद गांधी जी ने इस मकान को छोड़ने का निर्णय लिया।

मकान की खोज में रोज़ चक्कर लगाने लगे। वे चाहते थे बांद्रा या सांताक्रूज में मकान मिल जाए। बांद्रा में जो मकान मिल रहा था वह एक कसाईख़ाने के बगल में था। घर जाते-निकलते वक़्त टंगे बकरों पर नज़र पड़ती। हिंसा के इस प्रदर्शन को वे देख नहीं सकते थे। समुद्र से दूर रहना उन्हें पसंद नहीं था। आखिर प्राणजीवन मेहता के भाई रेवशंकर जगजीवन की मदद से सांताक्रूज़ में समुद्र के पास बड़ा-सा बंगला किराए पर लिया गया। यह एक अच्छा मकान था। भरपूर हवा-पानी इस घर में आता था। तुरंत सपरिवार इस बंगले में आ गए।

यहीं से रोज़ लोकल ट्रेन से हाईकोर्ट जाने लगे। सांताक्रूज से चर्चगेट जाने के लिए फ़र्स्ट क्लास की टिकट ली। इसमें भीड़ कम होती थी। क़ानून की किताब उनके पास तो पहले से थी ही, फिर भी वे विधि पुस्तकालय के सदस्य बने। वे रोज़ लाइब्रेरी में बैठते और क़ानून की किताबों का अध्ययन करते। जब अपना कोई केस नहीं होता तो अन्य वकीलों की बहस सुनते। वकालत भी अपेक्षा से अधिक बढ़िया चल निकली थी। उनके चचेरे भाई का लड़का, जिसे वे बेटे की तरह मानते थे, छगनलाल उनके साथ आकर रहने लगा। उससे गांधी जी को काफ़ी मदद मिल जाती थी। उन्हें और परिवार के सदस्यों को लगने लगा कि अब कुछ शांत और व्यवस्थित जीवनयापन होगा। हर रविवार को स्वादिष्ट व्यंजन बनते और सारे लोग मिलजुल कर उस सुस्वादु भोजन का आनंद लेते।

एक दिन वे सर फीरोजशाह मेहता का आशीर्वाद लेने गए। उनसे उन्हें एक चेतावनी मिली। “तुम नेटाल से कमाए अपने पैसे यहां मत बर्बाद करो।” गांधी जी ने बिना हतोत्साहित हुए उनकी बातों को सकारात्मक ढंग से लिया। गांधी जी के दक्षिण अफ़्रीकी क्लायंटों ने अपने बम्बई के मुकदमे गांधी जी को लड़ने को कहा। यह उनकी रोज़ी-रोटी के लिए पर्याप्त था। इसबीच वे उच्च न्यायालय में भी अपने कदम जमाने का प्रयास कर रहे थे। कमाई चल निकली थी। घर-परिवार का खर्च आराम से चल रहा था। उन्होंने परिवार-बच्चों के भविष्य की सुरक्षा के लिए दस हजार रुपए का एक जीवन बीमा भी करवाया।

गोखले जी से उनका सम्पर्क बना हुआ था। गोखले जी गांधी जी के मुम्बई आ जाने से काफ़ी ख़ुश थे। वे उनके चैम्बर में भी आ जाया करते थे। उस समय के देश के शीर्ष लोगों में शुमार गोखले जी का उनके चैम्बर में आना गांधी जी के लिए बहुत ही गर्व की बात थी। गोखले जी खास लोगों से भी गांधी जी का परिचय कराया करते थे। समय-समय पर देश की राजनीति और विभिन्न समस्याओं से भी गांधी जी को अवगत कराते रहते थे।

गांधी जी को भारतीय रजनीति में लाने का यह उनका अपना तरीक़ा था।

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संदर्भ और पुराने अंकों के लिंक

रविवार, 12 फरवरी 2012

सूफ़ी दर्शन-1

सूफ़ियों ने विश्व-प्रेम का पाठ पढ़ाया अंक-6

सूफ़ी दर्शन-1

अंक-1 : सूफ़ी शब्द का अर्थ अंक-2 सूफ़ीमत का उदय अंक-3 : सूफ़ीमत की प्रारंभिक अवस्था अंक-4. सूफ़ीमत का विकास-1 अंक-5 सूफ़ीमत का विकास-2

सूफ़ीमत की आधारशिला दो चीज़ों पर रखी हैं – 1. ईश-प्रेम और 2. परमात्मा का सानिध्य।

तसव्वुफ़ सदाचरण का नाम है। एक स्रष्टा के प्रति सदाचरण, दूसरा सृष्टि के प्रति सदाचरण। स्रष्टा के प्रति सदाचरण का अर्थ यह है कि बन्दा (दास, भक्त) उसके फैसले पर राज़ी हो, उसके किसी फैसले पर उसे कोई शिकायत पैदा न हो, उसके हर निर्णय पर वह पूरी तरह समर्पित हो। सृष्टि के प्रति सदाचरण यह है कि जीवों के प्रति उसका जो कर्तव्य बनता है, उन्हें स्रष्टा की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए निभाए। इस कार्य में कोई और स्वार्थ उसके सामने न हो।

ईश्वर बेमिस्लो-बेकैफ़ है अर्थात न तो कोई उसके जैसा है और न ही उसकी कैफ़ियत का बयान करना ही संभव है। ईश्वर सूक्ष्म है और हर जगह वह मौजूद है। उसके इन्हीं गुणों की तरफ़ ध्यान दिलाने के लिए सूफ़ियों ने उसे नूर कहा है। सृष्टि उसकी सिफ़ात का अक्स है अर्थात उसके गुणों का प्रतिबिंब है, क़ुरआन के इस बयान को सूफ़ियों ने अपनी साधनाओं के माध्यम से भी सत्य अनुभव किया। ईश्वर की ओर रूहानी क़दम बढ़ाते हुए जब वे अपने वुजूद के मूल पर पहुंचे तो उन्होंने इस हक़ीक़त का मुशाहिदा (दर्शन) स्वयं किया। इस मुशाहिदे का बयान सूफ़ियों ने दो तरह किया है.

