सोमवार, 30 अप्रैल 2012

गांधी जी की पहली सेक्रेटरी मिस सोंजा श्लेसिन


गांधी और गांधीवाद-112
गांधी जी की पहली सेक्रेटरी मिस सोंजा श्लेसिन

मोहनदास गांधी और हरमन कालेनबैक के साथ मिस सोंजा श्लेसिन
सन 1903 में गांधी जी की पहली स्टेनोग्राफर मिस डिक के चले जाने के बाद उनके साथ शॉर्टहैंड और टाइपिंग का काम करने वाला कोई नहीं था, इसलिए दफ़्तर की व्यवस्था फिर गड़बड़ा गई। पत्रों का अम्बार एक बार फिर से लगने लगा। गांधी जी के अभिन्न यूरोपीय मित्र थे हरमन कालेनबैक (Hermann Kallenbach)। तगड़ी कद-काठी और चपटे सिर वाले हरमन एक वास्तुकार थे। उनका जन्म पोलैंड में हुआ था और परवरिश जर्मनी में हुई थी। काफ़ी कम उम्र में ही वे दक्षिण अफ़्रीका आ गए थे। यहां पर वे कई धनी-मानी लोगों का घर डिजाइन कर चुके थे। जोहान्सबर्ग से थोड़ी दूर पर स्थित उनका खुद का मकान भव्यता और सुन्दरता का एक बेहद खूबसूरत नमूना था। वे अविवाहित थे और उनके पास खर्च करने के लिए समय और पैसों की कोई कमी नहीं थी।2  

एक दिन हरमन कालेनबैक सतरह साल की प्रसन्नचित्त एक युवती को लेकर गांधी जी के पास आए। कालेनबैक उस युवती के चाचा के परिचित थे। वे जर्मनी के उसी शहर के निवासी थे, जहां के कालेनबैक थे। वह युवती अपनी मां के कहने पर कालेनबैक के अभिभावकत्व में आई थी। उसका नाम था मिस सोंजा श्लेसिन (Sonja Schlesin)। 6 जून 1888 को मास्को, रूस में जन्मी, रूसी-यहूदी मूल की यह लड़की एक दक्षिण अफ़्रीकी हाईस्कूल में शिक्षिका का काम करती थी। उसके पिता का नाम इसिडोर श्लेसिन (Isidor Schlesin) और माता का नाम हेलेना डोरोथी (Helena Dorothy) था। श्लेसिन परिवार जून 1892 में मास्को से दक्षिण अफ़्रीका के केप ऑफ गुडहोप आकर बस गया था।3

सोंजा श्लेसिन ने 1903 में केप ऑफ गुडहोप के विश्वविद्यालय से मैट्रिक पास किया था और शॉर्टहैंड और टाइपिंग का काम जानती थी। कालेनबैक जब सोंजा को गांधी जी के पास लाए तो उन्होंने कहा था, वह समझदार और ईमानदार है, लेकिन बहुत शरारती और घमंडी है। शायद उद्धत भी। अगर उसे संभाल सकते हों तो रखिए।4

वह स्पष्टवादी, मनमौजी, मजाकिया स्वभाव की और रंगभेद के विचार से कोसों दूर थी। वह नौकरी करने के विचार से नहीं, अनुभव प्राप्त करने के उद्देश्य से वहां गई थी, लेकिन  अपनी मर्ज़ी से वहीं ठहर गई।5 वह काफ़ी सुलझी हुई महिला थी और किसी का अपमान करने से नहीं डरती थी। वह लोगों पर धौंस जमाती और उसके मन में जिसके बारे में जो विचार आते उसे उनके मुंह पर कहने से बिल्कुल भी नहीं झिझकती। वह अपनी मर्ज़ी की मालकिन थी और खुद को सही माँनने वाली प्रवृत्ति की नटखट बाला थी। उसके इस शरारती स्वभाव के कारण गांधी जी कभी-कभी परेशानी में भी पड़ जाते थे। लेकिन वह बहुत ही सरल और शुद्ध स्वभाव की थी। उसका निष्कपट स्वभाव इतना आकर्षक था कि उसकी हज़ारों शैतानिया क्षम्य थीं।6

उसकी कार्य-क्षमता पर तो संदेह की कोई गुंजाइश ही नहीं थी। अपना सारा काम वह समय पर संपन्न कर देती थी। यही नहीं, काम समय पर और सही ढंग से पूरा हो, इसमें वह किसी तरह की कोताही बर्दाश्त नहीं करती थी।1 रोज़ साढ़े सात बजे गांधी जी छह मील की साइकिल सवारी कर अपने घर से जोहान्सबर्ग शहर के मध्य अपने दफ़्तर पहुंचते थे। सुबह का अख़बार पढ़कर वे सोंजा को साढ़े दस बजे तक डिक्टेशन दिया करते थे। उसके अंग्रेज़ी-ज्ञान से गांधी जी काफ़ी प्रभावित थे और उन्होंने स्वीकार किया कि उसका अंग्रेज़ी-ज्ञान  उनसे अधिक है।1 इस कारण उसके द्वारा टाइप किए बहुत से पत्रों को दुबारा जांच किए बिना ही, वे हस्ताक्षर कर दिया करते थे। गांधी जी को विश्वास था कि सोंजा श्लेसिन उनके विचार एवं जीवन-दर्शन को अच्छी तरह समझती है, सो उसके मसौदे में बदलाव की कोई गुंजाइश नहीं होगी।

समय के साथ, गांधी जी के दर्शन और विचारों को उसने पूर्णतः आत्मसात कर लिया था। गांधी जी भी उसकी त्यागवृत्ति से काफ़ी प्रभावित थे। काफ़ी अरसे तक उसने सिर्फ़ छह पौंड प्रति माह पर काम किया। जब तक वह गांधी जी के साथ रही, उसने दस पौंड से अधिक वेतन कभी नहीं लिया।1 जब भी कभी गांधी जी उसे अधिक तनख़्वाह लेने को कहते, उसका जवाब होता, “मैं वेतन के लिए यहां काम नहीं कर रही। मुझे आपके साथ यह काम करना अच्छा लगता है और आपके आदर्श मुझे पसंद हैं, इसलिए मैं यहां टिकी हूं।”1 उसने गांधी जी से साफ़-साफ़ कह दिया था, “मुझे अधिक की आवश्यकता नहीं है और यदि मैंने आवश्यकता से अधिक लिया, तो वह उस सिद्धांत के साथ छल होगा, जिसने मुझे आपकी ओर आकृष्ट किया है।”4 एक बार ज़रूरत पड़ने पर उसने गांधी जी से 40 पौंड लिए थे, लेकिन उधार। 1920 में गांधी जी के भारत लौट जाने के बाद वे चालीस पौंड, श्लेसिन ने मनी ऑर्डर से उन्हें भेज दिए थे।6

