सूफ़ियों ने विश्व-प्रेम का पाठ पढ़ाया अंक-10
अंक-1 : सूफ़ी शब्द का अर्थ, अंक-2 सूफ़ीमत का उदय, अंक-3 : सूफ़ीमत की प्रारंभिक अवस्था, अंक-4.सूफ़ीमत का विकास-1, अंक-5 सूफ़ीमत का विकास-2, अंक-6 : सूफ़ी दर्शन-1, अंक-7 : सूफ़ी दर्शन-2,अंक-8 सूफ़ियों की प्रेमोपासना-1, अंक-9 : सूफ़ियों की प्रेमोपासना-2
साधना की चार अवस्थाएं
जब कोई साधारण व्यक्ति साधना के मार्ग पर चलने का मन बनाता है, तो उसे इसके लिए साधारण से मोमिन बनने का अभ्यास करना होता है। मोमिन बनने पर उसके अन्दर जब ईश-प्रेम का विकास होता है, तो वह सालिक की स्थिति में पहुंचता है। सालिक का अर्थ है यात्री, साधना के पथ का यात्री। जब ईश्वर को खोजने की तीव्र अभिलाषा जाग्रत होती है, तो सालिक पीर (गुरु) के शरण में जाता है।
पीर उस सालिक को साधना के मार्ग पर बढ़ने का रास्ता दिखाते हैं। सूफ़ी गुरुओं ने साधकों को साधना के लिए ये चार सोपान निर्धारित किए हैं –
कही ‘सरीअत’ चिस्ती पीरू।
उधरित असरफ़ और जहंगीरू।
राह ‘हकीकत’ परै न चूकी।
पैठि ‘मारफ़त’ मार बुडूकी॥
1. शरीयत
2. तरीक़त
3. मारिफ़त
4. हक़ीक़त
1. शरीयत - शरीयत अर्थात धर्मग्रंथ, अल्लाह के बताए क़ानून का नाम है। अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए शरीयत की पाबन्दी ज़रूरी है। इसे हमारे यहां के संदर्भ में कर्मकांड कहा जा सकता है। शरीयत के तीन अंग हैं – इल्म (ज्ञान), अमल (कर्म) और इख़लास (निष्ठा)। जबतक ये तीनों जीवन में नहीं उतरेंगे, शरीयत पर पूरा अमल न होगा।
2. तरीक़त – तरीक़त का अर्थ है बाहरी क्रिया-कलाप से परे होकर केवल हृदय की शुद्धता द्वारा भगवान का ध्यान। तरीक़त अन्तःपक्ष पर वार्ता करती है, यानी हृदय को कैसे शुद्ध किया जाए, मन में ईश-प्रेम को कैसे उतारा जाए। इसे उपासना कांड के रूप में समझा जा सकता है। जब गुरु (पीर) सूफ़ी साधक (सालिक) को अपने संरक्षण में ले लेता है, तो वह उसे ‘तरीक़त’ के पालन में, यानी साधना में लगा देता है।
साधना के प्रारंभिक सात सोपान हैं –
1. अनुताप
2. आत्म-संयम
3. वैराग्य
4. दारिद्र्य
5. धैर्य
6. ईश्वर-विश्वास, और
7. संतोष
साधक को इन सात सोपानों को पार करना होता है। जब वह इन सात सोपानों को पार कर लेता है, तो साधक चतुर्विध सोपानों का अधिकारी हो जाता है। तरीक़त के इन सोपानों के द्वारा साधक अपने शरीर, मन और इंद्रियों को साधता है। जब तन, मन औत इंद्रियां सध जाते हैं, तब सालिक को अपने मन के दर्पण में परमप्रिय ईश्वर की छवि दिखाई देने लगती है। इस प्रकार वह परमप्रिय के सुंदर रूप को निहारता है। उसके सुंदर छवि को निहारते ही उसके मन में “उसके” प्रति प्रेम हिलोरें लेने लगता है। वह संसार से विरक्त हो एकांतप्रिय हो जाता है।