एक अंदाज़े बयान वहदतुल वुजूद का नज़रिया (अद्वैतवाद) कहलाता है जबकि दूसरा वहदतुश्-शुहूद का नज़रिया (नज़र में केवल एक का होना) कहलाता है। एक का ताल्लुक़ शैख़ इब्ने अरबी से है और दूसरे का ताल्लुक़ शैख़ अहमद सरहिंदी से है। वहदतुल वुजूद का नज़रिया हो या वहदतुश्-शुहुद का नज़रिया, दरअसल यह है एक ही बात बस इसे कहने के लिए अलग अलग उपमाएं ली गई हैं। वहदतुल वुजूद का शाब्दिक अर्थ है वुजूद का एक होना और वहदतुश्-शुहूद का मतलब है कि देखी जाने वाली चीज़ का एक होना। यह एक गहन अनुभूति है जिसे समझने के लिए सूफ़ी लोग शब्दों के बजाय साधना का मार्ग ही पकड़ते हैं और कामिल वली होने के लिए यह बुनियादी सिफ़त है। सूफ़ी साधनाओं का केंद्र बिंदु इसी गुण और इसी भाव की प्राप्ति है।

वहदत-उल-वुजूद

सूफ़ियों का मक़सद क़ुरआन से ज़रा सा भी हटा हुआ नहीं है। क़ादिरी सिलसिले के संस्थापक ग़ौसे पाक शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी रहमतुल्लाह अलैहि ने फ़रमाया है कि इन साधनाओं का मक़सद केवल यह है कि जो कुछ ख़बर है वह मुशाहिदे (दर्शन) में बदल जाए ताकि यक़ीन का आला दर्जा हासिल हो जाए क्योंकि अपने देखे हुए का विश्वास कभी जाता नहीं है। वहदतुल वुजूद के क़ायल सूफ़ियों के कलाम को भी इसी प्रकाश में समझा जाता तो कभी यह भ्रम न होता कि वे ख़ुद को ईश्वर का अंश कह रहे हैं। जहां जहां उन्होंने ऐसा कहा है वहां वहां ईश्वर के गुणों के प्रतिबिंबित होने का ही तात्पर्य है। जो लोग उनकी अनुभूतियों से नहीं गुज़रे थे। उन्होंने जब उनके कलाम की व्याख्या की तो वे उनके रहस्यमय और अलंकारिक कलाम को न समझ सके और वे कुछ का कुछ समझ बैठे। वहदतुल वुजूद की अनुभूति के बावजूद शैख़ इब्ने अरबी रह. ज़िंदगी भर शरीअते इस्लाम के ठीक वैसे ही पाबंद रहे जैसे कि उस दौर के ग़ैर सूफ़ी आलिम पाबंद थे बल्कि वे उनसे भी बढ़कर पाबंद थे। उनके कलाम को उनके जीवन से जोड़कर ही समझना चाहिए।

वहदत-उल-वुजूद के प्रवर्तक हज़रत इब्न-उल-अरबी रह. के अनुसार वास्तविक सत्ता ‘एक’ है और वह परमात्मा है। अन्य सभी पदार्थ उसकी अभिव्यक्ति मात्र हैं और छाया वास्तविक की मात्र अभिव्यक्ति है। एक तरह से यह भारत का एकेश्वरवाद ही है। हज़रत इब्न-उल-अरबी रह. का कहना था कि ईश्वर सर्वव्यापी है। सबमें उसी की झलक है। उससे कुछ भी अलग नहीं है। सभी मनुष्य समान हैं। परमात्मा यानी ईश्वर एवं जीवात्मा दोनों एक हैं। सम्पूर्ण सृष्टि का उद्गम एक ही है और वह उसी की ओर पलटने वाली है। क़ुरआन के आयत में भी उद्धृत है “हम सब अल्लाह के ही हैं और हमें उसी की ओर पलटना है” (इन्ना लिल्लहि व इन्ना इलैहि सजिऊन, क़ुरआन, अल-बक़र)।”

सूफ़ीमत पर भारतीय अध्यात्मवाद का प्रभाव

भिन्न-भिन्न देशों में विकसित होता हुआ सूफ़ीमत भारत में प्रवेश करता है। सूफ़ीमत पर भारतीय विचारधाराओं की गहरी छाप पायी जाती है। सूफ़ियों ने अपने भीतर परमात्मा के प्रति प्रेम की पीड़ा जगाई, उसमें भारतीय दर्शन या भारतीय अध्यात्म-चिंतन भी सम्मिलित था। सूफ़ियों ने भारतीय दर्शन – अद्वैतवाद, शुद्धाद्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद आदि के मूल तत्व, शांतिपूर्ण एवं अहिंसामय वैष्णव धर्म और प्रेम को पूरे आदर के साथ ग्रहण किया। उनकी विचारधारा अद्वैतवाद और विशिष्टाद्वैतवादके काफ़ी निकट है। क़ुरआन में “साबई” का उल्लेख मिलता है, जो एकेश्वरवाद को मानने वाले थे और जीवन में पवित्रता पर अधिक बल देते थे। ये लोग आर्यवंश के बतलाए जाते थे, जो प्राचीन ईरान और भारतवर्ष में मंद (मीडियन) जाति के नाम से प्रसिद्ध थे। क़ुरआन में हनीफ़ और शेबी वर्ग की चर्चा की गई है। संभव है कि हनीफ़ भारत के “पणि” और शेबी (साबी) शैव रहे हों और बाद में इस्लाम स्वीकार कर लिया हो।