सोंजा के बाल लड़कों की तरह छोटे-छोटे थे। वह ऐनक लगाती थी। काला स्कर्ट और सफेद शर्ट पहना करती थी। वह नेक टाई भी बांधती थी। वह छोटे कद और भारी बदन की थी। उम्र से बड़ी दिखती थी पर उसमें बचपना भरा था।3 उसकी नटखट हरकतों से कालेनबैक चिढ़ते थे और गांधी जी परेशान हो उठते थे। उसके नटखटपन की एक कथा श्रीमती सुमित्रा गांधी कुलकर्णी (गांधी जी की पोती और श्री रामदास गांधी की पुत्री) ने अपनी पुस्तक में लिखी है। गांधी जी को सिगरेट पीने से सख्त नफ़रत थी। सोंजा श्लेसिन भी सिगरेट नहीं पीती थी। लेकिन गांधी जी को चिढ़ाने के इरादे से उसने एक दिन दफ़्तर में सिगरेट सुलगा ली। इतना ही नहीं उसने सिगरेट का धुआं गांधी जी की तरफ़ छोड़ दिया। गांधी जी क्रोधित हुए। उन्होंने श्लेसिन को दो तमाचे जड़ दिए। मज़ाक़ की भी एक सीमा होती है। सोंजा ने तो आज हद ही पार कर दी थी। दफ़्तर के सभी सदस्यों के सामने सोंजा को सज़ा मिली थी। लेकिन सोंजा ने इसका बुरा नहीं माना। न ही गांधी जी के प्रति उसके आदर भाव में कोई कमी आई।6 उस अवसर को याद करते हुए गांधी जी कहते हैं, “पहली बार मेरे सामने रोई और मुझसे माफ़ी मांगी और बाद में मुझे लिखा कि भविष्य में वह ऐसा कभी नहीं करेगी।7

गांधी जी के जीवनीकार रोबर्ट पेन ने सौन्जा को अराजकतावादी कहा। उनके अनुसार सोंजा श्लेसिन हुक्म चलाने के लिए बनी स्त्रियों में से थीं और गांधी जी स्वेच्छा से उसके शिकार बने। उन्होंने सोंजा को टेढ़ी, उतावली, घोर दुराग्रही, मर्दाना, दुस्साहसी और बेवकूफ़ आदि विशेषणों से नवाजा है।2 पेन यह भी भी बताते हैं कि उसे सताए गए लोगों की सेवा करने से संतुष्टि मिलती थी। भारतीय समुदाय की सहायता के लिए मिली पोलाक (हेनरी पोलाक की पत्नी) ने जब 1909 में ट्रांसवाल इंडियन विमेन्स एसोसिएशन की स्थापना की तो सोंजा श्लेसिन को उसका सचिव बनाया गया। उसने इस काम को भी बहुत ही कुशलता पूर्वक निभाया।8


सोंजा श्लेसिन फौलादी संकल्प वाली, काफ़ी हिम्मती और निर्भीक लड़की थी। वह काम और धुन की पक्की थी। दिन-रात की परवाह किए बगैर वह अपना काम पूरा किया करती थी। आधी को रात को भी कहीं जाना होता, तो वह अकेली ही चली जाती। जंगल की राह और फिनिक्स जैसे जीव-जंतु से भरे स्थान में भी वह किसी का साथ न मांगती और कभी यदि गांधी जी किसी को साथ लेजाने को कहते तो वह मना कर देती। अपनी जिम्मेदारी वह  भली-भांति समझती थी। एक बार जब गांधी जी और उनके अधिकतर सहयोगी जेल में थे, तब उसने, लगभग अकेले ही सत्याग्रह-आंदोलन चलाया था।

वह लाखों पौंड का हिसाब-किताब रखती और गांधी जी का सारा पत्र-व्यवहार करती थी। तेरह वर्ष के देवदास गांधी के साथ उसने इंडियन ओपिनियन का सारा काम सम्भाला हुआ था। कई बार सत्याग्रह के ताजा समाचार देर रात को पहुंचते। तब तक साप्ताहिक का मैटेरियल सेट होकर मशीन पर चढ़ा होता था। लेकिन श्लेसिन उस बने-बनाए सेट को उतारती, ताजा समाचार को सेट में बैठातीं और सुबह से पहले उसे छापकर आतुर पाठकों तक पहुंचा देती। उन दिनों जनता बेसब्री से “इंडियन ओपिनियन” के आने की प्रतीक्षा करती थी।6 अनेक बाधाएं आई पर वह बहादुर महिला मानों थकना जानती ही न हो। श्लेसिन ने गांधी जी के दक्षिण अफ़्रीका के सत्याग्रह आंदोलन में भी सहयोग दिया। गांधी जी ने खुद स्वीकार किया है, तब वह सिर्फ़ सोलह साल की थी, लेकिन अपने खुलेपन और बचाव करने की तत्परता से उसने मेरे मुवक्किलों और साथी सत्याग्रहियों का मन मोह लिया। वह शीघ्र ही न केवल मेरे कार्यालय की बल्कि संपूर्ण आंदोलन की नैतिकता की प्रहरी बन गई।4