3. मारिफ़त (पहचान) – मारिफ़त को हम सिद्धावस्था कह सकते हैं। सूफ़ी मात के अनुसार शरीयत अमल करके और तरीक़त के रास्तों को अपनाने के बाद साधक का जीवन गंदगियों से पाक-साफ़ हो जाता है। इस तरह उसके मन में ईश-प्रेम जाग्रत हो उठता है। उसका हृदय शुद्ध होकर परम-लक्ष्य की ओर बढ़ने लगता है। उसे ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त होता है। ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त होने की इस स्थिति से ही ‘मारिफ़त” का आरंभ होता है। मारिफ़त की स्थिति में उसे ‘इर्फ़ान’ होने लगता है। इर्फ़ान कहते हैं ब्रह्मज्ञान को। जैसे-जैसे ब्रह्मज्ञान का स्वरूप उस पर खुलता है, साधक को नूर का प्रत्यक्ष दर्शन होता है। उसे अब ईश्वरोन्मुख होते रहने की प्रेरणाएं मिलने लगती हैं। उसे अपने प्रियतम को पा लेने का दृढ विश्वास हो जाता है।
इस तरह से कठिन उपवास और मौन आदि की साधना द्वारा साधक की आत्मा परमात्मा में लीन हो जाती है। जायसी ने अखरावट में कहा है,
वेद वचन मुख सांच जो कहा।
सो जुग जुग अहथिर होइ रहा।
4. हक़ीक़त – से अभिप्राय भक्ति और उपासना के प्रभाव से सत्य के बोध से है। यह हमारे यहां का ज्ञानकांड है। यहां तक पहुंचते-पहुंचते साधक पर सत्य अनावृत्त हो जाता है। सत्य की पहचान, सत्य का दर्शन और सत्य का अनुभव ही ‘हक़ीक़त’ है। अब वह (साधक) होता है और उसका प्रियतम (परमात्मा)। हक़ीक़त की अवस्था को प्राप्त होकर साधक आत्म-भाव संक्रमण की ओर बढ़ता है। तब सम्मिलन और एकत्व भाव ज़ोर मारने लगता है। वह ख़ुद को उसमें मिटा देना चाहता है। जब आत्म-भाव सर्वथा निर्मूल हो जाता है, तब साधक के भीतर एक अद्भुत प्रकार का उन्माद जाग्रत होता है।
इस अवस्था में वह स्वयं का तो होता ही नहीं है, उसे सब तरफ़ ‘उसी’ का जल्वा, ‘उसी’ का नूर दिखाई देता है। बेख़ुदी की इस अवस्था को ‘सुक्र’ कहते हैं। सुक्र अर्थात नशा, मस्ती – ऐसी मस्ती जिसकी मिठास को रोम-रोम अनुभव कर रहा होता है। फिर महामिलन का वह क्षण आ पहुंचता है जब आत्मा अपने मूल, अपने उद्गम, अपने स्वामी, अपने परम-प्रिय में विलीन होकर अपना व्यक्तिगत अस्तित्व समाप्त कर देती है।
यही साक्षात्कार है जिसे सूफ़ियों ने फ़ना (विलय) कहा है। परम तत्व में विलय के बाद आत्मा को एक नया जन्म प्राप्त होता है। अब वह अभिन्न रूप से अपने स्रष्टा में निवास करती है। इस अवस्था को ‘बक़ा’(अनश्वरता, नित्यता) कहा जाता है। इसी अवस्था को प्राप्त करना सूफ़ी साधना का चरम लक्ष्य है। भाव रूप में एक होने के बाद सालिक एक नया जीवन प्राप्त क्रता है। यह एक नित्य जीवन व एक अनश्वर जीवन है। इस अनंत जीवन को प्राप्त करके साधक जीवन समर को जीत लेता है। यह अनुभव उसे ‘वज्द’ की अवस्था में ले जाता है। वज्द की यह अवस्था बेख़ुदी की वह अवस्था है, जिसके विषय में ग़ालिब ने कहा था, -
हम वहां हैं जहां से हमको
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती।
इस प्रकार इस अवस्था में आकर साधक परम आनंद का अनुभव करता है।यह आनंद अद्भुत, अपूर्व व अलौकिक होता है। इस अपूर्व, अलौकिक, अद्भुत अनुभव की अवस्था को ‘सह्व’ की अवस्था कहते हैं।
अभी जारी है ....
(चित्र : आभार गूगल सर्च)