तैत्तिरियोपनिषद मृणुवल्ली का का प्रथम अंश देखें : “यता वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति, यत्प्रयन्त्य संविशन्ति। तद्वि जिज्ञास्व, तदब्रह्मेति”। अर्थात्‌ ये सब प्रत्यक्ष दिखने वाले प्रणी जिससे उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जिसके सहारे जीवित रहते हैं तथा प्रयाण करते हुए जिसमें प्रवेश करते हैं, उसके तत्व से जानने की इच्छा कर, वही ब्रह्म है।

एक और मंत्र देखें : “एष योनिः सर्वस्य प्रभ वाप्ययौ हि भूतानाम्‌”। अर्थात्‌ वही उद्गम स्थल है जिससे सब उत्पन्न होते हैं और उसी में सब लौट जाते हैं। वेदों में स्पष्ट रूप से घोषणा की गई है – “एको ब्रह्म द्वितीया नास्ति” – ईश्वर एक है, उसकी सत्ता में कोई दूसरा सम्मिलित नहीं है। “न तस्य प्रतिमा अस्ति” – उसका कोई रूप या आकार नहीं है।

क़ुरआन में प्रभु के लिए “अल्लाह” शब्द का प्रयोग हुआ है। क़ुरआन के हिन्दी अनुवादक मुहम्मद फ़ारूक़ ख़ां के अनुसार अल्लाह शब्द वास्तव में ‘‘अल्‌-इलाह” था, जो साधारण परिवर्तन के बाद “अल्लाह” हो गया। अल्‌-इलाह (अल्लाह) में ‘अल्‌’ शब्द उसी प्रकार प्रयुक्त हुआ है जैसे अंग्रेज़ी में किसी शब्द से पहले ‘दि’ लगाकर उसे जातिवाचक से व्यक्तिवाचक बना देते हैं। इस प्रकार ‘अल-इलाह’ य ‘अल्लाह’ से अभिप्रेत एक विशिष्ट सत्ता ही हो सकती है। इसलिए अल्लाह के अर्थ हुआ एक प्रमुख और विशिष्टइलाह (पूज्य)। ऋग्वेद में ईश्वर के लिए “इल्य” शब्द का प्रयोग हुआ है, अर्थ है “स्तुतियोग्य”। यजुर्वेद में ईश्वर के “इला” शब्द का प्रयोग किया गया है, “नमस्ते इलाम्‌ अस्तु”। इसी तरह “नास्तिक” उन लोगों को कहा गया है जो वेदों में वर्णित सत्यों को मानने से इंकार करते हैं या वेदों की निन्दा करते हैं। उधर क़ुरआन में उन लोगों को “काफ़िर” कहा गया है, जो उन सच्चाइयों को मानने और स्वीकार करने से इन्कार करें जिनकी शिक्षा इस्लाम में दी गई है।

जीवात्मा और परमात्मा के मिलन से ही मोक्ष संभव है। यह मिलन परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण से प्राप्त होता है। मोक्ष प्राप्ति के मार्ग पर चलने के लिए पथ प्रदर्शक की आवश्यकता पड़ती है। पथ प्रदर्शक को उन्होंने पीर (शिक्षक) कहा। उनकी परंपरा में गुरु अथवा पीर को ईश्वर की प्राप्ति का माध्यम माना गया। अतः उन्होंने गुरु भक्ति पर बल दिया। उलमा को ये विचार रास नहीं आए। उनके अनुसार मनुष्य और ईश्वर दोनों अलग हैं। क़ुरआन ईश्वर के द्वारा दिया गया आदेश है एवं यह मनुष्य का फ़र्ज़ है कि वह ईश्वर के आदेश को माने। पर अधिकांश सूफ़ी-साधक जगत को ब्रह्म से अलग नहीं मानते –

जब चीन्हा तब और न कोई।

तन, मन, जिउ, जीवन सब सोई।

हौं हौं कहत धोख इतराही।

जब भा सिद्ध कहां परछाही।

(जायसी)

अभी जारी है ....

शुक्रवार, 10 फरवरी 2012

मणिलाल की बीमारी

गांधी और गांधीवाद- 97

मणिलाल की बीमारी

clip_image001DSCN1362गांधी जी सपरिवार बम्बई (मुम्बई) आ गए। बम्बई आते ही मुसीबत ने घेर लिया। उनका चैंबर फ़ोर्ट में था और घर गिरगांव में। जिस घर में वे रहते थे उसके कमरों में अंधेरा रहता था, हवा ठीक से न आ पाती थी और सीलन भी बहुत थी। कुछ ही दिनों बाद उनके दस वर्षीय दूसरे पुत्र मणिलाल को बुखार आने लगा। कुछ ही दिनों पहले हुए चेचक से अभी वह उबरा ही था। शरीर कमज़ोर था ही, उसपर से यह बुखार जो 104 -105 डिग्री तक पहुंच जाता और उतरने का नाम नहीं लेता था। बीमारी बढ़ती ही गई, गांधी जी और बा परेशान हो गए। ज्वर उतरता न था और ऐसे ही कई दिन बीत गए। ज्वर के बढ़ते ही रात को मणिलाल बड़बड़ाने लगता।

डॉक्टर को बुलाया गया। डॉक्टर ने बताया बुखार ने गंभीर रूप धारण कर लिया है, इसे टायफायड के साथ निमोनिया भी हो गया है। बच्चा एकदम कमज़ोर हो गया है। पारसी डॉक्टर कमज़ोर और रुग्ण मणिलाल को अंडे और मुर्गी का शोरबा देने की सलाह दे रहे थे जिससे उनकी प्रतिरोधक क्षमता बढ़े, अन्यथा टायफायड और निमोनिया को झेलना बहुत ही मुश्किल हो जाएगा। डॉक्टर का कहना था कि केवल दवा से काम नहीं चलेगा। इस तरह के आहार की बहुत ज़रूरत है।

शाकाहार, गांधी जी के लिए एक विश्वास था। वे इसके साथ समझौता करने को तैयार न थे। वे डॉक्टर से तर्क करने लगे, “ज़िन्दा रहने के लिए यह ज़रूरी नहीं कि मांसाहार किया ही जाए। डॉक्टर साहब हम शाकाहारी हैं। हम इसे न अंडा दे सकते हैं न ही मुर्गी का शोरबा। क्या आप इसकी जगह और कोई चीज़ नहीं बता सकते?”