गांधी जी के साथ काम करते हुए कुछ ही दिनों में वह गांधी परिवार में घुल-मिल गई। हालाकि उसने विवाह न करने का निश्चय किया हुआ था, किन्तु उसके व्यवहार में मातृत्व की सहज प्रवृत्तियां स्पष्ट झलकती थीं। गांधी जी और कस्तूरबा आंदोलन के कारण सतत व्यस्त रहते या जेल जाते रहते थे, लेकिन सोंजा श्लेसिन ही गांधी जी के पुत्र रामदास आदि को शिक्षा-दीक्षा देती थी और उनकी परवरिश करती थी। रामदास गांधी ने बाद में स्वीकार किया है कि मिस श्लेसिन से उन्होंने काफ़ी कुछ सीखा है। वो गुस्सा करती तो थीं, पर उनका गुस्सा क्षणिक होता था। वास्तव में जब इतनी आत्मीयता उस परिवार के प्रति वो रखती थीं, तो गुस्सा भी उसे अधिकार से करती थी। वह हमेशा हंसती रहती थी, और उसके गालों में बने डिम्पल बड़े मोहक लगते थे। फिनिक्स आश्रम के सब बड़े लोग जब जेल में होते, तो सोंजा श्लेसिन सब बच्चों की पढ़ाई-लिखाई ज़ारी रखती। उनके अभ्यास का क्रम टूटने नहीं देती। बच्चों में उत्साह कायम रखने के लिए खेलकूद प्रतियोगिताओं का अयोजन करती। बच्चों में पुरस्कार का वितरण करती। बच्चों को डरबन ले जाकर चिड़ियाघर, संग्राहालय, वनस्पति उद्यान, अस्पताल आदि घुमाती थी। समुद्र स्नान और पिकनिक पर भी ले जाती। वह भी तब जब गांधी जी सींखचों के पीछे बंद थे। मुश्किल से दो व्यस्क लोगों के साथ सत्रह नादान बच्चों को मिस श्लेसिन ने छह महीने तक संभाला और आश्रम-प्रवृत्ति  का निर्वाह किया।6

जनवरी 1911 में उसने केप ऑफ गुडहोप से ही इंटरमीडिएट ऑफ आर्ट्स की परीक्षा पास की। दूसरे विश्व युद्ध के बाद श्लेसिन ने 1920 से 1924 के बीच बी.ए. और एम.ए. भी पास किया। 1914 में गांधी जी दक्षिण अफ़्रीका से भारत वापस लौट आए। श्लेसिन उसके बाद ट्रांसवाल के एक स्कूल क्रूगर्सड्रॉप में अध्यापिका बन गई। अध्यापिका के रूप में काम करते वक़्त उसने काला पोशाक धारण कर लिया था। लोग उसे एकांतप्रिय और सनकी शिक्षिका के रूप में याद करते हैं।7 वह वहां बच्चों को लैटिन पढ़ाती रही। जून 1933 में 55 साल की उम्र में उसने अध्यापन के पेशे से अवकाश ग्रहण कर लिया।  इस दरमियान उसके सिर्फ़ दो विद्यार्थी परीक्षा में असफल हुए।

उसके आवास का नाम हेरिटेज(विरासत) था। गांधी जी के साथ उसके पत्र-व्यवहार 1947 तक चलते रहे। गांधी जी बहुत स्नेह के साथ उसे “प्यारी बेटी” कहकर संबोधित करते थे। भारत लौटने के बाद गांधी जी को सोंजा का स्थानापन्न तलाश करने में पूरे दो साल लग गए, तब जाकर उन्हें महादेव देसाई मिले। कलेक्टेड वर्क्स के 15वें जिल्द के अनुसार 2 जून 1919 को लिखे एक पत्र में गांधी जी ने सोंजा को लिखा था, “कितनी शिद्दत से चाहता हूं कि तुम यहां होती, कई कारणों से! लेकिन मुझे अकेला ही चलना है। यहां कोई डोक नहीं है। कोई कैलेनबैक, कोई पोलाक भी नहीं है। ... सुनकर तो अजीब लगेगा, लेकिन यहां मैं दक्षिण अफ़्रीका से ज़्यादा अकेला महसूस करता हूं। ... मुझमें सुरक्षा का वैसा एहसास नहीं है जो तुम सबसे वहां मिलता था। ...”9

6 जनवरी 1956 को जोहान्सबर्ग के गौटेंग (Gauteng) के जेनरल अस्पताल में उनका देहावसान हो गया। उनके अंतिम दिनों में उनकी बहन रोज़ ने उनकी काफ़ी देख-भाल की। उच्च कोटि के चरित्र बल के माध्यम से उन्होंने गांधी जी के व्यावसायिक और राजनीतिक जीवन को सफल बनाया। गांधी जी द्वारा प्राप्त प्रारंभिक सफलताओं का श्रेय सोंजा की  प्रबंधन क्षमता को दिया जा सकता है। ऐसा कोई काम नहीं था जिसे वो पुरुषों के मुकाबले अच्छा न करती हो। ज़रूरत पड़ने पर गांधी जी के साथ वाद-विवाद करने से भी नहीं कतराती। उनका बलिदान, उनकी निर्भीकता, सिद्धांतवादिता, विचारों की शुद्धता और कर्मठता अद्वितीय थी। तभी तो, स्त्री-शक्ति की प्रतीक श्लेसिन की कर्तव्यपरायणता से प्रभावित होकर गोखले जी ने एक बार गांधी जी से कहा था, “इतना त्याग, इतनी पवित्रता, इतनी निर्भयता और इतनी कुशलता मैंने बहुत थोड़ों में देखी है। मेरी दृष्टि में तो मिस श्लेसिन तुम्हारे साथियों में प्रथम पद की अधिकारिणी है।”1

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संदर्भ :
  1. सत्य के प्रयोग  आत्मकथा, एम.के. गांधी 
  2. The Life And Death Of Mahatma Gandhi  Robert Payne 
  3. http://www.sahistory.org.za/people/sonja-schlesin
  4. दक्षिण अफ़्रीका के सत्याग्रह का इतिहास  मोहनदास करमचंद गांधी 
  5. महात्मा गांधी और उनकी महिला मित्र  गिरिजा कुमार 
  6. महात्मा गांधी मेरे पितामह (खंड-1)  सुमित्रा गांधी कुलकर्णी
  7. Sonja Schlesin, Gandhi’s South African Secretary – George Paxton, (2006)
  8. Mohandas  Rajmohan Gandhi 
  9. http://www.scribd.com/search?query=collected+works+mahatma+gandhi (for collected works of M.K. Gandhi)
  10. Gandhi Ordained in South Afrika  J.N. Uppal 
  11. गांधी जी एक महात्मा की संक्षिप्त जीवनी  विंसेंट शीन 
  12. Satyagraha  Savita Singh 
  13. The Life of MAHATMA GANDHI LOUIS FISCHER
  14. Gandhi  A Patriot in South Africa Joseph J Doke 
  15. GANDHI A LIFE REVISITED – Krishna Kripalani



