शनिवार, 31 मार्च 2012

साधना की चार अवस्थाएं

सूफ़ियों ने विश्व-प्रेम का पाठ पढ़ाया अंक-10

अंक-1 : सूफ़ी शब्द का अर्थ, अंक-2 सूफ़ीमत का उदय, अंक-3 : सूफ़ीमत की प्रारंभिक अवस्था, अंक-4.सूफ़ीमत का विकास-1, अंक-5 सूफ़ीमत का विकास-2, अंक-6 : सूफ़ी दर्शन-1, अंक-7 : सूफ़ी दर्शन-2,अंक-8 सूफ़ियों की प्रेमोपासना-1, अंक-9 : सूफ़ियों की प्रेमोपासना-2

साधना की चार अवस्थाएं

जब कोई साधारण व्यक्ति साधना के मार्ग पर चलने का मन बनाता है, तो उसे इसके लिए साधारण से मोमिन बनने का अभ्यास करना होता है। मोमिन बनने पर उसके अन्दर जब ईश-प्रेम का विकास होता है, तो वह सालिक की स्थिति में पहुंचता है। सालिक का अर्थ है यात्री, साधना के पथ का यात्री। जब ईश्वर को खोजने की तीव्र अभिलाषा जाग्रत होती है, तो सालिक पीर (गुरु) के शरण में जाता है।

पीर उस सालिक को साधना के मार्ग पर बढ़ने का रास्ता दिखाते हैं। सूफ़ी गुरुओं ने साधकों को साधना के लिए ये चार सोपान निर्धारित किए हैं –

कही ‘सरीअत’ चिस्ती पीरू।

उधरित असरफ़ और जहंगीरू।

राह ‘हकीकत’ परै न चूकी।

पैठि ‘मारफ़त’ मार बुडूकी॥

1. शरीयत

2. तरीक़त

3. मारिफ़त

4. हक़ीक़त

1. शरीयत - शरीयत अर्थात धर्मग्रंथ, अल्लाह के बताए क़ानून का नाम है। अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए शरीयत की पाबन्दी ज़रूरी है। इसे हमारे यहां के संदर्भ में कर्मकांड कहा जा सकता है। शरीयत के तीन अंग हैं – इल्म (ज्ञान), अमल (कर्म) और इख़लास (निष्ठा)। जबतक ये तीनों जीवन में नहीं उतरेंगे, शरीयत पर पूरा अमल न होगा।

2. तरीक़त – तरीक़त का अर्थ है बाहरी क्रिया-कलाप से परे होकर केवल हृदय की शुद्धता द्वारा भगवान का ध्यान। तरीक़त अन्तःपक्ष पर वार्ता करती है, यानी हृदय को कैसे शुद्ध किया जाए, मन में ईश-प्रेम को कैसे उतारा जाए। इसे उपासना कांड के रूप में समझा जा सकता है। जब गुरु (पीर) सूफ़ी साधक (सालिक) को अपने संरक्षण में ले लेता है, तो वह उसे ‘तरीक़त’ के पालन में, यानी साधना में लगा देता है।

साधना के प्रारंभिक सात सोपान हैं –

1. अनुताप

2. आत्म-संयम

3. वैराग्य

4. दारिद्र्य

5. धैर्य

6. ईश्वर-विश्वास, और

7. संतोष

साधक को इन सात सोपानों को पार करना होता है। जब वह इन सात सोपानों को पार कर लेता है, तो साधक चतुर्विध सोपानों का अधिकारी हो जाता है। तरीक़त के इन सोपानों के द्वारा साधक अपने शरीर, मन और इंद्रियों को साधता है। जब तन, मन औत इंद्रियां सध जाते हैं, तब सालिक को अपने मन के दर्पण में परमप्रिय ईश्वर की छवि दिखाई देने लगती है। इस प्रकार वह परमप्रिय के सुंदर रूप को निहारता है। उसके सुंदर छवि को निहारते ही उसके मन में “उसके” प्रति प्रेम हिलोरें लेने लगता है। वह संसार से विरक्त हो एकांतप्रिय हो जाता है।

3. मारिफ़त (पहचान) – मारिफ़त को हम सिद्धावस्था कह सकते हैं। सूफ़ी मात के अनुसार शरीयत अमल करके और तरीक़त के रास्तों को अपनाने के बाद साधक का जीवन गंदगियों से पाक-साफ़ हो जाता है। इस तरह उसके मन में ईश-प्रेम जाग्रत हो उठता है। उसका हृदय शुद्ध होकर परम-लक्ष्य की ओर बढ़ने लगता है। उसे ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त होता है। ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त होने की इस स्थिति से ही ‘मारिफ़त का आरंभ होता है। मारिफ़त की स्थिति में उसे ‘इर्फ़ान’ होने लगता है। इर्फ़ान कहते हैं ब्रह्मज्ञान को। जैसे-जैसे ब्रह्मज्ञान का स्वरूप उस पर खुलता है, साधक को नूर का प्रत्यक्ष दर्शन होता है। उसे अब ईश्वरोन्मुख होते रहने की प्रेरणाएं मिलने लगती हैं। उसे अपने प्रियतम को पा लेने का दृढ विश्वास हो जाता है।

इस तरह से कठिन उपवास और मौन आदि की साधना द्वारा साधक की आत्मा परमात्मा में लीन हो जाती है। जायसी ने अखरावट में कहा है,

वेद वचन मुख सांच जो कहा।

सो जुग जुग अहथिर होइ रहा।

4. हक़ीक़त – से अभिप्राय भक्ति और उपासना के प्रभाव से सत्य के बोध से है। यह हमारे यहां का ज्ञानकांड है। यहां तक पहुंचते-पहुंचते साधक पर सत्य अनावृत्त हो जाता है। सत्य की पहचान, सत्य का दर्शन और सत्य का अनुभव ही ‘हक़ीक़त’ है। अब वह (साधक) होता है और उसका प्रियतम (परमात्मा)। हक़ीक़त की अवस्था को प्राप्त होकर साधक आत्म-भाव संक्रमण की ओर बढ़ता है। तब सम्मिलन और एकत्व भाव ज़ोर मारने लगता है। वह ख़ुद को उसमें मिटा देना चाहता है। जब आत्म-भाव सर्वथा निर्मूल हो जाता है, तब साधक के भीतर एक अद्भुत प्रकार का उन्माद जाग्रत होता है।

इस अवस्था में वह स्वयं का तो होता ही नहीं है, उसे सब तरफ़ ‘उसी’ का जल्वा, ‘उसी’ का नूर दिखाई देता है। बेख़ुदी की इस अवस्था को ‘सुक्र’ कहते हैं। सुक्र अर्थात नशा, मस्ती – ऐसी मस्ती जिसकी मिठास को रोम-रोम अनुभव कर रहा होता है। फिर महामिलन का वह क्षण आ पहुंचता है जब आत्मा अपने मूल, अपने उद्गम, अपने स्वामी, अपने परम-प्रिय में विलीन होकर अपना व्यक्तिगत अस्तित्व समाप्त कर देती है।

यही साक्षात्कार है जिसे सूफ़ियों ने फ़ना (विलय) कहा है। परम तत्व में विलय के बाद आत्मा को एक नया जन्म प्राप्त होता है। अब वह अभिन्न रूप से अपने स्रष्टा में निवास करती है। इस अवस्था को ‘बक़ा’(अनश्वरता, नित्यता) कहा जाता है। इसी अवस्था को प्राप्त करना सूफ़ी साधना का चरम लक्ष्य है। भाव रूप में एक होने के बाद सालिक एक नया जीवन प्राप्त क्रता है। यह एक नित्य जीवन व एक अनश्वर जीवन है। इस अनंत जीवन को प्राप्त करके साधक जीवन समर को जीत लेता है। यह अनुभव उसे ‘वज्द’ की अवस्था में ले जाता है। वज्द की यह अवस्था बेख़ुदी की वह अवस्था है, जिसके विषय में ग़ालिब ने कहा था, -

हम वहां हैं जहां से हमको

कुछ हमारी ख़बर नहीं आती।

इस प्रकार इस अवस्था में आकर साधक परम आनंद का अनुभव करता है।यह आनंद अद्भुत, अपूर्व व अलौकिक होता है। इस अपूर्व, अलौकिक, अद्भुत अनुभव की अवस्था को ‘सह्व’ की अवस्था कहते हैं।

अभी जारी है ....

(चित्र : आभार गूगल सर्च)

बृहस्पतिवार, 29 मार्च 2012

धार्मिक जिज्ञासा

गांधी और गांधीवाद-105

धार्मिक जिज्ञासा

GhandiZarz12

गांधी जी की जहां एक ओर आत्मा के आंतरिक जीवन के प्रति उत्सुकता बनी रहती थी, वहीं दूसरी ओर वे शारीर की उचित देखभाल के प्रति भी काफ़ी जिज्ञासु थे। जब हम थोड़ा गहरे जाकर उनको समझने का प्रयत्न करते हैं तो पाते हैं कि उनकी चाहे जो भी व्यावसायिक और राजनीतिक प्रतिबद्धताएं रही हों, नैतिक नियमों के अनुरूप कर्म करना और स्वास्थ्य या प्रकृति के नियमों के अनुसार जीवन जीने के उनके विचार को सत्य की खोज के अंगों के रूप में ही देखा जा सकता है।

थियॉसोफी के वातावरण के संसर्ग में

अपनी इन्ही जिज्ञासाओं के कारण न सिर्फ़ लंदन में बल्कि दक्षिण अफ़्रीका की पहली यात्रा में ही गांधी जी ईसाई वातावरण के संपर्क में आए थे। इस बार वे थियॉसोफी वातावरण के संसर्ग में भी आए। जोहान्सबर्ग में उनकी वकालत काफ़ी बढ़ गई थी। अब अकेले काम संभालना मुश्किल हो रहा था। गांधी जी ने दो अंगरेज़ों को मदद के लिए अपने साथ आर्टिकिल क्लर्क के रूप में रख लिया। उनमें से एक लुइस वाल्टर रीच (Louis Walter Ritch) थे। वे एक सफल व्यापारी थी, जिनका विवाह एक बड़े परिवार में हुआ था। गांधी जी के सुझाव पर उन्होंने अपना व्यापार बंद कर दिया और गांधी जी के क़ानूनी व्यवसाय में आर्टिकल क्लर्क के रूप में मदद करने लगे। वे दो साल तक गांधी जी के साथ रहे, फिर इंगलैंड चले गए जहां उन्होंने अपना क़ानूनी अध्ययन ज़ारी रखा।

गांधी जी के पास आने के पहले मि. रिच एक वाणिज्यिक कम्पनी के व्यवस्थापक थे। वे थियॉसोफिस्ट थे। उन्होंने गांधी जी का परिचय जोहान्सबर्ग की थियॉसोफी सोसायटी से कराया। कुछ बुनियादी मतभेद के कारण गांधी जी उन लोगों की सोसाइटी के सदस्य तो नहीं बने लेकिन बराबर उस सोसायटी के संपर्क में रहे। उसके सदस्यों के साथ गांधी जी की धर्म-चर्चा होती रहती थी। उनकी पुस्तकें पढ़ते रहते थे। उनकी सभा में उन्हें बोलने का जब भी अवसर मिलता, तो वे सदस्यों के सिद्धांत और आचरण में भेद की आलोचना करने से नहीं चूकते। पर इस आलोचना के कारण उन्होंने आत्म-निरीक्षण करना सीखा।

गीता की गहराई में

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थियॉसोफिस्ट उन्हें न सिर्फ़ अपनी मंडली में शामिल करना चाहते थे, बल्कि वे गांधी जी से हिंदू धर्म के बारे में भी कुछ जानना और सीखना भी चाहते थे। थियॉसोफी की पुस्तकों पर हिंदू धर्म का काफ़ी प्रभाव गांधी जी ने पाया था। चूंकि थियॉसोफिस्ट संस्कार और पुनर्जन्म को मानते थे इसलिए उन्हें लगा कि गांधी जी उनकी सहायता कर सकेंगे। पर गांधी जी की संस्कृत की जानकारी बहुत कम थी। प्राचीन धर्म ग्रंथ संस्कृत में थे। अनुवादों के द्वारा भी उनका अध्ययन न के बराबर ही था।

