सूफ़ियों ने विश्व-प्रेम का पाठ पढ़ाया अंक-5
सूफ़ीमत का विकास-2
अंक-1 : सूफ़ी शब्द का अर्थ अंक-2 सूफ़ीमत का उदय अंक-3 : सूफ़ीमत की प्रारंभिक अवस्था 4. सूफ़ीमत का विकास-1
इस्लाम में सूफ़ीमत का विकास किसी धर्म में होने वाले रहस्यवादी आंदोलन (Mystic Movement) की सफलता और लोकप्रियता का महत्त्वपूर्ण और दिलचस्प इतिहास है। धीरे-धीरे नक़्शब, तिर्मीज़, नीशापुर, बुस्ताम, बग़दाद और शीराज़ सूफ़ीमत के अन्य प्रमुख केन्द्र बने। जैसे-जैसे इस्लाम अरब की सीमाओं से बाहर निकलकर पर्शिया, ईराक़, सीरिया, मिस्र और विश्व के अन्य देशों में फैलता चला गया, वैसे-वैसे मुसलमानों की संख्या-वृद्धि के साथ-साथ ही उन लोगों की संख्या में भी वृद्धि होती गई, जो इस्लाम में पूर्ण आस्था के बावज़ूद अपनी आत्मा में मचलते हुए प्रभु-प्रेम के फलस्वरूप अपने अंतःचक्षु द्वारा प्रिय के दर्शन करने में लगे हुए थे।
एक मत के रूप में सूफ़ीमत नौवीं शताब्दी में उभरा। सूफ़ीमत इस्लामी विधान का उल्लंघन नहीं करता। यह दौर इस्लाम के अत्यधिक प्रभाव का दौर था। इस्लामी आदेशों का ज़रा-सा उल्लंघन भी उस समय के धर्म रक्षा के लिए प्रतिबद्ध शसकों को सह्य नहीं था। हज़रत ज़ुन्नून रहमतुल्लाह अलैह, नूरी रह., मंसूर रह. जैसे सूफ़ियों को ऐसे ही कुछ कारणों से दंडित होना पड़ा।
हज़रत ज़ुन्नून रहमतुल्लाह अलैह (796-829 ई.)
हज़रत ज़ुन्नून रहमतुल्लाह अलैह ने सूफ़ी साधना में अहवाल (रूहानी अनुभूति) और मक़ामात (रूहानी पद) के महत्व को स्थापित करके मारिफ़त (तत्वज्ञान) को एक सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने ही पहली बार साधक की प्रेम-पिपासा को शराब और प्याले के प्रतीक प्रदान किए। इस्लामी समाज उनकी इन रहस्यवादी व्याख्याओं को सहन नहीं कर सका। उन्हें 829 ई. में बन्दी बनाकर बग़दाद भेजा गया, जहां ख़लीफ़ा ने उन्हें मिस्र लौट जाने का आदेश दिया।
हज़रत अबुल क़ासिम जुन्नैद रहमतुल्लाह अलैह ने कहा कि फ़ना (मृत्यु) और बक़ा (जीवन) पर्यायावची शब्द हैं क्योंकि न फ़ना का अर्थ है शरीर का अवसान और न बक़ा का अर्थ श्वास का चलते रहना है।
प्रथम सूफ़ी साधक
हज़रत मंसूर हल्लाज रहमतुल्लाह अलैह (858-922 ई.) अपना एक विशिष्ट स्थान रखते हैं। उन्होंने सूफ़ी साधना पद्धति को, जीवन-यापन द्वारा, सिद्धांत रूप में प्रस्थापित किया। उन्होंने आत्मा और परमात्मा की अभिन्नता को साधना की आधारभूमि बताकर यह घोषित किया कि अपनी चरम सीमा पर पहुंचकर ईश-प्रेम साधक को ब्रह्मत्व प्रदान कर परमात्मास्वरूप बना देता है।