बृहस्पतिवार, 26 अप्रैल 2012

सूफ़ी रहस्यवाद-2


सूफ़ियों ने विश्व-प्रेम का पाठ पढ़ाया अंक-13
यदि सत्‍यता व ईमानदारी मुझे सहज लगती है तो परमात्‍मा से प्रेम भी सहज प्राप्‍त हो सकता है।

पिछले अंक में जहां हमने बात छोड़ी थी, वहीं से शुरू करते हैं। हज़रत इमाम ग़ज़ाली रह. ने कीमिया-ए-सादात में कहा है, मानव हृदय एक सरोवर की तरह है। इस सरोवर के तल की खुदाई करनी होगी जिससे स्वच्छ जल का सोता फूटे और सरोवर को भर दे। जब तक बाहरी पानी रहेगा इसका जल स्वच्छ हो ही नहीं सकता।

एक छोटी सी सूफ़ी कथा है।
हज़रत हसन बसरी रह. नदी के किनारे नाव का इंतज़ार कर रहे थे। हबीब नामक उनका शिष्य आया और बोला, “उस्ताद! आप किस चीज़ का इंतज़ार कर रहे हैं?”
वे बोले, “नाव का।
तो शिष्य बोला, “क्यों?”
वे बोले, “नदी पार करनी है।
शिष्य ने कहा, “ इसमें क्या बड़ी बात है? अपने दिल से जलन, बैर और सांसारिकता निकाल फेंकें, अंतःकरण को पवित्र कर लें और ख़ुदा पर यक़ीन कर नंगे पांव चलें, आसानी से नदी पार कर लेंगे।
संत ने सोचा, ‘मेरा चेला मुझे ही सीख दे रहा है।बोले, “तू कहीं पगला तो नहीं गया है?”
हबीब कुछ नहीं बोला, नदी में पांव रखा व चलता चला गया। गुरुदेव देखते रह गए। फिर वह लौट कर आया तो गुरु ने पूछा, “मुझसे से ही इल्म लेने वाले, आज तूने मुझे इल्म दे दिया। कैसे हुआ यह सब?”
हबीब बोला, “आपकी सीख सुनकर मैं अपना दिल साफ़ करता चला गया!


कहने का तात्पर्य यह है कि जब तक हृदय के अंतस्तल में आत्म-ज्ञान नहीं उपजेगा हम बाहरी ज्ञान (इंद्रिय-जनित ज्ञान) से मुक्ति नहीं पा सकते। रहस्यवाद के अनुसार इबादत की हक़ीक़त को महत्व दिए बिना कर्मकांड व्यर्थ है। चूंकि ईश्वर शुद्ध हृदय में ही निवास करता है इसलिए हमें अपना हृदय पवित्र रखना चाहिए। ईश्वर को प्राप्त करने के लिए अहंकार का नाश ज़रूरी है। हमें ईश्वर की भक्ति में पूरी तरह लीन हो जाना चाहिए। इसके लिए साधक को चार स्थितियों से गुज़रना होता है शरीयत, तरीक़त, हक़ीक़त और मारिफ़त।

पहली स्थिति (शरीयत) में साधक ख़ुदा की सत्ता से प्रभावित होता है। इस्लाम की सबसे बुनियादी मान्यता है कि अल्लाह एक है। उसने कुछ नहीं से संसार की रचना की। क़ुरआन में कहा गया हैला इलाह इल्लल्लाह यानी अल्लाह के सिवा दूसरा ईश्वर नहीं है। रहस्यवाद में  वहदतुल वुजूद” पर ज़ोर दिया गया है, अर्थात्‌ हक़ीक़ी वुजूद सिर्फ़ ख़ुदा है। दूसरा मत है वहदतुल शुहूद जो मानता है कि वुजूद चाहे क्षणिक और छायामात्र ही क्यों न हों लेकिन दूसरे वुजूद भी हैं और ये तब भी होते हैं जबकि रूहानी आंख से दर्शन केवल एक हक़ीक़ी वुजूद का ही हो रहा हो।

अल्लाह के अलावा किसी अन्य स्रष्टा-शक्ति की कल्पना ही नहीं की गई है। वह तो “ला इब्तिदा ला इंतिहा” है। न उसका कोई आदि है, न अंत ही। ज़ाहिर (प्रत्यक्ष) और बातिन (अप्रत्यक्ष) दोनों जगत का वही स्वामी है। वही सर्जक है, वही पालक है, वही संचालक है। “वहदतुल वज़ूद ख़ालिकुस्समावाते फ़िल अर्दे” – सारा जड़-चेतन जगत उसी से उपजा है, सबमें उसी के नूर का ज़हूर है। एक तरफ़ तो वह इतना विराट है कि सारी कायनात में उसका अस्तित्व फैला हुआ है, दूसरी तरफ़ वह इतना सूक्ष्म है कि वह व्यक्ति की आत्मा में समा जाता है। रूह में बस जाता है। क़ुरआन शरीफ़ में इबादत दर्ज़ है –
सब्बहा लिल्लाहि मा फ़िस्समावाति वल अर्ज़ि व हुवल अज़ीज़ुल हकीम. 
लहु मुल्कुस्समावाति वल अर्ज़ि युहयी व युमीत व हुवा अला कुल्लि शैइन क़दीर.
 
हुवल अव्वलु वल आखि़रू वज़्ज़ाहिरू वल बातिनु व हुवा बिकुल्लि शैइन अलीम.
-अलक़ुरआन 57
, 1-3
अल्लाह की तसबीह की हर उस चीज़ ने जो आकाशों और धरती में है। वही प्रभुत्वशाली, तत्वशाली है (1आकाशों और धरती की बादशाही उसी की है। वही जीवन प्रदान करता है और मृत्यु देता है, और उसे हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है (2वही आदि है और अन्त भी और वही व्यक्त है और अव्यक्त भी। और वह हर चीज़ को जानता है (3)

यह सृष्टि, आकाश, धरती, चर-अचर सब उसी की मिल्कियत है। वही जिलाता है, वही मारता है, न उसके पहले कोई था, न उसके बाद कोई है। वो अज़ीम (महान) है। अल्लाह एक वुजूद है और सारी कायनात उसी वुजूद की छाया और अक्स  है। तभी आत्मा के अंदर उपस्थित अल्लाह पुकार उठता है -  इन्नी अनल्लाह' ला इलाहा इल्ला अना – मैं के सिवा कोई दूसरा अल्लाह नहीं।