डॉक्टर बोला, “आपके लड़के के प्राण संकट में हैं। दूध और पानी मिलाकर दिया जा सकता है, पर इससे उसे पूरा पोषण नहीं मिल सकेगा। दूध से कितनी ताक़त आएगी? फिर भी जैसा आप सोचें, निर्णय तो आपको ही लेना है, पर मैं सोचता हूं कि आप अपने लड़के पर ऐसी सख़्ती न करें, तो अच्छा होगा।”

धर्म और विश्वास की परीक्षा

गांधी जी बोले, “आप कहते हैं, सो ठीक है। आपको यही कहना भी चाहिए। पर मेरी जिम्मेदारी बहुत बड़ी है। लड़का बड़ा होता तो मैं अवश्य ही उसकी इच्छा जानने का प्रयत्न करता। यहां तो मुझे ही इस बालक के बारे में निर्णय करना है। यह मेरे धर्म और विश्वास की परीक्षा की घड़ी है। सही हो या ग़लत, मैंने यह माना है कि मनुष्य को मांस नहीं खाना चाहिए। इसलिए मुझे वह जोखिम उठानी ही होगी।”

उन्होंने कहा, “अब इसका इलाज मैं स्वयं करूंगा। मैं प्राकृतिक चिकित्सा का सहारा लूंगा।” उन्होंने डॉक्टर से कहा, “यदि आप बच्चे की नाड़ी गति, छाती और फेफड़े की समय-समय पर जांच करते रहें, तो बड़ी कृपा होगी।” डॉक्टर ने गांधी जी की बात मान ली। वह बीच-बीच में आता था, मणिलाल की चेकअप किया करता था।

गांधी जी ने मणिलाल को डॉक्टर के साथ हुई सारी बात बता दी। मणिलाल ने कहा, “ठीक है बापू। आप अपनी विधि से इलाज कीजिए। मैं अंडा और मुर्गी का शोरबा नहीं लूंगा।”

जल चिकित्सा

लुई कूने की पद्धति से गांधी जी ने जल चिकित्सा आरंभ कर दी। मणिलाल को उन्होंने कटिस्नान कराना शुरू किया। जहां तक आहार का सवाल था, उन्होंने फलों के जूस और पानी देना शुरु किया। शुरु में तो सुधार के कोई लक्षण न दिखे। बुखार उतरता न था। रात को वह अंट-संट बकता था। तापमान 104 डिग्री तक जाता था। गांधी जी घबरा गए। यदि मणिलाल गुजर गया तो दुनिया क्या कहेगी? कभी-कभी वे खुद से भी प्रश्न करते कि बच्चे की ज़िन्दगी से खिलवाड़ करने का उनका क्या अधिकार है? दूसरे डॉक्टर को क्यों न बुलाया जाए? बैद्य को क्यों न दिखाया जाए? मन में मन्थन चलता रहता। फिर भी उन्होंने सबकुछ ईश्वर के हाथों में सौंप कर मणिलाल का उसी तरह से इलाज ज़ारी रखा।

बा पूछीं, “मेरे बच्चे को कुछ होगा तो नहीं?”

गांधी जी ने कहा, “ईश्वर पर भरोसा रखो, सब ठीक हो जाएगा।”

एक समय तो ऐसा आया कि बालक मणिलाल की हालत बहुत ही नाज़ुक हो गई। गांधी जी मणिलाल को बगल में लेकर सोये थे। उन्होंने भिगोकर निचोड़ी हुई चादर में मणीलाल को लपेटने का निश्चय किया। वे उठे। चादर लेकर ठण्डे पानी में भिंगोया। निचोड़ा। बच्चे को सिर से पैर तक लपेट दिया। ऊपर से दो कम्बल ओढ़ा दिया। सर पर गीला तौलिया रख दिया। बुखार से शरीर तवे की तरह तप रहा था। पसीना आता ही न था।

ईश्वर ने लाज रखी

गांधी जी थक गए। अपने आंदोलित मन को शांत करने के लिए बच्चे को मां के जिम्मे कर आधे घंटे के लिए चौपाटी पर चले आए। धैर्यमूर्ति ममतामयी मां अपने बीमार बेटे के पास मौन बैठी रहीं। गांधी जी थोड़ी हवा खाकर ताज़ा हुए। कुछ शांति मिली। रात के क़रीब एक बज रहे थे। लोगों का आना-जाना कम हो गया था। वे विचारों में डूब गए। “हे भगवान! इस धर्म-संकट से तू मेरी लाज रख।” थोड़े चक्कर लगाकर वापस आए। घर में पैर रखते ही मणीलाल ने पुकारा, “बापू, आप आ गए?”

“हां, बेटे। मैं आ गया।”

“मुझे अब इससे निकालिए न। मैं जला जा रहा हूं।”

“क्यों, क्या पसीना छूट रहा है?”

“मैं पसीने से नहा गया हूं। अब मुझे निकालिए न, बापूजी!”