उन्नीस वर्ष की अवस्था में जब गांधी जी लंदन पहुंचे थे, तो उन दिनों अपने थियॉसोफिस्ट मित्रों के आग्रह पर सर एड्विन ऑर्नाल्ड द्वारा रचित भगवद्‌गीता का अंगरेज़ी अनुवाद “दिव्य संगीत” पढ़ा था। सर एड्विन की एक और किताब “एशिया की ज्योति” उन्होंने पढ़ी थी, जो गौतम बुद्ध की जीवन कथा थी। दक्षिण अफ़्रीका में अपने थियॉसोफिस्ट मित्र की मदद के लिए गांधी जी ने स्वामी विवेकानंद का “राजयोग” पढ़ा। “राजयोग” गीता पर स्वामी जी द्वारा की गई टीका थी। उन्होंने “पातंजल-योगदर्शन” का भी अध्ययन किया। लेकिन उनके जीवन को सबसे अधिक प्रभावित किया “भगवद्‌गीता” ने। विभिन्न टिकाओं के साथ उन्होंने गीता का अभ्यास भी शुरू किया। इसके बाद “जिज्ञासु-मंडल” के नाम से एक छोटा-सा मंडल भी स्थापित किया। इस प्रकार उनका नियमित अभ्यास होने लगा। वे गीता की गहराई में उतरने लगे। अनुवाद की पुस्तक से मूल संस्कृत को समझने लगे। श्लोकों को कण्ठस्थ करने लगे।

गीता के श्लोकों को याद करने के लिए

गीता के श्लोकों को याद करने के लिए वे दातून और स्नान के समय का सदुपयोग करते। दातून में उन्हें पन्द्रह और स्नान में बीस मिनट लगता था। दातुन वे खड़े-खड़े किया करते थे। सामने की दीवार पर गीता के श्लोक लिखकर चिपका देते और उसे देखते और याद करते जाते। स्नान करते समय इसे दुहराते जाते। इस तरह वे पूरी गीता कण्ठस्थ कर गए। गीता ने उनके आचरण पर काफ़ी प्रभाव डाला। आचार-संबंधी कठिनाइयों का समाधान वे गीता में ढूंढ़ा करते। गांधी जी कहते थे, “जब मुझे प्रकाश की एक किरण भी कहीं दिखाई नहीं देती, मैं उसे भगवद्‌गीता में खोजता हूं और उसके किसी श्लोक में निहित आशा का संदेश मेरे भारी-से-भारी दुख को चुटकियां बजाते दूर कर देता है। अनंत दुख, कष्ट और आपदाओं से भरे अपने इस जीवन में जो स्थिर और अविचलित रह सका हूं उसका सारा श्रेय भगवद्‌गीता को ही है।”

अपरिग्रह और समभाव

गीता के गहन अध्ययन के बाद उनका हृदय गीतामय हो गया। जीवन की हर समस्या का समाधान वे गीता में ही खोजने लगे। गीता को जीवन का आदर्श मानकर उन्होंने अपने जीवन को उसी प्रकार ढालने का प्रयास करने लगे। गीता के अपरिग्रह और समभाव शब्द तो उनके दिल में बस गए। “अपरिग्रह” का अर्थ है आत्मा के लिए भार स्वरूप सभी भौतिक वस्तुओं का परित्याग। इसमें धन, संपत्ति और विषयेषणा से छुटकारा भी निहित है। और जिसे छोड़ा न जा सके स्वयं को उसका ट्रस्टी समझकर आचरण करना, न कि मालिक बन बैठना। गीता के अध्ययन के फलस्वरूप उन्हें ट्रस्टी शब्द का अर्थ स्पष्ट हुआ। क़ानून-शास्त्र के प्रति उनका आदर बढ़ा।

“समभाव” का अर्थ है सुख और दुख में, विजय और पराजय में, मन की एक सी वृत्ति। जीत की आशा और हार की आशंका से परे होकर अपना काम करते जाना। “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन्‌”। समभाव के बल पर ही गांधी जी चाहे वह अंगरेज़ अधिकारी हों या अपने सहकर्मी, चाहे निर्धन, लाचार देशवासी हों या पूंजीपति, सबके साथ एक जैसा व्यवहार कर सके।

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मंगलवार, 27 मार्च 2012

बेतरतीब विचार

आज मन पता नहीं किस उलझन में है .... । जब मन उलझन में होता है तो बड़े बेतरतीब से ख़्याल आते रहते हैं।

एक मित्र ने एस.एम.एस. द्वारा बड़ा ही गूढ़-गहन संदेश भेजा है। आप से भी शेयर कर लूं। सिक्के जो एक, दो, पांच के मूल्य के होते हैं खनकते बहुत हैं, आवाज़ ज़्यादा निकालते हैं। वहीं दस, बीस, पचास, सौ, पांच सौ और हज़ार के नोट शांत होते हैं, ख़ामोश रहते हैं। बड़ा स्पष्ट सा संदेश है कि जैसे-जैसे महत्व एवं उपयोगिता बढ़ती जाती है व्यक्ति उत्तेजनारहित और शांत होता जाता है। यह स्थिति ज्ञान के संचय से ही आती है।

इस अवस्था में जीवन सुंदर होता है।

सुंदर जीवन बस यूं ही नहीं हो जाता। इसे रोज़ बनाना पड़ता है ... अपनी प्रार्थनाओं से, नम्रता से, त्याग से एवं प्रेम से। प्रार्थना से परिस्थिति नहीं बदल जाती। हां इससे परिस्थिति के प्रति हमारी सोच में बदलाव आ सकता है। हम और मज़बूत इरादों के साथ समस्या के सम्मुख खड़े हो पाते हैं। तब हममें मधुर भावनाओं का संचार होता है। हम विकट परिस्थिति में भी प्रसन्नचित्त रह पाते हैं।

जीवन में हमें ख़ुशी चाहिए, प्रसन्नता चाहिए। ज़िन्दगी हमें यूं ही ख़ुशियां नहीं दे देती। इसे हमें पाना होता है। जीवन के रास्ते सदैव समतल तो नहीं ही होते। कभी-कभी ऊँची चढ़ाई भी चढ़नी होती है। पक्के इरादे और मज़बूत हौसले से हम जीवन की दुश्‍वारियों का सामना दृढ़ता से कर पाते हैं।

लोग कहते हैं कि अनुभव और समय के साथ मनुष्य को गंभीर हो जाना चाहिए। गंभीर होने का यह मतलब नहीं कि हमें खनक छोड़ देनी चाहिए, हंसी और मुस्कान छोड़ देनी चाहिए।

ऐसा नहीं है कि ज्यों-ज्यों हम उम्रदराज़ होते जाते हैं तो हमारी मुस्कान कम होती जाती है। बल्कि सच तो ये है कि हम बूढ़े इसलिए दिखते हैं क्योंकि हमने मुस्कुराते रहना कम कर दिया है। इसलिए हम अपने आप को मुस्कान का उपहार दें और लंबी ज़िन्दगी जिएं।

हम अगर जिन्दगी को मुस्कराने का मौका दें तो जिन्दगी हमें जिन्दगी भर मुस्कुराने का मौका देगी।

रविवार, 25 मार्च 2012

घर बसाने के झंझट से मुक्ति

गांधी और गांधीवाद-104

घर बसाने के झंझट से मुक्ति

clip_image001चेम्बर से न मिल पाने के बाद 1903 में जनवरी, फरवरी और मार्च में कुछ महत्वपूर्ण बातें ये हुईं

· 30 जनवरी को दादाभाई नौरोजी को पत्र लिखकर चेम्बरलेन से मिलने गए शिष्टमंडल का ब्योरा दिया।

· 16 फरवरी को गोखले जी को पत्र द्वारा ट्रांसवाल के घटनाक्रम की जानकारी दी और कहा कि वे आ सकने की स्थिति में नहीं हैं।

· 16 मार्च को दादाभाई नौरोजी को रिपोर्ट भेजा।

Gandhi_0032एक आम इंसान की तरह गांधी जी भी कुछ धन इकट्ठा करना चाहते थे। मुम्बई में जब उन्होंने अपना दफ़्तर खोला था, तो भविष्य के विषय में निश्चिंत होने के लिए दस हज़ार का बीमा कराया था। कुछेक किस्त देने के बाद उन्होंने उसे बंद कर दिया। उनके मन में प्रश्न उठने लगा कि “क्या ऐसी सुविचारित सुरक्षा ईश्वरीय शक्ति में विश्वास से मेल खाती है? दुनिया के अनगिनत ग़रीबों के परिवारों का क्या होता रहा है? मैं ख़ुद को भी उनमे क्यों न गिनूं?” उन्होंने उस पॉलिसी की अगली किस्त जमा नहीं की। उनके भाई काफ़ी नाराज़ हुए। लगभग उन्हें त्याग ही दिया था। दोनों में बातचीत बंद हो गई थी। कस्तूरबा भी इसे अपने बच्चों के भविष्य के प्रति जानबूझ कर की गई लापरवाही मानकर दुखी हुई। लेकिन गांधी जी कोई इरादा एकबार कर लेते थे, तो कुछ भी उसमें बाधक नहीं होता था।

इसबार दक्षिण अफ़्रीका में उन्हें बदले हुए हालात का सामना करना पड़ रहा था। इन बदले हालातों के कारण क्रमशः उनके विचारों में भी परिवर्तन आता गया। जोहान्सबर्ग में काम करने के निश्चय के साथ-साथ उन्होंने “ट्रांसवाल ब्रिटिश एसोसिएशन” का गठन किया। खुद उसके सेक्रेटरी बने। कोर्ट में वकालत शुरू करने के साथ ही उन्होंने जोहान्सबर्ग में अपना ऑफिस भी खोल लिया था।

काम तो शुरू हो गया था लेकिन कस्तूरबा को दिया वादा और बेटों की याद उन्हें हमेशा परेशान किए रहती थी। मुम्बई छोड़ते वक़्त गांधी जी ने कस्तूरबा से कहा था कि वे 1903 के अंत तक वापस आ जाएंगे, अगर किसी कारणवश यह संभव न हुआ, तो उन्हें दक्षिण अफ़्रीका बुला लेंगे। परिस्थितियां ऐसी बन पड़ी थीं कि उनका निकट भविष्य में भारत जाना संभव नहीं था। लेकिन पत्नी को दिए वचन को पूरा करना भी उनके लिए ज़रूरी था। उन्हें लगने लगा कि बाल-बच्चों से उन्हें अब बिल्कुल ही अलग नहीं रहना चाहिए। उनके भरण-पोषण की व्यवस्था दक्षिण अफ़्रीका में ही होनी चाहिए। यह कैसे पूरा किया जाए? यह आसान भी नहीं था। तीन-चार साल तो अफ़्रीका में लगने ही थे। क्या इतने दिनों तक कस्तूरबा गांधी जी पर कोई दवाब न डालतीं उन्हें अफ़्रीका बुलाने के लिए। उन्हें पता था कि कस्तूर उनके साथ ही रहना चाहेंगी, लेकिन उस समय ऐसा संभव नहीं था। यदि साल के अंत तक उन्हें बुलाया जाए तो यहां रहने के लिए घर बसाना और फिर उसे तोड़ना काफ़ी कठिन होने वाला था।

गांधी जी ने अपनी समस्या हरिदास वखतचंद वोरा को पत्र द्वारा बताई। हरिदास काठियावाड़ के एक नामी वकील थे और गांधी जी के काफ़ी क़रीबी थे। पत्र में उन्होंने लिखा, “मैं नहीं समझता कि वो (कस्तूरबा) वहां रहने के लिए तैयार होंगी। उनकी चिंता करते हुए मैं समाज के काम में एकाग्रचित्त होकर मन नहीं लगा पाऊंगा। मुझे उसकी भावनाओं का ख्याल रखना ही चाहिए। अगर वो आने का मन बनाती हैं तो उन्हें अक्तूबर में तैयारी शुरू कर देनी होगी और नवम्बर में वहां से चल देना चाहिए।”

हरिदासभाई को कस्तूरबा से सलाह-मशवरा कर गांधी जी को जवाब भेजना था। 5 फरवरी को गांधी जी ने पत्र की एक प्रति अपने भतीजे छगनलाल को इस निर्देश के साथ भेजा कि वे इसे अपनी चाची को पढ़कर सुनाएं। उन्होंने यह भी लिख भेजा था कि “यह ज़्यादा सही होता कि वे वहीं रहतीं, क्यों कि यहां रहने पर खर्च काफ़ी होगा। उनके वहां रहने से जो पैसे बचेंगे उससे उनके और बच्चों के जीवन-बसर में काफ़ी सुविधा होगी। फिर भी यदि वे यहां आने का मन बना ही लें, तो मैं वहां से चलने के वक़्त किए अपने वादे से फिरूंगा नहीं।”