दूसरी स्थिति तरीक़त कि स्थिति में साधक उस ज्ञान को प्राप्त कर अपने कर्तव्य का निर्धारण करता है। यह ईश्वरीय ज्ञान की जिज्ञासा है, इसे इंद्रियों से प्राप्त नहीं किया जा सकता। यहां बुद्धि या तर्क से काम नहीं चलता। इसके लिए पूर्ण समर्पण का भाव होना चाहिए। सब मनुष्य एक ही ईश्वर की संतान हैं। अतः किसी भी मनुष्य से घृणा नहीं, सबसे प्रेम करना चाहिए। क्योंकि प्रेम से ही ईश्वर को पाया जा सकता है। कहा भी गया हैक़ल्बुल इन्साने बैतुल रहमाने यानी इंसान का दिल ख़ुदा का घर है। सूफ़ी मत वहदतुल वजूद यानी सर्वव्यापी ईश्वर में विश्वास रखता है। उसका सबसे प्रिय आवास मनुष्य का हृदय है। इसलिए सूफ़ियों के अनुसार ईश्वर आराधना की सबसे पहली कड़ी है कि किसी का दिल न दुखाया जाए। सूफ़ी संत हज़रत नज़ीरी रह. ने कहा है,
ज़ ख़ुद हरगिज़ नै आराज़म दिली रा,
कि मी तरसम दरे ऊ जाए तू बाशद।
अर्थात्‌ मैं किसी के दिल को कष्ट नहीं देता क्योंकि मैं जानता हूं कि वहां तू रहता है। बेशक मंदिर मस्जिद तोड़ो बुल्लेशाह है कहता, पर प्यार भरा दिल कभी न तोड़ो, जिस दिल में दिलवर रहता। हज़रत हाफ़िज ने भी कहा है,
मबाश दर पै आज़ार व हर चे ख़्वाही कुन,
कि दर, शरीयते माग़ीर अज ईन गुनाही नीस्त।
तू जो करना चाहे कर, बस दूसरों को कष्ट न दे क्योंकि हमारे आचार-शास्त्र में इससे बढ़कर और कोई पाप नहीं है।

तीसरी स्थिति हक़ीक़त की स्थिति में वह परमात्मा की शक्ति और उसके विराट रूप को जान लेता है। अब वह बेखुदी के आलम में दाखिल होता है। उसकी आत्मा पर उसके नूर की बारिश होती है। उसे इरफ़ान (आत्म-ज्ञान) होता है। इस प्रकार उसकी रूह (आत्मा) ज़मानी और मकानी (दिक्‌-काल) की हद से ऊपर उठकर लामकां (बिना देश का) की स्थिति में आ जाता है। वह आध्यात्मिक प्रेम की मदिरा में डूब जाता है। इस तरह इश्क़े हक़ीक़ी की अवस्था में उसे प्रियतम का प्रतिबिंब में नज़र आता है।

चौथी स्थिति मारिफ़त की स्थिति में वह परमात्मा को प्राप्त कर लेता है। साधक के आगे से सारे परदे उठ जाते हैं। ईश्वर की दिव्य ज्योति (दीदार-ए-इलाही) की उसे अनुभूति होती है। कुछ भी शेष नहीं रह जाता, जिसे फ़नाफ़िल्लाह कहते है। इस तरह फ़नाफ़िश्शेख (पीर या गुरु की शरण में जाने) से शुरू हुई यात्रा फ़नाफ़िर्रसूल के रास्ते फ़नाफ़िल्लाह तक पहुंचती है।  ईश्वर में लय हो जाने के इस मकामे लाहूती को सूफ़ी चिंतन की चरम स्थिति कहा जा सकता है। यह अनुभूति व्यक्ति अपनी निजी व्यक्तिगत आध्यात्मिक अनुभूति होती है। इसी लिए कहा गया है कि इस्लामी रहस्यवाद का संबंध अहले हाल यानी दृश्य से हैअहले क़ाल यानी प्रवचन से नहीं। सूफ़ी साधक व्यक्तिगत साधना पर ज़ोर देते थे। उनकी नज़र में परमात्मा और साधक का संबंध व्यक्तिगत और पारस्परिक है। हाल की स्थिति से ही सूफ़ी साधक ईश्वरीय-सौंदर्य का आनंद उठाना शुरू कर देते हैं। वह तो उसके नैसर्गिक सौदर्य कें मगन रहता है। सभी जगह वह अपने आराध्य की छवि पाता है।
अभी ज़ारी है ....
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बुधवार, 25 अप्रैल 2012

गांधी जी के विदेशी सहयोगी-1


गांधी और गांधीवाद-111

अच्‍छी व स्‍वच्‍छ प्रतियोगिता स्‍वस्‍थ बनाती है परन्‍तु ईर्ष्‍या एक घातक रोग है।


गांधी जी के विदेशी सहयोगी-1

किचन से भेंट

गांधी जी का मानना था कि जो अपने में विद्यमान ईश्वर को सबमें देखना चाहते हैं, उसे सबके साथ अलिप्त होकर रहने की शक्ति भी आनी चाहिए। इसी सिद्धांत को मानते हुए वे नए-नए लोगों से संपर्क स्थापित करते रहते और उनके साथ रहते हुए राग-द्वेष से दूर भी रहते। इसी सिद्धांत के तहत जब बोअर-ब्रिटिश युद्ध हुआ, तो अपना घर भरा होने के बावज़ूद उन्होंने जोहान्सबर्ग से आए हुए दो अंग्रेज़ों को अपने यहां टिका लिया। दोनों थियोसॉफिस्ट थे। उनमें से एक का नाम किचन था। जो बाद के दिनों में भी उनके लिए काफ़ी मददगार साबित हुआ।

उन्ही दिनों गांधी जी के पास चार भारतीय कारकुन (इन्तज़ाम करने वाला, कारिन्दा) हो गए थे। हालाकि वे उन्हें बेटे की तरह मानते थे, लेकिन उनके रहने से भी गांधी जी काम नहीं चल रहा था। उन्हें टाइपिंग नहीं आती थी। उन चार नवयुवकों में से दो को तो गांधी जी ने खुद ही टाइपिंग सिखाई, लेकिन उनका अंग्रेज़ी का ज्ञान बहुत ही कम था, इसलिए उनकी टाइपिंग कभी भी अच्छी हो ही न सकी। गांधी जी को ऐसे आदमी की भी ज़रूरत थी, जो हिसाब-किताब तो बराबर रख ही सके पत्र-व्यवहार भी कर सके। उन दिनों गांधी जी का काम भी काफ़ी बढ़ गया था। उनके लिए यह संभव नहीं हो पा रहा था कि वे वकालत और सार्वजनिक सेवा, दोनों का काम ठीक से कर सकें। नेटाल से भी किसी को बुला नहीं पा रहे थे क्योंकि परमिट की अड़चन थी। पत्रों का अम्बार लगता जा रह था। यदि कोई अंग्रेज़ भी मिल जाता तो उन्हें काफ़ी सुविधा होती, पर किसी काले के यहां कोई गोरा काम करने को तैयार होता क्या?