वे जब आध्यात्मिक पराकाष्ठा पर पहुंचे तो उन्हें लगा कि उनमें और ख़ुदा में कोई अन्तर नहीं है। बल्कि दोनों एक ही हैं। और अचानक उनके मुंह से निकल पड़ा, “अनलहक़” “मैं सत्य हूं”। यह उनकी रूहानी अनुभूति थी और उनकी ज़बान से ‘अनल हक़‘ बेअख्तियार निकलता था लेकिन इस हालत में भी वह बंदगी का हक़ अदा करने लिए पाबंदी से नमाज़ अदा करते थे। शैख़ जुन्नैद ने उन्हें अपनी कैफ़ियत पर क़ाबू पाने की नसीहत की लेकिन अपनी ज़बान से ‘अनल हक़‘ निकलने को वह क़ाबू न कर सके जिस कारण उन्हें अपने प्राण देने पड़े। ऐसी कैफ़ियत के सूफ़ी को सूफ़ियों के दरम्यान कमज़ोर दर्जे का सूफ़ी माना जाता है जो कि अपनी कैफ़ियत को जज़्ब न कर सके और लोगों के लिए फ़ित्ने का सबब बन जाए लेकिन दुनिया ने मंसूर को एक बहुत ऊंचे दर्जे का सूफ़ी क़रार दे दिया जबकि वह सूफ़ियों में निहायत आला मक़ाम रखने वाले शैख़ जुन्नैद रह. के मुरीद थे और अभी रास्ते में ही थे अर्थात उन्हें साधना के कुछ चरण और भी पूरे करने थे।
भारतीय दर्शन में ‘अनल हक़‘ के समानार्थी ‘अहं ब्रह्मस्मि‘ है। अद्वैत दर्शन को सूफ़ी मंसूर की पहचान माना जाता है लेकिन हक़ीक़त है यह कि राहे विलायत से गुज़रने वाले हरेक साधक को इस मक़ाम से गुज़रना पड़ता है।
यही वह उत्स है जहां से सूफ़ी आन्दोलन के कभी न ख़त्म होने वाले अनेक सिलसिले निकले। जब ये लोग सीरिया, मिश्र, फिलिस्तीन और यूनान पहुंचे तो इनका संपर्क ईसाई मतावलंबियों से हुआ। जिसके परिणामस्वरूप एक विवेचनात्मक शाखा फूटी। एक नई दृष्टि से क़ुरआन की व्याख्या करने का प्रयास यहीं से शुरु हुआ। जिसकी काफ़ी तीखी प्रतिक्रिया हुई। पर सूफ़ियों के लिए इस्लाम एक सागर था जिसमें विभिन्न विचारों की नदियां आकर मिलती हैं। विभिन्न पंथों की अच्छी अवधारणाओं को समाहित करने के प्रयास से सूफ़ी दर्शन पर अन्य दर्शनों का काफ़ी प्रभाव पड़ा।
इश्क़ (प्रेम) के सिद्धांत को अद्वैत की आधारभूमि प्रदान करते हुए हज़रत अबू बक्र शिबली रहमतुल्लाह अलैह ने कहा कि साधक अपने मन की समस्त इच्छाओं-आकांक्षाओं को ईश-प्रेम में स्थानान्तरित कर दे। उन्होंने जमकर ख़ुदा के इश्क़ से ख़ाली बाह्याचार की निन्दा की, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें पागलख़ाने में बंद कर दिया गया।
मध्यमार्ग
दसवीं और ग्यारहवीं शताब्दी मुस्लिम जगत में दार्शनिक, आध्यात्मिक और सूफ़ी चिंतन के लिए प्रसिद्ध है। दसवीं शताब्दी में सूफ़ियों की साधना पद्धति के दो सैद्धांतिक पक्ष स्थापित हो गए थे, जिन्हें सुक्र (होश) और सहव (इश्क़े ख़ुदा में होश खोना) कहा जाता था। सुक्र की कैफ़ियत में हज़रत बायज़ीद रह. और हज़रत मंसूर रह. का ज़िक्र आता है जबकि सहव में हज़रत मुसाहिबी रह. और हज़रत जुनैद रह. का नाम लिया जाता है। इस तरह तरीक़त की दोनों कैफ़ियतों को समझाने के लिए दो विशेषण वुजूद में आ चुके थे। जिससे फ़ायदा यह हुआ कि अब बाद के सूफ़ियों को हज़रत मंसूर रह. जैसी कठिनाईयों का सामना नहीं करना पड़ा।
हज़रत अबू हमीद अल ग़ज़ाली रहमतुल्लाह अलैह