कस्तूरबाई पति की समस्याओं को कैसे नज़रअंदाज़ कर सकती थीं। इसलिए उन्होंने फिलहाल भारत में ही रहने का निश्चय किया। इसतरह गांधी जी को तुरत ही जोहानसबर्ग में घर बसाने के झंझट से मुक्ति मिली। अब वे अधिक एकाग्रता से अपने व्यवसाय और राजनैतिक क्रियाकलापों को अंजाम दे सकते थे।

जोहान्सबर्ग में उन्होंने धीरे-धीरे अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली। ऑफिस खोले पांच महीने ही हुए थे लेकिन उसका काम अच्छा चल रहा था। सुबह पौने नौ से लेकर रात दस बजे तक वे लगातार काम करते रहते थे। छगनलाल को पत्र लिखकर घर-परिवार की जनकारी भी ले लिया करते थे। बच्चों की शिक्षा के बारे में सुझाव भी भेजा करते थे। मणिलाल ने जब एक पत्र में शिकायत भेजी कि मां ने संगीत क्लास की फ़ीस देनी बंद कर दी है, तो उन्होंने छगनलाल को पत्र लिखकर समझाया, “मुझे छगनलाल की फ़ीस देने में कोई एतराज़ नहीं है, लेकिन उसे वाद्य संगीत सीखना चाहिए। उसकी संगीत शिक्षा बंद करना ठीक नहीं था।”

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बुधवार, 21 मार्च 2012

सूफ़ियों की प्रेमोपासना-2

सूफ़ियों ने विश्व-प्रेम का पाठ पढ़ाया अंक-9

अंक-1 : सूफ़ी शब्द का अर्थ, अंक-2 सूफ़ीमत का उदय, अंक-3 : सूफ़ीमत की प्रारंभिक अवस्था, अंक-4. सूफ़ीमत का विकास-1, अंक-5 सूफ़ीमत का विकास-2, अंक-6 : सूफ़ी दर्शन-1, अंक-7 : सूफ़ी दर्शन-2, अंक-8 सूफ़ियों की प्रेमोपासना-1,

सूफ़ियों की प्रेमोपासना-2

दसवीं सदी में बसरा में एक सम्प्रदाय निकला जिसका नाम था ख़वानुस्सफ़ा (पवित्र संघ / बिरादरी)। इन्होंने अपने ज्ञान को पुस्तक के रूप में लेखबद्ध किया, इसे रसायल खवानुस्सफ़ा (पवित्र-संघ-ग्रंथावली) कहते हैं। इस संघ ने त्याग, तपस्या, आत्म-संयम के ऊपर काफ़ी ज़ोर दिया। इनके अनुसार प्रेम का सबसे ऊपर स्थान है – प्रेम जीव का परमात्मा से मिलने के लिए बेक़रारी है। इसी प्रेम का एक भाग वह प्रेम है, जो कि इस जीवन में प्राणिमात्र के प्रति क्षमा, सहानुभूति और स्नेह द्वारा प्रकाशित किया जाता है। प्रेम इस लोक में मानसिक सान्त्वना, हृदय की स्वतंत्रता देता है और प्राणिमात्र के साथ शांति स्थापित करता है, और परलोक में उस नित्य ज्योति का समागम कराता है।

पवित्र संघ सूफ़ियों का प्रशंसक था। सूफ़ी दर्शन में जीव ब्रह्म के गुणों का प्रतिबिंब है, और भाव रूप में जीव का ब्रह्म में लीन होना, यही उसका सर्वोच्च ध्येय है। जीव ही नहीं जगत भी ब्रह्म के गुणों का प्रतिबिंब है। जीव को हक़ (सत्‌, ब्रह्म) से मिलने का एक ही रास्ता है, वह है – प्रेम (इश्क़) का। यह प्रेम शुद्ध आध्यात्मिक प्रेम था।

सूफ़ी प्रेम में स्वरूप तो लौकिक प्रेम का ही है, भावावेश और सुखानुभूति श्रृंगार जैसी ही है, किन्तु है वह निराकार के प्रति। प्रेम प्रत्यक्ष के प्रति न होकर प्रच्छन्न के प्रति होता है, इसलिए उसमें तीव्रता भी अधिक होती है और उसमें रहस्य की अनिवार्यता भी हो जाती है। इसमें लौकिकता और अलौकिकता का योग होता है। सूफ़ी प्रेम में इश्क़ ए मजाजी (लौकिक प्रेम) इश्क़ ए हक़ीक़ी (आध्यात्मिक प्रेम) की सीढ़ी माना जाता है। साधना के उत्तरोत्तर विकास के बाद ही साधक परमेश्वर तक पहुंचेगा। सूफ़ियों का कहना है कि सांसारिक प्रेम में स्त्री-पुरुष का प्रेम तो साधारण सी बात है, लेकिन अहं पर विजय पाने के लिए, युवा के प्रति प्रेम अधिक उपयुक्त है। स्त्री के प्रति जो प्रेम होता है, उसमें स्वार्थ होता है और सुन्दर युवा के प्रति जो प्रेम होता, उसमें स्वार्थ नहीं होता, उसमें विकार नहीं होता। विकारहीन होने के कारण यह स्वार्थ और बुद्धि पर विजय पाने में अत्यधिक सहायक सिद्ध होता है। संसार को छोड़कर भी वह प्रेमिका के सौन्दर्य को ही दृष्टि में रखता है और साधना के मार्ग पर चढ़ता हुआ भी वह नर-नारी के संयोग (वस्ल) में ही साधना की चरम परिणति मानता है।

यह प्रेम जीवन को अर्थ देता है। वह (साधक) नाचता है, गाता है, जीवन का उत्सव मनाता है। उसके (प्रेमास्पद के) प्रेम में वयक्ति विह्वल हो जाता है, आसक्त हो जाता है। आसक्त व्यक्ति मूर्छित हो जाता है। उसकी आसक्ति इतनी चरम सीमा की होती है कि प्रेमास्पद के अतिरिक्त समस्त सृष्टि उसे सूनी प्रतीत होती है। यहां प्रेम वैराग्य का साधन बनता है। जब वह नाच रहा होता है, उत्सव मना रहा होता है, तब यदि वह अपने अंदर झांकता है तो वहां कोई नहीं होता। एक शून्यता होती है, इसे ही सूफ़ी फ़ना कहते हैं। यह, कोई नहीं होने वाली, स्थिति ऐसी स्थिति है जब अहंकार विसर्जित हो जाता है – फ़ना, अनात्म। यहां प्रेम एक कृत्य न होकर स्थिति है।

प्रेमाख्यानों में ईश्वर को परम सुन्दरी माना जाता है। जहां साधक पुरुष है, उसकी आसक्ति स्त्री के प्रति ही हो सकती है। प्रेमाख्यान की दो चरम सीमाएं हैं – उल्लास और तड़पन। प्रेमी प्रेम में मस्त हो जाता है। वह मस्ती में झूमता रहता है। मस्ती में वह भजन (क़व्वाली) गाता है और झूमता है। जहां उसमें मस्ती और दीवानगी होती है वहीं उसमें विरह की असीम तड़पन होती है। वह तड़पता रहता है। विरह की तड़पन ही उसके प्रेम को व्यंजित करती है। वह विरह को समस्त सुखों का आधार मानता है। जायसी ने पद्मावत में कहा है –

जेहि के बोल विरह के धाया।

कहु तेहि भूख कहां तेहि छाया।

फेरे भेस रहह भा तपा।

धूरो लपेटा मानिक छपा॥

सूफ़ियों के प्रेम दर्शन में वियोग-संयोग का भी विशेष स्थान है। सूफ़ियों ने संयोग से तात्पर्य विलीन होने के बजाए ईश्वर का सानिध्य प्राप्त करना पाया है। जब साधक साधना में लगा रहता है तो उसके भीतर की बुराइयां दूर होने लगती हैं और भलाइयां जड़ पकड़ने लगती हैं। ऐसे लोग ईश्वर का सान्निध्य प्राप्त करते हैं। अल्लाह जितना अधिक अपने बन्दों के दिलों को अपने क़रीब देखता है उतना ही वह भी उनके क़रीब आ जाता है। सूफ़ीमत की अवधारणा में कहीं जाना नहीं है। परमात्मा के पास जाना नहीं है। वह तो यहीं है। लेकिन साधक यहां नहीं है। वह कहीं और होता है। साधना के द्वारा वह वापस लौटता है। परमात्मा का सान्निध्य प्राप्त करता है।

वियोग की कल्पना भी सूफ़ीमत में पाया जाता है। मिलन का न होना ही वियोग है। सूफ़ी इसे क़ब्ज कहते हैं। जब साधक सान्निध्य प्राप्त करने की ओर रास्ते की बाधाओं को पार करते हुए आगे बढ़ता है, तो उसे बसत कहते हैं। इसीलिए सूफ़ी कहते हैं कि भविष्य की आशाओं को लेकर बसत की क्रिया बराबर चलती रहती है और क़ब्ज वर्तमान में मौजूद रहता है। सूफ़ी कहते हैं कि क़ब्ज (वियोग) बसत (संयोग) के मुक़ाबले अधिक लाभप्रद और उपयोगी होता है। क़ब्ज अहंभाव समाप्त करता है और प्रियतम की ज्योति उसके मन में उतरती जाती है। सूफ़ी मानते हैं कि अल्लाह का सान्निध्य प्राप्त करने के लिए ज़रूरी है कि साधक को किसी मुसीबत में डाला जाए। मुसीबत वही है जो साधक के दिल को बेचैन कर दे, परेशान रखे। जो साधक मुसीबत आने पर परेशान और बेचैन नहीं होता, धैर्य से काम लेकर उसे आसानी से जीत जाता है, तो सच में यह उसके लिए मुसीबत हुई ही नहीं। दुख से मन को कष्ट अवश्य पहुंचता है, लेकिन उससे आत्मा प्रज्ज्वलित जो उठती है। उसका विश्वास बढ़ता है।

सारांश यह है कि सूफ़ीमत की संपूर्ण साधना प्रेमाश्रित रही है। सूफ़ियों के लिए प्रेम का लक्ष्य ईश-सान्निध्य प्राप्ति है। इसी के लिए वह साधना करता है, इसी के लिए वह दुख सहता है, पीड़ाओं को सहन करता है। इसी के लिए वह तड़पता है, परेशान रहता है। जब वह मंजिल पा लेता है, अपने को मिटा कर वह उसी का हो जाता है, जिसको उसने अपना प्रियतम बनाया था। व्यक्ति साधना की उच्चभूमि में पहुंचने पर भी इनकी दृष्टि में लोकरक्षा और लोकरंजन के प्रति गहरा सरोकार बना रहा। परम्परा को स्वीकार करते हुए भी रूढ़ एवं जर्जर तत्वों की जकड़न को इन्होंने स्वीकार नहीं किया।

प्रेम मानव मन की नैसर्गिक क्षुधा है। प्रेम के लिए किसी प्रकार की संहिता का बनाया जाना संभव नहीं है। प्रेम अतर्कपूर्ण है। तर्क और प्रेम एक साथ नहीं रह सकते। तर्क प्रेम का निषेध करता है। अवरोध उत्पन्न करता है। जब कोई प्रेम करता है तो वह अतर्कपूर्ण बन जाता है। इसी तरह जब कोई तर्कनिष्ठ होता है तो वह प्रेमपूर्ण नहीं रह जाता। प्रेम का अनुभव नितांत वैयक्तिक होता है। इसलिए सूफ़ी-साधक प्रेम के जिन नियमों का पालन कर परमात्मा से तादातम्य स्थापित करता है, वे नियम उसके नितांत वैयक्तिक होते हैं। जैसे संसार की प्रत्येक वस्तु का स्वभाव अपने मूल की ओर लौटना है, उसी तरह आत्मा भी अपने मूल की ओर लौटना चाहती है। प्रत्येक आत्मा में उसी की ओर लौटने की इच्छा निहित रहती है। साधारण व्यक्ति मोहमाया में पड़कर अपनी आत्मा की इस नैसर्गिक क्षुधा की उपेक्षा ही नहीं करता बल्कि उसकी इच्छा का इतना दमन करता है उसे आत्मा की आवाज़ तक सुनाई नहीं देती। जब साधारण व्यक्ति के भीतर परमात्मा को जानने की जिज्ञासा उत्पन्न होती है, तब वह अध्यात्म-मार्ग पर चलना शुरु करता है। ऐसे व्यक्ति को सालिक (साधक) कहते हैं।