गांधी जी ने गौर से देखा, माथे पर पसीने की बूंदें दिखाई दीं। बुखार कम हो गया था। उन्हें धीरज आया। उन्होंने प्रभु को धन्यवाद दिया। चादर हटाकर बच्चे के शरीर को पोंछा और दोनों बाप बेटे सो गए। सुबह तक ज्वर सामान्य होता गया।

उन्होंने इस घटना को याद करते हुए लिखा है,

“मणिलाल का नीरोग होना राम की देन है, अथवा पानी के उपचार की, या अल्पाहार की और सार-संभाल की, इसका निर्णय कौन कर सकता है? सब अपनी-अपनी श्रद्धा के अनुसार जैसा चाहें, करें। मैंने तो यह जाना कि ईश्वर ने मेरी लाज रखी, और आज भी मैं यही मानता हूं।”

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सोमवार, 6 फरवरी 2012

अच्छे मौक़े का इल्म

कभी-कभी वक़्त हमसे बहुत आगे निकल जाता है और हम उसे तलाशते रह जाते हैं। वेलेंटाइन डे अपनी दस्तक देने लगा है। कुछ लोगों के लिए यह एक ख़ास दिन होता  है। सारे संसार में यह दिन एक विशेष अवसर के रूप में मनाया जाता है। बात तो कुछ ख़ास होगी ही इस दिन में।

इस अवसर पर एक कहानी सुनाने का मन कर रहा है। हमने किसी से सुनी थी। आपसे शेयर करता हूँ।

उस शहर की वह अगर सबसे नहीं तो एक बहुत ही ख़ूबसूरत लड़की तो थी ही। उसका सहपाठी बहुत ग़रीब था। पर दोनों में दोस्ती गहरी थी। सिर्फ़ दोस्ती! 14 फ़रवरी को उस लड़की का जन्म दिन पड़ता था। पिछले साल उसने अपना जन्म दिन उसी ग़रीब दोस्त के साथ मनाया था। एक ढाबे टाइप के रेस्तरां में कुछ मीठा खा कर। फिर वे पैदल अपने घर को लौट रहे थे। रास्ते में एक गहनों की दूकान के आगे लड़की के क़दम रुक गये। ग़रीब दोस्त ने पूछा, “क्या हुआ ?”

उस लड़की ने बताया, “जब भी मैं इस दूकान के आगे से गुज़रती हूँ तो मेरी नज़र बरबस उस गहने पर टिक जाती है।” उसने एक गहने की तरफ़ इशारा करते हुए कहा, “… और मैं सोचती हूँ मेरा वैलेंटाइन ... सच्चा प्रेमी .. किसी दिन आयेगा और उस गहने को मुझे पहनायेगा।”

दूसरे दिन वह ग़रीब लड़का उस दूकान पर गया और उस गहने की क़ीमत पता की। क़ीमत उसके बस के बाहर थी। शायद अपने को बेच भी देता तो उसे ख़रीद नहीं पाता!

आज .. एक साल बाद फिर से 14 फरवरी आ गई। वह ग़रीब लड़का हाथ में एक पैकेट लिये हुए घर से निकलता है। रास्ते में एक लाल गुलाब भी ख़रीदता है। और अपनी उस मित्र के घर पहुंचता है। उसकी दोस्त कहीं जाने के लिये तैयार दिखती है। पूछने पर बताती है, “मेरा एक ख़ास दोस्त आने वाला है। वह मुझे होटल ताज ले जा रहा है। मेरा स्पेशल जन्म दिन मनायेगा वह।”

ग़रीब लड़का वह पैकेट वहीं टेबुल पर रख देता है और “मेनी हैप्पी रिटर्न्स ऑफ द डे!’ बोल कर लाल गुलाब छुपाते हुए अपनी धुन में भारी मन से वहां से निकल आता है। उसे पता भी नहीं चलता कि जब वह निकल रहा था तो कोई भीतर घुस रहा था।

जो भीतर प्रवेश करता है वह शहर के सबसे धनी व्यक्ति का पुत्र है और ख़ुद एक होस्पिटल और ब्लड बैंक का मालिक है। वह अपना क़ीमती तोहफ़ा उस लड़की को प्रज़ेंट करता है। फिर पूछता है, “वह जो लड़का अभी-अभी यहां से गया है वह कौन था और क्यों आया था?”

लड़की बताती है, “मेरे साथ पढता है और मुझे बर्थ डे विश करने आया था और यह गिफ़्ट दे गया है।” उसने उस पैकेट की तरफ़ इशारा किया जो अभी खोला भी नहीं गया था।

धनी लड़का बोलता है, “ज़रा खोलो तो देखें इसमें क्या है?”

लड़की पैकेट खोलती है … तो उसे पिछले साल का वक़या याद आ जाता है। उसमें वही हार होता है!

उसके मुंह से निकलता है, “इतनी क़ीमती हार … ? वह कहां से लाया?”

इस पर धनी लड़का बोलता है, “मुझे मलूम है। वह पिछले एक साल से मेरे होस्पिटल में नाइट ड्यूटी कर रहा है... वार्ड की साफ़-सफ़ाई की ... और हर रविवार को अपना ख़ून भी बेचता रहा है। पर उसने पैसे कभी नहीं लिये। हमेशा बोलता था इसे अपने पास ही रखिये। एक ज़रूरी सामान ख़रीदना है। अभी कल ही उसने सारे पैसे लिये थे। लगता है इसी गिफ़्ट को ख़रीदने के लिये वह पैसे जमा कर रहा था।”

लड़की उस ग़रीब लड़के को खोजने बाहर निकलती है पर वह बहुत दूर जा चुका होता है।

***

सच है हमें तब तक किसी अच्छे मौक़े का इल्म नहीं होता जब तक वह हमारे हाथों से निकल नहीं जाता।