ग्यारहवीं शताब्दी में हज़रत अबू हमीद अल ग़ज़ाली रहमतुल्लाह अलैह (1058-1111 ई.) ने सूफ़ीमत को मुस्लिम जगत में सम्माननीय स्थान प्राप्त कराया। उन्होंने सूफ़ियों के प्रति सद्भाव एवं सौहार्द्र उत्पन्न करने की दृष्टि से तथा सनातन-पंथी मुसलमानों के विरोध को शांत करने के उद्देश्य से शरीयत एवं तरीक़त के समन्वय का मार्ग निकाला। उन्होंने सूफ़ीमत की व्याख्या इस प्रकार से की, कि इसे इस्लामी दर्शन का अंग बना दिया। उन्होंने कहा कि शरीयत एवं तरीक़त दोनों एक ही चीज़ हैं, सिर्फ़ उनकी व्याख्या अलग-अलग की गयी है। तरीक़त शरीयत से बाहर नहीं है। यह इस्लाम का विरोध या खंडन नहीं करता। उनकी वजह से लोगों को सूफ़ियों की मंशा और मक़सद को समझना आसाना हो गया।
हज़रत ग़ज़ाली रह. ने सूफ़ीमत क़ुरआन के अनुरूप प्रभु की सार्वभौमिकता और सर्वशक्तिमत्ता स्थापित करते हुए ज्ञान की महत्ता पर बल दिया। साथ ही उन्होंने ध्यान द्वारा किए जाने वाले ईश से साक्षात्कार की संभावना को भी को भी पुष्ट कर दिया। ग़ज़ाली ने सूफ़ीमत को दार्शनिक आधार भी प्रदान किया और इस्लामी विधि-विधान के साथ इसका सामंजस्य भी बिठा दिया। इस प्रकार उन्होंने सूफ़ी दर्शन को इस्लाम पंथ के रूप में मान्यता दिलायी।
अल-ग़ज़ाली रह. के बताए सिद्धांतों पर चलकर हज़रत मजदूद सनाई रह., हज़रत जलालुद्दीन रूमी रह. और हज़रत फ़रीदुद्दीन अत्तार रह. ने बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी में सूफ़ीमत को ख़ास और आम सबके दरम्यान लोकप्रिय बनाया। हज़रत सनाई रह. ने तर्क और ज्ञान के संबंध में सूफ़ी-सिद्धांतों का प्रतिपादन किया। हज़रत अत्तार रह. ने अनुभवजन्य ज्ञान पर बल देकर सूफ़ी-साधना को फ़ना (निर्वाण) के साथ आबद्ध किया। हज़रत रूमी रह. ने हाल या वज्द (भावाविष्टावस्था) को सूफ़ी-साधना की महत्वपूर्ण पद्धति के रूप में प्रकाशित किया।
सूफ़ियों का सिलसिला
उलमा के विरोध एवं शासक वर्ग की नाराज़गी के बावज़ूद सूफ़ियों का प्रभाव बढ़ता गया। तेरहवीं शताब्दी तक सूफ़ियों की अनेक ख़ानक़ाहें (आश्रम) स्थापित हो चुकी थीं। विचारों और साधना-पद्धति में भिन्नता के कारण इसकी कई शाखाएं हुईं जिन्हें सिलसिला कहा जाता है। सूफ़ियों के सिलसिलों की संख्या निश्चित करना कठिन है, पर उनमें से कई भारत में पाए जाते हैं। इनमें प्रमुख हैं – चिश्ती, सुहरवर्दी, क़ादिरी, शतारी, नक्शबंदी, फिरदौसी, आदि। अकबर के ज़माने का मशहूर विद्वान अबुल फजल ने “आइन-ए-अकबरी” में चौदह सूफ़ी सिलसिलों का ज़िक्र किया है। पर ये मुख्य रूप से दो वर्गों में विभाजित थे – “बा-शरअ” और “बे-शरअ”। “बा-शरअ” पंथी इस्लामी क़ानून के पालन पर बल देते थे और ख़ानक़ाहों में रहते थे। जबकि कुछ सूफ़ियों पर जज़्ब की कैफ़ियत तारी रहती थी और वे अक्सर घूमते ही रहते थे। आम लोग उन्हें ``बे-शरअ’’ कहते थे क्योंकि वे उन्हें नमाज़-रोज़ा करते नहीं देखते थे। हक़ीक़त यह होती थी कि वे अपने होशो हवास में ही नहीं होते थे और शरीअत की पाबंदी के लिए होशो हवास क़ायम होना ज़रूरी है।
इस्लामी उलमा ने कहा है कि न तो ऐसे लोगों को बुरा कहो और न ही उनका अनुसरण करो।
अभी जारी है ....