मुस्लिम समाज में जब साधारण व्यक्ति कर्मकाण्ड का पालन करता है तो हम कहते हैं कि वह शरीअत का पालन कर रहा है। शरीअत का अर्थ है इस्लामी विधि-विधान। इसके मार्ग पर चलकर साधक अपने आचरण को शुद्ध बनाता है ताकि वह सद्कर्मों में प्रवृत्त हो। आचरण की शुद्धता के लिए संयम की ज़रूरत होती है ताकि तन-मन सधे। इस तरह ईश-वंदना के तरीक़ों का निरंतर पालन करने से चित्तवृत्ति की एकाग्रता का अभ्यास होता रहता है। ऐसा करने वाले व्यक्ति को मोमिन कहते हैं।

साधना के मार्ग पर चलने के लिए व्यक्ति साधारण से मोमिन बनने का अभ्यास करता है। मोमिन बनने पर उसके अन्दर जब ईश-प्रेम का प्रस्फुटन होता है वह सालिक की स्थिति में पहुंचता है। सालिक का अर्थ है यात्री। मानवीय प्रेम से ईश्वरीय प्रेम की ओर अग्रसर होना ही साधक का लक्ष्य होता है। जब ईश्वर को खोजने की प्रबल उत्कंठा जाग्रत होती है, तो एक सालिक पीर (गुरु) के शरण में जाता है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने में गुरु (पीर) सहायक होता है। पीर ही साधक को प्रेम-पंथ दिखाता है और बिना गुरु के कोई भी ईश्वर को नहीं पा सकता है। यहा ईश्वर और साधक में चित्रकार और चित्र, सूर्य और किरण का संबंध है

अभी जारी है ....

(चित्र : साभार गूगल सर्च)

शुक्रवार, 16 मार्च 2012

साउथ अफ़्रीका में इंडियन ओपिनियन

गांधी और गांधीवाद-103

साउथ अफ़्रीका में

‘इंडियन ओपिनियन’

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गांधी जी के एक गुजरात के रहने वाले सहकर्मी थे मदनजीत व्यावहारिक। वे पहले मुम्बई के एक स्कूल के शिक्षक थे। 1898 में उन्होंने डरबन में “इंटरनेशनल प्रेस” नाम से एक छोटा-सा प्रिंटिंग प्रेस खोला था। नटाल भारतीय कांग्रेस के अधिकांश पम्फलेट और ब्रोशर वहीं से छपा करते थे। 1903 में मदनजीत इस प्रस्ताव के साथ गांधी जी से मिले कि एक साप्ताहिक पत्र निकाला जाए। किसी भी राजनीतिक कार्य के संचालन में प्रेस की भूमिका से गांधी जी भलिभांति परिचित थे। उन्होंने मदनजीत के आइडिया का स्वागत किया। इस प्रकार “इंडियन ओपिनियन” की शुरुआत हुई।

इस पत्र के पहले पी.एस. अय्यर 1898 से एक साप्ताहिक पत्र “इंडियन वर्ड” मारित्ज़बर्ग से निकालते रहे थे। इस पत्र के बंद हो जाने पर 1901 से उन्होंने “कॉलोनियल इंडियन न्यूज़” नाम से दूसरा अखबार निकालना शुरू किया। शुरू में यह दो भाषाओं में निकलता था, लेकिन 1902 के अप्रैल से केवल तमिल संस्करण ही निकाला जाता रहा। केवल तमिल व्यापारियों से विज्ञापन मिलने के कारण इसका आधार भी काफ़ी सीमित रहा और गुजराती व्यापारियों के बीच इसकी लिकप्रियता नहीं बढ़ पाई थी। गुजराती व्यापारियों के उदासीन रहने के कारण पी.एस. अय्यर को यह पत्र 1903 में बंद ही कर देना पड़ा।

4 जून 1903 को इंडियन ओपिनियन का पहला अंक डरबन से हिंदी, तमिल, गुजराती और अंग्रेज़ी में निकला। इसका मुख्य उद्देश्य प्रवासी भारतीयों की समस्याओं की वकालत करना था। इस अख़बार का लक्ष्य भारतीयों को उनकी कमियां बता कर उनके समाधान का रास्ता दिखाना था। साथ ही भारतीयों को उनकी ग़लतियों का अहसास कराना और अधिकारों और कर्तव्यों का ज्ञान कराना था। यह भी लक्ष्य था कि भारतीय और ब्रिटिश समुदाय के बीच एक सद्भावना का माहौल तैयार हो, उनके बीच की दूरियां घटे और ग़लतफ़हमियां दूर हो। बाद के दिनों में ब्रिटिश उपनिवेशवाद के वर्चस्व को चुनौती और उसके विरोधी आंदोलन में इस अखबार की अग्रणी भूमिका रही।

इसके पहले अंक में ही गांधी जी ने “अपनी बात” शीर्षक आलेख में लिखा था, “इस समाचार पत्र की ज़रूरत के बारे में हमारे मन में कोई संदेह नहीं है। ... भारतीय समाज की भावनाओं को प्रकट करनेवाले और विशेष रूप से उसके हित में संलग्न समाचार पत्र के प्रकाशन से उसकी एक बड़ी कमी पूरी होगी। ... समय सिद्ध करेगा कि जो सही है, वही करने की हमारी इच्छा है। ...”

बड़े आश्चर्य की बात है कि भारत में रहते हुए भी गांधी जी कभी अखबार ही नहीं पढ़े थे। जब वे विलायत पढ़ने गए तो उन्हें मालूम हुआ कि अखबार क्या होता है? लंदन में जब वे जुलाई 1888 में पहुंचे तो दलपतराम शुक्ल के सुझाव पर ‘डेली न्यूज़’, ‘डेली टेलीग्राफ’ और ‘पेलमेल गजट’ आदि अंग्रेज़ी अखबार पढ़ना शुरू किया। वही गांधी जी 1903 में एक अखबार प्रकाशित करते हैं। तब उनकी उम्र मात्र 34 साल की थी। गांधी जी अपने जीवन में पत्रकारों को काफ़ी महत्व देते रहे थे। उनसे बातचीत करना, साक्षात्कार देना, उनके क्रियाकलापों का एक अहम हिस्सा था। लेकिन इंडियन ओपिनियन के अस्तित्व में आने के बाद उनके लिए यह बेहद ज़रूरी हो गया था कि वे लगातार लेखन भी करें। इसके कारण उनके दैनिक क्रियाकलापों में एक यह काम भी आ जुड़ा। गांधी जी के विचारों की सबसे बड़ी शक्ति उनकी संप्रेषणीयता थी। वे बात की गहराई को समझते थे और उसे जनसाधारण तक पहुंचाने की योग्यता रखते थे। वे जो भी लिखते थे उसका मुख्य उद्देश्य प्रवासी भारतीयों को जागरूक करना होता था। गांधी जी की लेखनी और शैली इतनी उद्देश्य परक और प्रभावी होती थी कि पाठकों को इसे नकारना मुश्किल होता था। उनकी पत्रकारिता निर्भय पत्रकारिता थी।

इंडियन ओपिनियन के संपादक गांधी जी नहीं थे। उन्होंने तो पैसा लगाकर इसे चालू किया था। इस हिसाब से वे इसके मालिक थे। मनसुखलाल हीरालाल नाज़र इसके संपादक थे। वे मुंबई में पत्रकार रहे थे। मदनजीत व्यावहारिक इसका प्रिंटर नियुक्त हुआ। किंतु वास्तव में इसकी समस्त संपादकीय दायित्व गांधी जी पर ही था। नाज़र का मानना था कि दक्षिण अफ़्रीका के विषय पर गांधी जी ही बेहतर लिख सकते हैं। इसलिए जिन-जिन विषयों पर लिखना उन्हें ज़रूरी लगता उसका बोझ वे गांधी जी पर डाल दिया करते।

इस अख़बार में ट्रांसवाल को अधिक जगह मिलना स्वाभाविक ही था। लेकिन वह केवल दक्षिण अफ़्रीका में रह रहे भारतीयों की पीड़ा का ही इज़हार नहीं करता था, वह केवल उनके क़ानूनी अधिकारों और सम्मान की रक्षा की लड़ाई नहीं लड़ता था, बल्कि यह अखबार आत्मिक शुद्धि, आंतरिक शक्तियों का गठन भी करता दिखाई देता था।

जब पत्र शुरू किया गया, तो किसी ने भी यह कल्पना नहीं की थी कि इसमें इतनी लागत आएगी। गांधी जी ने इसमें अपना सारा पैसा झोंक दिया। संपादकीय और अन्य कई ऐसे व्यावसायिक काम थे जो स्वेच्छा से अवैतनिक करने होते थे। नटाल भारतीय कांग्रेस और ट्रांसवाल ब्रिटिश एसोसिएशन ने इसे मदद करनी शुरू कर दी थी। इसके एवज में उन्हें इसके कुछ कम्प्लीमेंटरी प्रति मिल जाया करते थे। इसके बावज़ूद इसकी आर्थिक स्थिति तंग ही रहती थी। अखबार न निकलता तब भी कोई हानि होने वाली नहीं थी। पर गांधी जी को लगा कि निकालने के बाद उसके बंद होने से भारतीयों की बदनामी होगी और समाज को हानि पहुंचेगी। साथ ही यह भी तय था कि इसे ज़िन्दा रखने के लिए गांधी जी को अपनी जेब से इसका खर्च उठाना पड़ेगा। पहले ही वर्ष में गांधी जी को इसके संचालन के लिए दो हज़ार पाउंड की राशी खर्च करनी पड़ी। एक समय तो ऐसा आया कि जब गांधी जी की सारी बचत उसी पर खर्च हो जाती थी। धन कमाने का विचार तो उनका कभी था ही नहीं, फिर भी भारतीय समाज की सेवा के लिए गांधी जी ने अपनी जेब से धन क्या इसमें अपनी आत्मा ही उड़ेल दी थी।

गांधी जी इसके हर अंक में कोई न कोई आलेख ज़रूर लिखते। सत्याग्रह के सिद्धांत को इससे लोगों को समझाने का प्रयत्न करते। वे बड़े नाप-तौल कर शब्दों का प्रयोग किया करते थे। जान-बूझकर बढ़ा-चढ़ाकर लिखना उनकी प्रकृति के विरुद्ध था। इसलिए उनके संयम की परीक्षा इस अखबार के ज़रिए खूब हुई। मित्रों के लिए यह उनके विचारों से अवगत होने का माध्यम बना। अलोचकों को यहां से कुछ खास मिल नहीं पाता था। गांधी जी का कहना था कि इस अखबार के बिना सत्याग्रह की लड़ाई चल नहीं सकती। अफ़्रीका के भारतीयों का सही हाल जानने का यह एक उपयोगी माध्यम बना। यह पत्र लोगों को शिक्षित करने के लिए था, साथ ही उन्हें सूचनाएं देने के लिए भी था। इस अखबार के कारण गांधी जी की भविष्य में होने वाली लड़ाई संभव हो सकी।

मनसुखलाल नाज़र की अकाल मृत्यु के बाद गांधी जी के एक अंग्रेज़ मित्र हर्बर्ट किचन इसके संपादक हुए। बाद में हेनरी एस.एल. पोलक संपादक हुए और कई वर्षों तक इस दायित्व को संभालते रहे। जब गांधी जी और पोलक जेल में थे, तो पादरी जोसफ़ डोक ने भी कुछ दिनों तक इसके संपादक के रूप में काम किया।