आप मत निकल जाने दीजिए।

शुक्रवार, 3 फरवरी 2012

मुम्बई में ऑफिस

गांधी और गांधीवाद- 96

मुम्बई में ऑफिस

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Gandhi_0014गांधी जी कस्तूरबा को राजकोट में छोड़कर कलकत्ते चले गए थे। इधर कस्तूरबा अकेले रह गई थीं। जब से भारत भूमि पर उनके क़दम पड़े थे, उनके लिए ख़ुशी और ग़म के मिले जुले भाव का अवसर था। राजकोट के घर में तो उत्सव का माहौल था। महिलाएं, संगी और रिश्तेदारों का तांता लगा हुआ था। कस्तूर परिवार की पहली महिला थीं जिसने विदेश की यात्रा की हो। बा भी अपने समुद्री यात्रा के किस्से सबको बड़े चाव से सुनाया करती थीं। बच्चे भी लोगों के बीच किसी हीरो से कम नहीं थे। इन सब उल्लास और उत्तेजनाओं के बीच कभी-कभी बा बहुत अकेली और उदास हो जाया करतीं। उनके जीवन में कई अपूरनीय क्षति हो चुकी थी। इन पांच वर्षों के विदेश प्रवास के दौरान उनके माता, पिता गोकुलदास और व्रजकुंवरबा कपाडिया का निधन हो चुका था। अपने सारे दुख उन्होंने दिल में दबा कर रख लिया था।

26 फरवरी को गांधी जी राजकोट पहुंचे। गोखले जी की इच्छा थी कि गांधी जी बम्बई में बस जाएं। वहां वे बैरिस्टर का धन्धा शुरु करें और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सार्वजनिक सेवा के काम में उनका हाथ बंटाएं। उन दिनों सार्वजनिक सेवा का मतलब था कांग्रेस की सेवा। गांधी जी की भी यही इछा थी। पर वे बम्बई में वकालत शुरु करने के लिए पर्याप्त आत्मविश्वास जुटा नहीं पा रहे थे। पिछले अनुभव अच्छे नहीं थे। ख़ुशामद तो वे कर नहीं सकते थे, फिर मिलेगा इसकी कोई गारण्टी नहीं थी। इसलिए 1902 में गांधी जी ने राजकोट में ही वकालत शुरु की। इसका एक फ़ायदा ही हुआ कि उन्हें कुछ दिन आराम करने का समय भी मिला जिसकी उन्हें सख़्त ज़रूरत थी। बर्मा में डॉ. मेहता ने कहा भी था कि उन्हें आराम की बहुत ही आवश्यकता है।

कुछ दिनों तक तो नाम मात्र के मामले उनके पास आए। उनके पुराने हितैषी केवलराम मावजी दवे ने तीन मुकदमे सौंपे। इनमें से दो तो अपीलें थीं, काठियावाड़ कोर्ट में। इसमें डर की कोई बात नहीं थी। तीसरा इब्तदाई मुकदमा जामनगर में था। यह महत्वपूर्ण मुकदमा था। गांधी जी जोखिम उठाना नहीं चाहते थे। केवलराम जी ने समझाया, “हारेंगे तो हम हारेंगे न। तुमसे जितना हो सके, तुम करो। मैं भी तो तुम्हारे साथ रहूंगा ही न।”

गांधी जी ने पूरी तैयारी की। दक्षिण अफ़्रीका का अनुभव भी साथ था। मुकदमें में उनकी जीत हुई। इस सफल मामले ने उनका आत्मविश्वास भी बढ़ाया। ऐसा उन्हें लगने लगा कि अब वे बम्बई (मुम्बई) जाकर वकालत कर सकते हैं। गोखले जी ने भी तो कहा था कि उन्हें बम्बई में सेटल करना चाहिए। वही वकालत भी करनी चाहिए। और सार्वजनिक काम को भी हाथ में लेना चाहिए। मन ही मन उन्होंने कई बार इस पर सोच-विचार किया। केवलराम दवे, उनके एक पुराने परिचित ने कहा कि बिना समय गंवाए उन्हें बम्बई चला ही जाना चाहिए। एक मात्र समस्या थी – वित्तीय। उसका भी हल मिल ही गया। दक्षिण अफ़्रीका एक एक बकाया आ गया था। 11 जुलाई 1902 को वे बम्बई चले आए। किराए पर हाई कोर्ट के निकट फ़ोर्ट एरिया के आग़ा ख़ा भवन में एक चैम्बर लिया और गिरगांव में रहने का मकान। अगस्त के पहले सप्ताह में कस्तूरबा और तीन बच्चे भी बम्बई आ गए। क्सतूरबा को फिर से एक नया घर बसाना पड़ा।

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बुधवार, 1 फरवरी 2012

सूफ़ीमत का विकास-2

सूफ़ियों ने विश्व-प्रेम का पाठ पढ़ाया अंक-5

सूफ़ीमत का विकास-2

अंक-1 : सूफ़ी शब्द का अर्थ अंक-2 सूफ़ीमत का उदय अंक-3 : सूफ़ीमत की प्रारंभिक अवस्था 4. सूफ़ीमत का विकास-1

इस्लाम में सूफ़ीमत का विकास किसी धर्म में होने वाले रहस्यवादी आंदोलन (Mystic Movement) की सफलता और लोकप्रियता का महत्त्वपूर्ण और दिलचस्प इतिहास है। धीरे-धीरे नक़्शब, तिर्मीज़, नीशापुर, बुस्ताम, बग़दाद और शीराज़ सूफ़ीमत के अन्य प्रमुख केन्द्र बने। जैसे-जैसे इस्लाम अरब की सीमाओं से बाहर निकलकर पर्शिया, ईराक़, सीरिया, मिस्र और विश्व के अन्य देशों में फैलता चला गया, वैसे-वैसे मुसलमानों की संख्या-वृद्धि के साथ-साथ ही उन लोगों की संख्या में भी वृद्धि होती गई, जो इस्लाम में पूर्ण आस्था के बावज़ूद अपनी आत्मा में मचलते हुए प्रभु-प्रेम के फलस्वरूप अपने अंतःचक्षु द्वारा प्रिय के दर्शन करने में लगे हुए थे।

एक मत के रूप में सूफ़ीमत नौवीं शताब्दी में उभरा। सूफ़ीमत इस्लामी विधान का उल्लंघन नहीं करता। यह दौर इस्लाम के अत्यधिक प्रभाव का दौर था। इस्लामी आदेशों का ज़रा-सा उल्लंघन भी उस समय के धर्म रक्षा के लिए प्रतिबद्ध शसकों को सह्य नहीं था। हज़रत ज़ुन्नून रहमतुल्लाह अलैह, नूरी रह., मंसूर रह. जैसे सूफ़ियों को ऐसे ही कुछ कारणों से दंडित होना पड़ा।

हज़रत ज़ुन्नून रहमतुल्लाह अलैह (796-829 ई.)