मिस डिक

गांधी जी टाइपराइटिंग एजेंट के पास गए और उससे बोले कि जिसे काले आदमी के अधीन नौकरी करने में अड़चन न हो, ऐसे टाइप राइटिंग करने वाले गोरे भाई या बहन को उनके लिए खोज दे। दक्षिण अफ़्रीका में शॉर्टहैंड और टाइपिंग का काम अधिकांशतः महिलाएं ही करती थीं। एक लड़की नई-नई स्कॉटलैंड से आई थी, उसका नाम कुमारी डिक था। वह रंग-भेद से अछूती थी। उसने एक भारतीय के लिए काम करने की अपनी इच्छा ज़ाहिर की थी। उस एजेंट ने मिस डिक को गांधी जी के पास भेज दिया।

गांधी जी ने उससे पूछा, “आपको किसी भारतीय के अधीन काम करने में कोई कष्ट तो नहीं होगा?”
उसने कहा, “बिल्कुल नहीं।”
“आप वेतन कितना लेंगी?”
“क्या साढ़े सतरह पौंड आपके ख़्याल में अधिक होंगे?”
“आपसे मैं जितने काम की आशा रखता हूं, अगर उतना काम आप करेंगी तब तो मैं इसे बिल्कुल अधिक नहीं समझूंगा। आप काम पर कब से आ सकेंगी?”
“आप चाहें तो इसी क्षण से।”
गांधी जी खुश हुए और उस महिला को सामने बैठने को कहा और डिक्टेशन देना शुरू कर दिया।

गांधी जी के लिए मिस डिक काफ़ी उपयोगी साबित हुई। कुछ ही समय में उसने दफ़्तर का पत्र-व्यवहार अच्छी तरह से संभाल लिया। सिर्फ़ सहायक ही नहीं, वह गांधी जी के घर में बेटी की तरह रही। गांधी जी को उसे कभी ऊंची आवाज़ में कुछ भी न कहना पड़ा। शायद ही वह अपने काम में कोई ग़लती करती रही हो। खाते-बही का हिसाब-किताब भी वह रखने लगी। कुछ ही दिनों में उसने अपने काम से गांधी जी का विश्वास अर्जित कर लिया। दोनों का एक-दूसरे पर भरोसा दिनों-दिन बढ़ता गया। निजी मामलों में भी वह गांधी जी की सलाह लिया करती थी। यहां तक कि जब अपना जीवन-साथी पसंद करने की बारी आई तो उसने इसके लिए गांधी जी से सलाह ली और अपनी शादी तय की। उसका कन्यादान भी गांधी जी ने ही किया और उसकी शादी का पूरा ख़र्च वहन किया।54 अब वह मिस डिक से मिसेज मैकडॉनल्ड बन गई थी। गांधी जी ने उसे सहर्ष विदा किया। इसके बाद वह गांधी जी से अलग रहने लगी। हां काम की अधिकता हो जाने पर यदा-कदा गांधी जी को उसकी सहायता मिलती रही।
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रविवार, 22 अप्रैल 2012

समय के साथ

"एक अच्छा विचार, हमें फ़िज़ूल के श्रम से बचाता है"।


लघु कथा
समय के साथ


पिताजी ने कहा था बेटा जब बड़ा आदमी बन जाना तो अपनी आत्मकथा लिखना। इस पदोन्नति के बाद तो गौरव काफ़ी बड़े पोस्ट पर आ गया है। काफ़ी बड़ा अधिकारी हो गया है। दो साल पहले पिताजी गुज़र गए। उनकी इच्छा पूरी करनी है। तो अब अपनी आत्मकथा लिख रहा है।

माँ ज़िन्दा है। आत्मकथा अपनी जननी से ही शुरु करता है।

मां ने जन्म दिया। पाला, पोशा, बड़ा किया। इस लायक़ बनाया।

उफ़! इस बल्ब की रोशनी में ठीक से दिखता भी नहीं। पर्दे हटाने चल देता है। रोशनी भीतर आ गई। ज़्यादा साफ़ दिख रहा है। उसकी नज़र मां पर पड़ती है, .. मां सामने सड़क पार कर घर ही तो आ रही है। साथ में उसका बेटा बिट्टू भी है। उसे स्कूल से लाने गई थी। उसकी उंगलियां थामे मां उसे रास्ता पार करा रही है। उसके बैग आदि अपने कंधे पर रख कर। उसके सिर पर मां का आंचल है। उसे धूप न लगे। बिट्टू को कोई तकलीफ़ नहीं होने देती मां।

गौरव को भी कहां होने देती थी कोई तकलीफ़। उसे भी तो इसी तरह उसने बड़ा किया। बड़ा बनाया। बच्चों का कितना ख़्याल रखती है मां। समय के साथ-साथ बिल्कुल भी नहीं बदली मां।

और गौरव ... ?!
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शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

नए-नए लोगों से संपर्क

गांधी और गांधीवाद-110

नए-नए लोगों से संपर्क

gandhi (10)

गांधी जी का काम दोनों स्तरों पर चल रहा था। एक तरफ़ एशियाटिक डिपार्टमेंट की ज़्यादतियों के विरोध में संघर्ष तो दूसरी तरफ़ वकालत का पेशा। एशियाटिक डिपार्टमेंट का प्रमुख नीतिकार, ट्रांसवाल का सहायक उपनिवेश सचिव लियोनेल कर्टिस (Lionel Curtis) था। वह एक उदार प्रकृति का इंसान था। 1903 में जब गांधी जी उससे मिले थे, तो उन्होंने उसे भारतीयों की उद्यमशील, अल्पव्ययी और धैर्य जैसी अच्छी आदतों से उसपर प्रभाव डालने का प्रयत्न किया था। गांधी जी को सुनने के बाद उसका जवाब था, “मि. गांधी! यह तो वही बात हुई कि आप एक धर्म-दीक्षित को उपदेश दे रहे हों। मैं इन सब चीज़ों से वाकिफ़ हूं। आपकी जानकारी के लिए मैं आपको बताना चाहता हूं कि यूरोपीय भारतीयों से उनकी बुराई से नहीं उनके सदाचार से डरते हैं।”