इस अखबार में शुरू में विज्ञापन और बाहर की छपाई के कुछ काम भी लिए जाते थे। पर इस सब काम में लोगों की खुशामद करनी होती थी। इसके अलावा कौन-से विज्ञापन दिए जाएं कौन-से न दिए जाएं, इसे तय करने में काफ़ी समय नष्ट होता था। इसलिए बाद में विज्ञापन छापना बंद कर दिया गया। किंतु आर्थिक तंगी के कारण गांधी जी के सामने यह प्रश्न अब भी था कि वे इसे चलायें या बंद कर दें। ऐसे में एक मित्र के रूप में अलबर्ट वेस्ट से उनकी मुलाक़ात हुई। एक दिन उसने समाचार पत्र में प्लेग की खबर और गांधी जी का पत्र पढ़ा और गांधी जी से मिलने चला आया। उसने कहा, कहिए मैं आपकी क्या सहायता कर सकता हूं? गांधी जी ने अलबर्ट वेस्ट से कहा मैं और मदनजीत तो प्लेग बीमारों की सेवा में लगे हैं, क्या आप डरबन जाकर मेरे अखबार को संभाल सकते हैं? हालाकि वेस्ट के पास उसका अपना प्रेस था, फिर भी उसने हामी भर दी। इस प्रकार प्रतिमाह मात्र दस पौंड वेतन पर उसने डरबन जाना स्वीकार कर लिया। वेस्ट को गांधी जी और मदनजीत से ज़्यादा धंधे की समझ थी। उसे समझते देर न लगी कि अखबार और प्रेस की हालत खास्ता है। जब वेस्ट डरबन पहुंचा तो उसे जांच से पता लगा कि वहां तो आर्थिक घपले किए गए हैं। मदनजीत और नाज़र ने गांधी जी को बहकावे में रखा था। प्रेस पर काफ़ी उधारी थी। वेस्ट ने गांधी जी को समझाया कि उन्हें खुद डरबन आकर कुछ मामलों को फ़ौरन सुलझाना पड़ेगा। गांधी जी ने डरबन जाने की निश्चय किया।

गांधी जी जब जोहान्सबर्ग से डरबन जाने के लिए रेल में सवार हुए तो उनके पत्रकार मित्र पोलक ने रास्ते में पढ़ने के लिए रस्किन की किताब “अनटू दिस लास्ट” पुस्तक दी। गांधी जी ने जब किताब पढ़नी शुरू की तो इसमें पूरी तरह रम गए। दूसरे दिन शाम को जब गाड़ी डरबन पहुंची तब तक वह पुस्तक वे पढ़ चुके थे और रस्किन के सिद्धांत को अमल में लाने का निश्चय कर चुके थे। इस पुस्तक से उन्हें काफ़ी प्रेरणा मिली। उन्होंने “इंडियन ओपिनियन” प्रेस के गोरे प्रबंधक और अपने मित्र एलबर्ट वेस्ट के साथ प्रेस को एक फार्म में ले जाने की योजना बनाई। इसके लिए यह निर्धारित किया गया कि फार्म के सभी निवासी श्रमजीवी होंगे और सबको समान वेतन मिलेगा। सभी मिलकर प्रेस चलायेंगे। डरबन से 14 मील दूर फिनिक्स में एक हज़ार पौंड में गांधी जी ने गन्ने के खेतों के बीच सौ एकड़ ज़मीन ख़रीदी और फिनिक्स आश्रम की नींव डाली। ज़मीन पथरीली और उबड़-खाबड़ थी। उसमें पानी का एक झरना भी था। आम, पपीते और कुछ मलबेरी के पेडों को छोड़कर पूरा मैदान सूखी घास से भरा था। वहां सांपों का उपद्रव भी था। नज़दीक का फिनिक्स स्टेशन यहां से तीन मील दूरी पर था। इस आश्रम के सबसे पहले निवासियों में पोलक, वेस्ट और गांधी जी के चचेरे भाई छगनलाल गांधी, मगनलाल गांधी और मेकेनिक गोविंदस्वामी थे। “इंडियन ओपिनियन” को डरबन से फिनिक्स लाया गया। प्रेस के लिए पचहत्तर फुट लंबा और पचास फुट चौड़ा एक छप्परनुमा हॉल बनाया गया। संस्थावासियों के रहने के लिए आठ मकान खड़े किए गए।

वहां से निकलने वाले पहले अंक की कहानी भी बहुत ही रोचक है। जिस रात अखबार छपना था, उस दिन मशीन टूट गई। गांधी जी तो पहले से ही यह मानते थे कि मशीन पर बहुत निर्भर न रहा जाए। लेकिन उनकी बात कोई मानता ही न था। अब तो हाथ से मशीन चलाने के अलावा कोई चारा भी नहीं था। गांधी जी ने अकेले ही मशीन चलानी शुरू कर दी। वेस्ट आंखें फाड़-फाड़ कर देख रहा था। तेल के इंजन से चलने वाले प्रेस को उन्होंने हैंडप्रेस में तबदील कर दिया। इस प्रकार पत्र का प्रकाशन ट्रेडिल मशीन पर हाथ की ताक़त से होने लगा। उस मशीन की हैंडल चलाने के लिए चार लोगों की ज़रूरत पड़ती थी। उस समय उतने लोग वहां न थे। गांधी जी ने सोते हुए बढ़ई, लोहार आदि को जगा दिया। थोड़ी ही देर में वहां से छपाई होने लगी। सुबह ठीक समय पर अखबार निकला।

गांधी जी का स्वावलंबन का यह प्रयोग काफ़ी सफल रहा। पोलक ने जब सुना कि गांधी जी ने फिनिक्स से “इंडियन ओपिनियन” नामक अखबार निकालना शुरू किया है तो उसने अपने पुराने अखबार “क्रिटिक” से इस्तीफ़ा दे दिया और “ओपिनियन” में आ गया। गांधी जी और पोलक प्रूफ़ जांचने का काम करते थे। खर्च घटाने के लिए 28 जनवरी 1906 से इसका हिंदी और तमिल संस्करण बंद कर दिया गया। जहां सामान्यतः इस अखबार के 1200 से 1500 तक ग्राहक होते थे, जब आंदोलन ने उग्र रूप लिया तो धीरे-धीरे इस अखबार के ग्राहकों की संख्या 3500 हो गई। पाठकों की संख्या 20,000 रही होगी।

इस अखबार ने गांधी जी की लड़ाई में बहुत निर्णायक और महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी पत्र के द्वारा गांधी जी ने “सत्याग्रह” शब्द का आगाज़ किया। “हिंद स्वराज” का क्रमिक प्रकाशन इसी अखबार से हुआ। गांधी जी के भारत प्रस्थान करने तक, अर्थात 18 जुलाई 1914 तक “इंडियन ओपिनियन” के 581 अंक निकले। इनकी कुल पृष्ठ संख्या 15,544 थी। गांधी जी के जाने के बाद इसके ग्राहकों की संख्या 3500 से घटकर 500 ही रह गई। उनके भारत चले आने के बाद उनके पुत्र मणिलाल गांधी ने 1916 से 1958 तक संपादक के रूप में इस पत्र को चलाया। 1958 में मणिलाल की मृत्यु के बाद सुशीला मशरूवाला, मणिलाल की पत्नी, किशोरलाल मशरूवाला की भतीजी, इसकी संपादक बनीं। उन्होंने इसका नाम बदल कर “ओपिनियन” कर दिया। वे इसे 4 अगस्त 1961 तक चला सकीं।

गांधी जी इस अखबार को समाज की सम्पत्ति मानते थे। वे यह मानते थे कि समाचारपत्र सेवाभाव से ही चलाए जाने चाहिए। यह अखबार उनकी आवाज़ और पुकार के रूप में प्रतिध्वनित हुआ। इसमें न सिर्फ़ समसामयिक विषय पर विचार किया जाता था बल्कि स्थाई समस्याओं पर भी विचार किया जाता था। गांधी जी ने पत्रकारिता के कई नए कीर्तिमान क़ायम किए। जितनी सामग्री आती थी, अखबार में छपने के पहले वे उसे खुद देखते थे। सामग्री वे भारत से भी मंगवाते थे। रामनरेश त्रिपाठी की एक कविता जो सरस्वती में छपी थी, उसे इस अखबार में उन्होंने छापी। अखबार में साहित्यिक योगदान के लिए उन्होंने कई विद्वानों से सलाह लिया, उनमें से प्रमुख हैं मदनमोहन मालवीय। वे अच्छे लेखकों की खोज में रहते थे। इंडियन ओपिनियन में उस ज़माने के बड़े-बड़े लोग लिखा करते थे।

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बुधवार, 14 मार्च 2012

बरसात का एक दिन!

बरसात का एक दिन!

कलकत्ता में वर्षा झट से आती है और जमके बरसती है। उस दिन भी ऐसा ही हुआ। इन दिनों डेली यात्री के बांए कंधे पर बैग और दाएं हाथ में छाता का होना एक आवश्‍यक सामग्री है। धर्मतल्ला पर बस से उतरा ही था कि ज़ोर की वर्षा शुरू हो गई। जब तक छाता खोलता थोड़ा-बहुत भींग ही गया। इतनी मूसलाधार बारिश थी कि खुद को बचते-बचाते फुटपाथ पर आश्रय लेना पड़ा। वहां बहुत सारे लोग थे। क़रीब-क़रीब एक दूसरे से चिपके पानी की बूंदो से खुद को बचाते। कुछेक महिलाएं भी थी, पानी की बूंदे तो उन्‍हें परेशान कर ही रही थी, लोगों की नजरों एवं उनकी हरकतों से भी उन्‍हें खुद को बचाना पड़ रहा था।

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तभी एक खूबसूरत शोड़षी पर मेरी नज़र पड़ी। सावन के इस सुहाने मौसम में उसकी दुबली पतली काया पर पीत वस्‍त्र … मानों सरसों के खेत में गुलाब का फूल ! उस दुकान के सामने की फुटपाथ के सात-आठ फीट की जगह में खड़े पचासों लोगों की घूरती निगाहें उसे विचलित कर रही थी, या और कोई विवशता थी, पता नहीं पर वह बार बार इधर-उधर व्यग्रता से देख रही थी और कुछ क्षणोपरांत धीरे-धीरे सरकते – सरकते मेरे बगल में आ गई। मेरा सौभाग्य !!

Indian-motifs-11मध्‍यम किंतु मीठे कोकिल स्‍वर में बोली, “तुम्‍हारे पास छाता है।”

“हूँ।” मैं थोड़ा सकुचाया।

वहां की सैंकड़ों जोड़ी आंखे अब मुझपर भी शिफ़्ट हो गई थीं।

उस सुदंरी के संग मैं था, कहना सही नहीं होगा, पर मेरे पास वह थी, यह इस मौसम में वहां के लोगों के मन में इर्ष्‍या घोलने के लिए काफी था।

उसने मेरी ओर देखा। मैं सकुचाया और नीचे देखने लगा। मेरे हृदय की धड़कने बेलगाम हो चुकी थी कूद कूद कर घोषणा कर रही थी , “इट्स लव ऐट फ़र्स्ट साइट!” … ऊँह! … अहा!! … और मैं मन ही मन प्रसन्‍न, इन्‍द्र देवता को बार बार आभार प्रकट कर रहा था, “सब प्रभू आपकी कृपा है।”

वह बालों में घुस आये जलकण को झटके से दूर करती बोली, “छाता है, ... तो यहां क्‍या कर रहे हो? .. चलो यहां से!”

उस समय वह इन्‍द्रसभा की अप्सरा ही तो लग रही थी।

पीली साड़ी के साथ नीला ब्‍लाऊज और गुलाबी चोटी भी अब मुझे दिखा। लाल लिपिस्‍टिक वाले होठ के पीछे से मोती से भी सफेद दंत पंक्तियां मेरे सौभाग्य की पराकाष्‍ठा का ऐलान कर रही थी। मैनें साथ निकल पड़ने की सारी इच्‍छाओं के बावजूद कहा, “पर इतनी तेज़ बारिश … में …. ? … भींग जाएंगे!”

“कुछ नहीं होगा। यहां जो सारे घूर रहे हैं! सब जलेंगे, जब तुम मेरे साथ चलोगे! चलो ना, मजा करते हैं!!” वह इठलाते हुए बोली।

मैं उसके सौदंर्य के जादू, यौवन की तपिश और व्‍यक्तित्‍व के आकर्षण में ऐसा खोया कि मुझे कुछ अंदाज नहीं रहा कब मैं उसके साथ सड़क पर आ गया।

उस वक्‍त धर्मतल्‍ला पर मौजूद सबसे खूबसूरत लड़की मेरे छाता में घुसी! मुझे अपने भाग्‍य पर यकीन ही नहीं हो रहा था! यह सच था!!