हज़रत ज़ुन्नून रहमतुल्लाह अलैह ने सूफ़ी साधना में अहवाल (रूहानी अनुभूति) और मक़ामात (रूहानी पद) के महत्व को स्थापित करके मारिफ़त (तत्वज्ञान) को एक सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने ही पहली बार साधक की प्रेम-पिपासा को शराब और प्याले के प्रतीक प्रदान किए। इस्लामी समाज उनकी इन रहस्यवादी व्याख्याओं को सहन नहीं कर सका। उन्हें 829 ई. में बन्दी बनाकर बग़दाद भेजा गया, जहां ख़लीफ़ा ने उन्हें मिस्र लौट जाने का आदेश दिया।

हज़रत अबुल क़ासिम जुन्नैद रहमतुल्लाह अलैह ने कहा कि फ़ना (मृत्यु) और बक़ा (जीवन) पर्यायावची शब्द हैं क्योंकि न फ़ना का अर्थ है शरीर का अवसान और न बक़ा का अर्थ श्वास का चलते रहना है।

प्रथम सूफ़ी साधक

हज़रत मंसूर हल्लाज रहमतुल्लाह अलैह (858-922 ई.) अपना एक विशिष्ट स्थान रखते हैं। उन्होंने सूफ़ी साधना पद्धति को, जीवन-यापन द्वारा, सिद्धांत रूप में प्रस्थापित किया। उन्होंने आत्मा और परमात्मा की अभिन्नता को साधना की आधारभूमि बताकर यह घोषित किया कि अपनी चरम सीमा पर पहुंचकर ईश-प्रेम साधक को ब्रह्मत्व प्रदान कर परमात्मास्वरूप बना देता है।

वे जब आध्यात्मिक पराकाष्ठा पर पहुंचे तो उन्हें लगा कि उनमें और ख़ुदा में कोई अन्तर नहीं है। बल्कि दोनों एक ही हैं। और अचानक उनके मुंह से निकल पड़ा, “अनलहक़” “मैं सत्य हूं”। यह उनकी रूहानी अनुभूति थी और उनकी ज़बान से ‘अनल हक़‘ बेअख्तियार निकलता था लेकिन इस हालत में भी वह बंदगी का हक़ अदा करने लिए पाबंदी से नमाज़ अदा करते थे। शैख़ जुन्नैद ने उन्हें अपनी कैफ़ियत पर क़ाबू पाने की नसीहत की लेकिन अपनी ज़बान से ‘अनल हक़‘ निकलने को वह क़ाबू न कर सके जिस कारण उन्हें अपने प्राण देने पड़े। ऐसी कैफ़ियत के सूफ़ी को सूफ़ियों के दरम्यान कमज़ोर दर्जे का सूफ़ी माना जाता है जो कि अपनी कैफ़ियत को जज़्ब न कर सके और लोगों के लिए फ़ित्ने का सबब बन जाए लेकिन दुनिया ने मंसूर को एक बहुत ऊंचे दर्जे का सूफ़ी क़रार दे दिया जबकि वह सूफ़ियों में निहायत आला मक़ाम रखने वाले शैख़ जुन्नैद रह. के मुरीद थे और अभी रास्ते में ही थे अर्थात उन्हें साधना के कुछ चरण और भी पूरे करने थे।

भारतीय दर्शन में ‘अनल हक़‘ के समानार्थी ‘अहं ब्रह्मस्मि‘ है। अद्वैत दर्शन को सूफ़ी मंसूर की पहचान माना जाता है लेकिन हक़ीक़त है यह कि राहे विलायत से गुज़रने वाले हरेक साधक को इस मक़ाम से गुज़रना पड़ता है।

यही वह उत्स है जहां से सूफ़ी आन्दोलन के कभी न ख़त्म होने वाले अनेक सिलसिले निकले। जब ये लोग सीरिया, मिश्र, फिलिस्तीन और यूनान पहुंचे तो इनका संपर्क ईसाई मतावलंबियों से हुआ। जिसके परिणामस्वरूप एक विवेचनात्मक शाखा फूटी। एक नई दृष्टि से क़ुरआन की व्याख्या करने का प्रयास यहीं से शुरु हुआ। जिसकी काफ़ी तीखी प्रतिक्रिया हुई। पर सूफ़ियों के लिए इस्लाम एक सागर था जिसमें विभिन्न विचारों की नदियां आकर मिलती हैं। विभिन्न पंथों की अच्छी अवधारणाओं को समाहित करने के प्रयास से सूफ़ी दर्शन पर अन्य दर्शनों का काफ़ी प्रभाव पड़ा।

इश्क़ (प्रेम) के सिद्धांत को अद्वैत की आधारभूमि प्रदान करते हुए हज़रत अबू बक्र शिबली रहमतुल्लाह अलैह ने कहा कि साधक अपने मन की समस्त इच्छाओं-आकांक्षाओं को ईश-प्रेम में स्थानान्तरित कर दे। उन्होंने जमकर ख़ुदा के इश्क़ से ख़ाली बाह्याचार की निन्दा की, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें पागलख़ाने में बंद कर दिया गया।