सदाचार का सबसे बड़ा उदाहरण तो गांधी जी स्वयं थे। उनके अच्छे व्यवहार के कारण न सिर्फ़ मुवक्किलों के बीच बल्कि साथी वकीलों के बीच भी उनकी प्रतिष्ठा बढ़ती जा रही थी। अब तक वे एक जाने-माने वकील के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके थे, जिनका सम्मान कोर्ट भी करती थी। क्रॉस एक्ज़ामिनेशन के वे माहिर वकील माने जाते थे। ग़लत गवाही को तोड़ने की कला उन्हें खूब आती थी। साथ ही अपने मुवक्किल से भी वे सख्ती से पेश आते थे। उनके साथ हुए करार की एक शर्त यह भी होती थी कि अदालती कार्रवाई के दौरान किसी भी बिन्दु पर यदि उन्हें यह अहसास हुआ कि मुवक्किल ने उनके साथ धोखा किया है, तो वे अपने आपको उस केस से अलग कर लेंगे। गांधी जी का हमेशा से अपने मुवक्किलों को यह सलाह रहती थी कि मामले को कोर्ट के बाहर ही निपटा लिया करें।

नेटाल में जहां उनकी औसत मासिक आमदनी 150 पौंड थी, वहीं ट्रांसवाल में यह 300 पौंड तक हो गई थी। धीरे-धीरे उसमें बढोत्तरी ही हो रही थी। यह अब सालाना पांच से छह हज़ार पौंड तक हो गई थी। ग़रीबों से वे कम या बिल्कुल ही फ़ीस नहीं लेते थे। गांधी जी का मानना था कि एक वकील का कर्तव्य है कि वह एक दोषी को निर्दोष साबित करने के बजाए कोर्ट को सच तक पहुंचने में मदद करे। वे मुवक्किल से सच बोलने के लिए कहते, अपना अपराध कबूल कर दंड स्वीकार करने की सलाह देते। एक वकील के रूप में भी उनका प्रमुख उद्देश्य होता कि व्यक्ति में परिवर्तन आना चाहिए।

इन सब बढ़े हुए काम के लिए उन्हें कई सहायकों की ज़रूरत पड़ती थी। दक्षिण अफ़्रीका में गांधी जी ने अपने भारतीय मुंशियों और अन्य कई मित्रों को अपने घर में परिवार के सदस्य के रूप में रखा था। उसी तरह वे अंग्रेज़ों को भी रखने लगे थे। हालाकि उनका यह व्यवहार साथ रहने वाले कई लोगों को अखरता था, फिर भी गांधी जी ने उन्हें अपने घर में जगह दी हुई थी। इस कारण उन्हें कड़वे-मीठे दोनों तरह के अनुभव हुए, पर उनके व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया। हालाकि ऐसे कड़वे अनुभव देशी-विदेशी दोनों तरह के मित्रों के संबंध में हुए, फिर भी गांधी जी को इसके लिए न कभी भी पश्चाताप हुआ और न ही उन्होंने अपनी आदत में परिवर्तन लाया।

किचन से भेंट

समय के साथ मित्रों ने उनकी इस आदत को उदारतापूर्वक सहन भी किया। नए लोगों के साथ जब भी कोई दुखद स्थिति आई गांधी जी ने उनका दोष बताने में कभी संकोच भी नहीं किया। गांधी जी का मानना था कि जो अपने में विद्यमान ईश्वर को सबमें देखना चाहते हैं, उसे सबके साथ अलिप्त होकर रहने की शक्ति भी आनी चाहिए। इसी सिद्धांत को मानते हुए वे नए-नए लोगों से संपर्क स्थापित करते रहते और उनके साथ रहते हुए राग-द्वेष से दूर भी रहते। इसी सिद्धांत के तहत जब बोअर-ब्रिटिश युद्ध हुआ, तो अपना घर भरा होने के बावज़ूद उन्होंने जोहान्सबर्ग से आए हुए दो अंग्रेज़ों को अपने यहां टिका लिया। दोनों थियोसॉफिस्ट थे। उनमें से एक का नाम किचन था। जो बाद के दिनों में भी उनके लिए काफ़ी मददगार साबित हुआ।

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संदर्भ और पुराने पोस्टों के लिंक यहां पर

मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

सूफ़ी रहस्यवाद-1


सूफ़ियों ने विश्व-प्रेम का पाठ पढ़ाया अंक-12

सूफ़ी रहस्यवाद-1

बसरा में दसवीं सदी में कुछ तेजस्वी लोगों का एक दल था, जिसे इख़्वानुस्सफ़ा (पवित्र बिरादरी) कहा जाता था। एक आदर्श मनुष्य की चर्चा करते हुए इस बिरादरी ने लिखा हैएक आदर्श आदमी वह है, जिसमें इस तरह की उत्तम बुद्धि और विवेक हो  जैसे कि वह ईरानी मूल का हो, अरब आस्था का हो, धर्म में सीधी राह की ओर प्रेरित हनफ़ी (इस्लामी धर्मशास्त्र की सबसे तार्किक और उदार शाखा के मानने वाले) हो, शिष्टाचार में इराक़ी हो, परम्परा में यहूदी हो, सदाचार में ईसाई हो, समर्पण में सीरियाई हो, ज्ञान में यूनानी हो, दृष्टि में भारतीय हो, ज़िन्दगी जीने के ढंग में रहस्यवादी (सूफ़ी) हो।

यह वक्तव्य इस्लामी संस्कृति को स्पष्ट करता है। उसके उदार प्रवृत्ति को उजागर करता है। विविधता में एकता की कल्पना को साकार करता है। दुनिया भर की अच्छी-अच्छी विचार-धाराओं को अपनाकर सूफ़ियों ने विश्व-प्रेम का पाठ पढ़ाया। सूफ़ीमत जिसका उदय पैगम्बर मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ माना जाता है, उसके विकास में इस उदार मानसिक माहौल का बहुत बड़ा योगदान था। निश्चित रूप से सूफ़ी मत का स्रोत पैगम्बर मुहम्मद स. हैं। उनकी प्रकाशना के दो स्तर हैं, एक क़ुरआन, जिसे इल्मे सफ़ीना (किताबी ज्ञान) कहा गया है, और यह सबके लिए है। दूसरा इल्मे सीना (गुह्य ज्ञान) जो सूफ़ियों के लिए है।