वह मेरे छाता में आ चुकी थी। फिर हम दोनों छाता में थे। फिर वह मेरे छाता में थी और मैं उसके साथ था। फिर छाता उसके हाथ में था और मैं छाता में था। फिर वह छाता में थी और मैं साथ में था। फिर वह छाता में थी और मैं उसे देखता हुआ पीछे-पीछे वर्षा की बूदों का मजा ले रहा था।

वह काफी तेज गति से सड़क पार करती जा रही थी। मैं उसे धीमी गति से पकड़ने की कोशिश कर रहा था। वह आगे और आगे गई। मेट्रो सिनेमा के नीचे उसने आश्रय लिया। इधर-उधर देखने लगी। मैं सोचा मैं पीछे रहा गया था, शायद मुझे खोज रही हैं। मैं लपक कर वहां पहुंचा।

तब तक दूसरी तरफ़ से एक युवक आया और उससे बोला, “कहां रह गई थी? मैं कब से वेट कर रहा था।”

उसके मधुर स्वर फूटे, “वर्षा में फंस गई थी। ये तो इन भद्र पुरुष का छाता का सहारा मिला, ... तो चली आई।”

वह उस आ चुके युवक का हाथ पकड़ कर बोली, “चलो-चलो! पिक्‍चर शुरू हो गई क्‍या.......?” फिर वह मेरी और पलटी, छाता थमाया और बोली, “थैंक्‍यू दादा।”

मैं मेट्रो के बाहर छाता मोड़ कर वर्षा के जल में भींगता धीमी गति से आगे बढ़ रहा था। न मुझे कहीं जाने की ज़ल्दी थी और न ही मैं ज़ल्दी में था।

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सोमवार, 12 मार्च 2012

जोहानिस्बर्ग में दफ़्तर रखने का निश्चय

गांधी और गांधीवाद-102

जोहानिस्बर्ग में दफ़्तर रखने का निश्चय

clip_image001एशियाटिक विभाग के अधिकारी न सिर्फ़ गांधी जी को चेंबरलेन से मिलने से रोक दिया बल्कि शिष्टमंडल के सदस्यों को डराया-धमका भी। संबंधित अधिकारी ने उन व्यक्तियों की लिस्ट से गांधी जी का नाम निकाल दिया जो उपनिवेश सचिव से मिलने वाले थे। इस अपमान से गांधी जी को बड़ा दुख हुआ, उनके दिल को चोट पहुंची। DSCN1492ऐसा नहीं था कि यह उनके साथ पहली बार हुआ था। न सिर्फ़ दक्षिण अफ़्रीका में बल्कि भारत में भी उन्हें कई बार अपमान के कड़वे घूंट पीने पड़े थे। इसलिए उन्होंने अपमान की परवाह न करते हुए तटस्थता-पूर्वक काम करने का निश्चय किया। स्थिति नाज़ुक ही नहीं गंभीर भी थी। एक तरफ़ तो चेंबरलेन से मदद तो दूर कोई आश्वासन भी नहीं मिला था, दूसरे उस अधिकारी ने अपने हस्ताक्षर में जो पत्र दिया था, उसमें लिखा था, चूंकि गांधी जी डरबन में मि. चेम्बरलेन से मिल चुके हैं, इसलिए अब उनका नाम प्रतिनिधियों की लिस्ट से निकाल डालने की ज़रूरत है। जब यह जानकारी अन्य साथियों को मिली तो यह उनके लिए असह्य था। सबने राय दी कि अब प्रतिनिधि मंडल के जाने का विचार त्याग ही दिया जाए।

गांधी जी को यह विचार उचित नहीं लगा। उन्हें समझाते हुए उन्होंने कहा, “अगर आप चेम्बरलेन के पास नहीं जाएंगे, तो यह मान लिया जाएगा कि यहां भारतवासियों को कोई कष्ट ही नहीं है। मेरे जाने न जाने से बहुत फ़र्क़ नहीं पड़ता। हमें जो बात कहनी सो तो हम लिख कर कह ही देंगे। और लिखा हुआ प्रार्थना-पत्र तो तैयार है ही। उसे मैं पढ़ूं या दूसरा कोई और पढ़े, इसकी चिंता मत कीजिए। वैसे भी चेम्बरलेन हमसे कोई चर्चा थोड़े ही करेंगे। रही बात मेरे अपमान की, तो वक़्त की नज़ाकत को समझते हुए उसे कड़वे घूंट की तरह हमें पी जाना है।

तैयब सेठ से सहा न गया, वे बोल पड़े, “पर आपका अपमान सारे भारतीय समाज का अपमान है। आप हमारे प्रतिनिधि हैं, इसे कैसे भुलाया जा सकता है?”

गांधी जी ने शांतिपूर्वक उन्हें समझाया, “यह सच है, पर समाज को भी ऐसे अपमान पी जाने पड़ेंगे। हमारे पास दूसरा इलाज ही क्या है?”

तैयब सेठ अब भी विचलित थे, “भले जो होना हो सो हो, पर जान-बूझकर दूसरा अपमान क्यों सहा जाए? जो बिगड़ना था सो तो बिगड़ ही चुका है। हमे हक़ ही कौन-से मिले हैं?”

यह जोश और जज़्बा गांधी जी को अच्छा लगा। पर वे जानते थे कि इस तरह से काम नहीं चलने वाला है। उन्हें अपने समाज की मर्यादा का भान था। इसलिए उन्होंने साथियों को शांत किया और अपनी जगह शिष्टमंडल दल के नेता के रूप में जॉर्ज गॉडफ़्रे, जो भारतीय बैरिस्टर थे, को ले जाने की सलाह दी। गॉडफ़्रे प्रतिनिधिमंडल के नेता बने।

जो भी हुआ था ऐसा नहीं है कि उस पर चेम्बरलेन की सहमति की मुहर नहीं लगी होगी। प्रतिनिधिमंडल चेम्बरलेन से मिला और प्रर्थना-पत्र उसे सौंपा जा सका। वहां जब गांधी जी की बात चली, तो चेंबरलेन ने कहा था, “मि. गांधी से तो मैं डरबन में मिल चुका हूं। इसलिए यह सोचकर कि यहां के लोगों का वृत्तांत यहीं के लोगों से सुनना ज़्यादा अच्छा होगा मैंने उनसे मिलने से इंकार कर दिया।” एशियाटिक महकमे ने जो सिखाया था, चेम्बरलेन ने वही कहा।

चेम्बरलेन पर उस वक़्त स्थानीय ब्रिटिश अधिकारियों का काफ़ी असर था। गोरों को संतुष्ट करने के लिए वह इतना आतुर था कि उसके हाथों से न्याय होने की आशा बहुत ही कम थी। कुछ लोगों ने व्यंग्य करते हुए गांधी जी को यह भी सुना दिया कि “बोअर युद्ध में अंगरेज़ों की सहायता कर हमें क्या मिला? आपके कहने से समाज ने लड़ाई में हिस्सा लिया, पर परिणाम तो यही निकला न?”

इस तरह के तानों से गांधी जी ने विचलित होना नहीं सीखा था। उन्होंने कहा, “मुझे इस सलाह का पछतावा नहीं है। मैं अब भी यह मानता हूं कि हमने लड़ाई में भाग लेकर ठीक ही किया। वैसा करके हमने अपने कर्तव्य का पालन किया। हमें उसका फल चाहे देखने को न मिले, पर मेरा यह पक्का विश्वास है कि अच्छे काम का फल हमेशा अच्छा ही होता है। लेकिन अब बीती बातों पर माथा-पच्ची करने से बेहतर है कि फिलहाल हमारे सामने जो चुनौतियां हैं हम उस पर विचार करें।”

चाहे जो भी उनके साथ अपमान की घटना हुई हो, चाहे जितना भी उन्हें धक्का लगा हो, दुख हुआ हो, लेकिन उनका अब भी मोहभंग नहीं हुआ था। उन्हें अब भी अंगरेज़ों की न्याय-भावना और औचित्यपूर्ण व्यवहार पर विश्वास था। अब भी साम्राज्य के उच्च और महान उद्देश्यों में उनकी आस्था थी। उन्हें अब भी उम्मीद थी कि आज न कल सच्चाई जानकर अंग्रेज़ों की आंखें खुलेंगी, और तब वे अपने आपको सुधारेंगे।

गांधी जी जिस काम के लिए ट्रांसवाल गए थे वह काम तो पूरा हो चुका था। प्रार्थना-पत्र तो चेम्बरलेन को सौंप दिया गया था। लेकिन गांधी जी का काम इतने से समाप्त नहीं हुआ था। जो कुछ उन्होंने देखा था, उससे वे विचलित थे। उन्हें लगा कि अभी उन्हें वहां से वापस नहीं जाना चाहिए। उन्हें लगा कि ऐसी कष्टमय हालत में ट्रांसवाल से निकल जाना कायरता होगी। उन्हें यह भी लगा कि ट्रांसवाल के भारतीयों को नेटाल के भारतीयों की अपेक्षा उनकी अधिक ज़रूरत है। उन्हें स्पष्ट तौर पर दिख रहा था कि यदि वे वहां के लोगों की मदद करना चाहते हैं, तो छह महीने क्या साल भर में भी भारत लौटना मुश्किल था। वस्तुस्थिति तो यह थी कि उन्हें वहां भी वही सब करना होगा जो उन्होंने नेटाल में किया था। स्थिति का आकलन करने पर उन्होंने पाया कि फिलहाल कुछ नया तो किया नहीं जा सकता, मौज़ूदा क़ानून के अंदर ही जितना हो सके अधिक-से-अधिक प्रशासनिक सुविधा हासिल की जाए। जिस क़ानून को क्रूगर लागू न कर पाया, यदि वर्तमान शासक ब्रिटिश शासन की मदद से लागू कर देता है, तो भारतीयों की स्थिति बहुत ही दयनीय हो जाएगी।

आत्मकथा में उन्होंने लिखा है, “अगर मैं कौम को भयावह स्थिति में देखते हुए भी भारत में सेवा करने के अभिमान से वापस जाऊं तो जिस सेवा-धर्म की झांकी मुझे हुई है वह दूषित हो जाएगी। मैंने सोचा कि मेरी ज़िंदगी भले ही दक्षिण अफ़्रीका में बीत जाए, पर जब तक घिरे हुए बादल बिखर नहीं जाते या हमारी सारी कोशिश के बावज़ूद और अधिक उमड़कर कौम फट नहीं पड़ते, तब तक मुझे ट्रांसवाल में ही रहना चाहिए।”

उन्होंने नेताओं के साथ बातचीत की। निश्चय किया कि वहीं रहना है और अपना काम अब उन्हें नेटाल से नहीं प्रिटोरिया से ही चलाना चाहिए। एक साल के अंदर भारत वापस जाने के जिस इरादे से वे आए थे, उसे अब त्याग देना ही उचित था। फिर से वकालत का धंधा उन्हें शुरू कर देना चाहिए। ये जो नया विभाग खोला गया है, उससे निबट लेने की हिम्मत तो उनमें है ही। यदि मुक़ाबला न किया गया, तो इससे भारतीय समाज का बहुत बड़ा अहित होगा। हो सकता है कि उनके पैर ही वहां से उखड़ जाएं। समाज का अपमान और तिरस्कार दिन-प्रति-दिन बढ़ता ही जाएगा। उनका मानना था, “इस अन्याय, अनीति का प्रतिकार करना धर्म है।

अपनी आत्मकथा में गांधी जी लिखते हैं, “चेम्बरलेन मुझसे नहीं मिले, उस अधिकारी ने मेरे साथ तिरस्कारपूर्ण व्यवहार किया, यह तो सारे समाज के अपमान की तुलना में कुछ भी नहीं है। यहां हमारा कुत्तों की तरह रहना बरदाश्त किया ही नहीं जा सकता।”

दक्षिण अफ़्रीका के भारतीयों का संकट इतना बड़ा और विकट था और गांधी जी पर उनका विश्वास इतना अधिक और दृढ़ था कि लौट जाने का गांधी जी का मन नहीं हुआ। गांधी जी ने प्रिटोरिया और जोहान्सबर्ग में रहने वाले भारतीय नेताओं से विचार-विमश करने के बाद फरवरी 1903 के मध्य में, जोहानिस्बर्ग में दफ़्तर रखने का निश्चय किया। वकालत करने के उनके प्रार्थना-पत्र का विरोध नहीं हुआ और ट्रान्सवाल की बड़ी अदालत ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। हालाकि भारतीय को अच्छे स्थान में ऑफिस के लिए घर मिलना मुश्किल था, लेकिन अंगरेज़ मित्र मि. रीच, जो उस समय के व्यापारी-वर्ग में प्रतिष्ठित थे, की मदद से एक अच्छी बस्ती, ट्रॉयविल में बड़ा-सा बंगला, 14-अल्बमेरी स्ट्रीट, भाड़े पर लिया। यह एक कमरे वाला मकान था। जब ऑफिस के लिए घर मिल गया, तो अप्रैल 1903 में उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में एक वकील के रूप में नाम दर्ज़ कराया। ट्रांसवाल में भारतीयों की सबसे बड़ी आबादी जोहान्सबर्ग में थी। इसलिए आजीविका और सार्वजनिक काम दोनों की दृष्टि से जोहान्सबर्ग ही गांधी जी के अनुकूल केंद्र था। जून 1903 तक उनका व्यवसाय जम गया था। एक बार जब वहां उनके पैर जम गए, तो उन्होंने सोचा कि अब मुम्बई का दफ़्तर बंद कर दिया जाए।