मध्यमार्ग

दसवीं और ग्यारहवीं शताब्दी मुस्लिम जगत में दार्शनिक, आध्यात्मिक और सूफ़ी चिंतन के लिए प्रसिद्ध है। दसवीं शताब्दी में सूफ़ियों की साधना पद्धति के दो सैद्धांतिक पक्ष स्थापित हो गए थे, जिन्हें सुक्र (होश) और सहव (इश्क़े ख़ुदा में होश खोना) कहा जाता था। सुक्र की कैफ़ियत में हज़रत बायज़ीद रह. और हज़रत मंसूर रह. का ज़िक्र आता है जबकि सहव में हज़रत मुसाहिबी रह. और हज़रत जुनैद रह. का नाम लिया जाता है। इस तरह तरीक़त की दोनों कैफ़ियतों को समझाने के लिए दो विशेषण वुजूद में आ चुके थे। जिससे फ़ायदा यह हुआ कि अब बाद के सूफ़ियों को हज़रत मंसूर रह. जैसी कठिनाईयों का सामना नहीं करना पड़ा।

हज़रत अबू हमीद अल ग़ज़ाली रहमतुल्लाह अलैह

ग्यारहवीं शताब्दी में हज़रत अबू हमीद अल ग़ज़ाली रहमतुल्लाह अलैह (1058-1111 ई.) ने सूफ़ीमत को मुस्लिम जगत में सम्माननीय स्थान प्राप्त कराया। उन्होंने सूफ़ियों के प्रति सद्भाव एवं सौहार्द्र उत्पन्न करने की दृष्टि से तथा सनातन-पंथी मुसलमानों के विरोध को शांत करने के उद्देश्य से शरीयत एवं तरीक़त के समन्वय का मार्ग निकाला। उन्होंने सूफ़ीमत की व्याख्या इस प्रकार से की, कि इसे इस्लामी दर्शन का अंग बना दिया। उन्होंने कहा कि शरीयत एवं तरीक़त दोनों एक ही चीज़ हैं, सिर्फ़ उनकी व्याख्या अलग-अलग की गयी है। तरीक़त शरीयत से बाहर नहीं है। यह इस्लाम का विरोध या खंडन नहीं करता। उनकी वजह से लोगों को सूफ़ियों की मंशा और मक़सद को समझना आसाना हो गया।

हज़रत ग़ज़ाली रह. ने सूफ़ीमत क़ुरआन के अनुरूप प्रभु की सार्वभौमिकता और सर्वशक्तिमत्ता स्थापित करते हुए ज्ञान की महत्ता पर बल दिया। साथ ही उन्होंने ध्यान द्वारा किए जाने वाले ईश से साक्षात्कार की संभावना को भी को भी पुष्ट कर दिया। ग़ज़ाली ने सूफ़ीमत को दार्शनिक आधार भी प्रदान किया और इस्लामी विधि-विधान के साथ इसका सामंजस्य भी बिठा दिया। इस प्रकार उन्होंने सूफ़ी दर्शन को इस्लाम पंथ के रूप में मान्यता दिलायी।

अल-ग़ज़ाली रह. के बताए सिद्धांतों पर चलकर हज़रत मजदूद सनाई रह., हज़रत जलालुद्दीन रूमी रह. और हज़रत फ़रीदुद्दीन अत्तार रह. ने बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी में सूफ़ीमत को ख़ास और आम सबके दरम्यान लोकप्रिय बनाया। हज़रत सनाई रह. ने तर्क और ज्ञान के संबंध में सूफ़ी-सिद्धांतों का प्रतिपादन किया। हज़रत अत्तार रह. ने अनुभवजन्य ज्ञान पर बल देकर सूफ़ी-साधना को फ़ना (निर्वाण) के साथ आबद्ध किया। हज़रत रूमी रह. ने हाल या वज्द (भावाविष्टावस्था) को सूफ़ी-साधना की महत्वपूर्ण पद्धति के रूप में प्रकाशित किया।

सूफ़ियों का सिलसिला

उलमा के विरोध एवं शासक वर्ग की नाराज़गी के बावज़ूद सूफ़ियों का प्रभाव बढ़ता गया। तेरहवीं शताब्दी तक सूफ़ियों की अनेक ख़ानक़ाहें (आश्रम) स्थापित हो चुकी थीं। विचारों और साधना-पद्धति में भिन्नता के कारण इसकी कई शाखाएं हुईं जिन्हें सिलसिला कहा जाता है। सूफ़ियों के सिलसिलों की संख्या निश्चित करना कठिन है, पर उनमें से कई भारत में पाए जाते हैं। इनमें प्रमुख हैं – चिश्ती, सुहरवर्दी, क़ादिरी, शतारी, नक्शबंदी, फिरदौसी, आदि। अकबर के ज़माने का मशहूर विद्वान अबुल फजल ने “आइन-ए-अकबरी” में चौदह सूफ़ी सिलसिलों का ज़िक्र किया है। पर ये मुख्य रूप से दो वर्गों में विभाजित थे – “बा-शरअ” और “बे-शरअ”“बा-शरअ” पंथी इस्लामी क़ानून के पालन पर बल देते थे और ख़ानक़ाहों में रहते थे। जबकि कुछ सूफ़ियों पर जज़्ब की कैफ़ियत तारी रहती थी और वे अक्सर घूमते ही रहते थे। आम लोग उन्हें ``बे-शरअ’’ कहते थे क्योंकि वे उन्हें नमाज़-रोज़ा करते नहीं देखते थे। हक़ीक़त यह होती थी कि वे अपने होशो हवास में ही नहीं होते थे और शरीअत की पाबंदी के लिए होशो हवास क़ायम होना ज़रूरी है।
इस्लामी उलमा ने कहा है कि न तो ऐसे लोगों को बुरा कहो और न ही उनका अनुसरण करो।

अभी जारी है ....