जहां तक रहस्यवाद का सवाल है, आरबेरी (Arberry) के शब्दों में यह वह भावना है जो हमेशा से प्रकृति के रहस्यों को जानने के लिए मानव को प्रेरित करती रही है। ज्ञान के क्षेत्र का अद्वैतवाद भावना के क्षेत्र में आकर रहस्यवाद कहलाता है। रहस्यवाद वह सिद्धान्त है जिसके अनुसार अव्यक्त अथवा अज्ञात को विषय बनाकर उसके प्रति प्रणय, विरह आदि के भाव व्यक्त करते हैं। रहस्यवाद कोई विचार या चिंतन नहीं, यह एक प्रवृत्ति है, एक भावना है। रहस्यवादी भावना आध्यात्मिक रहस्यों को जानने के लिए इन्सान को प्रेरित करती है। इसके द्वारा व्यक्ति अलौकिक शक्ति से अपना संबंध कायम करना चाहता है। यह संबंध इतना प्रगाढ़ हो जाता है कि जीव की अनुभूतियां उस महाशक्ति के साथ जुड़ जाती हैं। अपने अस्तित्व को भूल जीव हर वक़्त अपने प्रिय का स्मरण करता रहता है तथा उसी में लीन हो जाता है। अतः हम कह सकते हैं कि रहस्यवाद आत्मा की परमात्मा को प्राप्ति की प्रवृत्ति है।

रहस्यवाद अपनी प्रकृति से दो प्रकार का होता है -- एक साधनात्मक रहस्यवाद और दूसरा भावनात्मक रहस्यवाद। हमारे यहां का योगमार्ग साधनात्मक रहस्यवाद है। यह अनेक अप्राकृतिक और जटिल अभ्यासों द्वारा मन को अव्यक्त तथ्यों का साक्षात्कार कराने तथा साधक को अनेक अलौकिक सिद्धियां प्राप्त कराने की आशा देता है। तन्त्र भी साधनात्मक रहस्यवाद है। 

सूफ़ी सन्त महान विचारक और चिन्तक भी थे। वे सांसारिक भोग-विलास से दूर रहते थे और पवित्र एवं सदाचारी जीवन व्यतीत करने का उपदेश देते थे। उन लोगों ने न सिर्फ़  इस्लामी रहस्यवाद अपनाया बल्कि इस्लाम की सही जानकारी न रखने वालों  के कट्टरपंथी एवं कर्मकांडी विचारधाराओं का विरोध भी किया।  ज़कारिया इसहाक़ ने “साइंस और सूफ़िज़्म” शीर्षक आलेख के ज़रिए बताया है कि आध्यात्मिकता की जो शराब सूफ़ी मत में मिल रही थी, वो परम्परागत मुस्लिम समाज में उपलब्ध नहीं थी, क्योंकि जड़मूलवादियों ने क़ुरआन के शाब्दिक अर्थ को ही महत्व दिया और भीतरी अर्थ को न सिर्फ़ नज़रअंदाज़ किया बल्कि नकार दिया।

सूफ़ियों के यहां रहस्यात्मक माधुर्य भाव व्यापक स्तर पर दिखाई देता है। वे ईश्वर अथवा अल्लाह को सर्वव्यापी और सर्वगुण संपन्न मानते थे। हज़रत अबू-सैय्यद अबुल ख़ैर रह. के अनुसार ईश्वर की इच्छा का पूर्ण पालन अनिवार्य है। परिस्थितियों की अनुकूलता या प्रतिकूलता के संबंध में ऊहापोह, शंका या परीक्षा सूफ़ी मत के विरुद्ध है। सूफ़ीमत के अनुसार ईश्वर कभी कोई इच्छा पूरी नहीं करता। अगर कभी कुछ करता है तो यह उसकी रहमत है। इसलिए सबसे अच्छा उपाय समर्पण है। पूर्ण समर्पण। इसका मतलब यह है कि जो है उसी में राज़ी हो जाना चाहिए। सूफ़ी आनन्द और शांति की खोज में रहते हैं। इसलिए समर्पण अन्तः-प्रेरणा से हो।

सूफ़ियों के अनुसार ईश्वर सर्वव्यापी है। ईश्वर का वास मस्जिदों व मंदिरों में नहीं बल्कि मनुष्य के दिल में होता है और आत्मा ईश्वर का ही एक अंश है। हज़रत इमाम ग़ज़ाली रह. ने कीमिया-ए-सादात में कहा है, मानव हृदय एक सरोवर की तरह है। हमारी पांचों ज्ञानेन्द्रियां पांच नहरों की तरह हैं, जिनसे इस सरोवर में पानी आता है। लेकिन यदि इस सरोवर के तल से सोता को फूटना है तो पहले इसमें भरे पानी को उलीचना होगा। फिर इसमें जल भरने वाली नहरों को भी मूंद देना होगा। ताकि बाहर से आने वाला पानी रुक जाए। फिर इस सरोवर के तल की खुदाई करनी होगी जिससे स्वच्छ जल का सोता फूटे और सरोवर को भर दे। जब तक बाहरी पानी रहेगा इसका जल स्वच्छ हो ही नहीं सकता। कहने का तात्पर्य यह है कि जब तक हृदय के अंतस्तल में आत्म-ज्ञान नहीं उपजेगा हम बाहरी ज्ञान (इंद्रिय-जनित ज्ञान) से मुक्ति नहीं पा सकते।

इबादत की हक़ीक़त को महत्व दिए बिना कर्मकांड व्यर्थ है। हमें अपना हृदय पवित्र रखना चाहिए क्योंकि ईश्वर शुद्ध हृदय में ही निवास करता है। ईश्वर को प्राप्त करने के लिए अहंकार का नाश ज़रूरी है। हमें ईश्वर की भक्ति में पूरी तरह लीन हो जाना चाहिए। इसके लिए साधक को चार स्थितियों से गुज़रना होता है शरीयत, तरीक़त, हक़ीक़त और मारिफ़त।
अभी ज़ारी है ....