एक बार फिर से संकट की घड़ी ने उनके और उनके परिवार की जीवन धारा ही बदल दी। 1893 में गांधी जी एक साल के लिए दक्षिण अफ़्रीका आए थे और आठ साल रहकर गए, 1902 में वे छह महीने के लिए आए और लौटकर जाने में उन्हें बारह वर्ष लग गए। अब गांधी जी के जीवन का नया अध्याय शुरू होने वाला था। रंगभेद की नीतियां खत्म होने की जगह और भी उग्र हो गई थी। उसके विरुद्ध उन्हें लड़ना था। प्रवासी भारतीयों के अधिकार की लड़ाई कोई बराबरी की लड़ाई नहीं कमज़ोर का बलवान से मुक़ाबला होने वाला था। यह लड़ाई कितनी लंबी होगी यह कोई नहीं जानता था। इस लड़ाई ने गांधी जी के सारे मूल्य-बोध बदल दिया। उनमें एक नई दृष्टि, एक नया दर्शन नए मूल्य-बोध का प्रादुर्भाव हुआ। उनके भीतर नैतिक और आध्यात्मिक शक्ति का अद्भुत उत्थान हुआ जिसने इतिहास की दिशा ही बदल दी। उनके विचारों में गंभीर परिवर्तन हुए।

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बुधवार, 7 मार्च 2012

सूफ़ियों की प्रेमोपासना-1

सूफ़ियों ने विश्व-प्रेम का पाठ पढ़ाया अंक-8

सूफ़ियों की प्रेमोपासना-1

सूफ़ी साधना वास्तव में प्रेम-साधना है। सूफ़ी साधकों का मूल आधार ईश्वर को प्रेम द्वारा पाना है। लक्ष्य ईश्वर है और ज़रिया प्रेम है। मानव-जीवन की आत्मा मूलतः प्रेम है। इसके बिना जीवन नीरस और आनन्द रहित है। ईश्वर के प्रति पाया जाने वाला प्रेम ही सर्वोच्च, सर्वश्रेष्ठ और पवित्रतम होता है। प्रेम का अधिकारी केवल ईश्वर है, शेष जितने भी प्रेम इस जगत में हैं, वे सब उसके अधीन होने चाहिए। सूफ़ी इसी प्रेम के कायल हैं।

हज़रत इमाम ग़ज़ाली रह. के अनुसार प्रेम यह है कि मन उसी में लगा रहे और रसानुभूति करे। जितनी रसानुभूति होगी, प्रेम होगा। ईश-प्रेम की कसौटी रसानुभूति ही है। हजरत सहल तुस्तरी रह. ने कहा कि अल्लाह की सदैव और अनवरत भक्ति और आज्ञापालन और उसके आदेशों की अवज्ञा से सदैव के लिए परहेज़ का नाम प्रेम है। तमाम सूफ़ी इस पर सहमत हैं कि प्रेम प्रियतम के तदनुरूप होने का नाम है और तदनुरूपताओं में सब से बड़ी तदनुरूपता मन की तदनुरूपता है। सामान्य रूप से सूफ़ी प्रेम की चर्चा साधन और साध्य दोनों दृष्टि से करते हैं।

हज़रत इब्ने तैकिया रह. कहते हैं कि अल्लाह की मुहब्बत (ईश-प्रेम) ही धर्म का मूल है। जो जितना ईश-प्रेम करेगा, वह उतना ही धर्म का पालन करेगा और ईश-प्रेम में जितनी कमी होगी, उत्ना ही वह कम धर्म का पालन करेगा। मनुष्य के पैदा किये जाने का मूल उद्देश्य प्रेम है। अपने पालनहार की इबादत (भक्ति और आज्ञापालन) करो. इबादत में प्रेम का पाया जाना अनिवार्य है। प्रेम नहीं तो इबादत नहीं हो सकती, इसलिए कि उत्कृष्ट प्रेम ही प्रियतम को उपास्य बना सकेगा। अतः प्रेम को साध्य होने में संकोच नहीं रह जाता।

हज़रत मुईनुद्दीन चिश्ती रह. का कहना है कि सूफ़ी-साधक अक़्ल की आंख से महबूब के हुस्न को नहीं देखता बल्कि मजनूं की आंख से लैला को देखता है। वह प्रभु को देखता ही प्रेमी (आशिक़) की दृष्टि से है। वह अपनी संपूर्ण चाहत, उस ‘परम प्रिय’ पर उंड़ेलकर उसी का हो जाता है। प्रेम की यही एकनिष्ठा उसके आचरण को अकलुष, पवित्र बना देती है।

हज़रत जुन्नून बिन इब्राहिम रह. तो यहां तक कहते हैं कि सूफ़ी वह है, जिसने सृष्टि में केवल अल्लाह ही को पसंद किया है। फ़क़ीर वह है जो ईश्वर के अतिरिक्त किसी और वस्तु की ओर आकृष्ट न हो।

अबू उस्मान रह. का मानना है कि तसव्वुफ़ का अर्थ संसार-त्याग और वास्तविकताओं का पा लेना है और कौन नहीं जानता कि प्रेम सूफ़ीमत में सबसे बड़ी वास्तविकता है। इन सबसे प्रेम का साध्य होना ही स्पष्ट होता है।

हज़रत अली हिज्वेरी रह. का कहना है कि ईश्वर के प्रति साधक के मन में जो प्रेम उत्पन्न होता है, वह इतना व्यापक हो जाता है कि प्रेमी साधक सांसारिक विषयों की ओर से अनासक्त बन जाता है और केवल प्रेम ही के नियमों का पालन कर ईश्वर से तादातम्य स्थापित करता है।

रहा प्रेम का साधन होना, तो इसमें कोई संदेह नहीं कि सूफ़ियों के लिए प्रेम ही वह सीढ़ी है जो उसे ईश्वर तक पहुंचा सकता है। प्रेम ही वह माध्यम है, जो उसे प्रियतम की प्रसन्नता प्राप्त करने पर उभरता है। प्रेम ही वह रास्ता है जो प्रभु से निकलता है। प्रेम ही वह पथ है जो उसके जीवन को प्रियतम के कहे अनुसार चलने पर उभरता है। इस प्रकार वह प्रियतम का हो जाता है और प्रियतम उसका। हज़रत राबिया बसरी मानती हैं कि अल्लाह के प्रेमी की चाह को उस समय तक चैन नहीं, जब तक वह अपने प्रियतम के पास न पहुंच जाए। हज़रत अबू अब्दुल्लाह अल-क़ुरैशीरह. फ़रमाते हैं कि प्रेम की वास्तविकता यह है कि तुम अपने प्रियतम पर अपनी हर चीज़ क़ुरबान कर दो और तुम्हारे पास कोई चीज़ बाक़ी न रहे।

प्रेम-पथ की यात्रा और सात घाटियां

सूफ़ी कवि हज़रत फ़रीदुद्दीन अत्तर रह. ने प्रेम-पथ की यात्रा के लिए सात घाटियों को पार करना आवश्यक माना है।

1. पहली घाटी खोज घाटी है। यह लंबी तथा श्रम-साध्य है। यहा साधक को सभी सांसारिक वस्तुओं का परित्याग कर देना होता है। इस घाटी में साधक को तभी तक ठहरना चाहिए जब तक उसके मन को परम ज्योति अपनी रश्मियों में लपेट न ले।

2. परम ज्योति का स्पर्श पाकर साधक प्रेम की अनंत घाटी में प्रवेश करता है। यहां से उसका रहस्यवादी साधक का जीवन शुरु होता है।

3. तीसरी अवस्था में वह मारिफ़त की घाटी में प्रवेश करता है। इस घाटी में यात्री को सत्य का रहस्य ज्ञात हो जाता है।

4. चौथी घाटी अनासक्ति की घाटी है, इसमें ईश्वरीय प्रेम से अभिभूत होना पड़ता है।

5. पांचवीं घाटी एकत्व की है। यह आनंद की घाटी है। इसमें सौंदर्य की अंतर्दृष्टि प्राप्त होती है।

6. छठी घाटी कौतूहल तथा चकाचौंध की घाटी है। यहां सूफ़ी साधक की अंतर्दृष्टि का पुनः लोप हो जाता है और वह अंधकार में फंसता प्रतीत होने लगता है।

7. सातवीं घाटी ‘हक़ीक़त’ की घाटी है। इसमें आत्मा का प्रेम के महासागर में विलयन हो जाता है।

सूफ़ी साधक की इस यात्रा को सूफ़ी-साधना में शरीअत, तरीक़त, मारिफ़त और हक़ीक़त नाम से भी समझाया गया है। इसी साधना के द्वारा साधकइश्क़े मज़ाज़ी से इश्क़े हक़ीक़ी को प्राप्त होता है।

इश्क़े हक़ीक़ी

सूफ़ियों के लिए ईश-प्रेम ही मूल धर्म है। इसे सूफ़ी इश्क़े हक़ीक़ी (वास्तविक प्रेम/आध्यात्मिक प्रेम) का नाम देते हैं। इसकी पहचान यह है कि प्रियतम ईश्वर का प्रेम प्रेमी में हर उस गुण के लिए लगाव पैदा कर देता है, जो प्रियतम को प्रिय हो, अतएव ऐसा प्रेम प्रेमी में विनम्रता पैदा करता है और वह हर उस वस्तु से भी प्रेम करना सीखता है जिसमें वास्तविक प्रियतम प्रतिबिम्बित होता है। सूफ़ी लोग ऐसे प्रेम को मजाज़ी कहते हैं।

इश्क़े मजाज़ी

इश्क़े मजाज़ी वह सांसारिक प्रेम है जो प्रियतम तक पहुंचने का साधन बनता है। सूफ़ी मानवीय प्रेम को आध्यात्मिक प्रेम तक पहुंचने की सीढ़ी मानते हैं। जबतक मनुष्य सांसारिक प्रेम को नहीं जान पाता, उनके लिए आदर्श प्रेम तक पहुंचना संभव नहीं। साधक सांसारिक सौंदर्य का आनन्द तो उठाता अवश्य है, लेकिन वहीं तक नहीं रह जाता, उसे इश्क़े हक़ीक़ी तक आगे बढ़ना पड़ता है। सूफ़ी अनन्त सौंदर्य का दर्शन करता है। अनन्त सौंदर्य तो परमात्मा की ही एक मात्र सत्ता है। वह परम सत्य और परम मंगल है। उसी के प्रतिछवि के रूप में समस्त जगत और उसके प्राणी अभिव्यक्त हो रहे हैं, इसलिए सांसारिक सौंदर्य दर्शन उसी परम सत्ता के गुणों के सौंदर्य का दर्शन है।

अभी ज़ारी है ....

शुक्रवार, 2 मार्च 2012

अपमान का कड़वा घूंट

गांधी और गांधीवाद- 101
अपमान का कड़वा घूंट
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कुछ हफ़्ते के लिए दक्षिण अफ़्रीका के प्रवास में चेम्बरलेन को डरबन से केपटाउन तक के 1100 मील से अधिक के भूखण्ड का तूफानी दौरा करना था। उसका अगला पड़ाव ट्रान्सवाल में था। गांधी जी को अभी भी उस पर विश्वास था और उसके समक्ष वहां के भारतीयों का केस भी पेश करना था। लेकिन गांधी जी के सामने समस्या वहां पहुंचने की थी। जब वे पिछली बार दक्षिण अफ़्रीका आए थे तो उन्होंने ट्रांसवाल का भी दौरा किया था। उन्हें मालूम था कि रंगभेद की नीति के लिए बदनाम बोअर शासन के तहत भारतीयों की दशा वहां नेटाल से भी बुरी थी। गांधी जी को उम्मीद थी कि बोअर से निकलकर अब जबकि वहां का शासन ब्रिटिश शासकों के हाथों में आ चुकी है, तो भारतीयों के कष्ट कम हो गए होंगे। लेकिन यह जानकर उनको धक्का लगा कि भले ही ट्रांसवाल अंगरेज़ों का उपनिवेश बन गया हो, प्रवासी भरतीयों पर बंदिशें पहले से ज़्यादा थीं। अपमानजनक प्रतिबंध दूर होना तो दूर की बात थी, नियम अब तो और भी कड़े और अशोभन बना दिए गए थे।

युद्ध के पहले जो भारतीय चाहे जब ट्रांसवाल में दाखिल हो सकता था। अब वैसी स्थिति नहीं रह गई थी। उन सभी भारतीयों के लिए जो बोअर युद्ध के समय ट्रांसवाल छोड़कर चले गए थे, अब फिर से अपने घर वापस आने के लिए उन्हें परमिट लेना ज़रूरी कर दिया गया था। गांधी जी के लिए प्रिटोरिया जाने की अनुमति प्राप्त करना वहां के भारतीयों से संभव नहीं था। बोएर युद्ध के बाद ट्रांसवाल उजाड़-सा हो गया था, उसकी आर्थिक स्थिति बहुत ही खराब थी और वह संकट की घड़ी से वह गुज़र रहा था। वहां न खाने को अन्न थे, न ही पहनने ओढ़ने के लिए कपड़े। वहां के लोग घरबार छोड़ कर अन्य इलाक़ों में भाग गए थे। लड़ाई के कारण वहां की बहुत-सी दूकानें अब भी खाली और बंद पड़ी हुई थीं। दूकानों का अधिकांश माल बोअर सरकार साफ कर गई थी। ऐसी दूकानों को माल से भरवाना और उन्हें पुनः खुलवाना वहां के नए प्रशासकों की प्रमुख समस्या थी। यह काम धीरे-धीरे ही हो सकता था। जैसे-जैसे माल इकट्ठा होता जाए, वैसे-वैसे ही घर-बार छोड़कर भाग कर चले गए लोगों को वापस आने दिया जा सकता था। इस कारण प्रत्येक ट्रांसवाल वासी को परवाना लेना पड़ता था। जो गोरे थे उन्हें तो परवाना मांगते ही मिल जाता था। उनके लिए तो परवाने देने के दफ़्तर दक्षिण अफ़्रीका के अलग-अलग बंदरगाहों पर खोले गए थे। मुसीबत थी भरतीयों की। उनके लिए अलग विभाग खोला गया था।

लड़ाई के दिनों में भारत और लंका से कई अधिकारी और सिपाही दक्षिण अफ़्रीका पहुंच गए थे। लड़ाई के बाद उनमें से जो वहीं बसना चाहते थे, उन्हें हर तरह की सुविधा मुहैया करना वहां के प्रशासकों का काम था। इसके लिए एशियाटिक विभाग नाम से अलग महकमा ही खोल दिया गया था। इसी नए विभाग की सिफ़ारिश पर ही एशियावासियों को परवाने मिल सकते थे। परमिट देने की प्रक्रिया लंबी थी। भारतीयों को इस महकमे के अफसर के पास अर्ज़ी भेजनी होती थी। वह मंज़ूर हो गई तो डरबन या किसी दूसरे बंदरगाह से आमतौर पर परवाना मिल जाता था। हालाकि उस दफ़्तर में एशियाई मूल के लोग के काम करते थे लेकिन उनकी तानाशाही गोरों से भी ज़्यादा भयानक थी। इस विभाग की हालत यह थी कि इनके यहां अर्ज़ी सप्ताहों पड़ी रहती। इसके अधिकारी लालची और लंपट थे। इनके भ्रष्टाचर और अत्याचार से भारतीय लोग त्रस्त थे। दलालों के चक्कर लगाने पड़ते। ग़रीब भारतीयों के पैसे लुट रहे थे। गांधी जी के पास इन सब के लिए समय कहां था? यदि वे अर्ज़ी देकर परवाने के मिलने की प्रतीक्षा करते तो चेम्बरलेन से ट्रांसवाल में मिलने की आशा रखना ही व्यर्थ था। चेम्बरलेन प्रिटोरिया के लिए रवाना हो चुका था। देरी की गुंजाइश नहीं थी, गांधी जी को भी पीछे-पीछे ही पहुंचना था।

गांधी जी को परवाने देने वाले अधिकारी से जान-पहचान नहीं थी। वे अपने पुराने मित्र डरबन के पुलिस सुपरिण्टेण्डेण्ट आर.सी. अलेक्ज़ेण्डर के पास पहुंचे। फ़ील्ड स्ट्रीट वाले आक्रमण मे अलेक्ज़ेंडर और उसकी पत्नी ने उनकी जान बचाई थी। उनसे मदद की गुजारिश की। अलेक्ज़ेण्डर ने तुरत मदद की। वह गांधी जी को साथ ले जाकर परवाना देने वाले पदाधिकारी से परिचय करा दिया। उसने यह भी बताया कि गांधी जी एक साल तक ट्रांसवाल में रह चुके हैं। इस आधार पर 29 दिसम्बर 1902 को गांधी जी को पुलिस अधिक्षक अलेक्ज़ेण्डर की सहायता से ट्रांसवाल जाने का परमिट मिला। सामान बांधने और ट्रेन पकड़ने के लिए गांधी जी के पास सिर्फ़ एक घंटे था। जल्दी से सबकुछ समेट कर वे प्रिटोरिया के लिए रवाना हुए। 1 जनवरी 1903 को वे प्रिटोरिया पहुंचे। प्रार्थना पत्र तैयार कर वे चेम्बरलेन से मिलने की अर्ज़ी देने गए, तो उन्हें मालूम हुआ कि ट्रांसवाल के निवासी न होने के कारण उन्हें उपनिवेश सचिव से नहीं मिलने दिया जाएगा।

पराजय से खीजा हुआ ट्रांसवाल भारतीयों के लिए नेटाल से भी ज़्यादा कठोर और निर्मम था। ट्रांसवाल में उपनिवेश सचिव से कौन प्रतिनिधि मंडल कब मिल सकता है इसका काम एशिया निवासियों का मामला देख रहे नए विभाग के जिम्मे था। इस विभाग के अधिकारी निरंकुश ढंग से प्रशासन चला रहे थे। ऐसा लगता था कि इस महकमे की स्थापना ही भारतीयों को दबाने के लिए किया गया है। एक तो खास तौर से यह महकमा कायम ही वर्ग-विशेष के स्वत्वों पर अंकुश रखने के लिए किया गया था उस पर से वहां के अधिकारी घुसखोर भी थे। 2 जनवरी 1903 को जब मिलने वालों की अपने प्रतिनिधि मंडल की अर्ज़ी गांधी जी ने बढ़ाई, तो उस अधिकारी की समझ में नहीं आया कि यह आदमी ट्रांसवाल में दाखिल कैसे हो गया? उसने तो इसकी इज़ाज़त का कोई आदेश दिया नहीं था। गांधी जी से सीधे पूछने की तो उसकी हिम्मत नहीं हुई लेकिन आसपास के अन्य लोगों से उसने पूछा, पर वे बेचारे क्या जानते कि यह कैसे हुआ? उस अधिकारी ने यह अनुमान लगाया कि पुरानी जान-पहचान का फ़ायदा उठाकर गांधी जी बिना अनुमति-पत्र के दाखिल हो गए होंगे। वह मन-ही-मन सोच रहा था कि अगर इसने ज़्यादा चपड़-चुपड़ की तो इसे गिरफ़्तार करवा दूंगा।


लड़ाई के बाद शांति बाहाली के लिए वहां के अधिकारियों को कुछ विशेष पावर दे दिए गए थे। उनमें से एक यह भी था कि यदि कोई बिना अनुमति-पत्र के ट्रांसवाल में दाखिल होता है, तो उसे गिरफ़्तार कर लिया जाएगा और क़ैद में रखा जाएगा। इसी क़ानून के तहत गांधी जी को पकड़ने के लिए सलाह-मशवरा चल रहा था। लेकिन स्पष्ट तौर पर कोई उनसे परवाना मांगने की हिम्मत न दिखा पाया। अधिकारियों ने डरबन के अधिकारियों से संपर्क साधा और तब उन्हें मालूम हुआ कि गांधी जी को अनुमति-पत्र दिया गया है। बेचारे निराश हुए, पर हिम्मत नहीं हारे। अड़ियल रुख उसने बरकरार रखा। तरह-तरह की चालें चलता रहा और गांधी जी को चेम्बरलेन के पास न पहुंचने दिया।


इस विभाग के अधिकांश अधिकारी एशिया से आए थे। इनमें रंगभेद के अलावे चालबाज़ी का गुण भी था। वे निरंकुश तो थे ही, षडयंत्र करने से भी बाज़ नहीं आते थे। जो अधिकारी पहले से वहां का काम देख रहे थे, उनपर कम-से-कम गोरों का अंकुश तो रहता था। पर ये एशिया से आए अधिकारी स्थानीय गोरों की भी नहीं सुनते थे, तो भारतीयों की दशा तो उस सुपारी जैसी थी थी जो सरौते के बीच फंसी हो। सबसे पहले तो सभी प्रतिनिधियों के नाम मांगे गए। फिर उन्हें उच्चाधिकारी के पास बुलाया गय़ा। वह अधिकारी लंका से आया था। वह सहायक उपनिवेश सचिव था और उसका नाम डब्ल्यू. एच. मूर था। वह सिलोन सिविल सर्विस का अधिकारी था। उसने सेठ तैयब हाजी खान महम्मद से पूछा, “गांधी कौन है? वह यहां क्यों आया है?”


तैयब सेठ ने बताया, “वे हमारे सलाहकार हैं। उन्हें हमने बुलाया है।”


साहब ने हुंकार भरी, “तो हम सब यहां किस काम के लिए बैठे हैं? क्या हम तुम लोगों की रक्षा के लिए नियुक्त नहीं हुए हैं? ये गांधी यहां की हालत क्या जानेगा?”


तैयब सेठ ने अपनी क्षमता के हिसाब से जवाब दिया, “आप तो हैं ही, पर गांधी तो हमारे ही माने जाएंगे न? वे हमारी भाषा जानते हैं। हमें समझते हैं। आप तो आखिरकार अधिकारी ठहरे।”


साहब ने हुक्म दिया, “गांधी को मेरे पास लाना।”


तैयब सेठ के साथ गांधी जी ने उसके दफ़्तर में प्रवेश किया। कुर्सी मिलना या बैठने को कहना तो मानों वहां की परंपरा के खिलाफ़ होता। उसने आंखें टेढ़ी करके पूछा, “कहिए जनाब! आप यहां किसलिए आए हैं?”


गांधी जी ने शान्त स्वर में कहा, “अपने भाइयों के बुलाने पर मैं उन्हें सलाह देने आया हूं।”


उस अधिकारी ने अपनी चाल चली, “पर क्या तुम जानते नहीं कि तुमको यहां आने का अधिकार ही नहीं है? परवाना तो तुम्हें भूल से मिल गया है। तुम यहां के निवासी नहीं माने जा सकते। मि. चेम्बरलेन के पास जाना तो दूर, तुम्हें यहां से वापस जाना होगा। रही बात यहां के हिन्दुस्तानियों की रक्षा, तो उसके लिए ही तो यह विभाग विशेष रूप से खोला गया है। ओके। अब तुम जा सकते हो।”


गांधी जी को तो कुछ बोलने का मौक़ा ही नहीं दिया उस अधिकारी ने। जब वे बाहर निकलने लगे तो उस अधिकारी ने गांधी जी के अलावा शिष्टमंडल के सभी सदस्यों को रुकने को कहा। गांधी जी के जाने के बाद उसने सबको धमकाया और कहा कि वे अपनी ख़ैरियत चाहते हैं तो तुरत गांधी को ट्रांसवाल से विदा कर दें। उसने भारतीयों से कहा कि वे गांधी जी से किसी प्रकार का संपर्क न रखें और उनके साथ एक विदेशी की तरह व्यवहार करें।

सभी लोग अपमान का कड़वा घूंट पीकर वापस आ गए। गांधी जी शांत थे। वे भावी कार्य-योजना की रूपरेखा मन-ही-मन तैयार कर रहे थे।
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